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  • Нет – фашизму! Ukraine: Against Fascism in Donetsk, Kharkov and Odessa and Sevastopol- Red TV

    Ukraine Red TV asks Moscow are you Against Fascism ?

    “The duty of every honest Russian Communist – to express their solidarity with the Ukrainian comrades and give them full support.

    We do not choose between Kiev and Moscow regimes between Kaiser and King.

    We have our own barricade on which we must fight. It starts on the streets of Kharkov and Odessa, where activists “Borotba” mobilize

  • Mar 15: The longest fast

    http://america.aljazeera.com/features/2014/3/the-longest-fast.html The longest fast Basharat Peer 1.Following the example of Mahatma Gandhi On a March afternoon in 2013, Irom Sharmila, a 39-year-old activist who has been on a hunger strike since November 2000, appeared for a hearing before a judge. The court is housed in a white-and-blue-gray complex in Imphal, the capital of the northeast […]

  • Know your Enemy :The new neoliberal fascist government in Ukraine

    Democracy and Class Struggle says repeating the words of Sun Tzu :Know your enemy and know yourself and you can fight a hundred battles without disaster- Sun Tzu

    Information supplied by Borotba.

    What is the outcome at governmental level of the crisis in Ukraine? When looking at both the acting president, ministers, governmental bodies and regional governors posts one can find interesting

  • बेहतर भविष्य का घोषणापत्र

    गुजरात के साणंद में 1 से 3 मार्च  2014 तक  ‘रोजी रोटी अधिकार अभियान’ का पांचवां सम्मेलन संपन्न हुआ। इस दौरान जनहित खासकर वंचित वर्गों के अधिकारों की पैरवी करते हुए इस हेतु सतत संघर्ष का संकल्प भी लिया गया। इसी के साथ सांप्रदायिकता और विकास के गुजरात मॉडल को नजदीक से देखा और समझा गया। गौरतलब है कि  इस सम्मेलन में न सिर्फ भारत की बल्कि पूरे विश्व विशेषकर दक्षिण एशिया के देशों की सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक स्थिति पर भी विचार किया गया। पेश है सचिन कुमार जैन का आलेख;

    देश के 15 राज्यों से विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समुदाय के 2000 से ज्यादा लोग गुजरात के साणंद में “रोजी-रोटी अधिकार अभियान“ के सदस्य के रूप में पांचवें अधिवेशन में सम्मिलित हुए। इन सभी ने सामाजिक समानता, शोषण से मुक्ति, बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करने और बेहतर समाज की स्थापना के लिए चल रहे सभी अहिंसात्मक जमीनी जनसंघर्षों और आन्दोलनों के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट की। सम्मेलन में विभिन्न आंदोलनों एवं संघर्षों में शहादत देने वालों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

    अपने घोषणपत्र में अभियान ने स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव, कुपोषण, सतत भुखमरी के शिकार होकर मर जाने वाले बच्चों, महिलाओं, पुरुषों और तीसरे लिंग वाले समुदायों के प्रति संवेदना व्यक्त की। साथ ही  उल्लेख किया कि मातृत्व सेवाओं का अभाव महिलाओं का जीवन खत्म कर देता है। इन सबको बचाया जा सकता है। दस्तावेज में उन सभी मेहनतकशों व हजारों किसानों के प्रति भी श्रद्धांजलि अर्पित की गई हैं, जिन्हें शोषणकारी नीतियों के खिलाफ अपनी आजीविका को बचने का संघर्ष करते हुए आत्महत्या करना पड़ी। साथ ही उन लोगों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने साम्प्रदायिक और जातिगत हिंसा में अपना जीवन खो दिया है।
    वर्तमान परिस्थितियों की निंदा करते हुए कहा गया कि देश की आजादी के 67 साल बाद भी बड़ी आबादी को भोजन, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी हक भी उपलब्ध नहीं हैं। इसी के साथ दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, महिलाओं, निशक्तजनों और तीसरे लिंग के लोगों के साथ लगातार हो रहे भेदभाव की भी निंदा की गई।

    घोषणापत्र में कहा गया कि देश के लोकतंत्र में जिस तरह असहमति व्यक्त करने वालों, जनआन्दोलनों और गरीब समर्थक नीति निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों को दबाया जा रहा है, उससे सभी बहुत चिंतित हैं। यहाँ तक कि किसानों, मजदूरों, महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों, छात्रों, युवाओं, लैंगिक अल्पसंख्यकों सहित सभी तबकों के अहिंसक-शांतिपूर्ण जनआन्दोलनों और अधिकार मांगने वाले मेहनतकश लोगों को भी राज्य बहुत ही ताकतवर और क्रूर तरीके से कुचल रहा है। भारतीय लोकतंत्र में विरोध और असहमति व्यक्त करने के लिए दायरा सीमित होता जा रहा है। सम्मेलन में भोजन के अधिकार, लोकतंत्र की मजबूती और सामाजिक न्याय के प्रति संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई हैं।

