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  • वाह रे कारपोरेट मीडिया का ‘लोकतंत्र’ ! मेक्सिको के कुछ सबक

    पी. कुमार मंगलम का यह लेख मेक्सिको में चुनावों और प्रायोजित आंदोलनों तथा दलों के जरिए फासीवादी, जनविरोधी उभारों और जन संघर्षों को दबाने के साम्राज्यवादी प्रयोगों की रोशनी में भारत में पिछले कुछ समय से चल रही लहरों की (पहले ‘आप’ की लहर और अब मोदी की) पड़ताल करता है. एक जरूरी लेख.


    नरेंद्र मोदी या फिर अरविंद केजरीवाल/राहुल गांधी (यहाँ  कभी अगर क्रमों की अदला-बदली होती है, तो वह आखिरकार मीडिया कुबेरों के स्वार्थोँ से ही तय होती है)? आजकल अगर आप दोस्तों-रिश्तेदारों, लोकतंत्र के अपने अनुभवों का रोना रोते बुजुर्गों और अतिउत्साहित ‘नये’ वोटरों को सुनें, तो बात यहीं शुरु और खत्म हुआ करती है। जब 2014 के लोकसभा चुनावों का दौर शुरू हो चुका है, तब सभी संभावित राजनीतिक विकल्पों की गहरी पड़ताल के बजाए पूरी बात का सिर्फ़ इन चेहरों पर टंग जाना क्या स्वाभाविक है! आदि-समाजवाद से लेकर ‘ग्लोबलाईज़्ड’ समय के बीच की खिचड़ी सच्चाइयों से निकलते अनेकों जनसंघर्षों के इस दौर में सिर्फ़ ‘परिवार’, ‘संघ-परिवार’ और “अपनी ईमानदारी” की ‘उपलब्धि’ लिए घूमते इन चेहरों का यूं छाया रहना तो और भी अचरज भरा है! हालांकि, अगर इन दिनों चारों ओर से आ रही ‘पल-पल की खबरों’ पर गौर करें, तो चुनावों के मीडियाई नियंत्रण की कड़ियाँ अपने-आप खुलने लगती हैं। साथ ही, दुनिया के ‘सबसे बड़े’ भारतीय लोकतंत्र का खोखलापन भी नजर आता है। वैसे, बात सिर्फ भारत की ही नहीं है। ‘विकासशील’ या फिर ‘तीसरी दुनिया’ का ठप्पा झेलते देशों में ‘जनता का शासन’ अक्सर न दिखने वाले या फिर दिखने में लुभाऊ लगने वाले ऐसे ही फंदों से जकड़ा है। यहाँ हम लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको में जनतंत्र के पिछले कुछ दशकों के अनुभवों की चर्चा करते हुए अपनी बात स्पष्ट करेंगे।

    मेक्सिको: हड़प लिए गए लोकतंत्र की त्रासदी

    हम शायद ही कभी यह सोचते हैँ कि सिर्फ एक देश संयुक्त राज्य अमरीका का आम प्रयोग (हिदी में और ज्यादा) में अमरीका कहा जाना एक शब्द के गलत प्रयोग से कहीं ज्यादा है। जैसाकि समकालीन लातीनी अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो का कहना है, यह इस एक देश (अब से आगे यू.एस.) के द्वारा अपनी दक्षिणी सीमा के बाद शुरू होते लातीनी अमरीका का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और राजनीति हथियाकर इस पुरे क्षेत्र को “एक दोयम अमरीका” में बदल देने की पूरी दास्तान है। यहाँ हम इस भयावह सच के पूरे ताने-बाने और अभी तक चल रहे सिलसिले की बात तो नहीँ कर सकते, लेकिन मेक्सिको की बात करते हुए इसके कई पहलू खुलेँगे।

    भूगोल के हिसाब से उत्तरी अमरीका मेँ होने और यू.एस. से बिल्कुल सटे होने के बावजूद मेक्सिको स्पानी भाषा और स्पानी औपनिवेशिक इतिहास के साथ सीधे-सीधे दक्षिणी अमरीका का हिस्सा है। इस जुड़ाव की सबसे अहम बात यह है कि 1810-25 के बीच स्पानी हुकूमत से बाहर निकले मेक्सिको, मध्य और दक्षिणी अमरीका के देशों (इन तीनों को मिलाकर बना क्षेत्र ही लातीनी अमरीका कहलाता है) में बोई गई सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी, धनिकोँ के राजनीतिक वर्चस्व और यू.एस. की दादागिरी की नर्सरी भी यही देश रहा है। बात चाहे इस ‘आज़ादी’ के बाद भी स्पेनवंशी क्रियोल और मिली-जुली नस्ल के स्थानीय पूँजीपतियों के पूरे देश के संसाधन, संस्कृति और सत्ता पर कब्जे की हो या 1844-48 में यू.एस द्धारा मेक्सिको की आधी जमीन लील लिये जाने की हो, मेक्सिको कल और आज के लातीनी अमरीका की कई झाँकिया दिखलाता है।

    ‘आज़ाद’ मेक्सिको की लगातार भयावह होती गैरबराबरियों के खिलाफ वहां के भूमिहीन किसानों और खान मजदूरोँ का गुस्सा 1910 की मेक्सिको क्रांति बनकर फूटा। हालांकि, बहुत जल्द ही ब्रिटिश, फ्रांसीसी और आगे चलकर यू.एस. के बाज़ार और पैसे पर पलते क्रियोल वर्ग ने बदलाव के संघर्षों को बर्बरता से कुचल डाला था। 1930 के दशक मेँ उत्तर के पांचो विया और दक्षिण मेँ चियापास क्षेत्र के एमिलियानो सापाता जैसे क्रांतिकारी नेताओं की हत्या कर बड़ी पूँजी और सामाजिक भेदभाव की शक्तियों ने पूरे राज्य तंत्र पर कब्जा कर लिया था। 1929 में राष्ट्रपति रहे प्लूतार्को कायेस ने पीआरआई (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन इंस्तितुसियोनाल-व्यवस्थागत क्रांति का दल) बनाकर इन शक्तियों को संगठन और वैचारिक मुखौटा दिया। जैसाकि नाम से ही जाहिर है, यह पार्टी क्रांति के दौर में जोर-शोर से उठी समानता और न्याय की मांगों[1] को एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्रपति प्रणाली वाली व्यवस्था में दफनाने की शुरुआत थी।

    प्लुतार्को कायेस के बाद आए सभी राष्ट्रपतियों ने जनआकांक्षाओं का गला घोंटने वाली इस व्यवस्था को मजबूत किया। मजेदार बात यह कि यह सब लगातार जनता के नाम पर, लोकप्रिय नायकों की मूर्तियां वगैरह बनवाकर तथा लोकगीतों-लोककथाओं के कानफोड़ू सरकारी प्रचार के साथ-साथ किया गया! यह भी बताते चलें कि मूलवासियों सहित अन्य वंचित तबकों की कीमत पर विदेशी पूंजी का रास्ता बुहारती पीआरआई सरकारें यू. एस. शासन-व्यवस्था की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं थी। आश्चर्य नहीं कि जब 1950 के दशक में हालीवुड में “कम्युनिस्ट” कहकर चार्ली चैपलिन जैसे कलाकारों को निशाना बनाया जा रहा था, तब वहां के सरकारी फिल्मकारों ने मेक्सिको क्रांति के नायकों को खलनायक दिखा कई फिल्में ही बना डाली! 1953 में आई एलिया काज़ान की ऐसी ही एक फिल्म में चियापास के भुमिहीन किसानों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता को बातूनी और छुटभैया गुंडा बना दिया गया था!

    ‘आज़ाद’ मेक्सिको के आर्थिक-राजनीतिक हालातों की कुछ बारीकियाँ 1947 के बाद के भारत को समझने में मदद करती हैं। मसलन, जहां मेक्सिको में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, सत्ता और समाज में हावी रहे क्रियोल वर्ग ने नए निज़ाम पर जबरन कब्जा किया, वहीं भारत में अंग्रेजी राज से उपजे सवर्ण जमींदार 1947 के बाद “देशभक्ति” और खादी ओढ़कर पूरी व्यवस्था पर पसर गए! फिर, जहां मेक्सिको में शासक वर्गों ने पीआरआई का लुभावना सरकारी मुखौटा तैयार किया, वहीं ‘आज़ाद’ भारत की कांग्रेस ब्राह्मणवादी सामंतों के हाथों कैद होकर रह गई थी। यह जरूर है कि मेक्सिको में चियापास के मूलवासियों सहित भूमिहीनों-छोटे किसानों पर खुलेआम चली राजकीय हिंसा (जिसकी जड़ें अत्यधिक हिंसक औपनिवेशिक इतिहास में हैं) के बरअक्स भारत में यह हिंसा ‘लोकतंत्र’, ‘विकास’ और ‘राष्ट्रवाद’ के दावे से दबा दी जाती रही है। स्वरूप जो भी रहा हो, पूरी व्यवस्था पर गिनती के शोषक वर्गों के कब्जे ने दोनों ही देशों की बड़ी आबादी को अपनी ही जमीन पर तिल-तिल कर खत्म होने को मजबूर किया। इस पूरी प्रक्रिया में अपनी जीविका, भाषाओं और संस्कृतियों पर रोज ‘विकास’ के हमले झेलते भारत और मेक्सिको के मूलवासी बहुल क्षेत्र “सत्ता-केंद्र से पूरी योजना के साथ थोपे गये पिछड़ेपन” की जीती-जागती मिसाल बने (विलियम्स 2002)। वैसे,1991 के बाद से ‘जनहित’ के नाम पर बड़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुलकर किसानों-मजदूरों की जमीन और रोजगार छिनते भारतीय लोकतंत्र का ‘मानवीय’ मुखौटा अपने-आप उतर गया है। इस पूरे दौर की एक खास बात यह रही है कि बड़े मीडिया समुह नव-उदारवादी नीतियों के सबसे बड़े पैरोकार बन पूरे देश में इन्हें लागू करने वाले दलों को एकमात्र राजनीतिक विकल्प बना कर पेश कर रहे हैं। ‘ग्लोबल’ कहकर खुद पर इठलाती कारपोरेट मीडिया के इस गोरखधंधे को समझने के लिये भी मेक्सिको एक अच्छा उदाहरण है, जो वैश्वीकरण की उलटबासियाँ  काफी पहले से झेल रहा है।

