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  • पूँजीवादी पाशविकता की बलि चढ़ते मासूम बच्चे

    इसमें कोई दो राय नहीं कि बच्चों के खिलाफ़ होने वाले अपराधों का शिकार आमतौर से गरीब परिवारों और निम्न मध्‍यम वर्गीय परिवारों से आने वाले बच्चे होते हैं। अक्सर ही ऐसे परिवारों में गुजर बसर के लिए स्‍त्री और पुरूष दोनों को ही मेहनत मज़दूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। हालाँकि 12-14 घंटे लगातार अपना हाड़-मांस गलाने के बावजूद उन्हें इतनी कम मज़दूरी मिलती है कि बमुश्किल ही गुजारा हो पाता है। ऐसे हालात में बच्चे घरों में अकेले रह जाते हैं, वे असुरक्षित होते हैं इसलिए तमाम अपराधियों का आसानी से शिकार बनते हैं।

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  • पीड़ा के समुद्र और भ्रम के जाल में पीरागढ़ी के मज़दूर

    जूते-चप्पल की इन फैक्‍टरियों में ज्यादातर काम ठेके पर होता है। मालिक किसी भी तरह की मुसीबत से बचने के लिए और बैठे-बैठे आराम से मुनाफ़ा कमाने के लिए काम को ठेके पर दे देता है। जूते-चप्पल के काम में अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग ठेकेदार को ठेका दिया जाता है। जैसे जूते की सिलाई के लिए एक या दो ठेकेदार को दे दिया गया, जूता से तल्ला (shole) चिपकाने के लिए भी कई ठेकेदार या एक ही ठेकेदार को उसके बाद पैकिंग के लिए भी एक या दो ठेकेदार को काम दे दिया जाता है। इसके अलावा अगर जूता या चप्पल में पेंटिग का काम है तो इस काम को भी एक पेंटिग के ठेकेदार को ठेके पर दे दिया जाता है। इन ठेकेदार से मालिक एक जोड़ी चप्पल या जूता सिलाई या पैकिंग का रेट तय करता है। अधिकांश फैक्टरियों में पुरूष मज़दूर (हेल्पर) को आठ घण्टे के लिए 3800 से 4500 रूपये मिलते है, महिला मज़दूर (हेल्पर) को 3000 से 3500 रूपये मिलते है और अर्द्धकुशल मज़दूर को 5000 से 6000 रूपया प्रति माह मिलता है जो कि दिल्ली सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन का लगभग आधा है। इसके अलावा ठेकेदार जिस रेट से काम मालिक से लेता है उससे कम रेट पर अपने अर्द्धकुशल कारीगर से पीस रेट पर काम करवाता है। ठेकेदार ज्यादातर अपने गांव , क्षेत्र, धर्म के आदमी को साथ रखता है ताकि मज़दूरों को ‘अपना आदमी’ का भ्रम रहे। मज़दूर सोचता है कि ठेकेदार अपने क्षेत्र, धर्म का या रिश्तेदार है और जो मिल रहा है उसे रख लिया जाय। जबकि ठेकेदार ‘अपने’ क्षेत्र या धर्म के मज़दूर के सर पर बैठकर काम करवाता है, मज़दूरों की कम चेतना का फायदा उठता है उनसे अश्लील बातें करता है और किसी दिन कुछ खिला-पिला देता है। इन सबके बीच मज़दूर अपने हक अधिकार को भूल जाता है जिसका फायदा मालिक और ठेकेदार को ही होता है।

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  • डॉ. अमृतपाल को चिट्ठी!

    इन लेखों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मै तो ये मानता हूँ। कि हमारे जितने मज़दूर भाई हैं। उन सब के लिए ये मज़दूर बिगुल अखबार बहुत जरूरी है। मै तो अपने और दोस्तों को भी यह अखबार पढ़वाता हूँ।

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  • चुनाव नहीं ये लुटेरों के गिरोहों के बीच की जंग है