    पितृसत्तात्मक व्यवस्था और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरुद्ध चल रहे संघर्षों और जनसमर्थक लोकतान्त्रिक राजनीतिक ताकतों के रूप में संघर्ष कर रहे सभी आन्दोलनों के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई। इसी के साथ डब्ल्यूटीओ, मुक्त व्यापार समझौतों, अन्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों और फसलों पर जीएम तकनीक के प्रयोगों को अनुमति दिए जाने की भर्त्सना करते हुए बताया गया कि इनके माध्यम से देश की खाद्य संप्रभुता की व्यवस्था और संभावनाओं को खत्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। 
    नवउदार पूंजीवाद, भ्रष्ट शासन व्यवस्था, लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म करने के प्रयासों, प्रकृति संसाधनों की बेशर्म लूट और नागरिक संगठनों के संघर्षों का गला घोंटने की सरकारों की लगातार चल रही कोशिशों के परिणामस्वरुप ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत इमारत खंडहर हो गयी है और सरकार पर से लोगों का भरोसा उठता गया है। आजादी के बाद अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था। अमीरों के उपभोग के लिए लोगों के आजीविका के संसाधनों और सार्वजनिक-निजी साझेदारी के नाम पर सामुदायिक संपत्तियों को छीने जाने और कारपोरेट समूहों के लाभ के लिए देश के प्राकृतिक संसाधनों को बांटे जाने की नीतियों और कामों की कड़ी भर्त्सना की गई।

    “गुजरात के कथित विकास मॉडल” को पूरी तरह से खारिज करते हुए बताया गया कि “गुजरात के शोषणकारी विकास मॉडल” ने न केवल असमानता को और बढ़ाया है, बल्कि नवउदार पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ पितृसत्तात्मक ताकतों को भी ज्यादा मजबूत किया है। इसके अलावा यह विकास मॉडल गरीब और हाशियों पर खड़े समुदायों के विरोध को कुचलेगा एवं हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं जनकल्याणकारी ताने-बाने को नेस्तनाबूत कर देगा। ऐसी ताकतों के खिलाफ गुजरात में चल रहे संघर्षों और आन्दोलनों के साथ एकजुट रहने और संघर्ष में उनके साथ रहने की भी घोषणा की गई।

    सभी मेहनतकशों की ओर से कहा गया कि हम सबने खेती की व्यवस्था को संरक्षित किया है। देश की किसान आधारित खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता ही हमारी व्यवस्था की रीढ़ है और ये ही हमारे जनसंघर्ष की मूल ताकत है। अतएव सभी मेहनतकश वर्गों के इज्जत से जीवन जीने के लिए आवश्यक वेतन, काम की सुरक्षा, बेहतर और शोषण मुक्त मानवीय कार्यदशाएं, श्रम कानून के कठोर क्रियान्वयन और सामाजिक सुरक्षा (जिसमें पेंशन, मातृत्व लाभ, स्वास्थ्य सेवा समाहित हैं) हेतु प्रभावी कानूनी अधिकारों को हासिल करने के लिए संघर्ष करने और इस मंतव्य से चल रहे संघर्षों को समर्थन देने का भी प्रण लिया गया। यह मान्यता भी दोहराई गई कि खाद्यसुरक्षा को केवल खाद्य संप्रभुता से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा मांग की गई कि सभी बच्चों, पुरुषों, महिलाओं और तीसरे लिंग से सम्बंधित लोगों को पर्याप्त, विविधता और गुणवत्ता पूर्ण पोषक भोजन सहित अनिवार्य सेवाएं मिलना चाहिए।

    घोषणापत्र्ा में स्वीकार किया गया कि कई राज्यों में अभियान के लगातार संघर्ष और समन्वित प्रयासों के चलते लोगों के बुनियादी अधिकारों (जैसे रोजगार गारंटी, व्यापक सार्वजनिक वितरण प्रणाली, विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन, लोकव्यापिकृत आईसीडीएस, मातृत्व लाभ और सामाजिक सुरक्षा पेंशन आदि) को हासिल करने में उल्लेखनीय सफलता मिली है। यह संघर्ष उर्जा भी देता है। प्रपत्र्ा में मांग की गई कि प्राकृतिक आपदाओं, सांप्रदायिक-जातिगत हिंसा एवं विस्थापन से प्रभावित लोगों की आजीविका और पोषण सहित खाद्य सुरक्षा का हक सुनिश्चित किया जाए।