    मेक्सिको: वैश्वीकरण और मीडियाक्रेसी का मकड़जाल

    यू. एस. से सटे होने के कारण मेक्सिको और फिर मध्य अमरीकी देश वैश्वीकरण के पहले शिकारों में रहे हैं। ‘उदारीकरण’ ‘आर्थिक सुधार’ आदि का लुभावना चेहरा देकर वैश्वीकरण की जो नीतियां आज पूरी दुनिया में लागू की जा रही हैं, मेक्सिको काफी पहले से उन सबकी प्रयोगशाला रहा है (शायद यहीं से यह कहावत भी निकलती है: मेक्सिको, भगवान से इतना दूर और यू.एस. के इतना करीब!)। एक और खास बात यह कि लातीनी अमरीका के ज्यादातर देशों के उलट, जहां नव-उदारवादी नीतियां भयानक तानाशाहियों के द्धारा थोपी गईं [2], मेक्सिको में देश बेचने का काम छ्ह साला चुनावों के साथ और संसाधनों की लूट का हिस्सा मध्यवर्ग में बांटकर किया गया। हालांकि, 1980 के बीतते-बीतते शोषित तबकों को हथियार और कभी-कभी ‘भागीदारी’ के सरकारी झुनझुने तथा मध्यवर्ग को ‘राष्ट्रवाद’ और ‘विकास’ के दावे से साधते रहने की पीआरआई की रणनीति चूक गई थी। तब, जहां महंगाई और मेक्सिकन मुद्रा पेसो की कीमत में भारी गिरावट से कंगाल हुए उच्च और मध्य वर्ग सरकार को नकारा घोषित कर रहे थे, वहीं सालों की लूट और अनदेखी से बरबाद आबादी का बड़ा हिस्सा अपने आंदोलन खड़ा कर रहा था।

    1988 के राष्ट्रपति चुनावों में वंचित तबकों के जमीन और जीवन की मांगों को साथ लेकर तेउआनतेपेक कार्देनास पीआरडी (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन देमोक्रातिका-लोकतांत्रिक क्रांति का दल)  के झंडे के साथ पीआरआई उम्मीदवार कार्लोस सालिनास गोर्तारी के खिलाफ़ लड़े। व्यापक जनसमर्थन और जबरदस्त लोकप्रियता, कार्देनास के पिता पूर्व समाजवादी राष्ट्रपति लासारो कार्देनास थे, के बावजूद वे चुनाव हार गए। जीत और हार का बहुत कम फासला किसी राजनीतिक उलटफेर से नहीं, बल्कि सोची-समझी सरकारी साजिश से तय हुआ था। इलेक्ट्रॉनिक मतों की गिनती में कार्देनास शुरू से आग चल रहे थे कि ठीक आधी रात को मशीनें ‘अचानक’ खराब हो गईं। और जब उन्हें ‘ठीकठाक’ कर अगली सुबह नतीजों का एलान किया गया, तो कार्देनास राष्ट्रपति के बजाय राष्ट्रपति के भूतपूर्व उम्मीदवार बन चुके थे! लोकतंत्र के खुल्लम-खुल्ला अपहरण में इस बार सरकारी भोंपू बने बड़े मीडिया ने 1994 के चुनावों में अपनी भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ा ली थी। तब, पहले से ज्यादा संगठित पीआरडी की चुनौती को एक-दूसरे का पर्याय बने पीआरआई और राज्यसत्ता (जैसे अपने यहां कांग्रेस/बीजेपी/संस्थागत ‘वाम’ और सरकार) तथा सबसे बड़े मीडिया समूह तेलेवीसा ने मिलकर खत्म कर डाला था। श्रम ‘सुधार’ और ‘उदार’ कर-व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से यू.एस. का हुक्म बजाते नाफ्टा [3] करार पर पीआरआई की बलैयाँ  लेने वाली तेलेवीसा ने अपने कारनामों से जनमत सरकार के पक्ष में या ठीक-ठीक कहें तो पीआरडी के खिलाफ़ मोड़ दिया था।

    सबसे पहले, तेलेवीसा ने अपने बड़े नेटवर्क और उसपर आम लोगों के भरोसे को भंजाते हुए पीआरआई उम्मीदवार एर्नेस्तो सेदियो को अन्य उम्मीदवारों के मुकाबले 10 गुना ज्यादा प्रचार दिया। फिर, पीआरआई विरोधी मतों को बांटने के लिए 1980 में खड़ी हुई कट्टर कैथोलिक रुझानों वाली पार्टी पीएएन (पार्तिदो दे ला आक्सियोन नासियोनाल- राष्ट्रीय कारवाई का दल) को पीआरडी से ज्यादा तवज्जो देकर ‘विपक्ष’ बनाया गया। इतना ही नहीं, पीआरडी की राजनीतिक चुनौती को कुंद करने के लिए बिल्कुल उसी के सुर में मजदूर-किसान हित और व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाली पीटी (पार्तिदो दे लोस त्राबाखादोरेस-मजदूर दल) को रातों-रात सनसनीखेज तरीके से देश का ‘हीरो’ बना दिया गया! यह और बात है कि इस पार्टी का न तो पहले कभी नाम सुना गया था और न ही देश में इसका कोई संगठन था! यह सब करते हुए बाकी खबरें (हां, कहने के लिए तो वे खबरें ही थी!) भी पीआरआई की जीत के हिसाब से तय हो रहीं थी। मसलन, चुनाव से ठीक पहले सर्बिया-बोस्निया गृहयुद्ध और दूसरे देशों के अंदरूनी झगड़ों को बार-बार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। इशारा साफ था, अगर मेक्सिको को टूटने या कमजोर होने से बचाना है, तो देशवासियों को ‘अनुभवी’ और ‘सबको साथ लेकर चलने वाली’ पीआरआई का साथ देना ही चाहिए! यहां पीआरडी, जिसके हजारों कार्यकर्ता सरकारी हिंसा का शिकार हुए, और चियापास में भूमिहीन मूलवासियों के हथियारबंद सापातिस्ता आंदोलन को बतौर ‘खलनायक’ पेश किया गया।  

    तेलेवीसा की अगुआई में बड़ी मीडिया की इन सब कलाबाजियों का नतीजा पीआरडी की एक और हार तथा पीआरआई की ‘जीत’ के रूप में सामने आया। पहले से ही विदेशी पूंजी पर टिके और नाफ्टा में प्रस्तावित कर ‘सुधार’ आदि से अपनी कमाई कई गुना बढ़ाने को आतुर बड़ी मीडिया ने इस जीत को को तुरत-फुरत ‘ऐतिहासिक’ भी बता दिया था! वैसे इस जीत का असली खिलाड़ी तो सिर्फ रेफरी होने का ढोंग कर रहा यही मीडिया था, जिसने अपनी और अन्य धनकुबेरों की बेशुमार दौलत की खातिर मुनाफे की एक और सरकार बनवा दी थी। यहां बताते चलें कि पीआरआई के लिए चंदे की खातिर रखे गए सिर्फ़ एक रात्रि-भोज के दौरान 750 मिलियन डालर (करीब 45 सौ करोड़ रु.) जुटाए गए, जिसमें 70 मिलियन डालर (करीब 4 सौ 27 करोड़ रू.) तो तेलेवीसा के मालिक एमीलीयो इसकारागा ने ही दिए थे!

    लैटिन अमेरिका इन क्राइसिस (संकटग्रस्त लातीनी अमरीका) के लेखक जान डब्ल्यू शेरमान ने मेक्सिको में बडी मीडिया के द्वारा रचे गए ‘लोकतंत्र’ के इस नाटक को ‘मीडियाक्रेसी’ कहा है। इस ‘मीडियाक्रेसी’ में आबादी के बड़े हिस्से की सोच पर हावी एक या एक से अधिक कॉरपोरेट मीडिया, जैसे मेक्सिको में तेलेवीसा, अपने फायदे की सरकार बनाते-गिराते रहते हैं। यहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन सी पार्टी आ रही है, बस इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि जो भी आए इस मीडिया के काम आए! अपने मतलब के लिए सत्तासीन पार्टियों की अदला-बदली तो यहां की खास रवायत है! साल 2000 आते-आते मेक्सिको यह सब कुछ देख चुका था, जब राष्ट्रपति चुनावों में जीत का सेहरा पीआरआई के बजाय पीएएन के सिर बांधा गया। धार्मिक कट्टरता के अपने सभी दावों को बड़ी चालाकी से छुपा पीएएन अब बाजार की सबसे बड़ी हिमायती पार्टी बन गई थी और देश को नए राष्ट्रपति के रूप में कोका-कोला (मेक्सिको) के मुखिया रहे विसेंते फाक्स का ब्रांडेड तोहफा दिया था!

    निष्कर्ष: भारत और मीडियाक्रेसी की ‘लहरें’

    चुनावों से ठीक पहले ज्यादातर टी.वी. और अखबार मोदी तथा उनके मनपसंद प्रचार-हथकंडों, जैसे गुजरात में ‘विकास’ की विडंबनाओं पर घुन्ना चुप्पी और आतंकवाद (मतलब आई. एम. मतलब मुसलमान!) की तोतारटंत, से सज गए हैं। पूरी दुनिया का ‘सच’ “सबसे पहले” बताने-दिखाने का दावा करने वाली बड़ी मीडिया भला “हर-हर मोदी” के उन्माद में बौड़ाए संघी लगुओं-भगुओं-सा व्यवहार क्यों कर रही  है! वैसे, कल तक यही मीडिया अस्सी-नब्बे के दशक से नेहरुवादी समाजवाद का अपना ही बुना भ्रमजाल (जिसमें चलती स्थानीय जमींदारों-पूंजीपतियों की ही थी) तोड़कर बाजार के ‘मनमोहनी’ छ्लावे बेचती कांग्रेस पर फिदा था। हो भी क्यों न, ‘खबर’ बेचने के अपने कारोबार में ठेका-प्रथा और अधिकतम काम के लिए कम-से-कम पगार जैसे उदारीकरण के ‘वरदानोँ’ का सबसे ज्यादा फायदा भी तो इसी मीडिया ने उठाया है! और आज जब शोषण और लूट की इन्हीं सब नीतियों के लिए मनमोहन सिंह “अंडरएचीवर” बन चुके हैं, तब यह मीडिया पूरी पेशेवर सफाई और ‘निष्पक्षता’ से कारपोरेट पूंजी के नए, ‘सख्त’, ‘कठोर’ आदि, आदि…सेवक बने नरेंद्र मोदी के साथ हो लिया है!

    यहां मेक्सिको के जिन अनुभवों को रखा गया है, उनकी नजर से देखें तो कांग्रेस से बड़ी मीडिया का इस तरह किनारा कर लेना ज्यादा बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। मसलन, मेक्सिको के पीआरआई की तरह कांग्रेस भी जहाँ सत्ता के सभी खुले-छुपे हिस्सों पर वर्षों की अपनी पकड़ के बावजूद (या शायद इसी वजह से) वंचित तबकों के बुनियादी मुद्दे हल नहीं कर सकी, वहीं लोकप्रिय दिखने की चुनावी मजबूरियों के चलते वह आज कॉरपोरेट मुनाफे को खुली छूट भी नहीं दे सकती। इस तरह, ‘विकास’ और ‘सबका साथ’ के दावों के अपने ही अंतर्विरोधों में टूटी-फूटी यह पार्टी सिर्फ मुनाफे के लिए ‘प्रतिबद्ध’ बड़ी पूंजी की पहली पसंद नहीं रह गई है। वहीं, एकमुश्तिया वोट बटोरने के अपने हिंदू सांप्रदायिक एजेंडे को कारपोरेटी विकास की चकमक चाशनी में पेश करते मोदी बड़ी मीडिया के लिए ज्यादा जिताऊ-बिकाऊ खिलाड़ी (जैसे मेक्सिको में पीएएन) बन चुके हैं!

    आजकल (या कम से कम मोदी को सीधे-सीधे चुनौती देने तक) बड़ी मीडिया की लाडली बनी आम आदमी पार्टी के हो-हल्ले के पीछे झांके, तो लोकतंत्र पर भारी पड़ते पूँजी का खेल यहाँ भी दिख जाता है। सबसे पहले, सिर्फ़ पैसों के हेरफेर को भ्रष्टाचार समझने के चलताऊ नजरिए से लैस ‘आप’ ने भ्रष्टाचार की टी.वी. पर नहीं दिखने वाली, लेकिन हमारी पूरी व्यवस्था की जड़ में बैठी सच्चाइयों (आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का है, जिसमें ज्यादातर दलित हैं) से लोगों का ध्यान हटा दिया है। फिर, इतिहास की कई नाइंसाफियों की उपज ऐसी सच्चाइयों को ‘सामान्य’ समझने-समझाने वाले हमारे समाज के बड़े हिस्से को बिना कोई जनांदोलन खड़ा किए ‘ईमानदार’ होने और व्यवस्था ‘बदलने’ का फास्टफुडिया इल्हाम भी दे दिया गया है! यह तब जब दलितों-मुसलमानों-स्त्रियों सहित व्यवस्था के सभी शिकारों पर ‘आम आदमी’ के इस पार्टी का रवैया बिल्कुल सतही और आखिरकार शोषक सत्ताओं और विचारों को ही आगे बढ़ाने वाला है। मसलन, औरतों के सवालों को उनकी पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक  गहराई में उठाने की बजाय यहाँ इन सवालों का निशाना रही पुरुषसत्ता को ही “महिलाओं की कमांडो फोर्स” का नया हथियार दे दिया गया है! वहीं, धार्मिकता, पूरी राजनीतिक व्यवस्था और पुलिस आदि के जरिए वार करती सांप्रदायिकता पर सीधी बहस न खड़ी कर इसे सिर्फ़ मोदी विरोध और मुसलमानों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अभी तक चल रहे सरकारी छलावे के चुनावी तोतारटंत के भरोसे छोड दिया गया है। लोकतंत्र के तमाम दावों के बावजूद आप का अंदरूनी ढाँचा (जिसमें चलती सिर्फ़ पोस्टर ब्वाय अरविंद केजरीवाल और उन्हीं के चुने कुछ टेक्नोक्रेट लोगों की ही है) और स्वराज का इसका मंत्र (जहां सर्वशक्तिशाली लोकपाल न तो जनता द्वारा चुना जाएगा और न ही उसकी कोई जन-जवाबदेही होगी) भी भागीदारी और जनवाद के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं देते।

    इस तरह, सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण तथा पूँजीपतियों के ही हित साधने वाली मौजूदा आर्थिक नीतियों पर पूरी सहमति (याद करें केजरीवाल के “अच्छे” उद्योगपतियों के ‘बिजनेस’ में दखल न देने की वह चारों तरफ छापी गई टिप्पणी!) के साथ ‘आप’ ‘मुख्यधारा’ की राजनीति के लिए कोई खतरा नहीं है। बल्कि, आज कॉरपोरेट व्यवस्था के लिए भी चंद नामों पर चलती और और देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजाना उठ रही प्रतिरोध की अनगिनत आवाजों से कोई भी गहरा जुड़ाव न रखने वाली यह पार्टी एक वफादार और ‘ईमानदार’ ‘विरोधी’ बन रही है।आश्चर्य नहीं कि इसी व्यवस्था की जय-जयकार करती बड़ी मीडिया, जो जनांदोलनों को “अराजक”, “माओवादी” आदि बताकर खबरों से गायब कर दिया करती है, शुरू से ही ‘आप’ को चमका-दमका कर खड़ा करती आई है (बहुत-कुछ मेक्सिको के पीटी की तरह)! यह जरूर है कि जबर्दस्त संगठन और हिंदुत्व के वोटखींचू ताकत की वजह से लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा इस मीडिया से ’आप’ से ज्यादा तरजीह पा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब मोदी का खूनी चेहरा रोज नए ग्राहक ढूँढ़ती बड़ी पूँजी के काम का नहीं रहेगा, तब ‘साफ-सुथरी’ ‘आप’ को दुबारा हीरो बनते देर नहीं लगेगी!

    कुल मिलाकर, चौबीसो घंटे की प्राईम टाईम खबर बने मोदी (जिनकी रैलियों और वहां जुटाई गई भीड़ को कई-कई कैमरों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है), फिलहाल सिर्फ़ विज्ञापनों की तरह बीच-बीच में दिखाए जाते केजरीवाल और छोटू बना दिए गए कांग्रेस और अन्य दलों के साथ बड़ी मीडिया लोकतंत्र का एक और “महापर्व” रचने मॆ जुट गई है। हालांकि, इस महापर्व को रचने-बेचने के लिए महाभारत और दबंग के नायकों (सभी मर्द और सवर्ण!) की आदि हो चुकी जनता को मुट्ठी बाँधे, लड़ने को तैयार मोदी और केजरीवाल/राहुल दिखाकर इनके “सीधे मुकाबले” का भुलावा भी दिया जा रहा है! और, मेक्सिको की ही तरह यहाँ भी ‘भविष्य’ के इन चेहरोँ की नूराकूश्ती मेँ हमारे जल-जंगल-जमीन को डकारते बडी पूँजी के खतरे पर कहीँ कोई बात नहीँ होती!

