Author: Reyaz-ul-haque

  • घृणाजन्य अपराध और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

    राम पुनियानी

    मोदी सरकार को सत्ता संभाले तीन हफ्ते से ज्यादा हो गए हैं। एक ओर जहां समाज के कुछ तबकों को इस सरकार से ढेरों आशाएं हैं वहीं दूसरी ओर, इस सरकार के बारे में जो भय और आशंकाएं पहले से व्यक्त की जा रही थीं, वे सच होती दिख रही हैं। बाल ठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र, सोशल वेबसाईटों पर अपलोड होने के कुछ समय बाद ही पुणे में अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध हमले शुरू हो गए। हिंसक भीड़ ने शहर को मानो अपने कब्जे में ले लिया। कई मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया गया और कम से कम 200 सरकारी व निजी वाहनो को आग के हवाले कर दिया गया। इस हिंसा का सबसे भयावह पक्ष था मोहसिन शेख नाम के एक आईटी कंपनी में कार्यरत पेशेवर की सार्वजनिक रूप से हत्या। धनंजय देसाई के नेतृत्व में ‘हिंदू राष्ट्र सेना’ के कार्यकर्ताओं ने इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया। यह घटना बताती है कि नफरत हमें किस हद तक क्रूर और अमानवीय बना सकती है। जहाँ इस घटना से अल्पसंख्यक समुदाय सकते में हैं और कई नागरिक समूहों ने इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं भारत के प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर चुप हैं। महाराष्ट्र की सरकार इस घटना को एक सामान्य अपराध मान रही है। यह समझना कठिन है कि किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म के कारण, सड़क पर घेरकर, पीट-पीटकर मार डालने को केवल एक सामान्य हत्या कैसे समझा या बताया जा सकता है? वैसे भी, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही अल्पसंख्यक समुदाय के लोग आशंकित और भयग्रस्त हैं। पुणे और आसपास के इलाकों में पिछले दो हफ्तों में अल्पसंख्यकों के घरों व उनके धर्मस्थलों पर अनेक हमले हुए हैं। भाजपा की विचारधारा में यकीन करने वालों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। पुणे के आईटी पेशेवर की हत्या, उन लोगों के लिए एक चेतावनी का संकेत है जो सांप्रदायिक सद्भाव व राष्ट्रीय एकता के लिए संघर्षरत हैं और जो इस बात के हामी हैं कि अल्पसंख्यकों को समाज में सम्मान के साथ जीने का और आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त करने का हक है।

    पुणे की घटना को हम उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर से जोड़कर भी देख सकते हैं। वहां भी चुनाव के पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए हिंसा भड़काई गई थी। यह मात्र संयोग नहीं है कि महाराष्ट्र में भी जल्द ही चुनाव होने वाले हैं। उत्तरप्रदेश में एक सड़क दुर्घटना के बाद हुई मारपीट को ‘‘हमारी महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़’’ का स्वरूप दे दिया गया था। ‘लव जिहाद’ की चर्चा होने लगी और सांप्रदायिक खेमे के एक विधायक ने एक नकली वीडियो क्लिप अपलोड कर आग में घी डालने का काम किया। इस सबके बाद, पूरे इलाके में भयावह हिंसा हुई। हिंसा की कोख से जन्मा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और इसके बाद, उत्तरप्रदेश में भाजपा को भारी विजय हासिल हुई। उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत का श्रेय अमित शाह को दिया जा रहा है। वे ही अमित शाह अब महाराष्ट्र जा रहे हैं जहां वे आगामी चुनाव में भाजपा को जीत दिलवाने के लिए काम करेंगे। और इसके ठीक पहले, हिन्दू राष्ट्र सेना जैसी ताकतों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का तांडव शुरू कर दिया है।