    जो चुनावी नज़ारा दिख रहा है, उसमें तमाम हो-हल्ले के बीच यह बात बिल्कुल साफ उभरकर सामने आ रही है कि किसी भी चुनावी पार्टी के पास जनता को लुभाने के लिये न तो कोई मुद्दा है और न ही कोई नारा। जु़बानी जमा खर्च और नारे के लिये भी छँटनी, तालाबन्दी, महँगाई, बेरोज़गारी कोई मुद्दा नहीं है। कांग्रेस बड़ी बेशर्मी के साथ ‘भारत निर्माण’ का राग अलापने में लगी हुई है, उसके युवराज राहुल गाँधी बार-बार ग़रीबों के सबसे बड़े पैरोकार बनने के दावे कर रहे हैं, मगर जनता इतनी नादान नहीं कि वह भूल जाये कि पिछले 10 वर्ष में उन्हीं की पार्टी की सरकार ने ग़रीबों की हड्डियाँ निचोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उधर भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी अन्धराष्ट्रवादी नारों और जुमलों के साथ देश के विकास के हवाई दावों से मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से का ध्यान खींच रहे हैं जो गुजरात में उसकी सरपरस्ती में हुए क़त्लेआम से भी आँख मूँदने को तैयार है। गुजरात के तथाकथित विकास के लिए उन्होंने मज़दूरों को दबाने-निचोड़ने और पूँजीपतियों को हर क़ीमत पर लूट की छूट देने की जो मिसाल क़ायम की है उसे देखकर कारपोरेट सेक्टर के तमाम महारथियों के वे प्रिय हो गये हैं जो आर्थिक संकट के इस माहौल में फासिस्ट घोड़े पर दाँव लगाने को तैयार बैठे हैं। वोटों की फसल काटने के लिए दंगों की आग भड़काने से लेकर हर तरह के घटिया हथकण्डे आज़माये जा रहे हैं।

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  • गुड़गाँव के “मल्टीब्राण्ड” शॉपिंग सेन्टरों की चकाचौंध में गुम होते दुकान मज़दूर

    आम तौर पर लोगों का ध्यान इन कामों में लगे मज़दूरों के काम और जिन्दगी के हालात पर नहीं जाता। वास्तव में इन मज़दूरों की स्थिति भी कम्पनियों में 12 से 16 घण्टे काम करने वाले मज़दूरों जैसी ही है। इन सभी सेण्टरों में काम करने वाले यूपी-उत्तराखण्ड-बिहार-बंगाल-उड़ीसा-राजस्थान जैसे कई राज्यों से आने वाले लाखों प्रवासी मज़दूर दो तरह की तानाशाही के बीच काम करते हैं। एक ओर काम को लेकर मैनेजर या मालिक का दबाव लगातार इनके ऊपर बना रहता है और दूसरा जिस मध्य-वर्ग की सेवा के लिये उन्हें काम पर रखा जाता है उसका अमानवीय व्यवहार भी इन्हें ही झेलना पड़ता हैं। दुकानों और रेस्तराँ में ये मज़दूर लगातार काम के दबाव में रहते हैं, लेकिन ग्राहकों के सामने बनावटी खुशी और सेवक के रूप में जाने की इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। ये मज़दूर सिर्फ शारीरिक श्रम ही नहीं बेचते बल्कि मानसिक रूप से अपने व्यक्तित्व और अपनी मानवीय अनुभूतियों को भी पूँजी की भेंट चढ़ाने को मजबूर होते हैं। “आजाद” देश के इन सभी मज़दूरों को जिन्दा रहने के लिये जरूरी है कि किसी मालिक के मुनाफे के लिये मज़दूरी करें।

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  • कुत्ते और भेड़िये, और हमारी फ़ैक्टरी के सुपरवाइज़र

    मैं इन सुपरवाइज़रों की कुत्ता-वृत्ति और भेड़िया-वृत्ति को पता नहीं
    शब्दों में बाँध भी पा रही हूँ
    कि नहीं
    इनकी भौं-भौं और इनकी गुर्र-गुर्र
    इनका विमानवीकरण
    इनके दाँतों और नाख़ूनों में लगा
    हमारी दम तोड़ती इच्छाओं और स्वाभिमान का ख़ून और ख़ाल

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  • ऑटो सेक्टर की ‘रिको फैक्ट्री’ के मज़दूर से बातचीत