    टिप्पणियां:

    1. इन मांगों को उनकी पूरी गहराई और तफ़सील में मेक्सिको की दीवारों पर दर्ज करने का काम दिएगो रिबेरा, दाविद सिकिएरोस और उनके साथियों ने किया।

    2. दुनिया में पहली बार लोकप्रिय समर्थन से चुनी गई साल्वादोर आयेंदे की साम्यवादी सरकार के 1973 में तख्तापलट के साथ चिली इन देशों का सबसे कुख्यात उदाहरण बना। यू.एस. के तब के विदेश मंत्री किसिंगर ने कहा था: “हम चुपचाप हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगे, जब चिली की जनता की गैर-जिम्मेदारी से वहां कोई कम्युनिस्ट सरकार आ जाए”! 1973 में चिली के तानाशाह बने आगोस्तो पिनोचे यू.एस. के हथियारों और सैनिकों के बल पर ही सत्ता हथिया पाए थे।

    3.  North Atlantic Free Trade Agreement: उत्तर अटलांटिक मुक्त व्यापार संगठन 1 जनवरी, 1994 को यू.एस., मेक्सिको और कनाडा को शामिल करते हुए अस्तित्व में आया। ठीक इसी दिन भूमिहीन मूलवासियों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता के नारों को उठाते हुए चियापास के जंगलों और गलियों पर एकदम से छा जाने वाले सापातिस्ता फ्रंट के लड़ाकों ने इस तारीख को सचमुच ऐतिहासिक बना दिया था। सापाता के ये नए साथी गुलामी की नई शर्तें थोपने वाले इस करार को रद्द करने के साथ-साथ मेक्सिको की पूरी शासन व्यवस्था को बदलने के लिए भी लड़ रहें हैं।

    संदर्भ सूची:

    Canclini, Garcia Nestor. Hybrid Culture: Strategies for Entering and Leaving Modernity. Minneapolis, London: University of Minnesota Press. 1995.

    Galeano, Eduardo. Memoria del fuego (II): las caras y las mascaras. Madrid: Siglo Veintiuno de España Editores. 1984.

    Galeano, Eduardo. Upside Down: A Primer for the Looking Glass World (translation by Mark Fried). New York: Metropolitan Books. 2000

    Sherman, W. John. Latin America in Crisis. Colorado: Westview Press. 2000.

    Williams, Gareth. The Other Side of the Popular. Durham & London: Duke University Press. 2002

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    -सुभाष गाताडे


    English version of this article is available here

    अगर मैं नहीं जलता
    अगर आप नहीं जलते
    हम लोग नहीं जलते
    फिर अंधेरे में उजास कौन करेगा

    – नाजिम हिकमत

    साहित्य के विद्यार्थियों एवं विद्वतजनों के बीच अपने आप को पाकर खुश हूं और सम्मानित महसूस कर रहा हूं। जब मुझे पहली दफा इस आयोजन की सूचना मिली कि साहित्य के ज्ञाता मानवाधिकार के मसले पर बात करनेवाले हैं – एक ऐसा मसला जिसकी तरफ हर चिन्तनशील और सरोकारसम्पन्न व्यक्ति को गौर करना चाहिए – तब मैं बहुत उत्साहित हुआ; लेकिन जब यह ख़बर भी मिली कि मुझे चन्द बातें रखनी हैं तो ईमानदारी की बात यह है कि मेरा उत्साह जाता रहा।
    बहरहाल, कुछ समय पहले एक अलग ढंग की किताब से मेरा साबिका पड़ा जिसका शीर्षक था रायटर्स पुलिसजिसे ब्रुनो फुल्गिनी ने लिखा था। जनाब बुल्गिनी जिन्हें फ्रांसिसी संसद ने पुराने रेकार्ड की निगरानी के लिए रखा था, उसे अपने बोरियत भरे काम में अचानक किसी दिन खजाना हाथ लग गया जब दो सौ साल पुरानी पेरिस पुलिस की फाइलें वह खंगालने लगे। इन फाइलों में अपराधियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा लेखकों एवं कलाकारों की दैनंदिन गतिविधियों का बारीकी से विवरण दिया गया था। जाहिर था कि 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में महान लेखकों पर राजा की बारीक निगरानी थी।
    जाहिर है कि अन्दर से चरमरा रही हुकूमत की आन्तरिक सुरक्षा की हिफाजत में लगे लोगों को यह साफ पता था कि ये सभी अग्रणी क़लमकार भले ही कहानियां लिख रहे हों, मगर कुलीनों एवं अभिजातों के जीवन के पाखण्ड पर उनका फोकस और आम लोगों के जीवनयापन के मसलों को लेकर उनके सरोकार मुल्क के अन्दर जारी उथलपुथल को तेज कर रहे हैं। उन्हें पता था कि उनकी यह रचनाएं एक तरह से बदलाव के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि कानून एवं सुरक्षा के रखवालों द्वारा विचारों के मुक्त प्रवाह पर बन्दिशें लगाने के लिए की जा रही वे तमाम कोशिशें बेकार साबित हुई और किस तरह सामने आयी फ्रांसिसी क्रान्ति दुनिया के विचारशील, इंसाफ़पसन्द लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन कर सामने आयी।
    या आप अंकल टाॅम्स केबिन या लाईफ अमंग द लोली नामक गुलामी की प्रथा के खिलाफ अमेरिकी लेखिका हैरिएट बीचर स्टोव द्वारा लिखे गए उपन्यास को देखें। 1852 ईसवी में प्रकाशित इस उपन्यास के बारे में कहा जाता है कि उसने अमेरिका के ‘‘गृहयुद्ध की जमीन तैयार की। इस किताब की लोकप्रियता का अन्दाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 19वीं सदी का वह सबसे अधिक बिकनेवाला उपन्यास था। कहा जाता है कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, जिन्होंने गुलामी की प्रथा की समाप्ति के लिए चले गृहयुद्ध की अगुआई की, जब 1862 में पहली दफा हैरिएट बीचर स्टोव से मिले तो उन्होंने चकित होकर पूछा ‘‘ तो आप ही वह महिला जिनके लिखे किताब ने इस महान युद्ध की नींव रखी।
    ईमानदारी की बात यह है कि मैं कभी भी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं मगर मैं साहित्य में समाहित इस जबरदस्त ताकत का हमेशा कायल रहता हूं। यह अकारण नहीं कि पहली समाजवादी इन्कलाब के नेता लेनिन ने, लिओ टालस्टाय को रूसी क्रान्ति का दर्पण कहा था या उर्दू-हिन्दी साहित्य के महान हस्ताक्षर प्रेमचन्द अपनी मृत्यु के 75 साल बाद आज भी लेखकों एवं क्रान्तिकारियों द्वारा समान रूप से सम्मानित किए जाते हैं।

