Category: Asia
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Jun 10: Govt may privatize mining, sale of coal
http://www.livemint.com/Industry/ZFxoKziRwMg8rGxc9kfCHO/Govt-may-privatize-mining-sale-of-coal.html Govt may privatize mining, sale of coal India currently allows private companies to mine coal only for captive use, barring them from selling the fuel in the open market New Delhi: India may significantly reform the coal sector by allowing private firms to mine and sell the mineral since the state-owned monopoly is unable […]
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खेल शुरू हो चुका है: आनंद तेलतुंबड़े
गरीबों-उत्पीड़ितों की हिमायत के ऐलान के साथ मोदी सरकार के बनते ही भगाणा के आंदोलनकारी दलित परिवारों को जंतर मंतर से बेदखल करने की कोशिशों और पुणे में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या में आनंद तेलतुंबड़े ने आने वाले दिनों के संकेतों को पढ़ने की कोशिश की है. अनुवाद: रेयाज उल हक.
अब इस आधार पर कि लोगों ने भाजपा की अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा वोट उसे दिया है और नरेंद्र मोदी ने ‘अधिकतम प्रशासन’ की शुरुआत कर दी है, बहुत सारे लोग यह सोच रहे थे कि हिंदुत्व के पुराने खेल की जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने हाव-भाव और भाषणों के जरिए मोदी ने बड़ी कुशलता से ऐसा भ्रम बनाए भी रखा है. इसके नतीजे में मोदी के सबसे कट्टर आलोचक तक गलतफहमी के शिकार हो गए हैं. यहां तक कि जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है, उनमें से भी कइयों को ऐसा लगने लगा है कि मोदी शायद कारगर साबित हों. लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में, भावनाओं में लिपटी हुई लफ्फाजी से भरे ऐलान के आधार पर यह यकीन करना बहुत जल्दबाजी होगी कि मोदी सरकार गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति समर्पित होगी. तब भी कइयों को लगता है कि चूंकि वे एक साधारण पिछड़ी जाति के परिवार से आते हैं और पूरी आजादी से काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों. नहीं भी तो वे मुसलमानों (जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया है) और दलितों (जिन्होंने भारी तादाद में उन्हें वोट दिया है) के प्रति संवेदनशील होंगे. यही वे दो मुख्य समुदाय हैं जिनसे मिल कर वह गरीब और उत्पीड़ित तबका बनता है, जिसके प्रति मोदी समर्पित होने की बात कह रहे हैं.
लेकिन इस हफ्ते हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने इन उम्मीदों को झूठा साबित कर दिया. दलितों के बलात्कारों और हत्याओं की लहर तो चल ही रही थी, उनके साथ साथ घटी इन दो घटनाओं ने ऐसे संकेत दिए हैं कि शायद पुराना खेल शुरू हो चुका है.
दलितों की नामुराद मांगें
भगाणा की भयानक घटना देश को शर्मिंदा करने के लिए काफी थी: घटना ये है कि हरियाणा में 23 मार्च को 13 से 18 साल की चार लड़कियों को नशा देकर रात भर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के ये अपराधी उन्हें ले जाकर भटिंडा रेलवे स्टेशन के पास झाड़ियों में फेंक आए. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक घिनौना और शर्मनाक है. लड़कियों को मेडिकल जांच के दौरान अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ा, जिसका बलात्कार के मामले में इस्तेमाल करने पर आधिकारिक पाबंदी लगाई जा चुकी है. हालांकि पुलिस को दलित समुदाय के दबाव के चलते शिकायत दर्ज करनी पड़ी, लेकिन उसने अपराधियों को पकड़ने में पांच हफ्ते लगाए. जबकि हिसार अदालत में उनको रिहा कराने की न्यायिक प्रक्रिया फौरन शुरू हो गई. और यह गिरफ्तारी भी तब हुई जब भगाणा के दलितों को उन लड़कियों के परिजनों के साथ इंसाफ के लिए धरने पर बैठना पड़ा. ये दलित परिवार अपने गांव वापस लौटने में डर रहे हैं क्योंकि उन्हें जाटों के हमले की आशंका है. भगाणा के करीब 90 दलित परिवार, जिनमें बलात्कार की शिकायतकर्ता लड़कियों के परिवार भी शामिल हैं, दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके अलावा 120 दूसरे परिवार हिसार के मिनी सचिवालय पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान ही नाबालिग लड़कियों के बलात्कारों की अनेक भयानक खबरें निकल कर सामने आई हैं. जैसा कि एक हिंदी ब्लॉग रफू ने प्रकाशित किया है, पास के डाबरा गांव की 17 साल की एक दलित लड़की का जाट समुदाय के ही लोगों ने 2012 में सामूहिक बलात्कार किया था जिसके बाद उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. एक और 10 वर्षीय बच्ची का एक अधेड़ मर्द ने बलात्कार किया था. इसके अलावा एक और लड़की का एक जाट पुरुष ने बलात्कार किया जो आज भी सरेआम घूम रहा है और उल्टे पुलिस ने लड़की को ही गिरफ्तार करके उसे यातनाएं दीं. ये सारी लड़कियां इंसाफ के लिए निडर होकर लड़ रही हैं और इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं.
