बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद कुछ लोगों ने ऐसे विचार प्रकट किये कि शायद अब भारत में फ़ासीवाद की राजनीति कमज़ोर पड़ेगी। परन्तु सच्चाई यह है कि फ़ासीवाद किसी एक व्यक्ति की सोच से नहीं पैदा होता है बल्कि यह संकटग्रस्त पूँजीवादी व्यवस्था का ही एक उत्पाद है और जब तक इस व्यवस्था का कोई क्रान्तिकारी विकल्प सामने नहीं आयेगा तब तक फ़ासीवाद अपने तमाम रूपों में अस्तित्वमान रहेगा। बाल ठाकरे जैसे व्यक्तित्व फ़ासीवाद के वाहक मात्र होते हैं और उनके जाने के बाद भी पूँजीवाद अपनी स्वाभाविक गति से नये फ़ासीवादी व्यक्तित्वों का निर्माण करता रहेगा, यदि क्रान्तिकारी ताकतें अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में क़ामयाब नहीं होती हैं। यही नहीं कुंठा का शिकार जनता का एक हिस्सा भी ऐसे फ़ासिस्टों में नायकों की तलाश करता रहेगा। इसलिए ऐसे दानवों को फ़लने फ़ूलने से रोकने का बस एक तरीका है और वह है मेहनतकशों को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रों की सीमाओं को तोड़़कर वर्गीय आधार पर एकजुट, लामबंद और संगठित करना।
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