    मज़दूर- आप खुशहाली की बात करते हैं। मुझे दस साल हो गये हैं, रिको कम्पनी मे काम करते हुए और अभी तक हम (कैजुअल) अस्थाई मज़दूर की हैसियत से काम कर रहे हैं। हमारी कम्पनी ने नियम बना लिया है कि किसी को (परमानेन्ट) स्थाई मज़दूर नहीं करेंगे। 2/3 से ज्यादा मज़दूर तो कैजुअल, अप्रैन्टिस, ट्रेनी, व ठेकेदार की तरफ से लगे हुए हैं। ऊपर से मालिक हर साल एक नई जगह (जैसे- सिड़कुल, धारूहेड़ा, दादरी) मे फैक्ट्री खोल लेता है। और एक जगह प्रोडक्सन (उत्पादन)कम करवाकर यह दिखाने की कोशिश करता है कि कम्पनी के पास आर्डर कम है। जिससे कि हम मज़दूर डर जाते हैं कि काम कम है तो अब छँटनी होगी और हर आदमी अपनी नौकरी बचाने के चक्कर मे ऐसा कोई काम नहीं करता कि मैनेजमेन्ट को कहने का मौका मिले। और अनिश्चित कालीन एक सरदर्द जिन्दगी मे बना रहता है कि कहीं नौकरी न चली जाये। दस हजार की तनख्वाह मे आदमी की जिन्दगी मे क्या खुशहाली होगी?

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  • ‘लव-जिहाद’ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जनसंख्या विज्ञान

    एक धार्मिक समुदाय के बीच किसी दूसरे धार्मिक समुदाय के बारे में झूठा प्रचार करना फ़ासीवादियों तथा धार्मिक-दक्षिणपंथी शक्तियों का पुराना हथकण्डा रहा है। फिर यह कैसे हो सकता था कि इस मामले में भारत के संघी-मार्का फ़ासीवादी पीछे रह जायेँ। भाजपा के 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए पीएम उमीद्वार नरेन्द्र मोदी ने 2002 के गुजरात दंगों के बाद वहाँ हुए चुनाव के दौरान कहा था – “हम (मतलब हिन्दू) दो हमारे दो, वो (मतलब मुस्लिम) पाँच उनके पचीस।” इसके बाद 2004 में विश्व हिन्दू परिष्द के अशोक सिंघल ने हिन्दुओं के आगे परिवार नियोजन छोड़ने का ढोल पीटा। अशोक सिंघल यह तुर्रा बहुत पहले से छोड़ते आ रहे हैं, और भाजपाई सरकार वाले राज्यों में तो वह सरकारी मंच से यह मसला उछालते रहते हैं। पिछले 3-4 सालों में संघियों ने अपने इसी जनसंख्या विज्ञान को फिर से दोहराना शुरू कर दिया है, लेकिन अब वे इसे नए रंग में लपेट कर लाए हैं। पहले संघी संगठन मुसलमानों द्वारा अपनी जनसंख्या बढ़ाने का हौवा ही खड़ा करते थे, अब उन्होंने ने इसमें “लव-जिहाद” का डर भी जोड़ दिया है। संघियों के अनुसार मुसलमानों ने (यहाँ संघी मुस्लिम कट्ट्टरपंथी संगठन कहना भी वाजिब नहीं मानते क्योंकि संघियों के लिए सभी मुस्लिम लोग मुस्लिम कट्ट्टरपंथी संगठनों के सदस्य हैं) हिन्दू नवयुवतियों को प्यार के जाल में फँसाकर अपनी आबादी बढ़ाने के लिए मशीनों की तरह इस्तेमाल करने के लिए “लव-जिहाद” नामक “गुप्त” संगठित अभियान छेड़ा हुआ है।

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  • पेरिस कम्यून: पहले मज़दूर राज की सचित्र कथा (बारहवीं किस्त)

    जहाँ कहीं भी मज़दूर इस बहादुराना संघर्ष की कहानी एक बार फिर सुनने के लिए इकट्ठा होंगे ­ एक ऐसी कहानी जो बहुत पहले ही सर्वहारा शौर्य-गाथाओं के ख़ज़ाने में शामिल हो चुकी है ­ वे 1871 के शहीदों की स्मृति को गर्व के साथ याद करेंगे। और साथ ही वे आज के वर्ग संघर्ष के उन शहीदों को भी याद करेंगे जो या तो मार डाले गये या पूँजीवादी देशों के क़ैदख़ानों में अब भी यातना झेल रहे हैं, क्योंकि उन्होंने अपने उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ बग़ावत करने की हिम्मत की थी, जैसा कि पेरिस के मज़दूरों ने करीब डेढ़ सौ साल पहले किया था।

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  • Northern Ireland : Military Reaction Force (MRF): Time for Truth

    The BBC’s Panorama programme has uncovered evidence that soldiers from a secret unit used by the British Army during the Troubles in Northern Ireland in the early 1970s, shot unarmed civilians.

    This was 40 strong unit operating a terror unit killing unarmed civilians, its operational records have been destroyed. They operated in West Belfast in unmarked cars.

    The soldiers operated