जंतर मंतर पर 6 जून को सुबह करीब 6 बजे, जब ज्यादातर आंदोलनकारी सो रहे थे, पुलिसकर्मियों का एक बड़ा समूह आया और उसने आंदोलनकारियों के तंबू गिरा दिए. उन्होंने उनके तंबुओं को जबरन वहां से हटा दिया और चेतावनी दी कि वे लोग दोपहर 12 बजे तक वहां से चले जाएं. हिसार मिनी सचिवालय में भी विरोध करने वाले इसी तरह हटाए गए. दोनों जगहों पर पुलिस ने उन्हें तितर बितर कर दिया और उनका सामान तोड़ फोड़ दिया. छोटे-छोटे बच्चों समेत ये निर्भयाएं (बलात्कार से गुजरी लड़कियों के लिए मीडिया द्वारा दिया गया नाम) सड़कों पर फेंक दी गई, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां भी नहीं रहने दिया. वहां पर जुटे महिला, दलित और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों तथा दो शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं को साथ लेकर प्रदर्शनकारी दोपहर 2 बजे संसद मार्ग थाना के प्रभारी अधिकारी को यह ज्ञापन देने गए कि उन्हें जंतर मंतर पर रुकने की इजाजत दी जाए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन इस समूह को थाना के सामने बैरिकेड पर रोक दिया गया. जब महिलाओं ने जाने देने और थाना प्रभारी से मिलने की इजाजत देने पर जोर दिया तो पुलिसकर्मी उन्हें पीछे हटाने के नाम पर उनके साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे. वुमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन की कल्याणी मेनन सेन के मुताबिक, जो प्रदर्शनकारियों का हिस्सा थीं, पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के गुप्तांगों को पकड़ा और उनके गुदा को हाथ से दबाया. शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं और अनेक महिला कार्यकर्ताओं (समाजवादी जन परिषद की वकील प्योली स्वातीजा, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की सुमेधा बौद्ध और एनटीयूआई की राखी समेत) पर इसी घटिया तरीके से हमले किए गए. बताया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी चिल्ला रहा था, ‘अरे ये ऐसे नहीं मानेंगे, लाठी घुसाओ.’ इस घिनौने हमले के बाद अनेक कार्यकर्ताओं को पकड़ कर एक घंटे से ज्यादा हिरासत मे रखा गया.