    हमारे देश में लंबे समय से सांप्रदायिक हिंसा और सांप्रदायिक अपराधों का इस्तेमाल धार्मिक ध्रुवीकरण करने के लिए  किया जाता रहा है। हालिया लोकसभा चुनाव में, सतही तौर पर देखने पर ऐसा लग सकता है कि मोदी को उनके विकास के एजेण्डे ने जीत दिलाई। परंतु सच यह है कि मोदी की जीत की पृष्ठभूमि में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही था। इसी ध्रुवीकरण की खातिर मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान अनुच्छेद ३७०, बांग्लादेशी घुसपैठियों और पिंक रिवोल्यूशन आदि की बातें कीं। नतीजे में हुए धार्मिक ध्रुवीकरण ने मोदी की जीत में कितनी भूमिका अदा की, यह कहना मुश्किल है।

    कुल मिलाकर, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सांप्रदायिक पार्टियों का एक प्रमुख हथियार है। गुजरात में हमने देखा कि किस तरह, गोधरा ट्रेन आगजनी के बाद हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने बड़े पैमाने पर हिंसा भड़कायी, जिसमें मारे जाने वालों में से 80 प्रतिशत मुसलमान थे। इस हिंसा ने ध्रुवीकरण को और गहरा किया और भाजपा सरकार, जो उस समय डगमगा रही थी, बहुमत से सत्ता में वापिस आ गई।

    सांप्रदायिक हिंसा और ध्रुवीकरण के लिए जिन मुद्दों का इस्तेमाल किया जाता है, वे समय के साथ बदलते रहे हैं। ब्रिटिश काल में मस्जिदों के सामने बैंड बजाना, मस्जिदों में सुअर का मांस और मंदिरों में गाय का मांस फेंकना, दंगे शुरू करवाने के पसंदीदा तरीके थे। गोधरा में मुसलमानों को हिंदू कारसेवकों को जिंदा जलाने का दोषी ठहराया गया तो मुंबई में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने का उत्सव मनाकर अल्पसंख्यकों को भड़काया गया। जहां ये मुद्दे हिंसा शुरू करवाने में मदद करते हैं वहीं लोगों के दिमागों में जहर भरने का काम लगातार चलता रहता है। मुस्लिम राजाओं की क्रूरता के किस्से बयान किए जाते हैं, यह बताया जाता है कि किस तरह मुसलमान बादशाह, मंदिरों को जमींदोज किया करते थे और अपनी हिंदू प्रजा पर जजि़या थोपते थे। यह भी कहा जाता है कि इस्लाम को तलवार की नोंक पर भारत में फैलाया गया। इसके अलावा, धारा 370 व मुसलमानों की ‘‘तेजी से बढ़ती’’ आबादी आदि जैसे मुद्दों पर भी भड़काऊ और झूठी बातें कही जाती हैं। इतिहासविद् व सामाजिक कार्यकर्ता चाहे लाख कहते रहें कि ये बातें सही नहीं हैं और सच कुछ और है तब भी उनकी कोई नहीं सुनता। केवल कुछ लोग, जो कि दूसरों की बातें आँख मूंदकर मानने में विश्वास नहीं रखते, तार्किकता और सत्य की आवाज को सुन पाते हैं। अधिकांश लोग आरएसएस के अतिप्रभावकारी व शक्तिशाली प्रचारतंत्र के जाल में फंस जाते हैं। आरएसएस ने पिछले कई दशकों से चले आ रहे अपने दुष्प्रचार के जरिये यह सुनिश्चित कर लिया है कि देश के अधिकांश हिंदू, मुसलमानों के बारे में गलत धारणाएं पाल लें। नोम चोम्स्की ने राज्य द्वारा ‘सहमति के निर्माण’ की बात कही थी। यहां, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन, ‘सामाजिक मान्यताओं’ का उत्पादन कर रहे हैं और इन मान्यताओं को आम लोगों के दिमागों में बिठा रहे हैं। इन मिथकों और गलत धारणाओं का इस्तेमाल, धार्मिक ध्रुवीकरण करने और सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिया किया जाता रहा है।

