Blog

  • Chicano community protests police checkpoint

    Los Angeles, CA – The Community Service Organization (CSO) and supporters held a protest Friday night, May 2, at a Los Angeles Police Department (LAPD) license/sobriety checkpoint located at a major intersection in the immigrant Mexican-American community of El Sereno.

    The organizers called this a repeat of the Battle of Puebla, where a ragtag Mexican army defeated the imperial French army in 1862. With volunteers and little resources the community took on the LAPD, informed the community, and protested what they see as a racist attack during Cinco de Mayo weekend.

    “Why during Cinco de Mayo and why in El Sereno?” organizers asked the LAPD. They pointed out that police continue to target Mexican/Chicano communities that have majority undocumented immigrants. With no driver’s licenses, the undocumented are easy prey for car confiscations.

    Car confiscation generates high revenues to local cities, as well as the Official Police Garage Association and their owners, who donate money for campaigns to local politicians for Los Angeles city council elections. For example Councilmember Mitch Englander has received large donations from Official Police Garage Association participants in the past. He in turn is a supporter of the Police Protective League, which also supports police checkpoints and car impounds. The protest was successful as the community came out and joined. Many drivers avoided the police trap, honked their car horns and waved in solidarity. The CSO and supporters will continue to protest any police checkpoint in our community.

  • Protest against joint U.S./Colombia military exercise in Arizona

    Tucson, AZ – 20 anti-war protesters confronted the arrival of Colombian Air Force and Special Forces troops at a U.S- led military exercise near Tucson, May 4. The anti-war activists chanted, “Stop the U.S.-funded war in Colombia!” and “50 years of war is enough!”

    The Colombian military came to practice under U.S. and NATO forces at Davis-Monthan Air Force Base. Outside the base, on a busy street corner, speakers denounced U.S. military intervention, the more than $8 billion spent by the U.S. government in repressing democracy and human rights, and the significance of the ongoing peace process between the revolutionary FARC and the Colombian government. In recent years Colombian officers, trained at Fort Benning in Georgia, were caught murdering civilian day laborers and claiming they were revolutionary fighters of the FARC. At least 1800 young men died this way.

    Tucson anti-war activist Jim Byrne shared, “We are here to denounce the collaboration of the NATO militaries during their training – for maintaining war and violence. We oppose the disgusting trend of the militarization of state and local police, who more and more look like professional armies. These police-armies are used against Chicano, African-American, and other oppressed people here, so that Arizona feels like the Terrordome!”

    Ana Maria Vasquez from Colombia explained, “I am 48 years old and I’ve never known peace in my country. We are all here today in solidarity to ensure the end of the war so that Colombians can live without war, murder, repression and fear.”

    Protesters vowed to continue their international solidarity with the Colombian people. Jim Byrne said, “We in the U.S. must develop alliances with all those seeking peace and justice for the people of Colombia. Labor unions like the United Steel Workers, faith organizations and social justice groups must demand the U.S. government stop financing, arming and supporting the militarization of Latin America and the repression of its peoples.”

    Video of the protest is being shared with unions, human rights organizations and the Colombian democratic movement Marcha Patriotica. The Alliance for Global Justice organized the protest to build solidarity between the U.S. and Colombian working people in struggling for peace and democracy. Tucson Students for a Democratic Society, Occupy Tucson and local churches endorsed the rally.

  • May 6: Fascist slaughter in Odessa

    http://www.wsws.org/en/articles/2014/05/06/ukra-m06.html Washington, Ukrainian puppet regime prepare new fascist slaughter in Odessa Alex Lantier In the wake of Friday’s fascist massacre of pro-Russian protesters at the Trade Unions House in Odessa, the US puppet regime in Kiev deployed National Guard units to the city yesterday. The sending of the National Guard, a force created by the […]

  • May 6: Fiction and facts of Gujarat model

    http://www.frontline.in/cover-story/fiction-and-fact/article5795324.ece?ref=sliderNews ‘Gujarat model’- Fiction and facts Atul Sood and Kalayiarasan A. NARENDRA MODI AND GUJARAT ARE THE pivots around which the 2014 elections in India are being contested. At least, so it appears if you see the print and the visual media in India. How far this is true for the real Indian voter, spread […]

