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  • The US National Endowment for Democracy and the Case of Pavel Gubarev and Human Rights Ukraine

    We at  Democracy and Class Struggle politically oppose the Progressive Socialist Party in Ukraine who are pro Eurasian Union and have Pavel Gubarev a Russian Chauvinist has a member.

    In fact we completely oppose the ideology of Eurasianism of Alexander Dugin .

    However we have contradictions when Right Sector attack offices and members the of Progressive Socialist Party who are part of the

  • UPS, FedEx owned by most of the same monopoly banks

    Jacksonville, FL – Despite ‘competing’ as the world’s two largest parcel delivery and shipping companies, UPS and FedEx are owned by many of the same banks. According to NASDAQ’s ownership summary of both companies, 12 of the top 20 owners of UPS and FedEx are the same banks, investment groups and financial institutions.

    Both multi-billion dollar corporations are under ‘institutional ownership’, which means that a majority of their shares are owned by financial institutions, banks and other large monopoly corporations. According to NASDAQ’s ownership summary of UPS on April 11, nearly 71% of UPS shares are owned by institutions. FedEx, a smaller company than UPS, actually had greater institutional ownership, with 83.94% of the company’s shares owned by institutions, according to NASDAQ.

    However, most of the largest institutional owners of both UPS and FedEx have substantial interests in both companies. For instance, Vanguard Group Inc., a Pennsylvania-based investment bank that manages nearly $2 trillion in assets, is the single-largest owner of UPS and the third largest owner of FedEx. Vanguard Group is a massive financial institution that boasts the largest ownership in many other large, well-known corporations including Apple, Exxon Mobil and Microsoft.

    Primecap Management Company, based in Pasadena, California, is the largest owner of FedEx, holding nearly 19 million shares of the shipping company, according to NASDAQ. However, Primecap is also the 16th largest owner of UPS stock, holding more than 6.3 million shares, also according to NASDAQ.

    In all, 60% of the top 20 owners of both UPS and FedEx are the same banks, investment groups and financial institutions.

    Institutional ownership is incredibly common among the largest 500 publicly traded companies.

    Despite this fact, companies like UPS stress to workers the need to “compete” against rival workers in their industry, like those at FedEx. UPS’s collective bargaining agreement includes an entire article on competition that states: “The Union recognizes that the Employer is in direct competition with…other firms engaging in the distribution of express letter, parcel express, parcel delivery, and freight, both air and surface.”

    The company leverages this poison pill of competition to justify subcontracting union work and undermining union standards. It creates an adversarial relationship between workers of UPS and FedEx, when in reality the owners at the top are united in extracting the most profit possible from workers at both companies. When the owners of UPS and FedEx are one in the same, ‘competition’ means which management team can exploit their workers the most and extract the most profit for the banks that own the whole industry.

    A prominent argument used by UPS claims that workers must accept concessionary contracts to remain ‘competitive.’ They argue that employing tried-and-true militant tactics, like striking as the Teamsters did successfully in 1997, will result in FedEx stealing UPS’s customers. Historically, the union movement addressed this by organizing entire industries, instead of single worksites or employers. This meant one industry, one union, and at times – one contract. At its best, this method of organizing and bargaining takes wages out of competition and sets industry-wide standards to prevent subcontracting and a race to the bottom through ‘competition.’ Tactically, if the 1% owners of both brands are united, then to combat them and win, workers across the entire industry must also unite.

    The attempts of the International Brotherhood of Teamsters to organize FedEx have been foiled by U.S. labor law, which misclassifies workers and stifles their ability to unionize. FedEx Ground drivers are misclassified as independent contractors and are legally barred from union representation, even though in practice, they are effectively workers directly employed by the company. FedEx Express drivers are also misclassified under the Railway Labor Act (RLA), as opposed to the National Labor Relations Act. The company claims their employees are ‘airline’ workers, and thus would need to unionize nationally all at once. The RLA also places many more restrictions on workers’ rights, including the ability to strike. It also forces the workers into binding arbitration, which often serve the interest of the boss instead of the workers.

    The banks and financial institutions that own both UPS and FedEx are united in their push for lower wages, part-time poverty jobs, fewer benefits and weaker contracts. To effectively fight their race to the bottom, union workers at UPS must organize FedEx workers, regardless of the legal fictions created by politicians in Washington.

    Dave Schneider and Dustin Ponder are both rank-and-file Teamsters and members of Part-Time Power at UPS, which is a national group for UPS part-timers.

  • शायर और शहज़ादी: शकीरा के बारे में मार्केस

    वे दोनों महानतम कोलम्बियनों में शुमार हैं: शकीरा और गाब्रिएल गार्सीया मारकेज़. नैसर्गिक था कि वे कहीं न कहीं मिलते.


