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  • भारत में लगातार चौड़ी होती असमानता की खाई और जनता की बर्बादी की कीमत पर हो रहे विकास पर एक नजर ! !

    देश में उपभोग करने वाली एक छोटी आबादी को चकाचौंध में डूबाने के लिये और अमेरिका-जापान से लेकर यूरोप तक पूरी दुनिया की पूँजी को मुनाफ़े का बेहतर बाज़ार उपलब्ध कराने के लिये जनता के कई अधिकारों को अप्रत्यक्ष रूप से छीना जा चुका है। इसके कई उदाहरण है कि जगह-जगह शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध और अपने अधिकारों के लिये होने वाले मज़दूर आन्दोलनों और जनता की आवाज को दबाने के लिये पुलिस-प्रशासन का इस्तेमाल अब खुले रूप में किया जा रहा है, कश्मीर से लेकर देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जनता पर सैन्य शासन के साथ ही अब मज़दूर इलाकों में भी मालिकों के कहने पर पुलिस प्रशासन जब चाहे फ़ासीवादी तरीक़े से मज़दूरों का दमन उत्पीड़न कर आतंक फ़ैलाने से बाज नहीं आती। यह सब इसलिये किया जाता है जिससे कि कुछ अमीर लोगों को देश के विकास का हिस्सेदार बनाया जा सके!

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  • भारत की ‘सिलिकन घाटी’ की चमक-दमक की ख़ातिर उजड़ा मेहनतकशों का आशियाना

    सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में काम करने वाली आबादी देश की पूरी श्रमिक आबादी का एक बेहद छोटा हिस्सा है, फ़िर भी चूँकि यह आबादी बाज़ार में उपलब्ध ऐशो-आराम के तमाम साजो समान को खरीदने की कुव्वत रखती है, इसलिए बंगलूरू शहर का पूरा विकास इस छोटी सी आबादी की ज़रूरतों को केन्द्र में रखकर किया जा रहा है। तमाम विज्ञापनों के ज़रिये इस आबादी को अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों जैसी जीवन शैली के सपने दिखाये जाते हैं। वातानुकूलित घरों और कार्यालयों में रहने वाले तथा वातानुकूलित गाड़ियों और शॉपिंग मॉलों में विचरण करने वाली इस आबादी को यह आभास तक नहीं होता कि उनके सपनों की दुनिया का निर्माण करने वाली बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी न सिर्फ़ इन सपनों से वंचित होती जा रही है बल्कि उसकी रही सही दुनिया भी दिन-ब-दिन उजड़ती जा रही है। मुम्बई के गोलीबार और कोलकता के नोनदंगा प्रकरण की तर्ज़ पर बंगलूरू में भी 19-20 जनवरी को इजीपुरा नामक मज़दूर बस्ती को प्रशासन और रियल स्टेट माफिया की मिलीभगत से उजाड़ दिया गया और देखते ही देखते मेहनतकशों के 1500 परिवारों के लगभग 8000 लोग सड़क पर आ गये।

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  • पेरिस कम्यून की वर्षगाँठ (18 मार्च) के अवसर पर

    सत्ता हासिल करने के बाद सर्वहारा वर्ग को हर सम्भव कोशिश करनी चाहिये कि उसके राज्य के उपकरण समाज के सेवक से समाज के स्वामी के रूप में न बदल जायें। सर्वहारा राज्य के विभिन्न अंगों-उपांगों में काम करने वाले सभी कार्यकर्ताओं के लिए ऊँची तनख़्वाहें पाने और एकाधिक पदों पर एक साथ काम करते हुए एकाधिक तनख्वाहें पाने की व्यवस्था समाप्त कर दी जानी चाहिये, और इन कार्यकर्ताओं को किसी विशेष सुविधा का लाभ नहीं उठाना चाहिए।

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  • कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (सत्रहवीं किश्त)