  • Benares Grapevine-2: परेशान चेहरे और लड़खड़ाते घुटने


    अस्‍सी चौराहे स्थित पप्‍पू की दुकान पर एक लंबा सा आदमी चाय पीने आया। उसकी लंबाई औसत से कुछ ज्‍यादा थी। एक व्‍यक्ति ने उसे देखकर दूसरे से कहा, ”ई आइबी क हौ।” दूसरे ने सुना और तीसरे को बताया। तीसरे ने उसमें मूल्‍यवर्द्धन किया, ”अरे, तीन-चार मिला हउवन। दू ठे घाटे पे घूमत रहलन।” बात आगे बढ़ी। चौथे ने बताया कि अकेले आइबी वाले नहीं, बल्कि सीआइए और रॉ वाले भी आए हुए हैं। एक पांचवें व्‍यक्ति ने इन बातों को सुन कर कहीं फोन मिलाया और बताया, ”अबे, पता हौ, आइबी, रॉ अउर सीआइए क टीम बनारस में आयल हौ। अस्‍सी पर हउवन सब।” वहां से बात आगे बढ़ी और कुछ पत्रकारों को विश्‍वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली कि शहर में छापा पड़ने वाला है। अगले दिन के अखबारों की हेडलाइन थी: ”शहर के चप्‍पे-चप्‍पे पर आइबी की निगाह, पड़ सकते हैं छापे, संवेदनशील हालात।”

    बनारस की पत्रकारिता का यह किस्‍सा पिछली रात तुलसी घाट पर महंतजी विश्‍वम्‍भर मिश्र के छोटे भाई डॉक्‍टर साहब ने अनौपचारिक बातचीत में सुनाते हुए शहर की पत्रकारिता पर अफ़सोस जताया। कहने का अर्थ ये कि बनारस में कौन सी बात ख़बर बन जाए और कौन सी ख़बर बतकही, कुछ कहा नहीं जा सकता है। मसलन, कल सवेरे मेरी डेढ़ घंटे की नींद खोलने के लिए एक फोन आया। फोन करने वाले ने सूचना दी कि आम आदमी पार्टी ने एक सर्वे जारी किया है जिसके मुताबिक बनारस में ”आप” पहले स्‍थान पर, बसपा दूसरे पर, भाजपा तीसरे पर, सपा चौथे पर और कांग्रेस पांचवें स्‍थान पर रहेगी। अब, सवाल ये है कि क्‍या कोई भी पार्टी खुद को हारता हुआ कहती है? अगर नहीं, तो इसमें मौलिक क्‍या है? बहरहाल, जंगल की आग की तरह यह सर्वे ऐसा फैला कि दोबारा झपकी आने पर भी यही ख़बर देने के लिए किसी और का फोन आ गया। किसी तरह दिन शुरू हुआ, तो व्‍योमेश शुक्‍ल ने फोन कर दिया कि विष्‍णु खरे के कमरे में हूं, आइए। विष्‍णुजी हाफ पैंट में बैठे कॉफी पी रहे थे। पहुंचा गया। वे अब भी रीयल पॉलिटिक पर कायम थे। व्‍योमेश लगातार पान दिए जा रहे थे। उन्‍हें अभी दो दिन रुकना था लेकिन हमें मार्केट में निकलने की जल्‍दी थी। लेनिन के ज़माने का सवाल अब भी दुनिया में कायम था: ”क्‍या करें?” विष्‍णुजी ने अपनी इच्‍छा प्रकट की, ”अगर प्रियंका न भी आ सकें तो कम से कम उनका कोई संदेश वाला वीडियो रिकॉर्ड करवा कर लोगों में बंटवा दिया जाए। इसका बहुत असर पड़ेगा।” मैंने कहा, ”ये करेगा कौन?” वे बोले, ”मेरी तो सोनिया, प्रियंका या राहुल किसी से भी पहचान नहीं है।” मैंने कहा, ”मेरी तो किसी कांग्रेसी सभासद तक से पहचान नहीं है।” सवाल गंभीर था, जवाब नदारद। व्‍योमेश बोले, ”कुछ करते हैं।”