इस नवउदारवादी दौर में जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक जगहें सुनियोजित तरीके से खत्म कर दी गई हैं और इन जगहों को राज्य की राजधानियों के छोटे से तयशुदा इलाके और दिल्ली में जंतर मंतर तक सीमित कर दिया गया है. लोग यहां जमा हो सकते हैं और पुलिस से घिरे हुए वे अपने मन की बातें कह सकते हैं, लेकिन वहां उनकी बातों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता. यह भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है. इस बदतरीन मामले में गांव के पूरे समुदाय को दो महीने तक धरने पर बैठना पड़ा है, अपने आप में यही बात घिनौनी है. उनकी जायज मांग की सुनवाई करने के बजाए – वे अपने पुनर्वास के लिए एक सुरक्षित जगह मांग रहे हैं क्योंकि वे भगाणा में नहीं लौट सकते – सरकार लोकतंत्र की इस सीमित और आखिरी जगह से भी उन्हें क्रूरतापूर्वक बेदखल कर रही है. यह बात यकीनन इसे दिखाती है कि ये दलितों के लिए वे ‘अच्छे दिन’ तो नहीं हैं, जिनका वादा मोदी सरकार ने किया था. दिल्ली पुलिस सीधे सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आता है और यहां पुलिस तब तक इतने दुस्साहस के साथ कार्रवाई नहीं करती जब तक उसे ऐसा करने को नहीं कहा गया हो. यह बात भी गौर करने लायक है कि हरियाणा और दिल्ली की पुलिस ने, जहां प्रतिद्वंद्वी दल सत्ता में हैं, समान तरीके से कार्रवाई की है. तो संदेश साफ है कि विरोध वगैरह जैसी बातों की इजाजत नहीं दी जाएगी. क्योंकि अगर जंतर मंतर और आजाद मैदान जैसी जगहें आबाद रहीं तो फिर कोई ‘अच्छे दिनों’ का नजारा कैसे कर पाएगाॽपहला विकेट गिरा
ऊपर की कार्रवाई तो सरकार की सीधी कार्रवाई थी, लेकिन कपट से भरी ऐसी अनेक कार्रवाइयां ऐसे संगठनों ने भी की हैं, जिनके हौसले भाजपा की जीत के बाद बढ़े हुए हैं. भगाणा के प्रदर्शनकारियों को उजाड़े जाने से ठीक दो दिन पहले 2 जून को पुणे में एक मुस्लिम नौजवान को हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. दशक भर पुराना यह हिंदू दक्षिणपंथी गिरोह फेसबुक पर शिव सेना के बाल ठाकरे और मराठा प्रतीक छत्रपति शिवाजी की झूठी तस्वीरें लगाए जाने का विरोध कर रहा था. पुणे पुलिस के मुताबिक, इन झूठी तस्वीरों वाला फेसबुक पेज पिछले एक साल से मौजूद था और उसको 50,000 लाइक्स मिली थीं. भीड़ को उकसाने के लिए हिंदू राष्ट्र सेना के उग्रवादियों ने इस बहुप्रशंसित पेज के लिंक को चैटिंग के जरिए तेजी से फैलाया. उनका कहना था कि यह पेज एक मुसलमान ‘निहाल खान’ द्वारा बनाया गया और चलाया जाता है, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह असल में एक हिंदू नौजवान निखिल तिकोने द्वारा चलाया जाता है, जो काशा पेठ के रहने वाले हैं. फिर इस गड़बड़ी का अहसास होते ही इस पेज को शुक्रवार को सोशल नेटवर्किंग साइटों से हटा लिया गया और तब इस मुद्दे पर विरोध को हवा देने की जरूरत नहीं रह गई थी. लेकिन हिंदू राष्ट्र सेना और शिव सेना के गुंडे सोमवार को प्रदर्शन करने उतरे. पुणे के बाहरी इलाके हदसपार में शाम उन्होंने एक बाइक रोकी, इसके सवार को उतारा और उसके सिर पर हॉकी स्टिक और पत्थरों से हमला किया और दौरे पर ही उसे मार डाला. मार दिया गया वह व्यक्ति मोहसिन सादिक शेख नाम का एक आईटी-प्रोफेशनल था और उसका उन तस्वीरों से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन चूंकि उसने दाढ़ी रख रखी थी और हरे रंग का पठानी कुर्ता पहन रखा था हमलावरों ने उसे मार डाला. शेख के साथ जा रहे उनके रिश्ते के भाई बच गए जबकि दो दूसरे लोगों अमीन शेख (30) और एजाज युसूफ बागवान (25) को चोटें आईं. पुलिस ने पहले हमेशा की तरह इस रटे रटाए बहाने के नाम पर इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की कि हमलावर शिवाजी की मूर्ति का अपमान किए जाने और एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़कों द्वारा बलात्कार किए जाने की अफवाह के कारण वहां जमा हुए थे. मानो इससे एक बेगुनाह नौजवान की हत्या जायज हो जाती हो.