    एक फ़रवरी को शकीरा मायामी से बूएनोस आइरेस पहुंची, एक रेडियो प्रोग्राम के लिए उससे फ़क़त एक सवाल पूछने का इच्छुक एक पत्रकार उन का पीछा करता आ रहा था. कई वजूहात से वह ऐसा नहीं कर सका तो उसने अपनी रपट का शीर्षक रखा: “शकीरा तब क्या कर रही होती है जब उनसे कोई ढूंढ ही नहीं सकता?” हंसी से दोहरी होती हुई शकीरा हाथ में डायरी थामे समझाती है. “मैं ज़िन्दगी जी रही हूं.”

    वह एक फ़रवरी की शाम को बुएनोस आइरेस पहुंची थी, और अगले दिन वह दोपहर से लेकर आधी रात तलक काम करती रही; उस दिन उसका जन्मदिन था, लेकिन उसे मनाने को उसके पास समय ही नहीं था. बुधवार को वह वापस मायामी चल दी, जहां उसने एक लम्बे पब्लिसिटी शूट में हिस्सा लिया और कई घन्टे अपने ताज़ा अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण के लिए रेकॉर्डिंग की. शुक्रवार की दोपहर दो बजे से शनिवार की सुबह तक उसने दो गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग पूरी की. उसके बाद वह तीन घन्टे सोई और दोबारा स्टूडियो पहुंची जहां उसने दोपहर तीन बजे तक काम किया. उस रात वह थोड़ा सोई और इतवार की भोर लीमा जाने वाले हवाई जहाज़ पर सवार हुई. सोमवार की पूर्वान्ह वह एक लाइव टीवी शो में उपस्थित थी; चार बजे उसका एक टीवी विज्ञापन शूट हुआ; शाम को वह अपने पब्लिसिस्ट द्वारा दी गई एक पार्टी में मौजूद थी जहां वह भोर तक जगी रही. अगले दिन यानी नौ फ़रवरी सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक को उसने रेडियो, टीवी और अख़बार के लिए आधे आधे घन्टे के ग्यारह इन्टरव्यू दिए. बीच में एक घन्टा लंच के लिए निकाला गया. उसे वापस मायामी पहुंचना था मगर अन्तिम क्षणों में उसने बोगोटा में ठहरना तय किया, जहां वह भूकम्प के शिकार लोगों तक अपनि सहानुभूति जताने पहुंची.

    उसी रात वह किसी तरह मायामी जाने वालि आख़िरी फ़्लाइट पकड़ पाने में कामयाब हुई जहां अगले चार दिनों तक वह स्पेन और पेरिस में होने वाली अपनी कन्सर्ट्स के लिए रिहर्सल में व्यस्त रही. अपने अल्बमों के अंग्रे़ज़ी संस्करणों के लिए उसने शनिवार लंचटाइम से लेकर सुबह साढ़े चार बजे तक ग्लोरिया एस्टेफ़ान के साथ काम किया. दिन फटने पर वह वह अपने घर पहुंची जहां उसने एक कॉफ़ी पी, डबलरोटी का एक टुकड़ा खाया और पूरे कपड़ों में सो गई. मंगलवार सोलह तारीख़ को वह कोस्टा रिका में एक लाइव टीवी शो में मौजूद थी. बृहस्पतिवार को वह वापस मायामी पहुंची जहां उसने ‘सेन्सेशनल सैटरडे’ नाम के एक टीवी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था.

    वह बमुश्किल सो पाई – 21 को उसने वेनेज़ुएला से लॉस एन्जेलीस पहुंचकर ग्रैमी समारोह अटैन्ड करना था. उसे विजेताओं की सूची में होने की उम्मीद थी पर अमरीकियों ने तमाम मुख्य पुरुस्कार जीत लिए. लेकिन इस से उसकी रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई: 25 को वह स्पेन में थी जहां उसने 27 और 28 फ़रवरी को काम किया. एक मार्च तक आखीरकार वह मैड्रिड के एक होटल में पूरी रात सो पाने का समय निकाल सकी. उस समय तक वह एक महीने में एक पेशेवर फ़्लाइट अटैन्डेन्ट के बराबर यानी चालीस हज़ार किलोमीटर की यात्राएं कर चुकी थी.