    सांप्रदायिक ताकतों के हथियारों के जखीरे में सोशल मीडिया एक नए व अत्यंत पैने हथियार के रूप में उभरा है। इसकी पहुंच व्यापक है। जहां अखबार व पत्र-पत्रिकाएं अपने लेखन में कम से कम कुछ संतुलन व परिपक्वता रखते हैं वहीं सोशल मीडिया में कोई भी, कुछ भी लिख सकता है और उसे लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। मुजफ्फरनगर में हिंसा भड़काने के लिए मुसलमानों के पारंपरिक परिधान पहने हुए लोगों द्वारा, पाकिस्तान ने दो चोरों की पिटाई की वीडियो क्लिप का इस्तेमाल किया गया। ऐसा बताया गया कि यह मुसलमानों द्वारा हिंदू लड़कों को मारने के दृश्य हैं। बजरंग दल के कार्यकर्ता, हैदराबाद के मंदिरों में गौमांस फेंकते हुए और कर्नाटक में पाकिस्तान का झंडा फहराते हुए पकड़े जा चुके हैं। हिंदू राष्ट्र सेना जैसे संगठन सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए कर रहे हैं। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी, उनकी असली सोच व इरादे को जाहिर करती है। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव आसन्न हैं और इस तरह की घटनाओं से भाजपा को वोटों की फसल काटने में मदद मिलेगी। यह आवश्यक है कि महाराष्ट्र सरकार चुनावी समीकरणों की परवाह करे बगैर विघटनकारी ताकतों को पूरी तरह से कुचल दे। इसके साथ ही, विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच आपसी प्रेम व सद्भाव को बढ़ावा देने की जरूरत भी है। अल्पसंख्यकों के बारे में गलत धारणाओं, मिथकों और पूर्वाग्रहों को दूर किया जाना भी उतना ही जरूरी है। यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम आमजनों को यह समझाएं कि हमारे देश की विविधवर्णी संस्कृति और उसके बहुवाद का सम्मान करके ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

    (अनुवाद:अमरीश हरदेनिया)
  • खेल शुरू हो चुका है: आनंद तेलतुंबड़े

    गरीबों-उत्पीड़ितों की हिमायत के ऐलान के साथ मोदी सरकार के बनते ही भगाणा के आंदोलनकारी दलित परिवारों को जंतर मंतर से बेदखल करने की कोशिशों और पुणे में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या में आनंद तेलतुंबड़े ने आने वाले दिनों के संकेतों को पढ़ने की कोशिश की है. अनुवाद: रेयाज उल हक.

    अब इस आधार पर कि लोगों ने भाजपा की अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा वोट उसे दिया है और नरेंद्र मोदी ने ‘अधिकतम प्रशासन’ की शुरुआत कर दी है, बहुत सारे लोग यह सोच रहे थे कि हिंदुत्व के पुराने खेल की जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने हाव-भाव और भाषणों के जरिए मोदी ने बड़ी कुशलता से ऐसा भ्रम बनाए भी रखा है. इसके नतीजे में मोदी के सबसे कट्टर आलोचक तक गलतफहमी के शिकार हो गए हैं. यहां तक कि जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है, उनमें से भी कइयों को ऐसा लगने लगा है कि मोदी शायद कारगर साबित हों. लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में, भावनाओं में लिपटी हुई लफ्फाजी से भरे ऐलान के आधार पर यह यकीन करना बहुत जल्दबाजी होगी कि मोदी सरकार गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति समर्पित होगी. तब भी कइयों को लगता है कि चूंकि वे एक साधारण पिछड़ी जाति के परिवार से आते हैं और पूरी आजादी से काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों. नहीं भी तो वे मुसलमानों (जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया है) और दलितों (जिन्होंने भारी तादाद में उन्हें वोट दिया है) के प्रति संवेदनशील होंगे. यही वे दो मुख्य समुदाय हैं जिनसे मिल कर वह गरीब और उत्पीड़ित तबका बनता है, जिसके प्रति मोदी समर्पित होने की बात कह रहे हैं. 