    दक्षिण एशिया खासतौर पर मध्य और उत्तर-पूर्वी भारत, कश्मीर घाटी, उत्तरी श्रीलंका, युद्धग्रस्त अफगानिस्तान आदि क्षेत्रों के उन लोगों को जिनकी जिंदगियां टकराव और हिंसा ने छीन ली है, के संघर्षों को याद करते हुए कहा गया कि खाद्यसुरक्षा के अधिकार को संरक्षित करने के लिए शान्ति अनिवार्य है। इस क्षेत्र में शांति बहाल करने, नागरिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, लोकतान्त्रिक तरीकों से संघर्ष-प्रदर्शन करने और टकराव को खत्म करने के लिए स्थान सुरक्षित होना चाहिए।

    लोगों के भोजन और अन्य संबधित हकदारियों के लिए एकजुट संघर्ष के अभियान को जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए, खाद्य संप्रभुता और जल-जंगल-जमीन जैसे संसाधनों के संरक्षण, किसानों और कृषि के संरक्षण, वंचित समूहों के मुद्दों और लोकतंत्र को सुरक्षित करने की दिशा में अभियान को आगे ले जाने का संकल्प भी लिया गया। भोजन के अधिकार को हासिल करने के लिए चल रहे वैश्विक आन्दोलनों के साथ एकजुटता अभिव्यक्त करते हुए और भोजन के अधिकार के लिए दक्षिण एशियाई आंदोलन के लिए काम
    करने का भी निर्णय इस सम्मेलन में लिया गया। (सभार: सप्रेस)
      
     सचिन कुमार जैन सक्रिय समाजकर्मी एवं विकास संवाद भोपाल से संबद्ध हैं।

  • Los Angeles Times on Ukraine threat from within : Neofascists are as much a menace to Ukraine as Putin’s actions in Crimea

    Democracy and Class Stuggle says this OP Ed in the Los Angeles Times is far from perfect but a hell of a lot better than `Liberal Left Apologists for Ukrainian Fascism which appear in the British Guardian and BBC. Some sections of the British Left on the Question of Ukrainian Fascism are frankly shameful.

    By Robert EnglishMarch 13, 2014It’s become popular to dismiss Russian President

  • Armed men from the Nazis/Fascist Right Sector movement have attacked local self-defence activists in the eastern city of Kharkov

    Armed men from the Nazi/Fascist Right Sector movement have attacked local self-defence activists in the eastern city of Kharkov, Itar-Tass reports citing local sources.

    At least three activists have reportedly been wounded by gunfire.

    The armed group of radicals had arrived from the West of Ukraine on a bus, local activists told Itar-Tass.“The outsiders are shooting machine guns,” he said.

  • Ukraine: The Ukrainian Junta prepares for Civil War

     

     

    Communiqué of Association Borotba (Объединение Боротьба) and antifascist resistance center number 9

    Recent activity by the Kiev junta suggests that nationalist forces are preparing for armed suppr…ession of the popular movement in the Southeast. Thus, the decision of the Verkhovna Rada to create a National Guard, numbering 60,000 people. The backbone of these militias will be the

  • ग्रीन ट्रिब्युनल ने गोरखपुर परमाणु संयंत्र पर माँगा जवाब, सुनवाई शुरू

    गुजरी 12 मार्च 2014 को राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्युनल के माननीय जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली मुख्य बैंच ने फतेहाबाद के गांव गोरखपुर में बनने वाले परमाणु संयंत्र को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हाल ही में दी गई पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ याचिका संख्या 8/2014 पर सुनवाई करते हुए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार,न्युक्लियर पॉवर कारपोरेशन ऑफ इंडिया, हरियाणा सरकार, मुख्य वन्य जीव संरक्षक हरियाणा, को नोटिस जारी किया है और दिनांक 21.03.2014 को जवाब देने के निर्देश दिए हैं। जीव रक्षा बिश्नोई सभा के सदस्य याचिकाकर्ता विनोद कड़वासरा ने एडवोकेट डॉ. एम.सी.मेहता (शीर्ष पर्यावरणविद वकील,सुप्रीम कोर्ट) के माध्यम से याचिका दायर की। पांच सदस्यीय खण्डपीठ के अध्यक्ष जस्टिस स्वतंत्र कुमार, न्यायमूर्ति यू.डी. साल्वी-न्यायिक सदस्य,डॉ देवेन्द्र कुमार अग्रवाल-विशेषज्ञ सदस्य, श्री विक्रम सिंह साजवान- विशेषज्ञ सदस्य, डॉ आर. सी. त्रिवेदी-विशेषज्ञ सदस्य ने सुनवाई करते हुए सभी छः प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए जवाब देने को कहा है।