    ठोस धरती पर भी शकीरा का काम कोई कम मुश्किल न था. उसके साथ चलने वाली संगीतकारों, लाइट टैक्नीशियनों और साउन्ड इंजीनियरों इत्यादि की टीम किसी लड़ाकू दस्ते जैसी नज़र आती है. वह हर चीज़ पर ख़ुद निगाह रखती है. उसे संगीत पढ़ना नहीं आता पर उसकी विशुद्ध आवाज़ और पूरा फ़ोकस इस बात की गारन्टी करते हैं कि उसके संगीतकार एक-एक नोट को सही सही लगा सकें. अपनी टीम के हर सदस्य के साथ उसके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं. वह अपनी थकान को जाहिर नहीं होने देती पर इस से आपको छलावे में नहीं पड़ना चाहिये. अर्जेन्टीना के चालीस कन्सर्ट्स वाले दौरे के आख़िरी दिनों में उसके एक सहायक को उसे बस में चढ़ने में मदद करनी पड़ी थी. कभी कभी उसकी धड़कनें बढ़ जाती हैं और उसे त्वचा की एलर्जी जैसी शिकायतें भी हो जाया करती हैं.

    ‘दोन्दे एस्तान लोस लाद्रोनेस?’ (सारे चोर कहां हैं?) अल्बम के अंग्रेज़ी संस्करण की तैयारी में एमीलियो एस्टेफ़ान और उसकी पत्नी ग्लोरिया के साथ की गई उसकी कड़ी मेहनत ने स्थिति को और भी मुश्किल बना दिया था. इस समय शकीरा को अपने जीवन के सबसे दबावभरे समय से जूझना पड़ा था: वह ठीकठाक अंग्रेज़ी बोल लेती है पर अपने उच्चारण को ठीक बनाने के लिए उसने इस कदर ऑब्सेशन की हद तक काम किया था कि वह सपने में भी कभी कभी अंग्रेज़ी बोला करती थी.

    कोलम्बिया के बारान्कीया के एक जौहरी विलियम मेबारेक और उसकी पत्नी नाइदिया रिपोल के अरबी मूल के कलाप्रेमी परिवार में जन्मी थी शकीरा. उसकी कड़ी मेहनत और असाधारण बुद्धिमत्ता का परिणाम था कि अपने शुरुआती सालों में उसने इतना सारा सीख लिया जिसे सीखने में सामान्य लोग दसियों साल लगा देते हैं. सत्रह माह की आयु में वह अक्षरमाला सीखना शुरू कर चुकी थी और तीन साल की उम्र में गिनती करना. चार साल की आयु में बारान्कीया के अपने स्कूल में वह बैली-डान्सिंग सीख रही थी. सात साल की आयु में उसने अपना पहला गीत कम्पोज़ किया. आठ की आयु में कविता लिखनी शुरू की और दस की होते होते बाकायदा अपने ओरिजिनल गीत लिख और कम्पोज़ कर लिए थे. इसी दरम्यान उसने अटलांटिक के तट पर मौजूद ‘एल कोर्रेहोन’ कोयला खदानों के कामगारों के मनोरंजन हेतु अपने पहले कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त कर लिए थे. उसने अभी सेकेन्डरी स्कूल में दाख़िला लेना बाकी था जब एक रेकॉर्डिंग कम्पनी ने उसे पहला पेशेवर प्रस्ताव दिया.

    “मुझे अपनी अपार रचनात्मकता के बारे में हमेशा मालूम था,” वह कहती है. “मैं प्रेम कविताओं का पाठ किया करती थी, कहानियां लिखती थी और गणित को छोड़कर सारे विषयों में सबसे अच्छे नम्बर लाती थी.” उसे बहुत खीझ होती थी जब घर पर आए मेहमान उस से गाने की फ़रमाइश किया करते थे. “मैं तीस हज़ार लोगों के सामने गाना पसन्द करती बजाय पांच गधों के आगे गाने और गिटार बजाने के.” वह थोड़ा कमज़ोर दिखती है मगर उसे पक्का यकीन था कि एक दिन सारी दुनिया उसे जानेगी. किस बात के लिए और कैसे, यह उसे पता नहीं था पर उसका भरोसा मजबूत था. यही उसकी नियति भी होनी थी.

    आज उसके सपने पूरे होने से कहीं ज़्यादा पूरे हो चुके हैं. शकीरा का संगीत किसी और के जैसा नहीं सुनाई पड़ता और उसने मासूम सेन्सुअलिटी का अपना एक ब्रान्ड भी बना लिया है. “अगर मैं गाऊंगी नहीं तो मर जाऊंगी!” यह बात अक्सर हल्के फ़ुल्के तरीके से कही जाती है लेकिन शकीरा के मामले में यह एक सच्चाई है: जब वह गा नहीं रही होती वह बमुश्किल ज़िन्दा रहती है. भीड़ के बीच रहने में ही उसके भीतर शान्ति उभरती है. स्टेज का डर उसे कभी महसूस नहीं हुआ. उसे स्टेज पर न होने से डर लगता है: “मुझे लगता है” वह कहती है “जैसे वहां मैं जंगल में किसी शेर जैसी हो जाती हूं.” स्टेज पर ही वह शकीरा बन पाती है जो कि वह असल में है.