    शाम को व्‍योमेश ने सचमुच कुछ तो किया। उन्‍होंने फिर फोन किया, ”विष्‍णु खरे और शबनम हाशमी नई सड़क पर कांग्रेस के मंच से बोल रहे हैं।” लहजा सूचित करने का था, लेकिन पहुंचने पर उन्‍होंने सभा में बैठने का आग्रह कर डाला। ज़ाहिर है सभा ईसा भाई की थी और वहां अजय राय के आने की भी अटकलें थीं, लेकिन यह कांग्रेसी अपनापा देखकर मुझे थोड़ी वितृष्‍णा हुई। मित्र व्‍यालोक का चप्‍पल टूटा था, सो हम लोगों ने इस समय का सदुपयोग किया और गली में से नया चप्‍पल खरीद ले आए। लौटे तो हाथ में अखबार में लिपटा चप्‍पल था और मंच पर विष्‍णु खरे। सड़क के बीचोबीच कतार में लगी लाल कुर्सियों पर बैठे मुसलमान भाइयों को वे भरभराई आवाज में संबोधित कर के अजय राय के लिए वोट मांग रहे थे। रियल पॉलिटिक शबाब पर था। संचालक ने उन्‍हें दिल्‍ली से आया पत्रकार बताया था, तो लोगों में उनका वज़न बढ़ गया था। वे बोले, और मंच से उतरते वक्‍त लड़खड़ा गए। मुझे अटलजी की याद हो आई।

    खैर, बनारस के अल्‍पसंख्‍यक इलाकों में मेरी देखी यह पहली कांग्रेसी सभा थी। पचासेक लोग रहे होंगे। अजय राय को नहीं आना सो नहीं आए। बड़ी अजीब स्थिति है, कि कांग्रेस और मुसलमानों के बीच का रिश्‍ता समझ में नहीं आ रहा। हमने दिन में न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस के कार्यक्रम ”वाराणसी: ब्‍लैक एंड वाइट” के शूट पर मदनपुरा के तमाम मुसलमानों से बार-बार पूछा कि वे किसे वोट देंगे। सबने बिना किसी अपवाद के केजरीवाल और झाड़ू का नाम लिया। इस लोकतंत्र में मुसलमान कभी भी अपनी पसंद ज़ाहिर नहीं करता है। यह बात हम सब जानते हैं। मेरे जाने पहली बार ऐसा हुआ कि मुसलमान बोल रहा है। नाम बोल रहा है। पसंद बता रहा है। क्‍या करें? उस पर भरोसा कर लें? अब तक के चुनावों का सबक ये रहा है कि भरोसा न किया जाए। मेरे मित्र रोहित प्रकाश एक अलहदा बात कहते हैं कि संभव है मोदी के डर से इस बार मुसलमान ज्‍यादा असर्टिव हुआ हो और अपने को खोल रहा हो। यह संभावना है, लेकिन केजरीवाल का नाम इनके मुंह से सुनकर अभ्‍यास यही बताता है कि वे केजरीवाल को वोट नहीं देंगे। इस बात से कांग्रेसी खुश हैं। बनारस में कांग्रेसियों का कोई नामलेवा नहीं है, ऐसा नहीं है। विष्‍णु खरे या शबनम हाशमी या फिर तीस्‍ता सीतलवाड़ का कांग्रेसी प्रचार उनकी दुकानदारी से उतना ही ताल्‍लुक रख सकता है जितना उनके अपने चुनावी विश्‍लेषण से। अजय राय के नाम पर मतदाताओं की चुप्‍पी कुछ कह रही है। उसे सुनने की ज़रूरत है। इसके बरक्‍स एक और आवाज है जो पूर्वांचल के खांटी सामंती चरित्र से निकल रही है।