    याचिका में पुरे प्रोजैक्ट को भी वन्यजीव दृष्टिकोण व अन्य खामियों के अनुसार लिया गया है जिसमें घनी आबादी और हिसार, फतेहाबाद व दिल्ली इत्यादि से नजदीकी भी मुख्य कारणों में शामिल है। संयंत्र में प्रयुक्त होने वाला पानी भी 1955 के भाखड़ा डैम समझोते के अनुसार केवल सिंचाई और जलउर्जा प्राप्ति के लिए था ना कि परमाणु उर्जा के लिए।नहर में विकिरणयुक्त पानी से सिंचाई के साथ साथ लोगों के स्वास्थ्य पर भी बहुत विपरित असर पड़ेगा क्योंकि लाखों लोग पीने के लिए इसी पानी का इस्तेमाल करते हैं।सिचांई का पानी संयंत्र में प्रयोग करने से इलाके के लाखों एकड़ वीरान हो जाऐगें। इसके अलावा तुरंत बाड़बंदी व खम्भे हटाने की अंतरिम राहत के साथ साथ पर्यावरण मंजूरी रदद करने की प्रार्थना की गई है।

    पूर्व केसः-

    गौरतलब है कि गत वर्ष एनपीसीआईएल द्वारा आनन फानन में बिना पर्यावरण मंजूरी के ही वन्य जीवों को खदेड़कर कालोनी क्षैत्र में बाड़बंदी व खम्भे बनाने की फैक्टरी लगा दी गई। जुलाई में याचिकाकर्ता द्वारा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्युनल की शरण लेकर कालोनी क्षेत्र से बाड़बदी हटवा दी गई।याचिका दायर करने के बाद भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून के वैज्ञानिकों ने क्षैत्र का दौरा करके मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपी जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया था कि क्षैत्र में अनुसूचि-1 के वन्यजीवों की संरक्षण योजना तैयार करना ही उनके दौरे का उदेदश्य था लैकिन संरक्षण योजना तब तक संभव नहीं है जब तक एनपीसीआइएल कॉलोनी हेतू अधिगृहित भूमि को छोड़ने के लिए तैयार ना हो। इसके अलावा एनपीसीआईएल को तुरंत अपनी फैक्टरी हटानी चाहिए और अनुसूचि-1 के वन्यजीवों के लम्बे समय संरक्षण के लिए प्रशासन को तुरंत कुतों के बधियाकरण का अभियान चलाना चाहिए इसके बाद ही अनुसूचि-1 के वन्यजीवों की संरक्षण योजना तैयार की जाएगी।

    22 अगस्त 2013 को ग्रीन ट्रिब्युनल ने मंत्रालय को निर्देश दिए कि मंत्रालय पर्यावरण मंजूरी से संबधित आगामी किसी भी कार्यवाही में याचिकाकर्ता को शामिल करें जिस अनुसार 19 नवम्बर 2013 को मंत्रालय की एक्सर्प एपरसल कमेटी की बैठक में विनोद कड़वासरा एवं एडवोकेट धर्मवीर पुनियां शामिल हुए और वन्यजीवों से संबधित सभी तथ्यों को रखते हुए भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून की रिपोर्ट लागु करने की मांग की।

    दिसम्बर के अन्त में सरकार द्वारा प्रधानमंत्री का शिलान्यास कार्यक्रम रख दिया गया और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार ने वन्यजीवों की संरक्षण योजना बनाए बिना ही एनपीसीआईएल को पर्यावरण मंजूरी दे दी। हालांकि 13 अक्तुबर 2010 को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा एनपीसीआईएल को परमाणु संयंत्र की रिपोर्ट में अनुसूचि-1 के वन्यजीवों की संरक्षण योजना तैयार करने बारे लिखा गया, इसके बाद पर्यावरण मंजूरी हेतू एक्सर्प एपरसल कमेटी की दिनांक 18 नवम्बर 2012 व 22-23 मार्च 2014 की बैठकों में भी अनुसूचि-1 के वन्यजीवों की संरक्षण योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए। परन्तु संरक्षण योजना नहीं बनी और पर्यावरण मंजूरी दे दी गई और प्रधानमंत्री महोदय द्वारा संयंत्र का शिलान्यास कर दिया गया। प्रधानमंत्री द्वारा हिरण पार्क की घोषणा भी बैतुकी थी क्योंकि हिरण पार्क भारतीय वन्य जीव संस्थान द्वारा नकार दिया था क्योंकि 300-400 हिरणों व नील गायों को मात्र 40.50 एकड़ में बंद नहीं किया जा सकता।