शेख की हत्या के फौरन बाद, आनेवाले दिनों के बारे में बुरे संकेत देता हुआ एक एसएमएस भेजा गया जिसमें मराठी में कहा गया था: पहिली विकेट पडली (पहला विकेट गिर गया). इस संदेश को मद्देनजर रखें और शेख को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियारों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि यह एक योजनाबद्ध कार्रवाई थी. पुलिस ने रोकथाम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए. हालांकि उसको बस इसी का श्रेय दिया जा सकता है, खास कर संयुक्त आयुक्त संजय कुमार को, कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र सेना के प्रमुख धनंजय देसाई समेत 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनमें से 17 पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. देसाई पर शहर के विभिन्न थानों में पहले से ही दंगा करने और रंगदारी वसूलने के 23 मामले दर्ज हैं. लेकिन इस फौरी कार्रवाई को इसके मद्देनजर भी देखना चाहिए कि आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार अपना धर्मनिरपेक्ष मुखौटा दिखाने की कोशिश करेगी. लेकिन चूंकि मोदी सरकार इस पर चुप है, इसलिए संकेत अच्छे नहीं दिख रहे हैं.ऐसा लगता है कि खेल शुरू हो गया है. देखना यह है कि नरेंद्र मोदी इस खेल में किस भूमिका में उतरते हैं.
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Jun 10: Trade unions slam Rajasthan govt bid to reform labour laws
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Trade-unions-slam-Rajasthan-govt-bid-to-reform-labour-laws/articleshow/36315861.cms Trade unions slam Rajasthan govt bid to reform labour laws NEW DELHI: Central trade unions cutting across party affiliations resolved to oppose any move by the BJP government in Rajasthan to bring crucial labour law reforms in a bid to boost job creation and attract investment to the state. Recently, the Vasundhara Raje cabinet […]
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Jun 9: Rajasthan government starts drastic labour reforms
http://www.financialexpress.com/story-print/1258240 Vasundhara Raje’s Rajasthan government shows way in labour reforms P. Vaidyanathan Iyer Posted online: Sunday, Jun 08, 2014 at 0000 hrs Mumbai : The Vasundhara Raje-led government in Rajasthan has taken the lead in bringing about dramatic changes to Central labour laws, which reformists have long argued are holding back job creation in the […]
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वज़ीरपुर में हड़ताल का चौथा दिन
वज़ीरपुर में हड़ताल का चौथा दिनवज़ीरपुर में हड़ताल का चौथा दिन। गरम रोला मज़दूर एकता समिति के नेतृत्व में हड़ताल के चौथे दिन मज़दूरों ने जीत हासिल करने का प्रण लिया। गरम रोला मज़दूर एकता समिति के रघुराज ने बताया कि कल वज़ीरपुर में एक व्यापक रैली निकालने का फैसला किया गया है। मंच संचालन करते हुए बाबुराम ने पिछले दिन की पूरी रिपोर्ट मज़दूरों के सामने रखी। कमिटी के अम्बिका ने भी अपनी बात में मज़दूरों से अपील की कि वे सिर्फ हड़ताल के दौरान सभा में शामिल न हो पर हड़ताल का संचालन भी करें। हड़ताल के दौरान बिगुल मज़दूर दस्ता, पी यु सी एल के कार्यकर्ताओं ने भी बात रखी। गरम रोला मज़दूर एकता समिति के कार्यकर्ता सनी ने रुसी मज़दूर आंदोलन पर बात रखी व मज़दूरों की हड़ताल के राजनैतिक प्रभाव के बारे में बताया।गरम रोला मज़दूर एकता समितिवजीरपुर औद्योगिक एरिया. सम्पर्क- 09211532753 (रघुराज), 09873358124 (सनी) -
Media Freedoms, Coercive regimes and Blasphemy-mania: M. Amer Morgahi
Guest post by M. AMER MORGAHI [What the corporate interests have done to the Indian media the military is doing in Pakistan. In the continuing face-off, the Pakistan Electronic Media Regulatory Authority (PEMRA) has suspended Geo TV’s license for fifteen days and imposed a fine of $ 104, 000 on it. See report here] Media […]

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Observer speaks out on Syria elections
Damasucs, Syria – On June 4, a group of parliamentarians met with the delegation of election observers from Canada, Ireland and the U.S. for a press event, which was covered by SANA, the Syrian public news company.