    रविदास गेट पर केशव की दुकान पर पान खाते एक पुलिसकर्मी मिले। छपरा निवासी थे। अजय राय से दुखी थे। बोले, ”पिछले चुनाव में हम बिधायकजी के संगे लगातार लगल रहली। हमरा चुनाव आयोग नोटिस भेज दिहलस। कोई बात ना.. बिधायक जी क सम्‍मान रहे। लेकिन अबकी ऊ ठीक नाहीं कइलन।” ऑटोमैटिक गति से पान बांधते राजेंदरजी की आंखें लाल हो गईं। वे बोले, ”जो राजनीत के लिए अपने भाई के कफ़न का सौदा कर ले, उसका कोई चरित्र है?” सिपाहीजी बोले, ”बताइए, ई सरवा गवाह है अपने भाई की हत्‍या में… कुछ तो लिहाज करना चाहिए था। ई न जीती।” पता नहीं इस कोण से कितने लोग सोच रहे हैं। मुख्‍तार का समर्थन लेकर अजय राय ने क्‍या कफ़न का सौदा सियासत के लिए कर लिया? क्‍या सियासत को इस उच्‍च आदर्शवादी स्‍तर पर जाकर सोचने वाले सामान्‍य लोग भी हैं? क्‍या अपने भाई की हत्‍या का बदला मोदी को हराने की चुनौती से बड़ा होना चाहिए?  ये ऐसे सवाल हैं जिन पर बनारस बहस कर रहा है। सवाल प्राथमिकताओं का है।

    एक और सवाल है। क्‍या नरेंद्र मोदी को हराने के लिए अजय राय उतने ही सीरियस हैं जितने अरविंद केजरीवाल? यह सवाल ज्‍यादा गंभीर है। ज़रूरी नहीं कि गंभीरता सड़कों पर दिखाई ही दे, लेकिन सड़कों के सन्‍नाटे के पार रात के धुंधलके में जो बनारस में घट रहा है, वह भी मामूली नहीं। नई सड़क की सभा के दौरान खबर मिली कि शरद यादव तुलसी घाट पहुंचने वाले हैं। उनकी पार्टी जेडीयू ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया है। वे महंतजी को श्रद्धांजलि देने रात साढ़े ग्‍यारह बजे उनके घर पहुंचे। अप्रत्‍याशित रूप से चार पत्रकार वहां मौजूद थे। मैंने पूछा, ”सिर्फ बनारस में मोदी का विरोध कर के क्‍या सारी सेकुलर ताकतें वड़ोदरा में उन्‍हें वाकओवर नहीं दे रही हैं?” शरद यादव ने जवाब दिया, ”ये बेकार का सवाल है।” मैंने दुहराया, ”क्‍या बनारस की समरसता को बचाना प्राथमिक है या मोदी को हराना? ” वे मुस्‍करा कर बोले, ”भाई, हम सत्‍ता में तो हैं नहीं। बहुत कमज़ोर हैं। हमारी जितनी ताकत है उतना कर रहे हैं।” दालान से निकल कर सीढि़यों से ऊपर आते वक्‍त वे लड़खड़ा गए। उन्‍हें सहारा देकर लाया गया। मुझे अटलजी की फिर याद आ गई।

    दरअसल, घुटने कमज़ोर हों तो हर आदमी अटलजी हो जाता है। मसलन, आज सवेरे शबनम हाशमी बहुत चिंतित थीं कि 9 तारीख को कबीर मठ में सूफ़ी गायन के लिए एडीएम ने उन्‍हें मंजूरी नहीं दी। वे मतदाता जागरूकता की बात कर रहे हैं और किसी का भी प्रचार करने वाले कार्यक्रमों को मंजूरी नहीं दे रहे। आज सवेरे-सवेरे बनारस के अखबारों में कांग्रेस प्रचार के लिए 60,000 परचे बंटवा चुकीं शबनम के चेहरे पर लेकिन इसका कोई उत्‍साह नहीं था। एक मित्र कह रहे थे कि राहुल गांधी के कांग्रेस की सत्‍ता में मज़बूत होने के बाद कुछ बदलाव आया है। कांग्रेस पोषित एनजीओ और व्‍यक्तियों को भाव नहीं दिया जा रहा और वे अपनी जगह दोबारा बहाल करवाने के लिए चार कदम आगे बढ़कर कांग्रेस के पक्ष में काम कर रहे हैं। यह बात कितनी सही है और कितनी गलत, यह तो नहीं पता लेकिन शबनम हाशमी को रायबरेली में परचा बांटने पर आरएसएस के लोगों द्वारा धमकाए जाने की घटना पर एक लेखक ने 4 तारीख को कबीर मठ में वाजिब टिप्‍पणी की थी, ”रायबरेली में साम्‍प्रदायिक फासीवाद का कौन सा खतरा है? ज़रा उनसे पूछिए कि वे वहां किसका परचा बांट रही थीं?” इस तरह के कई सवाल हैं जो बनारस के मोदी विरोधी खेमे में तैर रहे हैं, इसके बावजूद कुछ कमज़ोर घुटने मोदी को हराने के लिए किसिम किसिम की सीढि़यां उतर-चढ़ रहे हैं।