    कई गायक स्टेज से परे तेज़ रोशनियों पर निगाहें गड़ा लेते हैं ताकि श्रोताओं की भीड़ की निगाहों का सामना न करना पड़े. शकीरा इसका ठीक उल्टा करती है; वह अपने टैक्नीशियनों से कहती है कि दर्शकों श्रोताओं पर सबसे तेज़ रोशनियां डालें ताकि वह उन्हें देख सके. “तब जा कर संवाद सम्पूर्ण बनता है” वह कहती है. वह एक अजानी अनाम भीड़ को अपनी सनक और प्रेरणा के हिसाब से जैसा चाहे वैसा ढाल लेती है. “गाते हुए मुझे लोगों की आंखों में देखना अच्छा लगता है.” कभी कभी वह भीड़ में ऐसे चेहरे देखती है जिन्हें उसने कभी नहीं देखा होता लेकिन वह उन्हें पुराने दोस्तों की तरह याद करती है. एक बार तो उसने एक ऐसे आदमी को पहचान लिया जो कब का मर चुका था. एक बार उसे ऐसा महसुस हुआ जैसे कोई उसे किसी दूसरे जन्म के भीतर से देख रहा हो. “मैंने पूरी रात उस के लिए गाया.” वह बताती है. इस तरह के चमत्कार कई महान कलाकारो के लिए महान प्रेरणा के और अक्सर महान विनाशों के कारण बनते रहे हैं

    शकीरा के मिथक का सबसे बड़ा आयाम है बच्चों के भीतर उसकी इस कदर गहरी पैठ. जब उसका अल्बम ‘पीएस देस्काल्ज़ोस’ 1996 में रिलीज़ हुआ तो उसके पब्लिसिस्ट्स ने तय किया कि उसे कैरिबियन लोकसमारोहों के इन्टरवलों में प्रमोट किया जाएगा. उन्हें यह नीति बदलनी पड़ी जब तमाम बच्चे “शकीरा! शकीरा!” के नारे लगाते हुए सारी शाम उस के गीतों को बजाने की मांग करने लगे. आज यह करिश्मा डॉक्टरेट के किसी महत्वपूर्ण विषय में तब्दील हो चुका है. हर सामाजिक तबके के प्राइमरी स्कूल की बच्चियां पहनावे, बोलने और गाने के अन्दाज़ में शकीरा की नकल करती हैं. छः साला बच्चियां उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिकाएं हैं.

    इन्टरवल के दौरान उसके अल्बमों की सस्ती पाइरेटेड प्रतियों की अदलाबदली हुआ करती है. दुकानों में पहुंचते ही उसके आभूषणों की नकलें हाथोंहाथ निकल जाती हैं. बाजारों में हेयरडाईज़ की होलसेल बिक्री होती है ताकि लड़कियां शकीरा के हेयरस्टाइल की नकल कर सकें उसके नए अल्बम की पहली स्वामिनी स्कूल की सबसे लोकप्रिय लड़की बन जाती है. सबसे ज़्यादा पॉपुलर स्टडी-ग्रुप स्कूल के बाद किसी लड़की के घर में जमते हैं जहां पहले थोड़ा सा होमवर्क होता है और उस के बाद धमाल. जन्मदिन की दावतें नन्हीं शकीराओं का जमावड़ा हुआ करता है. बिल्कुल विशुद्धतावादी समूहों में – जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा है – लड़कों को नहीं बुलाया जाता.

    अपनी असाधारण संगीत प्रतिभा और मार्केटिंग के बावजूद शकीरा अपनी परिपक्वता के बगैर वहां हो ही नहीं सकती थी जहां वह अब है. यह यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि इस लड़की के भीतर इतनी ताकत आती कहां से है जो हर दिन अपने बालों का रंग बदल देती है – कल काला, आज लाल, कल हरा. कई उम्रदराज़ महिला गायकों से कहीं ज़्यादा ईनामात वह हासिल कर चुकी है. आप देख कर बता सकते हैं कि वह कहां पहुंचना चाहती है: बुद्धिमान, असुरक्षित, शालीन, मधुर, आक्रामक और सघन! अपने पेशे के चरम पर पहुंच चुकने के बाद भी वह बारान्कीया की एक लड़की भर है – जहां भी होती है उसे घर की मुलेट मछली और मैनियोक ब्रैड की याद आती है. अभी वह अपने सपनों का घर नहीं ले सकी है – समुद्र किनारे ऊंची छतों वाला एक शान्त मकान और दो घोड़े. उसे किताबें अच्छी लगती हैं – वह उन्हें खरीदती है उन्हें प्यार करती है अलबत्ता पढ़ने के लिए उसके पास उतना वांछित समय नहीं होता. एयरपोर्टों पर जल्दबाज़ी में विदा लेने के बाद उसे अपने दोस्तों की बहुत याद आती है मगर उसे मालूम होता है कि अगली मुलाकात होने में कितना वक़्त लग सकता है.

