भारत की ‘सिलिकन घाटी’ की चमक-दमक की ख़ातिर उजड़ा मेहनतकशों का आशियाना

सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में काम करने वाली आबादी देश की पूरी श्रमिक आबादी का एक बेहद छोटा हिस्सा है, फ़िर भी चूँकि यह आबादी बाज़ार में उपलब्ध ऐशो-आराम के तमाम साजो समान को खरीदने की कुव्वत रखती है, इसलिए बंगलूरू शहर का पूरा विकास इस छोटी सी आबादी की ज़रूरतों को केन्द्र में रखकर किया जा रहा है। तमाम विज्ञापनों के ज़रिये इस आबादी को अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों जैसी जीवन शैली के सपने दिखाये जाते हैं। वातानुकूलित घरों और कार्यालयों में रहने वाले तथा वातानुकूलित गाड़ियों और शॉपिंग मॉलों में विचरण करने वाली इस आबादी को यह आभास तक नहीं होता कि उनके सपनों की दुनिया का निर्माण करने वाली बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी न सिर्फ़ इन सपनों से वंचित होती जा रही है बल्कि उसकी रही सही दुनिया भी दिन-ब-दिन उजड़ती जा रही है। मुम्बई के गोलीबार और कोलकता के नोनदंगा प्रकरण की तर्ज़ पर बंगलूरू में भी 19-20 जनवरी को इजीपुरा नामक मज़दूर बस्ती को प्रशासन और रियल स्टेट माफिया की मिलीभगत से उजाड़ दिया गया और देखते ही देखते मेहनतकशों के 1500 परिवारों के लगभग 8000 लोग सड़क पर आ गये।

The post भारत की ‘सिलिकन घाटी’ की चमक-दमक की ख़ातिर उजड़ा मेहनतकशों का आशियाना appeared first on मज़दूर बिगुल.

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *