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  • India : Why the Aam Aadmi Party needs a small lesson in Marxism by Saroj Giri

    Source: http://sanhati.com/excerpted/9209/

    Let us accept Arun Jaitley’s characterisation that the Aam Aadmi Party (AAP) government had no agenda, ideology or mandate.

    Is this not precisely what gives AAP the freedom and lucidity with which they act, fresh, unpredictable and unjaded, if not entirely anti-establishment?

    While AAP too is definitely gaming for the next elections, they do not

  • मोदी को जिताना हमारे लिए शर्म की बात होगी: काशीनाथ सिंह

    लोकसभा चुनाव में बनारस से नरेंद्र मोदी की उम्‍मीदवारी पर बीबीसी को दिए अपने साक्षात्‍कार के कारण अचानक चर्चा में आए हिंदी के वरिष्‍ठ लेखक काशीनाथ सिंह शहर के उन विरल लोगों में हैं, जिनके यहां पत्रकारों का मजमा लगा है। दिल्‍ली से बनारस पहुंचने वाला हर पत्रकार काशीनाथ सिं‍ह का साक्षात्‍कार लेना चाहता है, लिहाजा सबको वे क्रम से समय दे रहे हैं। प्रस्‍तुत है अरविंद केजरीवाल की रैली से ठीक एक दिन पहले 24 मार्च को काशीनाथ सिंह से उनके घर पर हुई अभिषेक श्रीवास्‍तव की बातचीत के प्रमुख अंश।



    बीबीसी वाले इंटरव्‍यू का क्‍या मामला था… अचानक आपकी चौतरफा आलोचना होने लगी?
    (हंसते हुए) उन्‍होंने जो दिखाया वह पूरी बात नहीं थी। बात को काटकर उन्‍होंने प्रसारित किया जिससे भ्रम पैदा हुआ। मैं आज से नहीं बल्कि पिछले पांच दशक से लगातार फासीवादी ताकतों के खिलाफ बोलता-लिखता रहा हूं। मेरा पूरा लेखन सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ रहा है। आप समझिए कि अगर काशी के लोगों ने इस बार मोदी को चुन लिया तो हम मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाएंगे। यह हमारे लिए शर्म की बात होगी।

    वैसे चुनाव का माहौल क्‍या है? आपका अपना आकलन क्‍या है?
    देखिए, ये आज की बात नहीं है। साठ के दशक में काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय में चला आंदोलन हो या फिर बाबरी विध्‍वंस के बाद की स्थिति, बनारस के लोग हमेशा से यहां की गंगा-जमुनी संस्‍कृति की हिफ़ाज़त के लिए खड़े रहे हैं। हम लोग जब साझा संस्‍कृति मंच की ओर से मोर्चा निकालते थे, तो नज़ीर बनारसी साहब मदनपुरा में हमारा स्‍वागत करने के लिए खड़े होते थे और यहां के मुसलमानों को अकेले समझाने में जुटे रहते थे। बाद में खुद नज़ीर साहब के मकान पर हमला किया गया, फिर भी वे मरते दम तक फासीवाद के खिलाफ़ खड़े रहे। आपको याद होगा कि दीपा मेहता आई थीं यहां पर शूटिंग करने, उनके साथ कैसा सुलूक किया गया। उस वक्‍त भी हम लोगों ने मीटिंग की थी और परचा निकाला था।

    इस बार की क्‍या योजना है? कोई बातचीत हुई है लेखकों से आपकी?
    लगातार फोन आ रहे हैं। दुर्भाग्‍य है कि कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों ने अपनी करनी से अपनी स्थिति खराब कर ली, वरना माहौल कुछ और होता। हम लोग इस बार भी लेखकों, रंगकर्मियों, संस्‍कृतिकर्मियों, फिल्‍मकारों से लगातार संवाद में हैं। एक परचा ड्राफ्ट किया जा रहा है। जल्‍द ही सामने आएगा। कोशिश है कि कुछ नामी-गिरामी चेहरों को कुछ दिन बनारस में टिकाया जाए। समस्‍या यह है कि बनारस से बाहर के लेखक नरेंद्र मोदी के खतरे की गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं। कल ही पंकज सिंह से बात हुई। उनका फोन आया था। कह रहे थे कि चिंता मत कीजिए, भाजपा सरकार नहीं बनेगी। मुझे लगता है कि यह नि‍श्चिंतता कहीं घातक न साबित हो।

    आप एक ऐसे लेखक हैं जो लगातार अपनी ज़मीन पर बना रहा और जिसने स्‍थानीय पात्रों को लेकर रचनाएं लिखीं। बनारस के स्‍वभाव को देखते हुए क्‍या आपको लगता है कि यहां का मतदाता मोदी के उसी शिद्दत से फासीवाद से जोड़कर देख पा रहा है?
    देखिए, बनारस यथास्थितिवादी शहर है। पुरानी कहावत है- कोउ नृप होय हमें का हानि। यहां के लोग इसी भाव में जीते हैं। इस बार हालांकि यह यथास्थितिवाद फासीवाद के पक्ष में जा रहा है। लोगों के बीच कोई काम नहीं हो रहा। आखिर उन तक अपनी बात कोई कैसे पहुंचाए। जिस अस्सी मोहल्‍ले पर मैंने किताब लिखी, अब वहां जाने लायक नहीं बचा है। मुझे दसियों साल हो गए वहां गए हुए। सब भाजपाई वहां इकट्ठा रहते हैं। लोगों के बुलाने पर जाता भी हूं तो पोई के यहां बैठता हूं। दरअसल, लोगों को लग रहा है कि बनारस से इस बार देश को प्रधानमंत्री मिलना चाहिए। यह एक बड़ा फैक्‍टर है। लोगों को लग रहा है कि लंबे समय बाद बनारस इतने लाइमलाइट में आया है, बड़े नेता यहां से खड़े हो रहे हैं। लोगों को लगता है कि मोदी को जितवाना उनकी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न है।