    उसने कितना पैसा कमाया है, इस बाबत वह कहती है “जितना मैं बताती हूं उस से ज़्यादा मगर जितना लोग बताते हैं उस से कम.” संगीत सुनने का उसका प्रिय स्थान होता है गाड़ी के भीतर पूरे वॉल्यूम में बजता प्लेयर – वह शीशे चढ़ा लिया करती है ताकि दूसरों को दिक्कत न हो. “ईश्वर से बात करने, अपने से बात करने और समझने का यह आदर्श स्थान होता है.” उसे टीवी से नफ़रत है. उसके हिसाब से उसका सबसे बड़ा विरोधाभास है अनन्त जीवन पर उसका विश्वास और मृत्यु का असह्य खौफ़.

    वह एक दिन में चालीस इन्टरव्यू तक दे चुकी है और उसने किसी भी बात को दोहराया नहीं. कला, जीवन. अगले जन्म, ईश्वर प्रेम और मत्यु को लेकर उसके अपने विचार हैं. लेकिन उसके इन्टरव्यू लेने वालों ने इन विषयों पर खुल कर बताने को उस से इतनी दफ़ा पूछ लिया है कि अब वह उन से बचकर निकलना सीख गई है. उसके उत्तर जितना बताते हैं उस से कम ही छिपाते हैं और यह सबसे उल्लेखनीय बात है. वह इस बात को सीधे सीधे खारिज कर देती है कि उसकी प्रसिद्धि अस्थाई है और यह कि ज़्यादा गाने से उसकी आवाज़ पर असर पड़ेगा. “भरी धूप के बीच में सूर्यास्त के बारे में नहीं सोचना चाहती.” जो भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा संभव नहीं चूंकि उसकी आवाज़ की प्राकृतिक रेन्ज उसकी तमाम ज़्यादतियों के बावजूद बची रहेगी. बह बुखार और थकान से गा कर उबरी है. “गायक के लिए सबसे बड़ी कुंठा यह हो सकती है,” हमारे इन्टरव्यू के आखीर में तनिक हड़बड़ी में वह कहती है “कि वह गाने को अपना कैरियर बना चुकने के बावजूद गा न सके.”

    उसके लिए सबसे रपटीला विषय होता है प्यार. वह उसका गुणगान करती है, वही उसके संगीत की प्रेरणा होता है पर बातचीत में वह उस पर अपने ह्यूमर की परत चढ़ा लेती है. “सच तो यह है कि मुझे मौत से ज़्यादा शादी से डर लगता है.” यह आम जानकारी है कि उसके चार बॉयफ़्रैन्ड्स रह चुके हैं हालांकि वह शरारत के साथ बताती है कि तीन और थे जिनके बारे में किसी को मालूम नहीं. वे सब तकरीबन उसी की उम्र के थे पर उनमें से कोई भी उस जैसा परिपक्व नहीं था. शकीरा उन्हें बहुत अपनेपन और दर्द के साथ याद करती है. ऐसा लगता है वह उन्हें नश्वर प्रेतों की तरह देखा करती है जिन्हें उसने अपनी अल्मारी में टांग दिया है. भाग्यवश यह कोई बहुत हताशा की बात भी नहीं है: अगली दो फ़रवरी को वह फ़क़त छब्बीस साल की हो जाने वाली है.

    (हिंदी अनुवाद के लिए कबाड़खाना का आभार)
  • इस युग का कथाशिल्पी मार्केज

    पंकज सिंह

    गाब्रिएल गार्सिया मार्केज का 87 वर्ष की उम्र में निधन हो गया, यह समाचार सारी दुनिया के उन तमाम लोगों के लिए आघात पहुंचाने वाली एक बड़ी खबर है जो साहित्य-कला-संस्कृति की मानवीय संपदा को मनुष्य के लिए एक जरूरी और गतिमान निधि मानते हैं। मार्केज को 1982 में उनके महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘एकांत के सौ बरस’ पर साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

