मैंने पेशेवेर लोगों और कलाकारों को कृषिदास कहा। और क्या हैं वे? प्रोफेसर, पादरी, संपादक धनिकतंत्र के ही मुलाजिम हैं, उनका काम है वैसे ही विचारों का प्रचार जो धनिकतंत्र के विरूद्ध न हों और धनिकतंत्र की प्रशंसा में हों। जब भी वे धनिकतंत्र के विरोधी विचारों का प्रचार करते हैं उन्हें सेवामुक्त कर दिया जाता है और अगर उन्होंने संकट के दिनों के लिए कुछ बचाकर नहीं रखा है तो उनका सर्वहाराकरण हो जाता है। वे या तो नष्ट हो जाते हैं या मजदूरों के बीच आन्दोलनकर्ता की तरह काम करने लगते हैं। यह न भूलें कि प्रेस, चर्च और विश्वविद्यालय ही जनमत को गढ़ते हैं, देश की प्रक्रिया को दिशा देते हैं। जहां तक कलाकारों का सवाल है वे धनतंत्र की रुचियों की तुष्टि में खपते हैं।
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