    लेकिन जो बात टीवी चैनलों के माध्‍यम से आ रही है, जिस हवा की बात की जा रही है, वह तो अस्‍सी और पक्‍का महाल के इर्द-गिर्द ही है। बाकी बनारस का क्‍या?
    ये बड़ी विडम्‍बना है। असल में ”काशी का अस्‍सी” इतनी चर्चित है कि यहां जो कोई नया अधिकारी आता है, उसे ही पढ़कर बनारस को समझता है। अभी कल ही दिल्‍ली से एक पत्रकार आई थीं और किताब का जि़क्र कर रही थीं। जिस अस्‍सी के बारे में मैंने लिखा है किताब में, वह बहुत पुरानी बात हो चुकी। वह अस्‍सी अब वैसा नहीं रहा। और बनारस सिर्फ अस्‍सी नहीं है। विडम्‍बना है कि इस किताब को पढ़कर लोग सोचते हैं कि अस्‍सी से ही बनारस का मूड जान लेंगे। अब इसका क्‍या किया जाए।    

    मोदी अगर जीत गए तो क्‍या माहौल खराब होने की आशंका है?
    बेशक, लेकिन एक आशंका लोगों के मन में यह भी है कि मोदी इस सीट को रखेंगे या वड़ोदरा चले जाएंगे। जहां तक मेरा मानना है, बनारस का य‍थास्थितिवाद फासीवाद की ज़मीन तो तैयार करेगा लेकिन यही प्रवृत्ति इस शहर को फासीवाद से अछूता बनाए रखेगी। लेकिन सवाल सिर्फ बनारस का नहीं, देश का है। अगर मोदी के खिलाफ़ कोई संयुक्‍त उम्‍मीदवार सारी पार्टियां मिलकर उतार देतीं, तो शायद उनकी लड़ाई मुश्किल हो जाती। अरविंद केजरीवाल को ही समर्थन दिया जा सकता था। पता नहीं कांग्रेस की क्‍या स्थिति है, आप लोग बेहतर जानते होंगे।

    कांग्रेस से तो दिग्विजय सिंह का नाम चल रहा है। संकटमोचन के महंत विश्‍वम्‍भरजी और काशी नरेश के लड़के अनंतजी की भी चर्चा है…।
    दिग्विजय सिंह का तो पता नहीं, लेकिन अगर विश्‍वम्‍भर तैयार हो गए तो खेल पलट सकता है। अनंत नारायण तो तैयार नहीं होंगे। विश्‍वम्‍भर के नाम पर शहर के ब्राह्मण शायद भाजपा की जगह कांग्रेस के साथ आ जाएं, हालांकि विश्‍वम्‍भर के ऊपर न लड़ने का दबाव भी उतना ही होगा। अगर विश्‍वम्‍भर वाकई लड़ जाते हैं, तो यह अच्‍छी खबर होगी।

    हां, इधर बीच ब्राह्मणों में कुछ नाराज़गी भी तो है भाजपा को लेकर… ?
    ये बात काम कर सकती है। हो सकता है कि भाजपा के वोट आ भी जाएं, लेकिन एनडीए बनाने के क्रम में मोदी छंट जाएंगे। पता नहीं राजनाथ के नाम पर सहमति बनेगी या नहीं, हालांकि राजनाथ ने काफी सधी हुई रणनीति से ठाकुरों को पूर्वांचल में टिकट दिए हैं। संघ के भीतर तो ठाकुरों को लेकर भी रिजर्वेशन है ही। हां, ब्राह्मण अगर नाराज़ है तो मुझे लगता है कि हमें एक ऐसे उम्‍मीदवार की कोशिश करनी होगी जो भाजपा के ब्राह्मण वोट काट सके।

    मतलब ब्राह्मणवाद इस बार फासीवाद की काट होगा?
    (हंसते हुए) हो सकता है… ब्राह्मणवाद के साथ तो हम लोग जीते ही आए हैं, उसे बरदाश्‍त करने की हमारी आदत है, कुछ और सह लेंगे। लेकिन फासीवाद तो मौका ही नहीं देगा।

    क्‍यों नहीं ऐसा करते हैं कि हिंदी के व्‍यापक लेखक, बुद्धिजीवी, संस्‍कृतिकर्मी समुदाय की ओर से आप ही प्रतीक के तौर पर चुनाव लड़ जाएं मोदी के खिलाफ़?
    (ठहाका लगाते हुए) देखो, हमें जो करना है वो तो हम करेंगे ही। हमने पहले भी ऐसे मौकों पर अपनी भूमिका निभाई है, आज भी हम तैयारी में जुटे हैं। अभी महीना भर से ज्‍यादा का वक्‍त है। उम्‍मीद है दस-बारह दिन में कोई ठोस कार्यक्रम बने। मैंने प्रलेस, जलेस, जसम आदि संगठनों से और खासकर शहर के रंगकर्मियों से बात की है। शबाना आज़मी, जावेद अख्‍़तर, गुलज़ार आदि को शहर में लाने की बात चल रही है। कुछ तो करेंगे ही, चुप नहीं बैठेंगे।

    चुनाव और मोदी के संदर्भ में नामवरजी से कोई संवाद…?
    नहीं, अब तक तो उनसे कोई बात नहीं हुई है। देखते हैं… करेंगे।


    (शुक्रवार पत्रिका में प्रकाशित और साभार) 
  • A Clarion Call for the Defeat of Modi Led Fascism by CWP India

    Narendra Modi  

    The common masses in general and the working class in particular of our country are facing a grave situation on the eve of the forthcoming election. The way the capitalist press and the media are projecting Mr. Narendra Modi as a man of destiny on whose shoulder the future of India rests shows the dangerous portents of glooming fascism.