    लेकिन नोबेल पुरस्कार से विभूषित होने के बहुत पहले से मार्केज को स्पेनी भाषा का ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर का कालजयी कथाशिल्पी माना जा चुका था। 23 वर्ष की उम्र में अपना पहला लघु उपन्यास लिखने के बाद मार्केज दक्षिण अमरीका के स्पेनी लेखकों में चर्चा का विषय बन चुके थे।

    उस काल में उन्होंने ‘लीफ स्टार्म’ और ‘नो वन राइट्स टू द कोलोनेल’नाम के दो लघु उपन्यास लिखे थे। उन उपन्यासों का प्रभाव ऐसा था कि नये सिरे से इस मुद्दे पर बहस छिड़ गयी थी कि मार्केज की इन दो कृतियों को लंबी कहानी माना जाए या लघु उपन्यास। मार्केज ने अपने कथाकार जीवन के आरंभ से ही अपनी निजी कथा शैली की पहचान बनानी शुरू कर दी थी जिसके विकास के साथ उन्हें ‘जादुई यथार्थवाद’ का आविष्कारक होने का श्रेय दिया गया। हालांकि स्वयं गाब्रिएल गार्सिया मार्केज ने जादुई यथार्थवाद नाम की विशिष्ट शैली का जनक होने का कोई दावा कभी नहीं किया परंतु उनके लेखन में लातीन अमरीकी समाजों और परंपराओं के यथार्थ में चमत्कारों और अजीबोगरीब किस्म की घटनाओं, अनोखी चीजों और जीव जगत की अविश्वसनीय स्थितियों का जो मनोहारी मिश्रण और सामंजस्य पैदा हुआ उसने न सिर्फ उनकी कृतियों को विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर का दर्जा दिलाया बल्कि सारी दुनिया में अनेकानेक भाषाओं के लेखन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। ‘एकांत के सौ बरस’ का प्रथम प्रकाशन 1967 में हुआ था। तब से लेकर अब तक उस महान उपन्यास का दुनिया की लगभग तीन दजर्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और उसकी पांच करोड़ से ज्यादा प्रतियां साहित्य प्रेमियों के घरों में पहुंच चुकी हैं। सिर्फ उस एक उपन्यास के आंकड़ों के आधार पर यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि मार्केज इतिहास में लातीन अमरीका के सभी लेखकों से ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक रहे। गाब्रिएल गार्सिया मार्केज मूलत: कोलंबिया के थे जहां उनका जन्म हुआ और उन्होंने शिक्षा और संस्कार पाने के बाद वहां अपने जीवन का आधी सदी का सफर तय किया। पिछले तीस वर्षो से मार्केज मेक्सिको की राजधानी मेक्सिको सिटी में अपने परिवार के साथ रहते आए थे। 1999 में उन्हें कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी ने ग्रस लिया था, लेकिन मार्केज उचित चिकित्सा के कारण उसके चंगुल से बाहर आ गये थे। लेकिन उसके बाद उन्हें एक दूसरी खतरनाक बीमारी ‘अल्जाइमर्स’ ने अपना निशाना बना लिया और मार्केज की स्मृति क्रमश: गायब हो गयी।

    लातीन अमरीका के महान कवि पाब्लो नेरुदा ने कहा था कि स्पेनी भाषा में मिगुएल द सर्वातेस के क्लासिक उपन्यास, ‘दोन किहोते’ के बाद मार्केज का उपन्यास ‘एकांत के सौ बरस’उस भाषा की महानतम अभिव्यक्ति है। 1982 में जब मार्केज को स्वीडन के राजा एक भव्य समारोह में नोबेल पुरस्कार से विभूषित कर रहे थे तो पुरस्कार की निर्णायक समिति की ओर से पढ़े जा रहे प्रशस्ति पत्र में कहा गया कि गाब्रिएल गार्सिया मार्केज ऐसे लेखक हैं जिनकी हर नयी कृति के आने पर उस कृति के विषय में जो समाचार बनता है वह अंतरराष्ट्रीय स्तर का होता है और दुनिया की सभी भाषाओं में उसकी गूंज-अनुगूंज सुनायी देने लगती है।

    कहना न होगा कि मार्केज के देहांत पर सारी दुनिया में जो शोक की लहर छायी है उससे केवल साहित्यिक-सांस्कृतिक समुदायों के लोग ही प्रभावित नहीं हुए हैं, बल्कि पढ़े-लिखे समाजों में जीवन के हर क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों ने उनकी स्मृति में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए शोक-संदेश जारी किए हैं। अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा के शोक संदेश से ज्यादा भावपूर्ण भाषा में अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने बड़ी विनम्रता से मार्केज के साथ अपनी बीस साल पुरानी दोस्ती का हवाला देते हुए कहा है कि उन्हें इस बात का गर्व महसूस होता रहा है कि मार्केज उनके मित्र रहे।