    बनारस की पत्रकारिता में ऐसे औसत से ”लंबे लोग” आकर्षण का केंद्र होते हैं। ये खबरें बना रहे हैं, अफ़वाह के पात्र बन रहे हैं और अंतत: सहानुभूति के पात्र बन जा रहे हैं। जनता के लिए ऐसे लोग बस नए चेहरे हैं। नई सड़क पर कांग्रेसी सभा जहां हो रही थी, उसके बगल वाली गली में गुटखा चबाता एक नौजवान इदरीस मंच की ओर देखते हुए कहता है, ”जीतना मोदी को है, परेशान सब लोग हो रहे हैं।” यही परेशानी फि़लहाल नरेंद्र मोदी के सबसे मजब़ूत मुहावरे के बरक्‍स बनारस को बना-बिगाड़ रही है।

    पिछली किस्‍त 
    अगली किस्‍त 

  • Is Ukraine Descending Into Civil War? Professors Nicolai Petro and Aleksandr Buzgalin discuss

    Professors Nicolai Petro and Aleksandr Buzgalin discuss the factional clashes in the Ukrainian city of Odessa and how the international community can deescalate tensions

  • गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार

    तुलसीराम

    सैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं-‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

    गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है। इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है। मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं। सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया। नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

    इस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है। गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है,जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।

    उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

    इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया,जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा। इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई।

    एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी। मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

    अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए। उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं। इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

  • ग्रामीणों ने जंगल में कंपनी अधिकारियों को सर्वे और पेड़ों को चिन्हित करने से रोका

    सिंगरौली, 6 मई 2014। एस्सार कंपनी ने महान जंगल क्षेत्र के ग्रामीणों के अधिकारों का एक बार फिर उल्लंघन किया। कंपनी ने सीमांकन के लिए जंगल में पेड़ों और पत्थरों को चिन्हित करना शुरु कर दिया है। महान संघर्ष समिति ने इसका विरोध किया है और अधिकारियों को तुरंत इस गतिविधि को रोकने की मांग की।

    विशेषकर महिलाओं ने इस विरोध प्रदर्शन में बड़ी संख्या में भाग लिया। सोमवार को विरोध स्थल पर पुलिस भी पहुंची लेकिन ग्रामीणों ने विरोध जारी रखा। ग्रामीणों का विरोध देखते हुए कंपनी के अधिकारी सर्वे उपकरण जंगल में ही छोड़ कर चले गए थे, जिसे ग्रामीणों ने देर शाम बंधोर पुलिस चौकी में जाकर जमा करवा दिया। आज अमिलिया, बुधेर, सुहिरा और बंधोरा के करीब 140 ग्रामीणों ने बैठक कर निर्णय लिया कि वे कंपनी द्वारा जंगल में किए जा रहे किसी भी कार्य का शांतिपूर्वक विरोध जारी रखेंगे।

    कंपनी के अधिकारी गुप्त रुप से पिछले तीन से चार महीने से प्रस्तावित कोयला खदान के सीमांकन के लिए पेड़ों और पत्थरों पर अंकन कर रहे हैं। पिछले महीने महान संघर्ष समिति ने इसके खिलाफ जिला कलेक्टर और जिला वनमण्डलाधिकारी सिंगरौली के पास शिकायत भी दर्ज करवाया था लेकिन कोई भी कार्रवायी नहीं की गयी।

    पिछले साल अगस्त में कंपनी अधिकारियों ने इसी तरह पेड़ों को चिन्हित करने का काम किया था जिसका महान संघर्ष समिति ने जोरदार विरोध जताया था।

    महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता और अमिलिया निवासी विजय सिंह ने कहा कि, ‘एस्सार के कर्मचारियों ने महान जंगल में चुपके से पेड़ों और पत्थरों को अंकित किया है। हमलोगों ने कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे सर्वे को रोक दिया है और इसका विरोध आगे भी करते रहेंगे। यह हमारे वन सत्याग्रह का ही एक हिस्सा है जिसे हमने महान को दूसरे चरण की मंजूरी मिलने के बाद फरवरी में शुरू किया था’।

    ग्रीनपीस की कैंपेनर प्रिया पिल्लई ने सवाल उठाते हुए कहा कि, ‘क्या उन्हें गैर वन गतिविधि शुरू करने की अनुमति मिल गई है ? यह लोगों के अधिकारों का हनन है। हम वनमण्डलाधिकारी से मांग करते हैं कि वो तुरंत कंपनी को गतिविधि को रोकने का आदेश दे’।

    इससे पहले फरवरी में पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोईली द्वारा महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण का पर्यावरण मंजूरी दे दिया गया था, जिसका महान के ग्रामीणों द्वारा पुरजोर विरोध किया गया। उन्होंने उस विशेष ग्राम सभा में पारित प्रस्ताव के जाली होने का सबूत पेश किया है जिसके आधार पर दूसरे चरण की पर्यावरण मंजूरी दी गयी है।

    साल 2012 में महान कोल ब्लॉक को 36 शर्तों के साथ पहले चरण का पर्यावरण मंजूरी दिया गया था जिसमें वनाधिकार कानून को लागू करवाना भी शामिल था। 6 मार्च 2013 को अमिलिया में वनाधिकार पर विशेष ग्राम सभा आयोजित किया गया था। इस ग्राम सभा में 184 लोग उपस्थित थे लेकिन आरटीआई से मिले ग्राम सभा के प्रस्ताव में 1125 लोगों के हस्ताक्षर हैं। इनमें कई ऐसे हैं जो तीन साल पहले मर चुके हैं। इसके अलावा 27 अमिलिया निवासियों ने लिखित रुप से शिकायत दर्ज कराया है कि वे उस ग्राम सभा में उपस्थित नहीं थे।

    महान संघर्ष समिति के जगनारायण शाह ने फर्जी ग्राम सभा के प्रस्ताव के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवायी है लेकिन अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं किया गया है। मीडिया खबरों के अनुसार जिला कलेक्टर एम. सेलवेन्द्रन ने कहा है कि वे इस मामले को देखेंगे। महान संघर्ष समिति ने पुलिस अधीक्षक डी. कल्याण चक्रवर्ती के पास भी आवेदन दिया है।

    स्पष्ट है कि दूसरे चरण की पर्यावरण मंजूरी सवालों के घेरे में है। महान संघर्ष समिति मांग करती है कि जंगल में इस तरह के सर्वे पर रोक लगायी जाय और ग्रामीणों की शिकायत पर जल्द से जल्द कार्रवायी की जाय।

  • Philippines: CPP denounces arrival of 3,000 US troops for US-RP joint military exercises

     

     

    The Balikatan military exercises has long served as a cover for the US military to deploy its troops in the Philippines, build its communications infrastructure, conduct intelligence gathering operations, and allow US troops to be embedded in local counter-guerrilla combat operations.

     

     
    MEDIA RELEASE By CPP Information Bureau 05 May 2014

    The Communist Party of the

  • Rajasthan – Report of police repression on workers of Sriram Piston in Bhiwadi; Memorandum to Chief Minister; Report on deadly attack on worker activists of Gurgaon Mazdoor Sangharsh Samiti and Bigul Mazdoor Dasta

    Report on deadly attack on worker activists of Gurgaon Mazdoor Sangharsh Samiti and Bigul Mazdoor Dasta May 5. Ghaziabad. Goons of owner and management of Sriram Piston attacked the activists of Gurgaon Mazdoor Sangharsh Samiti and Bigul Mazdoor Dasta who were distributing pamphlets at the Ghaziabad plant of Sriram Piston in support of the struggling […]