    The last 10 years rule of UPA was

  • दयामनी बारला को बहुमत, जल जंगल जमीन पर हुकूमत !

    झारखण्ड के खूंटी लोकसभा सीट पर जैसे जैसे मतदान की तारिख नजदीक आ रही है, खूंटी में चुनावी सक्रियता बढ़ती जा रही है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में फर्क भी बढ़ता जा रहा है।  जहां एक ओर शहरी क्षेत्रों में झारखण्ड पार्टी, भाजपा  और कांग्रेस ने झंडे और पोस्टरों से पूरा बाज़ार पाट दिया है, वहीँ दूसरी और आदिवासी बहुल ग्रामीण क्षेत्रों में ‘आप’ पार्टी की प्रत्याशी दयामनी बारला छोटी छोटी सभाओं और घर घर मुलाक़ातों के मार्फ़त अभियान में सक्रीय हैं। अभी तक  दयामनी बारला को कोयल कारो जन आंदोलन, जिंदल-मित्तल विरोधी मंच, काँटी बांध विरोधी आंदोलन, तजना बांध विरोधी आंदोलन, रियरगाडा बांध विरोधी आंदोलन, सी पी आई, सीपीएम, भा क पा माले और महिला मंडलों का समर्थन हासिल हैं।

    दयामनी बारला को बहुमत, जल जंगल जमीन पर हुकूमत !…

    दयामनी बारला के साथ दो दिन चुनाव प्रचार में खूंटी लोकसभा क्षेत्र में रहे. इस दौरान कारपोरेट-सरकारी गठजोड आज जिस शातिर तरीके से उन सबकी आवाज़ चुप कराने में लगा है जो अपने आस-पास लोकतंत्र और लोगों के हक को लेकर बोलते हैं, इसकी ताज़ा मिसाल हैं दयामनी बारला. दयामनी जी ने अपने अनुभवों को हमसे साझा किया. हम यह बातचीत आपसे साझा कर रहे हैं:

    जन आंदोलनों के लम्बे अनुभवों के बाद अब आपको राजनीति करने की जरुरत क्यों पड़ी ?

    आगे पढ़ें…

     
    अभी तक तोरपा, तमाड़ और खूंटी, कोलेबिरा, सिमडेगा विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों में सघन प्रचार किया।  इस दौरान दयामनी बारला भी साथ रहीं और कई महत्वपूर्ण जगहों पर छोटी बड़ी जन सभाओं का आयोजन हुवा।  दिन भर नुक्कड़ सभाओं में सैकड़ों लोगों कि उपस्थिति में दयामनी बारला से आम ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं से अवगत कराया। जिस पर दयामनी बारला ने कहा कि वे संघर्ष पर विश्वास रखती हैं, तथा चुनाव का नतीज़ा चाहे जो भी हो, लौट कर वे फिर सभी के साथ मिल कर समस्याओं को हल कराने का प्रयास करेंगी।  नुक्कड़ सभाओं को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हम झारखण्ड वासी देश में सबसे आमिर हैं, लेकिन हमारे जल जंगल जमीन को सरकारों ने कंपनियों के हवाले कर दिया है।  इस लूट के खिलाफ जो भी आवाज़ उठाता है उसकी आवाज़ को कुचल दिया जाता है. उन्होंने कहा कि सरकार ने हम आदिवासियो को कागज़ों पर, बार बार वायदे किए परंतु उन्हें कभी पूरा नहीं किया।  उन्होंने कहा कि मै झारखण्ड के जल जंगल जमीन और संस्कृति बचाने की लड़ाई लड़ रही हूँ।  उन्होंने आगे कहा कि मैं शहीद बिरसा मुंडा के सपनो को साकार करना चाहती हूँ। 
        
     वहीँ दूसरी ओर तोरपा-खूंटी विधान सभा क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों में दयामनी बारला के लिए कार्यकर्ताओं कि  दूसरी टीम ने भी  सघन जन संपर्क किया और होटोर, रामजय, तिरला,कुंजला, पिलुआ, बिचना, सरिदकेल, अंगराबारी, जापुद औरे आबा टोली आदि गॉव का दौरा कर दयामनी बारला के समर्थन में वोट मांगे।  

    ग्रामीण क्षेत्रों में  दयामनी बारला के बढ़ते जनाधार से कई क्षेत्रीय दल अब पीएलफआई से कार्यकर्ताओं को धमकिया दिलवा रहें है.

    चुनाव पर अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें

  • दयामनी बारला को बहुमत, जल जंगल जमीन पर हुकूमत !

    दयामनी बारला के साथ दो दिन खूंटी लोकसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार में साथ रहे. इस दौरान कारपोरेट-सरकारी गठजोड आज जिस शातिर तरीके से उन सबकी आवाज़ चुप कराने में लगा है जो अपने आस-पास लोकतंत्र और लोगों के हक को लेकर बोलते हैं, इसकी ताज़ा मिसाल हैं दयामनी बारला. दयामनी जी ने अपने अनुभवों को हमसे साझा किया. हम यह बातचीत आपसे साझा कर रहे हैं:

    जन आंदोलनों के लम्बे अनुभवों के बाद अब आपको राजनीति करने की जरुरत क्यों पड़ी ?