    पूँजीवादी शासक वर्ग तमाम हथकण्डों से जनता को अपने शासन के प्रति निष्ठावान और समर्पित बनाने की कोशिश करता आया है और भारतीय संविधान में मौजूद मूलभूत कर्तव्य भी इसी की एक कड़ी है। परन्तु एक मेहनतकश इन्सान का सर्वोपरि दायित्व यह है कि वह उत्पादन और शासन-प्रशासन की एक ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए जी जान से जुट जाये जो एक इन्सान द्वारा दूसरे इन्सान के शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करे।

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  • पूँजी की ताकत के आगे हड़ताल के लिए जरूरी है वर्ग एकजुटता!

    हड़ताल मजदूर वर्ग का एक ऐसा जबर्दस्त हथियार है जिसकी ताकत के दम पर वह मालिक वर्ग को अपनी व्यवहारिक माँगों को पूरा करने के लिए घुटने टेकने को मजबूर कर देता है। 1990 के दशक से जारी निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों के साथ-साथ मालिक वर्ग ने ऐसे एक खास तरीके की रणनीति तैयार की है जिससे कि किसी एक फ़ैक्टरी में हड़ताल होने से उनकी सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। वो तरीका है एक बड़े कारखाने को सौ छोटे कारखानों में बाँट देना। ऐसी ही एक फ़ैक्टरी हड़ताल की घटना हमारे सामने है जो हड़ताल के बारे में कुछ जरूरी सबक देती है।

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  • दो दिनों की “राष्‍ट्रव्यापी” हड़ताल

    वास्तव में हड़ताल मज़दूर वर्ग का एक बहुत ताक़तवर हथियार है जिसका इस्तेमाल बहुत तैयारी और सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए। हड़ताल के नाम पर ऐसे तमाशों से कुछ हासिल नहीं होता बल्कि हमारे इस हथियार की धार ही कुन्द हो जाती है। मज़दूरों को ऐसे अनुष्ठानों की ज़रूरत नहीं है। मज़दूरों के हक़ों के लिए एकजुट और जुझारू लड़ाई की लम्बी तैयारी आज वक़्त की माँग है। इसके लिए सबसे पहले ज़रूरी है कि मज़दूर दलाल यूनियनों और नकली लाल झण्डे वाले नेताओं को धता बताकर अपने आप को व्यापक आधार वाली क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियनों में संगठित करें। एक-एक कारख़ाने में दुअन्नी-चवन्नी के लिए लड़ने के बजाय मज़दूर वर्ग के तौर पर पहले उन क़ानूनी अधिकारों के लिए आवाज़ उठायें जिन्हें देने का वायदा सभी सरकारें करती हैं। और हर छोटे-बड़े हक़ की लड़ाई में क़दम बढ़ाते हुए यह कभी न भूलें कि ग़ुलामी की ज़िन्दगी से मुक्ति के लिए उन्हें इस पूँजीवादी व्यवस्था को ख़त्म करने की लम्बी लड़ाई में शामिल होना ही होगा।

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  • चुनावी तैयारियों के बीच बजट का खेल

    इस बजट में महँगाई से निपटने के लिए कुछ नहीं है। उल्टे, डीज़ल और पेट्रोल के दामों में बढ़ोत्तरी का असर हर चीज़ पर पड़ने वाला है। रेल किरायों में बढ़ोत्तरी पहले ही हो चुकी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत से साफ़ है कि आने वाले दिनों में इसका संकट और गहरायेगा। यह संकट भारत के मेहनतकश अवाम के लिए भी ढेरों मुसीबतें लेकर आयेगा। गरीबी, बेरोज़गारी, महँगाई में और अधिक इज़ाफ़ा होगा। चुनावी वर्ष के बजट ने वास्तविक हालत को ढाँपने-तोपने की चाहे जितनी कोशिश की हो, भारत के मेहनतकशों को आने वाले कठिन हालात का मुक़ाबला करने के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी होगी।

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  • एक मेहनतकश औरत की कहानी…