    क्षेत्र के लोग गत कई वर्षों से सरकार से वन्य जीव संरक्षण की गुहार लगा रहे है लेकिन सरकार वन्यजीवों के साथ क्षैत्र के लोगों का जीवन दांव पर लगाते हुए परमाणु बम स्थापित करने को उतावली हो रही हैं।पुरा संयंत्र व इससे निकालने वाला पानी भी लोगों के लिए खतरनाक होगा।यदि पर्यावरण मजुंरी रदद होती है तो एईआरबी(परमाणु उर्जा रैगुलैटरी बोर्ड) व डीएई(डिपार्टमैंट आफॅ एटोमिक एनर्जी) से मंजुरी लेने की प्रक्रिया भी प्रभावित होगी और एनपीसीआईएल को दोबारा नए सिरे से वन्यजीव संरक्षण योजना तैयार करनी होगी। कालोनी क्षैत्र को भारतीय वन्य जीव संस्थान द्वारा अनुमोदन अनुसार ”संरक्षित क्षैत्र“ घोषित करना होगा। संरक्षण योजना तैयार करके नैशनल बोर्ड फॉर वाईल्ड लाईफ से वन्यजीव दृष्टिकोण से मंजूरी लेनी होगी और दोबारा पुरी रिपोर्ट तैयार करके पर्यावरण मजुंरी हेतु आवेदन करना होगा। उस पुरी प्रक्रिया में कई वर्ष लग सकते है। – विनोद कड़वासरा (याचिकाकर्ता सदस्य जीव रक्षा बिश्नोई सभा)

  • Fukushima nuclear power disaster could last a very long time

    San José, CA – March 11 marks the third anniversary of the tsunami that overwhelmed the Fukushima Daiichi nuclear power plant in Japan. The power plant’s owner, Tokyo Electric Power Company or TEPCO, says that it will take at least six more years to begin to remove the melted and radioactive uranium fuel, and even worse, that they don’t know how they are going to do it. The cleanup could go another 10 or 20 years and cost $50 billion or more.

    Three years ago the massive tsunami generated by a huge earthquake struck northern Japan, killing more than 15,000 people. The tsunami wave measured more than 100 feet in height, wiping out both the electrical power and the back-up generators at the seaside nuclear power plant (many nuclear power plants, including all the plants in California, operate by the sea to use seawater for cooling). This led to the melt-down of the nuclear fuel as the plant’s cooling equipment had no power, leading to the worst nuclear disaster since the 1986 Chernobyl disaster.

    Some 300,000 people had to be evacuated because of the radioactive contamination. 1500 of them died because of hardships and lack of medical treatment. Radioactive cooling water has been leaking from the power plant’s storage tanks, going into the ground water and then the Pacific Ocean.

    Although most Japanese support the continued shutdown of Japan’s 50-plus nuclear power plants, the right-wing government of Shinzo Abe supports nuclear power. So far two nuclear power plants have been reopened in Japan.

    Despite the growth of worldwide opposition to nuclear power after the disaster, the Obama administration is also continuing support nuclear power. Two new nuclear power plants are now under construction, the first since the U.S. Three Mile Island nuclear accident in 1979. Two more are approved, and there are more than 25 applications by the utility industry to build more nuclear power plants.

    Nuclear power only exists because the government provides insurance against a disaster and it has proven to be an expensive form of energy. In addition, there is no safe way to store the radioactive waste from nuclear fission power reactors, which can last hundreds of thousands of years.

    However, with government backing, nuclear power can be very profitable, especially for the giant corporations such as General Electric, which designed the nuclear power plants at Fukushima. More than one-third of the 100 nuclear power plants in the U.S. have the same design (‘boiling water reactor’) as the Fukushima Daiichi and twelve are in seismically active areas prone to earthquakes, including both of California’s plants at Diablo Canyon and San Onofre.

    While the tsunami was a natural disaster, the Fukushima Daiichi disaster was manmade. People in the U.S. need to continue to push for the complete shutdown of nuclear power and an end to export of this expensive and dangerous energy to other countries.

  • Ukraine: Donetsk – At least one killed and 13 injured in Clashes between pro and anti Ukraine Putsch Forces

    According to local media reports pro-Maidan activists started provoking the pro-Russian crowd, by shouting far-right Banderite slogans loudly demanding the respect of Ukrainian territorial sovereignty.

    Clashes between the rival rallies reportedly erupted after a crowd of demonstrators broke through a police cordon separating the crowds.

    This follows on from Nazis shooting and wounding