    आज हम देख रहे कि सरकारों के एजेण्डे में जनता से सरोकार रखने वाले सवाल खत्म हो रहे है. आज सरकारे जल-जंगल-जमीन, मानवाधिकार के सवाल, समुदायक अधिकार के सवालों को जनता के सवाल नहीं मानती है. सरकार के एजेण्डे में साफ है कि कैसे कोरपोरेट घरानों को लाभ पहुचाये. यही कारण है कि आज सरकार पुरे देश में जहाँ भी प्राकृतिक संसाधन है उन्हें कोरपोरेट घरानों को सोपने में लगी हुई है. इस लूट का जो भी विरोध कर रहा है उन पर तमाम तरह से हमले किये जा रहे है जैसे- व्यक्तिगत फर्जी कैस थोपना.

    केंद्र सरकार, राज्य सरकार या फिर कोरपोरेट घरानों के इर्दगिर्द घुमने वाली ताकते हो. इन ताकतों का गठजोड़ विश्व घरानों की ताकतों के साथ है. इससे निपटने के लिये जरुरी है कि देश में जितने भी हक-अधिकारों, मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण में लगे संगठनों और व्यक्तियों को एक मंच पर आना होगा तभी देश में एक सशक्त आदोलन खड़ा होगा और हम इन हालातों से निपट पायेगें.

    आप किन मुद्दों को अपने चुनाव अभियान में उठा रही है ?
    आज कोरपोरेट घराने सम, दाम, दंड, भेद के स्तर पर निपट रहे है. आज कोरपोरेट घरानों ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक-एक व्यक्ति को पकड़ कर उन्हें व्यक्तियों में बाँट कर ग्रामीण क्षेत्रों में घुस रहे है. अब कम्पनी सीधे जमीन नहीं खरीद रही है बल्कि उनके दलाल टुकड़ों में जमीन खरीद रहे है. आज हम देख रहे है कि सामूहिक विरोध कि ताकत कमजोर हो रही है, कोरपोरेट घराने आज सरकारों के साथ समझोते कर रहे है कि सरकार जन कल्याणकारी की भूमिका अब कम्पनियों को दे दे, जहाँ कम्पनियों को जमीने चाहिये वहा पर एनजीओ उनकी मदद कर रहे है और नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर गावों में आर्म फ़ोर्स भेजी जा रही जो नक्सलवाद के नाम पर आम लोगों का उत्पीड़िन कर रही है इससे ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पलायन कर रहे है.

    अभी देश में कोरपोरेट घरानों के विरोध में तो आंदोलन खड़े हो रहे है परंतु राज्य दमन के विरोध में सशक्त आंदोलन नहीं उठ रहा है.

    स्थानीय स्तर पर आपकी प्राथमिकताएँ क्या हैं ?

    झारखण्ड भले ही आदिवासी बहुल क्षेत्र हो परंतु आज यहाँ पर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिय जो आंदोलन जारी है उनमें सभी लोगों को शामिल होना होगा तभी हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचा पायेगें.

    आदिवासी आंदोलन अकेले आज उस मुकाम तक पहुचने कि स्थिति में नहीं है. आज हम विभिन्नता में एकता की बात कर रहे है. हमने देखा है की राज्य में अब तक आठ आदिवासी मुख्यमंत्री बने परंतु उन्होंने कोरपोरेट की दलाली के अलावा कोई कदम नहीं उठाया.

    आज सबसे ज्यादा इस बात की जरूरत है कि जो भी आदिवासी संगठन या आदिवासी मंच है उन्हें आपनी सोच के दायरे को बढ़ाना होगा तभी हम झारखण्ड के सपनों को साकार कर सकते है.

     आज देश का राजनीतिक ढांचा जन मुद्दों पर आधारित नहीं रहा है. आज व्यक्तिगत फायदे के लिये राजनीति की जा रही है. पुरी चुनाव की प्रक्रिया भष्टाचार के खेल में चल रही है. ऐसी स्थिति में जनांदोलनों को एक विकल्प तलाशने की जरूरत है जो भारत की जनता के हक-अधिकारों का संरक्षण करें ताकि उनका जल-जंगल-जमीन पर हक कायम रह सके तभी भारत का असली विकास होगा.

    आज देश में हजारों कम्पनियां निवेश के नाम पर आ गई है. इन कम्पनियों ने भारत के सविधान को ही कब्जे में ले लिया है. अब यह आवश्यक हो गया है कि एक ताकत बनाकर इनको टकर दी जाये.

  • बनारस धूल बैठने का इंतज़ार कर रहा है

    अभिषेक श्रीवास्‍तव 


    बनारस से लौटकर 




    बनारस में ज्ञान की खोज कबीर की देह पर गुरु रामानंद के पैर पड़ जाने जैसी कोई परिघटना होती है। यहां सायास कुछ भी नहीं मिलता, निरायास सब मिल जाता है। यहां बहसें हर ओर हैं, लेकिन बात को पकड़ना मुश्किल है। बात, कही भी जा सकती है। बात, अनकही भी होती है। मसलन, मणिकर्णिका घाट की सीढि़यों से ठीक पहले गली में एक चाय की दुकान पर पांच नौजवान अख़बार के पन्‍ने पलट रहे हैं। दिन के दो बजे हैं। एक के बाद एक शवों की आमद जारी है। अचानक एक नौजवान पास में गुमसुम बैठे अधेड़ उम्र के एक शख्‍स को संबोधित करते हुए एक ख़बर का शीर्षक पढ़ता है, ”गुरुजी, ई देखा, का छपल हौ। मगरमच्‍छ से खेलते थे बाल नरेंद्र!” अधेड़ व्‍यक्ति किसी भार को गरदन पर से हटाते हुए पूरी मेहनत से सिर उठाता है और कहता है, ”मगरमच्‍छ से खेला, शेर से खेला, सियार से खेला, बाकी आदमी से मत खेला। यहां तो आदमी ही आदमी से खेल रहा है।”