    जब मैं यह विवरण पढ़ता हूं और भविष्य को देखने की साहित्य की प्रचण्ड क्षमता का आकलन करने की कोशिश करता हूं तब यह उम्मीद करता हूं कि अब वक्त़ आ गया है कि इस स्याह दौर में साहित्य उस भूमिका को नए सिरे से हासिल करे।
    इसमें कोई दोराय नहीं कि यह एक स्याह दौर है, अगर आप निओन साइन्स और चमक दमक से परे देखने की या हमारे इर्दगिर्द नज़र आती आर्थिक बढ़ोत्तरी के तमाम दावों के परे देखने की कोशिश करें। जनता की बहुसंख्या का बढ़ता दरिद्रीकरण और हाशियाकरण तथा अपनी विशिष्ट पहचानों के चलते होता समुदायों का उत्पीड़न अब एक ऐसी सच्चाई है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। तरह तरह के अल्पसंख्यक – नस्लीय, एथनिक, धार्मिक आदि – को दुनिया भर में बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण एशिया के इस हिस्से में स्थितियां वाकई बेहद विपरीत दिखती हैं। बहुसंख्यकवाद का उभार हर तरफ दिखाई देता है। एक दिन भी नहीं बीतता जब हम पीडि़त समुदायों पर हो रहे हमलों के बारे में नहीं सुनते। दक्षिण एशिया के इस परिदृश्य की विडम्बना यही दिखती है कि एक स्थान का पीडि़त समुदाय दूसरे इलाके में उत्पीड़क समुदाय में रूपान्तरित होता दिखता है।
    कुछ समय पहले इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि महात्मा बुद्ध के सिद्धान्त के स्वयंभू रक्षक बर्मा के बिन लादेन में रूपान्तरित होते दिखेंगे। मुमकिन है कि आप सभी ने गार्डियन में प्रकाशित या टाईम में प्रकाशित उस स्टोरी को पढ़ा हो जिसका फोकस विराथू नामक बौद्धभिक्षु पर था, जो 2,500 बौद्ध भिक्खुओं के एक मठ का मुखिया है और जिसके प्रवचनों ने अतिवादी बौद्धों को मुस्लिम इलाकों पर हमले करने के लिए उकसाया है। बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा जिन पर बहुसंख्यकवादी बौद्धों द्वारा जबरदस्त जुल्म ढाये जा रहे हैं सभी के सामने है।
    बर्मा की सीमा को लांघिये, बांगलादेश पहुंचिये और आप बिल्कुल अलग नज़ारे से रूबरू होते हैं। यहां चकमा समुदाय – जो बौद्ध हैं, हिन्दू और अहमदिया – जो मुसलमानों का ही एक सम्प्रदाय है – वे सभी इस्लामिक अतिवादियों के निशाने पर दिखते हैं। कुछ समय पहले हयूमन राइटस वाच ने हिन्दुओं के खिलाफ वहां जारी हिंसा के बारे में रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें उनके मकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों या मन्दिरों को जलाने का जिक्र था। यह उसी वक्त की बात है जब बांगलादेश जमाते इस्लामी के वरिष्ठ नेताओ के  खिलाफ 1971 में किए गए युद्ध अपराधों को लेकर मुकदमे चले थे और कइयों को सज़ा सुनायी गयी थी। हालांकि वहां सत्ता में बैठे समूहों या अवाम के अच्छे खासे हिस्से ने ऐसे हमलों की लगातार मुखालिफत की है, मगर स्थितियां कब गम्भीर हो जाए इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
    पड़ोसी पाकिस्तान में इस्लामीकरण की तेज होती प्रक्रिया के अन्तर्गत न केवल हिन्दुओं, अहमदियाओं और ईसाइयों पर बल्कि शिया मुसलमानों पर भी हमले होते दिखते हैं। एक वक्त़ था जब पाकिस्तान में प्रचलित इस्लाम अपनी सूफी विरासत का सम्मान करता था, मगर स्थितियां इस मुका़म तक पहुंची है कि ऐसी सभी सूफी परम्पराएं अब निरन्तर हमले का शिकार हो रही हैं। जाने माने पाकिस्तानी विद्धान एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज हूदभोय  इसे पाकिस्तान का सऊदीकरण या वहाबीकरण कहते हैं। सूफी मज़ारों पर आत्मघाती हमले और बसों को रोक कर हजारों मुसलमानों का कतलेआम या लड़कियों को शिक्षा देने वाले स्कूलों पर बमबारी जैसी घटनाएं अब अपवाद नहीं रह गयी हैं। ईशनिन्दा के कानून के अन्तर्गत वहां किस तरह गैरमुस्लिम को निशाने पर लिया जा रहा है और किस तरह पंजाब (पाकिस्तान) के गवर्नर सलमान तासीर को इस मानवद्रोही कानून को वापस लेने की मांग करने के लिए शहादत कूबूल करनी पड़ी, इन सभी घटनाओं के हम सभी प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं।
    सार्कप्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा मालदीव भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ता दिखता है। श्रीलंका जो तमिल विद्रोहियों की सरगर्मियों के चलते दशकों तक सूर्खियों में रहा, वह इन दिनों सिंहल बौद्ध अतिवादियों की गतिविधियों के चलते इन दिनों चर्चा में रहता है, जो वहां की सत्ताधारी तबकों के सहयोग से सक्रिय दिखते हैं। कुख्यात बोडू बाला सेना के बारे में समाचार मिलते हैं कि किस तरह वह मुस्लिम प्रतिष्ठानों पर हमले करती है, ‘पवित्रा इलाकोंसे मस्जिदों तथा अन्य धर्मों के प्रार्थनास्थलों को विस्थापित करने का निर्देश देती है, यहां तक कि उसने मुसलमानों के लिए धार्मिक कारणों से प्रिय हलाल मीट को बेचने पर भी कई स्थानों पर रोक लगायी है। बर्मा की तरह यहां पर भी मुस्लिम विरोधी खूनी मुहिम की अगुआई बौद्ध भिक्षुकरते दिखते हैं।अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्रा कहलानेवाला भारत भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है।
    जहां तक अल्पसंख्यक अधिकारों का सवाल है तो यहां की परिस्थितियां भी अपने पड़ोसी मुल्कों से गुणात्मक तौर पर भिन्न नहीं हैं। संविधान को लागू करने के वक्त़ डा अम्बेडकर ने साठ साल पहले दी चेतावनी आज भी मौजूं जान पड़ती है कि एक व्यक्ति एक वोट से राजनीतिक जनतंत्र में प्रवेश करते इस मुल्क में एक व्यक्ति एक मूल्य कायम करना अर्थात सामाजिक जनतंत्रा कायम करना जबरदस्त चुनौती वाला काम बना रहेगा।

    कई अध्ययनों और सामाजिक परिघटनाओं के अवलोकन के माध्यम से अल्पसंख्यक अधिकारों की वास्तविक स्थिति को जांचा जा सकता है। इनमें सबसे अहम है साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना। इसकी विकरालता को समझने के लिए हम साम्प्रदायिक विवाद को लेकर चन्द आंकड़ों पर निगाह डाल सकते हैं।
    केन्द्रीय गृहमंत्रालय से सम्बद्ध महकमा ब्युरो आफ पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेण्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक 1954 से 1996 के बीच हुए दंगों की 21,000 से अधिक घटनाओं में लगभग 16,000 लोग मारे गए, जबकि एक लाख से अधिक जख्मीहुए। इनमें से महज मुट्ठीभर लोगों को ही दंगों में किए गए अपराध के लिए दंडित किया गया। और हम यह नहीं भूल सकते कि यह सभी आधिकारिकआंकड़े हैं, वास्तविक संख्या निश्चित ही काफी अधिक होगी।
    प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आयोजित सिख विरोधी जनसंहार को हम याद कर सकते हैं जब राष्ट्रीय स्तर पर सिख हमले का शिकार हुए और आधिकारिक तौर पर दिल्ली की सड़कों पर एक हजार से अधिक निरपराध – अधिकतर सिख – गले में जलते टायर डाल कर या ऐसे ही अन्य पाशवी तरीकों से मार दिए गए। हर कोई जानता है कि यह कोई स्वतःस्फूर्त हिंसा नहीं थी, वह बेहद संगठित, सुनियोजित हिंसा थी जिसमें तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के नेता शामिल थे। इसकी जांच के लिए कई आयोग बने, जिनमें सबसे पहले आयी थी सिटिजन्स फार डेमोक्रेसीद्वारा तैयार की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट ने स्पष्टता के साथ कांग्रेस के नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था।
    क्या आज कोई यकीन कर सकता है कि दिल्ली, जो भारत जैसे सबसे बड़े जनतंत्र की राजधानी है, वह महज तीस साल पहले आधिकारिक तौर पर एक हजार से अधिक निरपराधों के – जिनका बहुलांश सिखों का था – सरेआम हत्या का गवाह बनी और आज दस जांच आयोगों और तीन विशेष अदालतों के बाद, सिर्फ तीन लोग दंडित किए जा चुके हैं और बाकी मुकदमे अभी उसी धीमी रफ्तार से चल रहे हैं, जबकि इस सामूहिक संहार के असली कर्ताधर्ता एवं मास्टरमाइंड अभी भी बेदाग घूम रहे हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम सिखों के खिलाफ हुई इस हिंसा के असली कर्णधारों को दंडित नहीं करते, वह हमारे वक्त़ के हिन्दू हृदय सम्राटोंको वैधता प्रदान करता रहेगा जिन्होंने 2002 में गुजरात की अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा को क्रिया-प्रतिक्रियाके पैकेज में प्रस्तुत किया है।
    जैसे कि एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा है गुजरात 2002 की इस संगठित हिंसा के तीन विचलित करनेवाले पहलुओंको लेकर सभी की सहमति होगी। ‘‘एक यही कि यह जनसंहार शहरी भारत की हृदयस्थली में मीडिया की प्रत्यक्ष मौजूदगी में हुआ’, ‘दूसरेजिन्होंने इस जनसंहार को अंजाम दिया वह इसके तत्काल बाद इन अपराधों के चलते सत्ता में लौट सकेऔर तीसरे, इतने सालों के बाद भी कहीं से भी पश्चाताप की कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती है।
    यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हर सम्वेदनशील, मानवीय, न्यायप्रिय व्यक्ति तथा संगठन इस समूची परिस्थिति को लेकर आंखें मूंद कर रह सकता है या चुप्पी के इस षडयंत्र को तोड़ने के लिए तैयार है। क्या हमारे स्तर पर यह मानना उचित होगा कि हम उस जनसंहार को चन्द बीमार हत्यारों’, ‘कुछ धूर्त मस्तिष्कों की हरकतोंतक सीमित रखें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों – जिन्होंने इसकी योजना बनायी और उस पर अमल किया – को बेदाग छोडें ?
    इस हक़ीकत को देखते हुए कि आज की तारीख में दंगा कराने का काम बकौल पाल आर ब्रास संस्थागत दंगा प्रणालियों की अवस्था तक पहुंचा है, यह मुनासिब नहीं होगा कि हम किसी भी दंगे में स्वतःस्फूर्तता के तत्व तक अपने आप को सीमित रखें। हमें इस बात पर बार बार जोर देना पड़ेगा क्योंकि आज दंगा पीडि़तों से न्याय से बार बार इन्कार को लेकर स्वतःस्फूर्तताका यही जुमला दोहराया जाता है। इस पहलू की चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश सुश्री इंदिरा जयसिंहने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था: हमारी कानूनी प्रणाली इस बुनियादी प्रश्न को सम्बोधित करने में असफल रही है: आखिर ऐसी जनहत्याओं को लेकर राज्य के मुखिया की संवैधानिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी क्या होती है और उनकी सिफारिश थी: वे सभी जिन्होंने ऐसी हत्याओं को अंजाम दिया हो उन्हें जिम्मेदार ठहराने के अलावा, हमें उन लोगों को भी जिम्मेदार मानना होगा जिनके हाथों में सत्ता के सूत्र रहे हैं, जो न केवल हत्याओं को रोकने में असफल रहे, बल्कि घृणा आधारित वक्तव्यों से ऐसी हत्याओं की जमींन तैयार करते हुए उन्होंने उसे समझ में आने लायक प्रतिक्रिया घोषित किया।’’