    मार्केज की वैचारिकता सदा बहुत स्पष्ट रही। उन्होंने लातीन अमरीकी समाजों के जिस संष्टि यथार्थ को अपने कथा साहित्य में रूपायित किया उसमें यह साफ दिखाइ देता है कि साधारण से लेकर विशिष्ट जन तक की जीवन शैलियों, मनोविज्ञान, क्रिया-प्रतिक्रिया और जीवन के व्यापक विस्तार पर उनकी जो सूक्ष्म और पैनी निगाह लगातार बनी रही उसमें उनकी प्रगतिशील-जनवादी प्रतिबद्धता का सहज स्पर्श हर कहीं महसूस होता है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उनकी पुस्तक ‘ एकांत के सौ बरस ’ के विस्मयजनक प्रभाव से यह स्थिति बनी कि उन्होंने जिस काल्पनिक दक्षिण अमरीकी गांव माकोंदो और वहां रहने वाले बुएंदिया खानदान की जिन कई पीढ़ियों का चित्रण सैकड़ों पात्रों के साथ किया वह सब दक्षिण अमरीका की रहस्यमयी और अल्पज्ञात परंपराओं के श्रेष्ठ और अत्यंत प्रामाणिक रूपों की तरह अमिट रूप से साहित्यिक इतिहास में दर्ज हो चुका है। इस उपन्यास की रचना-प्रक्रिया से जुड़ी हुई अनेक कथाएं हैं। इसकी शुरुआत यूं हुई कि मार्केज अपनी गाड़ी में कहीं जा रहे थे और बीच के नीरव और सुनसान इलाके में उनकी कल्पना में उपन्यास की कथा का आरंभ उभरने लगा। उन्होंने कहीं रुककर उपन्यास के पहले अध्याय को लिपिबद्ध किया। कुछ ही समय बाद जब वे अपने घर गये तो उन्होंने अपनी प्रिय सिगरेट के बहुत सारे पैकेट अपने कमरे में भर लिए और पूरी तरह तल्लीन होकर, तन्मय भाव से लिखने में जुट गये। लंबी अवधि के बाद जब वे उपन्यास को पूरा करके निकले तो उनके पास तेरह सौ पृष्ठों की सामग्री थी। यह बात और है कि उस पूरी अवधि में किसी आर्थिक आय का कोई अता-पता नहीं था और वे तथा उनका परिवार बारह हजार डॉलर के कर्ज में डूब चुके थे। अपने कार्य जीवन की शुरुआत मार्केज ने एक पत्रकार के रूप में की थी। पत्रकारिता भी उन्होंने जमकर की थी। बाद के दौर में उन्होंने फिल्म पटकथा लेखन सहित कई तरह का ऐसा गद्य लेखन किया जिससे उन्हें ठीकठाक आय हुई। परंतु इस दौर में पत्रकारिता से लगभग विमुख होकर उन्होंने सिर्फ रचनात्मक लेखन पर खुद को केन्द्रित कर लिया था। उस दौर में अपने घर के प्रवेश द्वारा पर ताला लगाकर वे छिपकर पिछले दरवाजे से अपने घर में आते- जाते थे, ताकि उन्हें कर्ज देने वाले घर में घुसकर अपने पैसे वापस न मांगने लगें।

    क्यूबा के क्रांतिकारी जननायक और भूतपूर्व राष्ट्रपति फीदेल कास्त्रो से मार्केज की दोस्ती निरंतर चर्चा और विवाद का विषय बनी रही। मार्केज ने अमरीकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध काफी तीखे वक्तव्य समय-समय पर दिये थे। संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार उन्हें विध्वंसक व्यक्ति मानती रही और उन्हें अमरीका यात्रा के लिए वीजा देने से इनकार करती रही। वह तो बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने के बाद ही संभव हुआ कि इस महान प्रतिभा पर लगा अमरीकी यात्रा-प्रतिबंध समाप्त हुआ। फीदेल कास्त्रो के बारे में मार्केज का कहना था कि फीदेल अत्यंत सुसंस्कृत व्यक्ति हैं और मिलने पर वे दोनों साहित्यिक वार्तालाप किया करते हैं।

    मार्केज के अन्य बहुचर्चित उपन्यासों में ‘हैजा के दिनों में प्यार’ ,‘पूर्व घोषित मौत का सिलसिलेवार ब्योरा’,‘अपनी भूल-भुलैया में जनरल’,‘प्रभु पुरुष का पतझड़’ आदि बहुख्यात कृतियां हैं। उनकी अन्य दो उल्लेखनीय कृतियों में एक तो कोलंबिया में मादक द्रव्यों का अवैध कारोबार चलाने वाले मेदेलिन कार्तेल नामक भयावह संगठन द्वारा किए गए अपहरणों पर एक पत्रकारीय पुस्तक है और दूसरी पुस्तक उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने ‘कथा कहने के लिए जीते हुए’ नाम दिया था।

    क्या उनकी मृत्यु के दुख का दंश हमें इस बात से कम महसूस होगा कि वे कैंसर से लड़कर जीते, मगर दु:साध्य रोग अलजाइमर्स ने उनकी स्मृति छीन ली थी और आखिरकार न्यूमोनिया ने उनके दैहिक विनाश की भूमिका बना दी थी?