    बीते छह दशक से इस देश में चल रहे आदमी और आदमी के बीच के खेल की सबसे बड़ी पारी का इस बार गवाह बने बनारस की फि़ज़ां में टनों धूल उड़ रही है। हमेशा सड़कों पर रहने वाले यहां के लोगों ने अपने मुंह पर काली पट्टी बांध रखी है। चौकाघाट पर ड्यूटी बजा रहे हवलदार सालिकराम यादव मुंह पर बंधी काली पट्टी के भीतर से बोलते हैं, ”और क्‍या किया जाए? टीबी-कैंसर होने से तो अच्‍छा है न कि मुंह-नाक बंद कर के रखें।” यहां सड़कें पहले भी बनी हैं। काफिले पहले भी गुज़रे हैं। धूल पहले भी उड़ी है। दो दशक पहले लालकृष्‍ण आडवाणी की रथयात्रा के लिए यहां सड़कें बनी थीं तो बाबरी ढहा दी गई। धूल इतनी उड़ी कि धुंध में लोगों को पता ही नहीं चला कि किसकी तलवार है और किसका सिर। तब एक नज़ीर बनारसी हुआ करता था जिसने अपनी जान जोखिम में डाली थी। फिर बरसों बाद दीपा मेहता की फिल्‍म के सेट पर धूल उड़ी तो मदनपुरा में खुद नज़ीर का मकान इस धुंध का शिकार बन गया। इस बार न नज़ीर हैं न उनका मकान। धूल पुरज़ोर है। बनारस के लोगों ने फिलहाल खुद को बचाने के लिए काली पट्टियों को बांधने की नायाब तरकीब निकाली है। हर आदमी जैन मुनि लग रहा है, सिवाय उस काले रंग के, जो अपने भीतर एक प्रतिरोध को समोए हुए है।

    यह प्रतिरोध आपको ऊपर से नहीं दिखेगा। ऊपर सिर्फ हवा है। लहर है। धूल है। यह धूल हर हर कर के बरस रही है टीवी कैमरों के सामने और फोटोग्राफरों के लेन्‍स को चीरती हुई। कैमरे की आंख से जो दिख रहा है, वह बनारस नहीं है, इस बात की ताकीद करने वालों की पूरी एक कौम है जो मौत से भी ठंडी गलियों और चबूतरों पर गरदन झुकाए बैठी है। उन्‍हें पूछने वाला अबकी कोई नहीं है। जिन्‍होंने बनारस के अस्‍सी पर शामें गुजारी हैं, वे जानते हैं कि यह प्रतिरोध पप्‍पू की चाय की दुकान पर नहीं, पोई की दुकान पर मौजूद है। वे जानते हैं कि लंका पर केशव के यहां धूल उड़ती मिलेगी, उसके नीचे की परतें टंडनजी की दुकान पर ही दिख सकती हैं। बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के पुराने छात्र नेता राकेश मिश्रा कहते हैं, ”मोदी की लड़ाई इतनी आसान नहीं है। लोग जानते हैं कि मोदी के आने के बाद इस शहर में क्‍या होगा, लेकिन संकट ये है कि मोदी विरोधी वोटों को इकट्ठा करने वाला कोई दमदार उम्‍मीदवार नहीं है।”


    इस बार बनारस से लोकसभा चुनाव के उम्‍मीदवारों के नाम देखिए: बसपा से विजय जायसवाल, सपा से कैलाश चौरसिया, आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल, कौमी एकता दल से मुख्‍तार अंसारी और भाजपा से नरेंद्र मोदी। कांग्रेस से अभी नाम तय नहीं हुआ है। दिग्विजय सिंह, अजय राय, राजेश मिश्रा, संकटमोचन के महंत विश्‍वम्‍भर मिश्रा और काशी नरेश के पुत्र अनंत नारायण सिंह के नामों पर दांव लगाया जा रहा है। शुरुआत में सभी भाजपा विरोधी दलों द्वारा एक संयुक्‍त उम्‍मीदवार की बात आई थी, लेकिन इसके परवान चढ़ने से पहले ही सबने अपने-अपने उम्‍मीदवार घोषित कर दिए। उधर अपना दल के साथ भाजपा का समझौता हो गया जिसके कारण पटेल-भूमिहार बहुल रोहनिया संसदीय क्षेत्र का समीकरण बदल चुका है। प्रत्‍याशियों के लिहाज से बेशक नरेंद्र मोदी सबसे मज़बूत उम्‍मीदवार दिखते हैं, लेकिन सवाल बड़ा है कि आखिर भाजपा को वोट कौन देगा?