    इस समूची बहस की याद नए सिरेसे ताज़ा हो जाती है जब हम देखते हैं कि यह नेल्ली कतलेआम का इकतीसवां साल है और इस जघन्य हत्याकाण्ड के कर्ताधर्ता आज भी खुलेआम घुम रहे हैं। वह फरवरी 18, 1983 का दिन था जब हथियारबन्द समूहों ने असम के जिला नागौन में 14 गांवों में छह घण्टे के अन्दर 1,800 मुसलमानों को (गैरसरकारी आंकड़ा: 3,300) मार डाला। आज़ाद हिन्दोस्तां के धार्मिक-नस्लीय जनसंहार के इस सबसे बर्बर मामले में हमलावरों ने यह कह कर अपने हत्याकाण्ड को जायज ठहराया कि मरनेवाले सभी बांगलादेश के अवैध आप्रवासी थे। इस मामले की जांच के लिए बने आयोग – तिवारी कमीशन – की रिपोर्ट, जो ढाई दशक पहले सरकार को सौंपी गयी, आज भी वैसी ही पड़ी हुई है। उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई होना दूर रहा। और सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच वहां एक अलिखित सहमति बनी है कि इस मामले को अब खोला न जाए।
    कई तरीके हो सकते हैं जिसके माध्यम से बाहरी दुनिया के सामने भारत को प्रस्तुत किया जाता है, प्रोजेक्ट किया जाता है। कुछ लोगों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र है, जबकि बाकियों के लिए वह दुनिया की तेज गति से चल रही अर्थव्यवस्था है जिसका अब विश्व मंच पर आगमनहो चुका है। लेकिन शायद ही कोई हो यह कहता है कि वह जनअपराधों की भूमिहै जहां ऐसे अपराधों के अंजामकर्ताओं को शायद ही सज़ा मिलती हो। जनमत को प्रभावित करनेवाले लोग कहीं भी उस अपवित्र गठबन्धन की चर्चा नहीं करते हैं जो सियासतदानों, माफियागिरोहों और कानून एवं व्यवस्था के रखवालों के बीच उभरा है जहां जनअपराधों को अदृश्य करने की कला में महारत हासिल की गयी है। और ऐसे जनअपराधों के निशाने पर – धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोग, सामाजिक श्रेणियों में सबसे नीचली कतार में बैठे लोग या देश के मेहनतकश – दिखते हैं।
    क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि 42 दलितों – जिनमें मुख्यतः महिलाएं और बच्चे शामिल थे – का आज़ाद हिन्दोस्तां का पहलाकतलेआम तमिलनाडु के तंजावुर जिले के किझेवनमन्नी में (1969) में सामने आया था जहां तथाकथित उंची जाति के भूस्वामियों ने इसे अंजाम दिया था, मगर सभी इस मामले में बेदाग बरी हुए क्योंकि अदालती फैसले में यह कहा गया कि इस बात से आसानी से यकीन नहीं किया जा सकता कि उंची जाति के यह लोग पैदल उस दलित बस्ती तक पहुंचे होंगे।गौरतलब है कि कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में मजदूरों ने वहां हड़ताल की थी और अदालत में भले ही उन शोषितों को न्याय नहीं मिला होगा मगर वहां के संघर्षरत साथियों ने भूस्वामियों के हाथों मारे गए इन शहीदों की स्मृतियों को आज भी संजो कर रखा है, हर साल वहां 25 दिसम्बर को – जब यह घटना हुई थी – हजारों की तादाद में लोग जुटते हैं और चन्द रोज पहले यहां उनकी याद में एक स्मारक का भी निर्माण किया गया।
    अगर हम स्वतंत्रा भारत के 60 साला इतिहास पर सरसरी निगाह डालें तो यह बात साफ होती है कि चाहे किझेवनमन्नी, यहा हाशिमपुरा (जब यू पी के मेरठ में दंगे के वातावरण में वहां के 42 मुसलमानों को प्रांतीय पुलिस ने सरेआम घर से निकाल कर भून दिया था 1986), ना बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बम्बई में शिवसेना जैसे संगठनों द्वारा प्रायोजित दंगों में मारे गए 1,800 लोग (जिनका बहुलांश अल्पसंख्यकों का था, 1992 और जिसको लेकर श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी है), ना ही राजस्थान के कुम्हेर में हुए दलितों के कतलेआम (1993) और न ही अतिवादी तत्वों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों के संहार (1990) जैसे तमाम मामलों में किसी को दंडित किया जा सका है।  देश के विभिन्न हिस्सों में हुए ऐसे ही संहारों को लेकर ढेर सारे आंकड़े पेश किए जा सकते हैं।
    और हम यह भी देखते हैं कि उत्तर पूर्व और कश्मीर जैसे इलाकों में, दशकों से कायम सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसे दमनकारी कानूनों ने सुरक्षा बलों को एक ऐसा कवच प्रदान किया है कि मनगढंत वजहों से उनके द्वारा की जानेवाली मासूमों की हत्या अब आम बात हो गयी है। हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मणिुपर की फर्जी मुठभेड़ों को लेकर बनाए गए सन्तोष हेगडे कमीशन की हालिया रिपोर्ट पढ़ सकते हैं और जिन चुनिन्दा घटनाओं की जांच के लिए उन्हें कहा गया था उसका विवरण देख सकते हैं। बहुत कम लोग इस तथ्य को स्वीकारना चाहेंगे कि कश्मीर आज दुनिया का सबसे सैन्यीकृत इलाका है और विगत दो दशकों के दौरान वहां हजारों निरपराध मार दिए गए हैं।
    आप यह जानकर भी विस्मित होंगे कि किस तरह ऐस जनअपराधों को या मानवता के खिलाफ अपराधों को सत्ताधारी तबकों द्वारा औचित्य प्रदान किया जाता है या वैधता दी जाती है, जहां मुल्क का प्रधानमंत्री राजधानी में सिखों के कतलेआम के बाद – जिसे उसकी पार्टी के सदस्यों ने ही अंजाम दिया – यह कहता मिले कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन हिलती ही है। या किसी राज्य का मुख्यमंत्री उसके अपने राज्य में मासूमों के कतलेआम को न्यूटन के क्रिया प्रतिक्रियाके सिद्धान्त से औचित्य प्रदान करे।
    ऐसे तमाम बुद्धिजीवी जो हमारी महान संस्कृति में निहित सहिष्णुता से सम्मोहित रहते हैं और उसकी समावेशिता का गुणगान करते रहते हैं, वह यह जान कर आश्चर्यचकित होंगे कि किस तरह आम जन, अमनपसन्द कहलानेवाले साधारण लोग रातों रात अपने ही पड़ोसियों के हत्यारों या बलात्कारियों में रूपान्तरित होने केा तैयार रहते है और किस तरह इस समूचे हिंसाचार और उसकी उत्सवी सहभागिता के बाद वही लोग चुप्पी का षडयंत्र कायम कर लेते हैं। बिहार का भागलपुर इसकी एक मिसाल है – जहां 1989 के दंगों में आधिकारिक तौर पर एक हजार लोग मारे गए थे, जिनका बहुलांश मुसलमानों का था – जहां लोगाईं नामक गांव की घटना आज भी सिहरन पैदा करती है। दंगे में गांव के 116 मुसलमानों को मार दिया गया था और एक खेत में गाड़ दिया गया था और उस पर गोभी उगा दिया गया था।
    निस्सन्देह अल्पसंख्यक अधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता के तौर पर हम राज्य और दक्षिणपंथी बहुसंख्यकवादी संगठनों को देख सकते हैं मगर क्या उसे सामाजिक वैधता नहीं होती। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि एक ऐसे मुल्क में जहां अहिंसा के पुजारी की महानता का बखानकरता रहता है, एक किस्म की हिंसा को न केवल वैध समझा जाता है बल्कि उसे पवित्राताका दर्जा भी हासिल है। दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य उत्पीडि़त तबकों के खिलाफ हिंसा को प्राचीन काल से धार्मिक वैधता हासिल होती रही है और आधुनिकता के आगमन नेइस व्यापक परिदृश्य को नहीं बदला है। भारत एकमात्रा ऐसा मुल्क कहलाता है जहां एक विधवा को अपने मृत- पति की चिता पर जला दिया जाता रहाहै। अगर पहले कोई नवजात बच्ची को बर्बर ढंग से खत्म किया जाता था आज टेक्नोलोजी के विकास के साथ इसमें परिवर्तन आया है और लोग यौनकेन्द्रित गर्भपात करवाते हैं। यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि आखिर क्यों भारत दुनिया का एकमात्रा मुल्क है जहां 3 करोड 30 लाख महिलाएं गायबहैं। रेखांकित करनेवाली बात यह है कि ऐसी तमाम प्रथाओं एवं सोपानक्रमों की छापजिनका उदगम हिन्दू धर्म में दिखता है – अन्य धर्मों पर भी नज़र आती है। इस्लाम, ईसाइयत या बौद्ध धर्म में जातिभेद की परिघटना – जिसकी बाहर कल्पना नहीं की जा सकती – वह यहां  मौजूद दिखती है।
    इस परिदृश्य को बदलना होगा अगर भारत एक मानवीय समाज के तौर पर उभरना चाहता है। यह चुनौती हम सभी के सामने है। अगर इस उपमहाद्वीप के रहनेवाले लोग यह संकल्प लें कि दुनिया का यह सबसे बड़ा जनतंत्राभविष्य में जन अपराधों की भूमिके तौर पर न जाना जाए तो यह काम जल्दी भी हो सकता है। इसे अंजाम देना हो तो सभी न्यायप्रिय एवं अमनपसन्द लोगों एवं संगठनों को भारत सरकार को इस बात के लिए मजबूर करना होगा कि वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के जनसंहार के लिए बने कन्वेन्शन के अनुरूप अपने यहां कानून बनाए। गौरतलब है कि भारत ने इस कन्वेन्शन पर 1959 में दस्तख़त किए थे मगर उसके अनुरूप अपने यहां कानूनों का निर्माण नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जनअपराधों को लेकर न्याय करने की भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली की क्षमता हमेशा ही सन्देह के घेरे में रही है। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि उपरोक्त कन्वेन्शन आन द प्रीवेन्शन एण्ड पनिशमेण्ट आफ द क्राइम आफ जीनोसाइड के हिसाब से जीनोसाइड अर्थात जनसंहार की परिभाषा इस प्रकार है:

    ऐसी कोई भी कार्रवाई जिसका मकसद किसी राष्ट्रीय, नस्लीय, नृजातीय या धार्मिक समूह को नष्ट करने के इरादे से अंजाम दी गयी निम्नलिखित गतिविधियां

    क) समूह के सदस्यों की हत्या ;
    ख) समूह के सदस्यों को शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना ;
    ग) किसी समूह पर जिन्दगी की ऐसी परिस्थितियां लादना ताकि उसका भौतिक या शारीरिक विनाश हो
    घ) ऐसे कदम उठाना ताकि समूह के अन्दर नयी पैदाइशों को रोका जा सके
    च) समूह के बच्चों को जबरन किसी दूसरे समूह को हस्तांतरित करना 
    हम आसानी से अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि अगर असली जनतंत्र पसन्द लोग सत्ताधारी तबकों पर हावी हो सकें तो हम जनअपराधों पर परदा डाले रखने या दंगाइयों या हत्यारों के सम्मानित राजनेताओं में रूपान्तरण को रोक सकते हैं और जनअपराधों पर परदा डालने के दोषारोपण से मुक्त हो सकते हैं।
    हमें यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए कि साम्प्रदायिक हिंसा भले ही अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमले की सबसे क्रूर अभिव्यक्ति हो, मगर भेदभाव के बहुविध स्तर अस्तित्व में रहते हैं।मुस्लिम समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति को जानने पर केन्द्रित रही सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर सरसरी निगाह डालें – जिसे संसद के सामने नवम्बर 2006 में प्रस्तुत किया गया था – तो विचलित करनेवाली स्थिति दिखती है। शिक्षा और सरकारी रोजगार तथा विभिन्न स्तरों पर वंचना की उनकी स्थिति को रेखांकित करने के अलावा उसने दो महत्वपूर्ण तथ्यों की तरफ इशारा किया था। भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति और जनजाति की स्थिति से भी नीचे है और भले ही भारत की आबादी में मुसलमानों की तादाद 14 फीसदी हो, मगर नौकरशाही में उनका अनुपात 2.5 फीसदी ही है। उसने आवास, काम और शैक्षिक क्षेत्र में समानता विकसित करने के लिए बहुविध सुझाव भी पेश किए थे।

    यह बात अधिक विचलित करनेवाली है कि वास्तविक व्यवहार में कुछ नहीं किया जा रहा है। नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्युरोकी हालिया रिपोर्ट इस पर रौशनी डालती है, जो बताती है कि आज भले ही भारत में पुलिस की संख्या बढ़ा रहे हैं मगर जहां तक अल्पसंख्यक समुदाय के हिस्से की बात है, तो वह प्रतिशत कम हुआ है।
    कुछ समय पहले आप सभी ने डब्लू डब्लू डब्लू गुलैल डाट काॅम पर प्रख्यात खोजी पत्राकार आशीष खेतानद्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को देखा होगा जिसमें  इस बात का दस्तावेजीकरण किया गया था कि गोपनीय फाइलें इस तथ्य को उजागर करती हैं जिसका मुसलमानों को पहले से सन्देह रहा है: यही कि राज्य जानबूझ कर निरपराधों को आतंकवाद के आरोपों में फंसा रहा है। जबकि इलाकाई मीडिया में या उर्दू मीडिया में इस रिपोर्ट को काफी अहमियत मिली मगर राष्ट्रीय मीडिया ने एक तरह से खेतान के इस खुलासे को नज़रअन्दाज़ किया कि किस तरह आधे दर्जन के करीब आतंकवाद विरोधी एंजेन्सियों के आन्तरिक दस्तावेज इस बात को उजागर करते हैं कि राज्य जानबूझ कर मुसलमानों को आतंकी मामलों में फंसा रहा है और उनकी मासूमियत को परदा डाले रख रहा है।
    पत्रकार ने आतंकवाद केन्द्रित तीन मामलों की- 7/11 ट्रेन बम धमाके, पुणे ; पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट ; मालेगांव धमाके 2006 जांच की है और पाया है कि इसके अन्तर्गत 21 मुसलमानों को यातनाएं दी गयीं, अपमानित किया गया और बोगस सबूतों के आधार पर उन पर मुकदमे कायम किए गए। और जब उनकी मासूमियत को लेकर ठोस सबूत पुलिस को मिले तबभी अदालत को गुमराह किया जाता रहा।’’
    हम अपने हालिया इतिहास के तमाम उदाहरणों को उदधृत कर सकते हैं जहां ऐसी आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के लिए – जिनको हिन्दुत्व आतंकियों ने अंजाम दिया था – अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को जेल में ठूंसा जाता रहा है। फिर चाहे मालेगांव 2006 के बम धमाके का मामला हो या मक्का मस्जिद धमाके की घटना हो या समझौता एक्स्प्रेस बम विस्फोट की घटना हो – हम यही देखते हैं कि इन्हें संघ के कार्यकर्ता अंजाम देते रहे – मगर दोषारोपण मुसलमानों पर होता रहा। यह भी सही है कि राज्य मशीनरी के एक हिस्से की ऐसे मामलों में संलिप्तता के बिना ऐसा सम्भव नहीं था।
    जांच एजेंसियां अब तक देश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय हिन्दुत्ववादी संगठनों को देश के अलग अलग हिस्सों में हुई बम विस्फोट की सोलह (मुख्य) घटनाओं के लिए जिम्मेदार मानती हैं। आम लोगों को लग सकता है कि ऐसे सभी बम विस्फोट राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के असन्तुष्ट तत्वों द्वारा किए गए हैं, इससे बड़ा झूठ दूसरा हो नहीं सकता।
    अगर हम विकसित होते गतिविज्ञान पर गौर करें तो पाएंगे कि यह आतंकी मोड़ एक तरह से हिन्दुत्व संगठनों द्वारा तैयार की गयी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है जब उन्होंने तय किया कि वह दंगे के आतंकसे वह अब बम के आतंककी तरफ मुडेंगे। उन्होंने पाया कि अब पुरानी रणनीति अधिक लाभदायकसाबित नहीं हो रही हैं और नयी रणनीति अधिक उचित हैं और मुल्क में फासीवाद के निर्माण के लिए लाभदायक है।
    हम देख सकते हैं कि वह दो प्रक्रियाओंएक राष्ट्रीय और दूसरी अन्तरराष्ट्रीय – का परिणाम है। गुजरात 2002 के जनसंहार में हिन्दुत्व ब्रिगेड की संलिप्तता की वैश्विक स्तर पर जितनी भत्र्सना हुई कि उसे दंगे की राजनीति की तरफ नये सिरेसे देखने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस बात का एहसास गहराया कि साम्प्रदायिक दंगों को अंजाम देने का वांछित राजनीतिक लाभ नहीं मिलता बल्कि साम्प्रदायिक राजनीति के माध्यम से निकले राजनीतिक लाभ अन्य कारणों से निष्प्रभावी हो जाते हैं। एक दूसरा कारक जो हिन्दुत्व ब्रिगेड की इस नयी कार्यप्रणाली के लिए अनुकूल  था वह यह सहजबोध जिसका निर्माण 9/11 के बहाने अमेरिका ने किया था। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर अमेरिका ने जो मुहिम शुरू की थी उसमें एक विशिष्ट समुदाय और उसके धर्म – इस्लाम – को निशाना बनाया गया था।
    ऐसे अवसर आते हैं जब आप अपने आप को बहुत निराशा की स्थिति में पाते हैं – ऐसी स्थिति जब धरती के इस हिस्से में रहनेवाले हर शान्तिकर्मी एवं न्यायप्रिय व्यक्ति के सामने आयी वर्ष 2002में उपस्थित हुई थी जब हम सूबा गुजरात में सरकार की शह या अकर्मण्यता से सामने आ रहे जनसंहार से रूबरू थे। आज़ाद हिन्दोस्तां के इतिहास का वह सबसे पहला टेलीवाइज्ड दंगा अर्थात टीवी के माध्यम से आप के मकानों तक चैबीसों घण्टे सजीवपहुंचनेवाला दंगा था।
    अगर भारत सरकार ने जीनोसाइड कन्वेन्शन अर्थात जनसंहार कन्वेन्शन पर दस्तखत किए होते तो हिंसा के अंजामकर्ता या जिनकी संलिप्तता के चलते दंगे हो सके उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के लिए सलाखों के पीछे डाला जाता। समय का बीतना और शान्ति का कायम हो जाना इस सच्चाई को नकार नहीं सकता कि आज भी वहां न्याय नहीं हो सका है।
    बदले हुए हालात पर गौर करें। एक ऐसा शख्स जिसने आधुनिक नीरो की तर्ज पर इन दंगोंको होने दिया वह आज की तारीख में विकास पुरूषमें रूपान्तरित हुआ दिखता है और उसके नए पुराने मुरीद उसे ही देश के भविष्य का नियन्ता बनाने के लिए आमादा हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इस मुल्क का चुनावी गतिविज्ञान इस तरह आगे बढ़े कि यह शख्स भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे। मुमकिन है कि एक अधिक समावेशी, अधिक सहिष्णु, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक शान्तिप्रिय मुल्क बनाने की हमारी ख्वाहिशें, हमारी आकांक्षाएं और हमारी कोशिशें फौरी तौर पर असफल हों।
    क्या हमें इस परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिए और अपनी नियतिके प्रति समर्पण करना चाहिए। निश्चित ही नहीं।