    इस पूँजी की व्यवस्था में बिना पूँजी के लोगों की ऐसी ही हालत हो जाती है जैसे अभी पूजा की है। एकदम बेजान, चेहरा एकदम सूखा हुआ। 28 साल की उम्र में उसको स्वस्थ और सेहतमन्द होना चाहिए था मगर इस उम्र में जिन्दगी का पहाड़ ढो रही है और दिमागी रुप से असुन्तिल हो गयी है।

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  • इलाज के नाम पर लोगों की जान से खेल रही हैं दवा कम्पनियाँ

    एक तरफ तो यह कम्पनियाँ भारत में ग़रीब जनता को धोखे में रख उनपर अपनी दवा का परीक्षण कर उनकी जान से खेल रही है वहीं दूसरी तरफ किसी ठोस क़ानून के अभाव में दवा परीक्षण के दौरान या उसके दुष्प्रभावों के कारण होने वाली मौतों से भी अपना पल्ला झाड़ लेती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार सन 2008 से लेकर 2011 तक भारत में 2031 लोग दवा परीक्षणों के दौरान मरे थे। परन्तु दवा कम्पनियों का दावा है कि इनमें से कुछ प्रतिशत लोग ही सीधे तौर पर दवाओं के दुष्प्रभावों के कारण मारे गये थे जबकि एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में दवा परीक्षणों में जान गँवाने वाले 668 लोगों में से 158 की मौत सैनोफी एवेन्तीस नामक दवा कम्पनी के परीक्षण के दौरान हुई थी जिसका मुख्यालय फ्रांस में है, और 139 लोग बेयर नाम की जर्मन कम्पनी की दवाओं के परीक्षण के दौरान मरे थे। इसके अलावा 2010 में ही कैंसर रोकने वाली वैक्सीन का ट्रायल सुर्खियों में रहा था जिसके दौरान आन्ध्र प्रदेश और गुजरात में एचपीवी गर्भाशय कैंसर की रोकथाम के नाम पर वहाँ की गरीब लड़कियों पर इस टीके की जाँच की गयी थी। इस टीके के दुष्प्रभावों के कारण छह आदिवासी लड़कियों की मौत हो गयी थी। बाद में सरकार ने सिर्फ़ इतना कहकर इस पूरे मामले को दबा दिया कि लड़कियों की मौत वैक्सीन की वजह से नहीं बल्कि किसी अन्य कारण से हुई है।

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  • देशव्यापी हड़ताल किसके लिए?

    20-21 फरवरी 2013 दो दिवसीय देशव्यापी अनुष्ठानिक हड़ताल कुल 11 बड़ी ट्रेड यूनियनों ने मिलकर की जिससे बहुत मजदूर भ्रम में पड़ गये कि ये यूनियन वाले हमारे हितैषी हैं और हमारा साथ दे रहे हैं। वर्षो से पल रहा गुस्सा निकल पड़ा जिससे कई जगह तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाऐं हुई। मगर उन मजदूरों को ये शंका भी न हुई कि ये हमारे वर्ग के गद्दार और आस्तीन के सांप है। जिनका यह काम ही है कि हर साल ऐसे एक-दो अनुष्ठान करते रहो, जिससे की दुकानदारी चलती रहे। और मजदूर भ्रम में बने रहें। कि उनकी बात भी कहने वाले कुछ लोग है। हड़ताल वाले दिन नोएडा में तोड़फोड़ हुई। जिसकी सज़ा तुरन्त मजदूरों को मिली और अभी तक 150 से भी ज्यादा मजदूर जेल में है। मगर जिन बड़ी ट्रेड यूनियनों ने मिलकर ये अनुष्ठान सम्पन्न किया। उन्हीं में से एक ट्रेड यूनियन (एटक) के नेता और सांसद गुरूदास दासगुप्ता ने पुलिस से माँफी माँगी कि इस हिंसा में यूनियन की कोई गलती नहीं है।

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