    राकेश मिश्रा बताते हैं, ”भाजपा के बनारस में कुल एक लाख 70 हज़ार ठोस वोट हैं। आप अगर पिछले चुनावों में भाजपा प्रत्‍याशियों को मिले वोट देखें, तो यह दो लाख से कुछ कम या ज्‍यादा ही बना रहता है। इसका मतलब ये है कि मोदी के आने से जो हवा बनी है, उससे अगर पचास हज़ार फ्लोटिंग वोट भी भाजपा में आते हैं तो करीब ढाई लाख वोट पार्टी को मिल सकेंगे। इससे निपटने के लिए ज़रूरी होगा कि मुसलमान एकजुट होकर वोट करे। अगर मुख्‍तार मैदान में आ गए, तो यह संभव हो सकता है क्‍योंकि पिछली बार वोटिंग के दिन ही दोपहर में अजय राय और राजेश मिश्रा ने यह हवा उड़ाई थी कि मुख्‍तार जीत रहे हैं और पक्‍का महाल के घरों से लोगों को निकाल-निकाल कर मुरली मनोहर जोशी को वोट डलवाया था जिसके कारण जोशी बमुश्किल 17000 वोट से जीत पाए। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो जोशी हार जाते।” कुछ और लोगों का मत है कि मुख्‍तार के आने से वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा और नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित हो जाएगी। कांग्रेस पार्टी के युवा नेता मोहम्‍मद इमरान का मानना है कि मुख्‍तार के लिए अपने प्रचार का इससे बढि़या मौका नहीं होगा और वे मोदी से पक्‍का डील कर लेंगे। इधर बनारस से लेकर दिल्‍ली तक 25 मार्च की रात के बाद से चर्चा आम है कि मुख्‍तार से मोदी से कुछ करोड़ की डील कर ही ली है। अपना दल और भाजपा के बीच भी सौ करोड़ के सौदे की चर्चा है तो लखनऊ के सियासी गलियारों में पैठ रखने वाले मान रहे हैं कि राजनाथ सिंह ने पूर्वांचल में अपने उम्‍मीदवार मुलायम सिंह यादव से एक सौदेबाज़ी के तहत उतारे हैं। जितने मुंह, उतनी बातें। सारी बहस मोदी और मोदी विरोधी संभावित मजबूत उम्‍मीदवार पर टिकी है, जिनमें ज़ाहिर है कि एक बहस अरविंद केजरीवाल को लेकर भी है।

    केजरीवाल बनारस की चुनावी बहस में 25 मार्च के बाद आए हैं। उससे पहले लोग उनका नाम सुनते ही हंस दे रहे थे। दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा देना केजरीवाल के लिए नकारात्‍मक साबित हुआ है। लोग खुलेआम पूछ रहे हैं कि जब वे हर बात पर जनता से राय लेते हैं, तो क्‍या इस्‍तीफा देने से पहले भी उन्‍हें जनता से रायशुमारी नहीं करना चाहिए थी। बात वाजिब भी है, लेकिन मोदी के नाम पर उड़ाई जा रही धूल और चलाई जा रही हवा में केजरीवाल को दरअसल खारिज करने का भाव यहां ज्‍यादा है, गोया उन्‍हें मोदी के खिलाफ चुनाव में उतरने का कोई अधिकार ही न हो। यह एक किस्‍म का अंदरूनी भय है, जिसके बारे में पूछे जाने पर मोदी समर्थक हिंसक तरीके से ”मोदी मोदी” चिल्‍ला उठते हैं। यही भय 25 की सुबह रोड शो के दौरान केजरीवाल के ऊपर स्‍याही और अंडे फेंके जाने में दिखा। अरविंद की रैली से ठीक पहले बेनियाबाग मैदान के बाहर ड्यूटी पर खड़े पुलिसवालों की राय थी कि अगर मुख्‍तार अपना नाम वापस ले लें, तो केजरीवाल अकेले मोदी के लिए काफी होगा। उनके मुताबिक मुख्‍तार के आने से मोदी की जीत की संभावना बढ़ जाएगी। सामान्‍य तौर पर लोग यह मान रहे हैं कि अरविंद की ज़मानत नहीं बचेगी। ये लोग अधिकतर सवर्ण हैं जिनका दूसरे समुदायों के वोटिंग पैटर्न से ज्‍यादा लेना-देना नहीं है। बीस हज़ार लोगों से खचाखच भरे बेनिया मैदान में हुई अरविंद की रैली में मोमिन कॉन्‍फ्रेंस, बुनकर समाज, वाल्‍मीकि समाज, दस्‍तकारी-ज़रदोज़ी समिति और मुफ्ती की मंच पर मौजूदगी ने हालांकि उन्‍हें खारिज करने वाले कुछ लोगों को दोबारा सोचने पर मजबूर किया है।


    बीएचयू के पुराने छात्र नेता और आजकल कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम गांव, गरीब, गांधी यात्रा के संयोजक विनोद सिंह एक मार्के की बात कहते हैं, ”अरविंद केजरीवाल कांग्रेस का नया भिंडरावाले हैं। जिस तरह कांग्रेस ने अकालियों को खत्‍म करने के लिए पंजाब में भिंडरावाले को प्रमोट किया था और अंतत: वह खुद कांग्रेस के लिए भस्‍मासुर साबित हुआ, उसी तरह केजरीवाल भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस के सहयोग से तो उतर गए लेकिन वह कांग्रेस का ही सफाया कर बैठेंगे। केजरीवाल मोदी के वोट नहीं काटेंगे, बल्कि भाजपा विरोधी वोट काटेंगे। इसके बावजूद उनकी बनारस में बहुत बुरी हार होनी तय है क्‍योंकि बनारस का एक-एक आदमी जानता है कि काल भैरव के दरबार में कम से कम बनारस का आदमी तो अंडा नहीं फेंक सकता। यह काम खुद केजरीवाल के वेतनभोगी कार्यकर्ताओं का किया-धरा है जिन्‍हें लेकर वे दिल्‍ली से आए थे।”