    शायद नहीं।

    कल्पतरु एक्सप्रेस से साभार
  • Denis Pushilin Chairman of Donetsk People’s Republic on Geneva Road Map

    The self-proclaimed Donetsk Republic meanwhile said it will not follow the treaty’s calls until Kiev starts doing so.

    Speaking to Itar-Tass, the republic’s chair, Denis Pushilin, said that the Kiev authorities are “refusing to pull back the troops from the territory of the Donetsk Region, and in those conditions it is impossible to talk of compromise.”

    Kiev “must vacate the seized

  • Gujarati Muslims can forget Godhra, but what about these economic figures?

    By Sanjeev Kumar (Antim) Author’s Note: This is part of a report on Gujarat’s model of development, written by me for Jagriti Natya Manch. I am the script writer, director and founding member of the Manch. This theater group consists of students from JNU, DU and IIMC. If not Modi, then at least some of […]

  • Telengana – Electrocution and amputation of limbs of a brick kiln worker

    a report by Tathagata Sengupta Yet another case of a worker, Pabitra Parabhoe, getting electrocuted occurred in a Telangana brick kiln. This year, this is the third case electrocution that has come to the notice of the organisers of the brick workers’ movement in AP/Telangana. Before this, Mr. Khetra Majhi died on 20th January 2014 […]

  • Republicans blocking Extended Unemployment Compensation (EUC) in House

    Washington, DC – Legislation to restore unemployment benefits to the long-term unemployed is being blocked by House Republicans. The Senate passed a bill to reinstate jobless benefits April 7, but passage in the House is required to bring back extended unemployment insurance.

    The Democratic leadership did not insist on including a benefit extension in last December’s budget compromise, giving Republicans the power to stop legislation to restore Extended Unemployment Compensation.

    About 3 million workers have been denied jobless benefits since the program was allowed to expire late last December.

    House Democrats are circulating a discharge petition, which if signed by a majority of House members, would force an immediate vote on the measure. To date, the discharge petition has been signed by 193 House members. The House of Representatives has 233 Republicans and 199 Democrats.

  • John Quigley & Aleksandr Buzgalin discuss What Role Has Russia Played in Eastern Ukraine?

    John Quigley & Aleksandr Buzgalin say that the building occupations and protests in cities like Donetsk look like local initiatives, and are markedly less violent than some of those during the Euromaiden protests.

    For more information about European Union Military Assessment and a separate Finnish Military Analyst views of Russia’s military involvement in Eastern Ukraine visit here :

    http://

  • University of South Florida students demand “Hands off Ukraine”

    Tampa, FL – Tampa Students for a Democratic Society (SDS) and anti-war activists from the community protested U.S. interference in Ukraine at Senator Marco Rubio’s office, April 16. Marco Rubio supports efforts in the U.S. Senate to increase U.S. intervention and spend billions of taxpayer dollars in Ukraine. Students made three demands at Rubio’s office on the University of South Florida campus: No more U.S. intervention in Ukraine or Crimea; Stop U.S. aid to the illegitimate Ukrainian regime; and Oppose U.S. sanctions against Russia.

    Students gave fiery speeches denouncing Rubio’s support for U.S. intervention. Dani Leppo of Tampa SDS said, “For far too long, the imperialist aggression of the U.S. has caused bloodshed throughout the world. From Colombia to Venezuela, Iraq to Afghanistan, resources and lives are stolen in the name of spreading so-called ‘democracy.’ We must respect the people of Ukraine and Crimea.”

    When they finished speaking, the protesters marched into Rubio’s office to present their demands. The office was closed off and locked however, so protesters left a letter to Rubio listing their demands.

    SDS pointed out that the U.S. spent trillions on wars and foreign interventions while people suffered at home. Tampa SDS member Bridget White noted, “It’s ridiculous that the U.S. is backing real life fascists in the Ukraine. Can’t they be using this money to lower tuition instead?”

    SDS vows to continue the struggle against imperialism, fascism and Nazism wherever it appears.