The chairwoman of the Foreign Policy Committee of the People’s Assembly, Dr. Fadia Deeb, convened the meeting. Assemblywoman Deeb is from the city of Homs, which had been one of the starting places for the uprising of right-wing rebels that has torn apart the country for three years.
The following is a statement made by Joe Iosbaker, who served as an observer for the elections and is prominent Chicago based anti war activist:
“I was an election observer in Homs, where I spent time at multiple polling places. I directly observed several dozen people casting their ballots; I spoke with several of them at each of the precincts; I listened as other members of the delegation spoke with voters, as well as precinct workers.
“The election I observed was as free and fair as any I’ve witnessed in the U.S. The election was characterized by a high level of participation, with hundreds at enthusiastic voters, as well as the children of the community, rallying at each poll. Politically, it was more than a first multi-party election for president; it was a celebration of victory over the foreign armies that had finally withdrawn less than one month earlier.
“I am an experienced electoral activist in Chicago, where I am from. I want to compare the Syrian election with elections in the U.S. First, there is a much lower level of participation in the U.S. There are several reasons for this. For one, political parties work to depress turn out among workers, the poor, African Americans, Latinos and immigrants and youth. Also the electoral system requires a special registration to vote.
“Given the lies being told by the White House, I wanted to share with you a feature of the political system in the city of Chicago. Chicago, a city of 3 million, is a one-party state. The Democratic Party has controlled city government for 80 years. The last Republican mayor left office in 1931. There are 50 members of city council. They are all Democrats and there hasn’t been a Republican council member since the 1940s. Chicago is in Cook County, and all those elected from Chicago to county government are Democrats. The state assembly representatives and senators for the city of Chicago, of which there are a total of 45, are all Democrats. The six federal congresswomen and men for the city of Chicago are all Democrats as well. And on election day in Chicago, the precincts are required to have both Democratic and Republican party judges. It is routine that the ‘Republican’ judges are in fact Democrats, wearing the Republican badge for the day.
“Furthermore, I believe this is true in many cities in the U.S. In conclusion, the U.S. government has no right to criticize the elections in Syria.”
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Propaganda and regression
Numnual Yapparat
The junta is working overtime to rebuild Thailand by turning the clock back to a yesterday world. In doing so, they are intensifying a conservative ideology and values of “Thainess”. An example of the absurd propaganda, which has been launched in the previous week, is the “Happiness Project” where grotesque women soldiers in uniform sing songs to “cheer up” the public. They also provided free meals, hair-cuts, snacks and sweets. I cannot help thinking that the sweets must have a terribly poisonous taste. The junta is forcing people to be happy and giving out sweets as though we are all “children”.
Recently, the junta boss Prayut even composed a song to return happiness back to Thai citizens. Was the song nice? The right answer in this case would be “absolutely awe-inspiring”. Otherwise you might be invited to the army camp.
Prayut fought back against the three fingers symbol, used by anti-coup protesters, by lecturing us that the Hunger Games symbol was not compatible with Thai culture.
The military junta are also trying to add more values of “Thainess” to the day to day work of civil servants. The office of the Permanent Secretary to the Prime Minister has issued an order that all letters address to H.E. Generalissimo Prayut must start with “I grovel at your feet, your excellency” (กราบเรียน)and the letter must end with the phrase “With Great Respect”.