    बनारस की चुनावी हवा में दो बातें बहुत विश्‍वास के साथ तैर रही हैं। पहली यह, कि नरेंद्र मोदी का जीतना तय है। दूसरी यह, कि केजरीवाल की ज़मानत ज़ब्‍त हो जाएगी। नरेंद्र मोदी कैसे जीतेंगे, यह तर्क गायब है। उसी तरह केजरीवाल की ज़मानत क्‍यों ज़ब्‍त होगी, इसकी व्‍याख्‍या भी नदारद है। इन दो बातों को समझने के लिए बनारस के कुछ बाहरी इलाकों, आज़मगढ़, प्रतापगढ़ और लखनऊ से मिल रहे बदलावकारी संकेतों को उठाया जा सकता है। सबसे पहला संकेत यह है कि उत्‍तर प्रदेश का ब्राह्मण समुदाय भारतीय जनता पार्टी से क्षुब्‍ध है। हरीन पाठक से लेकर जोशी, कलराज मिश्र, लालमुनि चौबे आदि के साथ पार्टी के भीतर जो सुलूक किया गया है और जिस तरीके से राजनाथ सिंह ने पूरे पूर्वांचल को ठाकुर प्रत्‍याशियों से घेर दिया है, उससे एक संदेश यह गया है कि ब्राह्मणों के साथ भाजपा में नाइंसाफी हुई है। लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार और समाजसेवी रामकृष्‍ण की मानें तो बसपा द्वारा 21 सीटों पर ब्राह्मण प्रत्‍याशियों को खड़ा किया जाना एक सुखद संकेत है और संभव है कि ब्राह्मण एक बार फिर भाजपा को दगा दे जाएं। दूसरी बात, आजमगढ़ से मुलायम सिंह यादव के खड़े होने के नाते भाजपा का यादव वोटर भी इस बार सपा को वोट देगा, यह बात उतनी ही तय है जितनी यह कि कानपुर में जोशी और लखनऊ में राजनाथ सिंह की हार हो सकती है। मुज़फ्फरनगर दंगों पर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्‍य सरकार को दोषी ठहराए जाने की घटना ने पूर्वांचल के मुसलमानों के ज़ख्‍म हरे कर दिए हैं। प्रतापगढ़ में प्‍लाइवुड का कारोबार करने वाले मो. रईस कहते हैं, ”सपा को तो वोट देने का सवाल ही नहीं उठता।” अरविंद केजरीवाल की रैली के दिन बनारस की नई सड़क पर हर दुकानदार एक ही बात कहते मिला, ”यह बंदा मोदी को फाइट देगा।”

    कौन किसको फाइट देगा, कौन किसको वोट, इस पर कुछ भी कहना अभी खतरे से खाली नहीं है। अरविंद की रैली से एक दिन पहले रोहनिया में गंगा किनारे स्थित शूलटंकेश्‍वर महादेव पर रवींद्र श्रीवास्‍तव नाम के एक सज्‍जन मिले। वे कठपुतली के माध्‍यम से सरकारी शिक्षकों को प्रशिक्षण देते हैं। बात-बात में सौ बातों की एक बात कह बैठे, ”बस पिक्‍चर बदलती रहती है, हॉल तो वही रहता है। सब कठपुतली हैं। कौन किसे नचा देगा, यह तो एक दिन पहले ही तय होगा। बाकी आप दिमाग लगाते रहिए।” इस बात पर दो दिन पहले आदमी से आदमी के खेल की बात कहने वाले मणिकर्णिका पर मिले वे अधेड़ सज्‍जन अचानक याद आए जिन्‍होंने ”हर हर मोदी” का नारा लगाने वाले नौजवानों की ओर कातर निगाहों से देखते हुए एक शेर पढ़ा था, ”चुप हूं कि पहरेदार लुटेरों के साथ है / रोता हूं इसलिए क्‍योंकि घर की बात है।”


    घर की बात घर ही में रह जाए तो अच्‍छा। बाहर वालों से इसे साझा करना ठीक नहीं माना जाता। सब बोल रहे हैं, अपने-अपने तरीके से शहर को तौल रहे हैं, लेकिन बनारस फिलहाल अपने मुंह पर काली पट्टियां बांधे बाहरियों की उड़ाई धूल के बैठने का इंतज़ार कर रहा है। सुंदरपुर में काशीनाथ सिंह के घर से लेकर लखनऊ के हुसैनगंज के बीच चुपचाप एक मोर्चा शक्‍ल ले रहा है। जब मई की तपन में नई बनी सड़कों का कोलतार पिघलेगा, तब बनारस में कबीरा जागेगा।  

    (शुक्रवार पत्रिका में प्रकाशित और साभार)  
  • Teamsters, supporters rally at NY city hall for fired UPS drivers

    New York, NY – Hundreds of union members and community supporters rallied on the steps of city hall here, April 3, in support of the 250 UPS drivers who were issued terminations for walking out to defend their fellow co-worker.

    Union members from Teamsters locals all across the city were joined by MTA workers from Transport Workers Union Local 100, SEIU 32BJ and members of Communication Workers of America and other union supporters.

    President of Teamsters Local 804 Tim Sylvester told the crowd, “UPS is threatening to bankrupt 250 families,” and described the attacks as a heartless attack on drivers and their families. The crowd responded with shouts of “shut ‘em down!” and “Save the 250!”

    New York Public Advocate Letitia James spoke and threatened UPS with ending their $43 million of tax breaks provided by New York City. She also pointed out that a sweetheart deal on parking tickets is in on the line, now that 250 drivers have been given termination notice and UPS already fired 20 workers on March 31. She went on to proclaim, “This ain’t Wisconsin!”