    इसका अर्थ होगा जनतंत्र के बुनियादी सिद्धान्तों को बहुसंख्यकवाद के दहलीज पर समर्पित करना। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत के शासन के अलावा जनतंत्र का मतलब होता है, अल्पमत के जीवन के अधिकारों एवं मतों की सुरक्षा और अधिक महत्वपूर्ण, यह कानूनी सम्भावना कि आज का राजनीतिक अल्पमत भविष्य में चुनावी बहुमत हासिल करेगा और इस तरह शान्तिपूर्ण तरीके से व्यवस्था को बदल देगा।
    यह वर्ष 2001 का था जब नार्वे में अफ्रीकी नार्वेजियन किशोर बेंजामिन हरमानसेन की नवनात्सी गिरोह ने हत्या की, जो उस मुल्क के इतिहास की पहली ऐसी हत्या थी। आगे जो कुछ हुआ उसकी यहां कल्पना करना भी सम्भव नहीं होगा। अगले ही दिन दसियों हजार नार्वे के निवासी राजधानी ओस्लो की सड़कों पर उतरे और उन्होंने किशोर को न्याय दिलाने की मांग की और इस विशाल प्रदर्शन की अगुआई नार्वे के प्रधानमंत्री  जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने की जिन्होंने यही कहा: यह हमारा तरीका नहीं है ; अपने समाज में नस्लीय अपराधों के लिए कोई स्थान नहीं है।’’ एक साल के अन्दर पांच सदस्यीय पीठ ने दो हमलावरों को दोषी ठहराया और उन्हें 15 साल की सज़ा सुनायी।

    ‘‘यह हमारा तरीका नहीं है…।’’

    मुझे यह किस्सा तब याद आया जब नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डा. अमर्त्य  सेन भारत की सरजमीं पर यहां के नवनात्सी समूहों के निशाने पर आए जब उन्होंने कहा कि वह मोदी के  देश के  प्रधानमंत्री बनने के हक में नहीं हैं क्यूंकि उनके शासन में धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं होंगे। अधिकतर लोगों ने डा. सेन के वक्तव्य को गौर से नहीं पढ़ा होगा: ‘‘मुझे लगा कि बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है, न केवल मेरा अधिकार, कि मैं अल्पसंख्यकों के सरोकारों पर बात करूं। अक्सर बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा होने के नाते हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं।’’
    हमारी अपनी आंखों के सामने जनतंत्र को खोखला करने की इन तमाम कोशिशों पर हमें गौर करना ही होगा।

    अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षित करने में अहमियत इस बात की होगी कि हम जनतंत्र के बुनियादी मूल्य को अपनाएं और तहेदिल से उस पर अमल करे ताकि हम ऐसे शासन का निर्माण कर सकें जहां धर्म और राजनीति में स्पष्ट फर्क हो राज्य की धर्मनिरपेक्षता और नागरिक समाज का धर्मनिरपेक्षताकरण हमारा सरोकार बनना चाहिए।
    दोस्त अक्सर मुझे पूछते हैं कि आप क्यों जनतंत्र को गहरा करने और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने पर जोर देते हो। इसका एकमात्र कारण यही है कि जिस दिन हम अपने इस ध्रुवतारेको भूल जाएंगे, फिर वह दिन दूर नहीं होगा जब हम भी अपने पड़ोसी मुल्क के नक्शेकदम पर चलेंगे जिसने राष्ट्र के आधार के तौर पर धर्म को चुना और जो आज विभिन्न आंतरिक कारणों से अन्तःस्फोट का शिकार होता दिख रहा है।
    जब हमारे इर्दगिर्द ऐसे हालात हों और आप के इर्दगिर्द खड़ी उन्मादी भीड़ किसी नीरो को अपना नेता मानने के लिए आमादा हो तब उम्मीद के सोतों के लिए कहां देखा जा सकता है ?
    साहित्य ही ऐसा स्त्रोत हो सकता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि उसी ने लोगों को शीतनिद्रा से जगाने का काम किया है और उनमें बड़े बड़े दुश्मनों को ललकारने की हिम्मत पैदा की है।
    मैं अपनी प्रस्तुति को फ्रांसिसी इतिहास के एक प्रसंग से समाप्त करना चाहूंगा जिसे द्रेफ्यू काण्डकहा जाता है। वह 1890 का दौर था जब फ्रांस में एक यहुदी सैन्य अधिकारी द्रेफ्यू को देशद्रोहके आरोप में गिरफ्तार कर सेण्ट हेलेना द्वीप भेज दिया गया था। उसे तब गिरफ्तार किया गया था जब वह अपने बच्चे के साथ खेल रहा था। पुलिस ने उसके खिलाफ इतना मजबूत मामला बनाया था कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इससे उसे जिन्दगी भर जेल में ही रहना पड़ेगा।

    संयोग की बात कही जा सकती है कि महान फ्रांसिसी लेखक एमिल जोला ने इस काण्ड के बारे में जाना और इस घटना को लेकर अख़बारों में लेखमाला लिखी जिसका शीर्षक था आई एक्यूजअर्थात मेरा आरोप हैजिसमें यहुदी सैन्य अधिकारी की मासूमियत को रेखांकित किया गया था और यहभी बताया गया था कि किस तरह वह एक साजिश का शिकार हुए। उपरोक्त लेख में जोला ने यह भी बताया कि द्रेफ्यू के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करनेवाले सभी लोग किस तरह यहुदियों से घृणा करते थे। लेखों की इस श्रृंखला का असर यह हुआ कि द्रेफ्यू को रिहा करने की मुहिम अधिक तेज हुई और सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा।

    क्या अब वक्त़ नहीं आया है कि आतंकवाद के फर्जी आरोपों को लेकर आज जो तमाम द्रेफ्यू  जेल में हैं या अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले तेज हो रहे हैं, उस परिस्थिति में साहित्य के रचयिता और विद्यार्थी एक सुर में अपनी आवाज़ बुलन्द करें और कहें आई एक्यूज

    (साहित्य और मानवाधिकारशीर्षक पर इंग्लिश विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत व्याख्यान, अगस्त 2013)



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