If you think the “Happiness Project” was the ugliest form of political propaganda then you might be wrong. At the moment the junta has started releasing several video clips to assist Thai citizens in order to conduct themselves “correctly”. There is a video which targets students. The main messages in the video suggest that they stop thinking of themselves and put The Fatherland first. When you hear the national anthem then you have to stop and stand up in order to pay respect to the ARMY who guard the country! The military has never fought a successful battle against any invaders, but it is well practiced in shooting down unarmed Thai citizens.
On Friday Kasetsart University students tried to organise an anti-coup event by picnicking and reading books but they were intimidated by the university security guards and more than 100 soldiers. Students failed this time, but they will not give up and are seeking new techniques to exercise their views.
Some university vice-chancellors in the Northeast informed police to arrest their own students because they protested against the coup. The vice-chancellor of Ramatibodi University went further by clapping his hands to warmly welcome the coup. He said, “We need to have educational reform urgently; our students should study morals and technology”. In his plan, a “good” education system should reduce academic subjects because they generate different views among people and caused the political crisis.
The Office of The Basic Education Commission has announced the new education programme to suit the military junta’s criteria. All academic documents that criticise the junta are forbidden. Teaching programmes will promote the junta’s achievements. Political activities are not allowed to take place in schools and universities. Teachers, lecturers and staffs are told to avoid taking part in political events.
Freedom is Slavery; Ignorance is Strength!!
The best way to handle these absurdities is to relentlessly defy the junta’s New Order.
Filed under: Thai politics Tagged: Anti- Coup, Happiness Project, Hunger Game, Thai politics, Thailand, Three fingers

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गरम रोला मज़दूरों ने अपनी हड़ताल दुसरे दिन जारी रखी।
गरम रोला मज़दूरों ने अपनी हड़ताल दुसरे दिन जारी रखी।7 जून। गरम रोला मज़दूरों की हड़ताल दुसरे दिन जारी रही। आज मज़दूरों ने राजा पार्क में अपनी सभा की। इस सभा में करीब 500 मज़दूरों ने भागीदारी की। सभा में बात रखते हुए गरम रोल्ला मज़दूर समिति के मज़दूर अम्बिका ने कहा कि यह ज़रूरी है कि हम लगातार हड़ताल रखे इसलिए हमें अपनी सभा को जोश के साथ चलना होगा और सभी मज़दूर इस हड़ताल में शिरकत करें। सभा में आगे मज़दूर कार्यकर्ता सनी ने कहा कि इस हड़ताल पर ठंडा रोला, स्टील लाइन, रिक्शा के मज़दूर भी आस लगाए बैठे हैं। तथा इस हड़ताल में जीत पूरे वज़ीरपुर के मज़दूरों की जीत होगी और यह अन्य मज़दूरों को भी संघर्ष के रास्ते पर उतरने का रास्ता दिखाएगी। उन्होंने आगे कहा की हड़ताल में सभी मज़दूर न सिर्फ पार्क में बैठे बल्कि मज़दूर वर्ग की इस पाठशाला का इस्तेमाल वर्ग चेतन होने के लिए करें। आगे मज़दूरों ने आम राय बनाकर हड़ताल के माँगपत्रक को अपनी आम राय से पास कराया। गरम रोला मज़दूर समिति के रघुराज ने मज़दूरों को तमाम अफवाहों और दलालों से सावधान रहने को कहा तथा अपनी ताकत पर भरोसा रखने का आह्वान किया। उन्होंने इस हड़ताल में अन्य मज़दूरों को हड़ताल में शामिल करने का प्रस्ताव रखा। सभा के अंत में मज़दूरों ने हड़ताल को मजबूत बनाने व इसे जीतकर ही उठने की शपथ ली। बिगुल मज़दूर दस्ता की सांस्कृतिक टोली ने ‘एक कथा सुनो रे लोगो’, ‘जारी है हड़ताल’, ‘यूनियन हमारी एकता’ गीत प्रस्तुत किये।गरम रोला मज़दूर एकता समितिवजीरपुर औद्योगिक एरिया. सम्पर्क- 09211532753 (रघुराज), 09873358124 (सनी)
