    It was pointed out that different conditions prevail in New York City, which has the highest unionization rate in the country, than in Wisconsin, where right-wing Governor Scott Walker stripped public workers of their collective bargaining rights. “This is not going to end this way,” said City Controller Scott Stringer.

    Workers walked out to defend a union activist and 24-year worker, Jairo Reyes, after UPS tried to fire him through an abuse of the grievance procedure. UPS’ abuse of the grievance procedure is a common practice to retaliate against workers who are trying to enforce their rights. UPS issued working terminations to the 250 brave drivers from Teamsters 804, claiming they could maintain the right to dismiss them at anytime.

    One of the workers who was issued a termination, Domenick DeDomenico, age 40, spoke of the kind of harassment workers faced on a daily basis at UPS. A car struck DeDomenico while he was delivering packages, and he slipped into a coma for 10 days. He eventually returned to work after brain surgery and serious physical therapy. However, upon his return, UPS issued him a separate intent to discharge for slipping from his delivery rate of 13 packages per hour to 11 packages per hour after his injury. “I have a 13-year-old son and a wife,” said DeDomenico.

    Shop steward and 804 driver Vincent Perrone told the crowd, “How do you do something like this to our families? We work 10, 11, 12 hours a day…we leave houses at 6 o’clock in the morning and get home at 10 o’clock at night. It takes a toll on us, on our families, but we want to work. All we want is the dignity and respect we deserve.”

    A spokesperson for UPS later issued continuing threats, claiming that if UPS lost their tax breaks and sweetheart deals they may be forced to fire additional employees.

    “This company thinks they can get away with whatever they want. If they refuse to listen to reason, if they refuse to back down, it’s time to walk all the buildings and show them what union power means,” said one 804 member who asked to remain anonymous to avoid retaliation for advocating a work stoppage. “We’ve got the support of the city, now’s the time to take a stand.”

  • U of M SDS plans protest against war criminal Condoleezza Rice

    Minneapolis, MN – The University of Minnesota Students for a Democratic Society (SDS) are organizing an April 17 protest to coincide with a speech by Condoleezza Rice – a close aide of George Bush and a war criminal to boot.

    Former Secretary of State and National Security Advisor Condoleezza Rice will be speaking as the 2014 Distinguished Carlson Lecturer at the University of Minnesota. The Carlson Foundation, a private donor to the University of Minnesota, is fronting the $150,000 honorarium to host Rice. The university planned her speech, on the subject of civil rights, to coincide with the 50th Anniversary of the Civil Rights Act of 1964. The University of Minnesota describes her speech as recognition towards “her effort to foster freedom and democracy.”

    This invitation and “distinguished” lecture has disgusted students, staff, faculty and community members. The Twin Cites anti-war movement, heeding a call from SDS, will join a large rally to highlight Dr. Rice’s criminal conduct and to underscore the massive violations of human rights she was responsible for during the Bush administration.

    The choice of Dr. Rice to speak on civil rights or “freedom and democracy” is outrageous. In fact, her crimes stand in direct opposition to the great contributions made by leaders of the civil rights movement like Dr. Martin Luther King Jr. Dr. King had no problem connecting poverty, racism and injustice at home with the imperialist war in Vietnam. Dr. King noted that “every time we kill one [Vietnamese] we spend about $500,000 while we spend only $53 a year for every person characterized as poverty-stricken in the so-called poverty program.” For Dr. King and other civil rights leaders, the war was a disgrace that “played havoc with our domestic destinies” and put the U.S. “in a position of appearing to the world as an arrogant nation.”

    Recall that under Rice’s leadership as Secretary of State and National Security Advisor, the U.S. openly committed well-documented and widespread crimes against humanity. These crimes included but are not limited to an illegal invasion of Iraq on pretenses of ‘weapons of mass destruction’ – which were never found. The years of occupation that followed the invasion of Iraq left, by conservative estimates, over half of a million people dead. This invasion and occupation was accompanied by widespread use of terror, in the systematic torture of prisoners as documented at Abu Ghraib and the long-standing torture prison known as Guantanamo Bay.

    While this torture was documented, much more remains less documented. White House reports have long cited legal memos dispersed by Rice not only tolerating torture but suggesting that the Geneva Convention does not apply to the U.S. while engaged in its terroristic war, ‘The War on Terror.’

    It is with these facts and with many others that Students for a Democratic Society and other student and anti-war groups will rally against Rice’s visit to the University of Minnesota. While administrators of the university have said that their invitation of Dr. Rice was on the grounds of “freedom of speech,” her “free speech” should be seen as nothing more than promoting the annihilation of sovereign countries via barbaric means of torture and criminal activity.

    Like students and staff at Stanford, and most recently at Rutgers, Dr. Rice will be greeted upon her arrival with a reminder that her mark of distinction is that of a war criminal. In the name of the millions of Iraqis who saw their country ripped apart by the U.S. invasion – overseen in part by Condoleezza Rice, we urge you to join us at this protest. And in the names of thousands of young Americans sent to war only to return home without jobs, without proper healthcare – and the many who never returned at all – join SDS on April 17 at 4:00 p.m. at the University of Minnesota to condemn war criminals speaking on our campus.

     

  • The Land Question in India

    By Shankar Gopalakrishnan

  • Statement on Upcoming General Elections

    By The Sanhati Collective Lok Sabha Election 2014 is just around the corner. The UPA government, in the last ten years, has championed the cause of big capital with unbridled enthusiasm. The Manmohan-Chidambaram-Montek-led government has hastily taken forward the process of privatization and subordinating our national economy to global capital euphemistically called “liberalization” and “reform”–which […]