    लेकिन इस हफ्ते हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने इन उम्मीदों को झूठा साबित कर दिया. दलितों के बलात्कारों और हत्याओं की लहर तो चल ही रही थी, उनके साथ साथ घटी इन दो घटनाओं ने ऐसे संकेत दिए हैं कि शायद पुराना खेल शुरू हो चुका है.

    दलितों की नामुराद मांगें

    भगाणा की भयानक घटना देश को शर्मिंदा करने के लिए काफी थी: घटना ये है कि हरियाणा में 23 मार्च को 13 से 18 साल की चार लड़कियों को नशा देकर रात भर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के ये अपराधी उन्हें ले जाकर भटिंडा रेलवे स्टेशन के पास झाड़ियों में फेंक आए. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक घिनौना और शर्मनाक है. लड़कियों को मेडिकल जांच के दौरान अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ा, जिसका बलात्कार के मामले में इस्तेमाल करने पर आधिकारिक पाबंदी लगाई जा चुकी है. हालांकि पुलिस को दलित समुदाय के दबाव के चलते शिकायत दर्ज करनी पड़ी, लेकिन उसने अपराधियों को पकड़ने में पांच हफ्ते लगाए. जबकि हिसार अदालत में उनको रिहा कराने की न्यायिक प्रक्रिया फौरन शुरू हो गई. और यह गिरफ्तारी भी तब हुई जब भगाणा के दलितों को उन लड़कियों के परिजनों के साथ इंसाफ के लिए धरने पर बैठना पड़ा. ये दलित परिवार अपने गांव वापस लौटने में डर रहे हैं क्योंकि उन्हें जाटों के हमले की आशंका है. भगाणा के करीब 90 दलित परिवार, जिनमें बलात्कार की शिकायतकर्ता लड़कियों के परिवार भी शामिल हैं, दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके अलावा 120 दूसरे परिवार हिसार के मिनी सचिवालय पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान ही नाबालिग लड़कियों के बलात्कारों की अनेक भयानक खबरें निकल कर सामने आई हैं. जैसा कि एक हिंदी ब्लॉग रफू ने प्रकाशित किया है, पास के डाबरा गांव की 17 साल की एक दलित लड़की का जाट समुदाय के ही लोगों ने 2012 में सामूहिक बलात्कार किया था जिसके बाद उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. एक और 10 वर्षीय बच्ची का एक अधेड़ मर्द ने बलात्कार किया था. इसके अलावा एक और लड़की का एक जाट पुरुष ने बलात्कार किया जो आज भी सरेआम घूम रहा है और उल्टे पुलिस ने लड़की को ही गिरफ्तार करके उसे यातनाएं दीं. ये सारी लड़कियां इंसाफ के लिए निडर होकर लड़ रही हैं और इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं.

    जंतर मंतर पर 6 जून को सुबह करीब 6 बजे, जब ज्यादातर आंदोलनकारी सो रहे थे, पुलिसकर्मियों का एक बड़ा समूह आया और उसने आंदोलनकारियों के तंबू गिरा दिए. उन्होंने उनके तंबुओं को जबरन वहां से हटा दिया और चेतावनी दी कि वे लोग दोपहर 12 बजे तक वहां से चले जाएं. हिसार मिनी सचिवालय में भी विरोध करने वाले इसी तरह हटाए गए. दोनों जगहों पर पुलिस ने उन्हें तितर बितर कर दिया और उनका सामान तोड़ फोड़ दिया. छोटे-छोटे बच्चों समेत ये निर्भयाएं (बलात्कार से गुजरी लड़कियों के लिए मीडिया द्वारा दिया गया नाम) सड़कों पर फेंक दी गई, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां भी नहीं रहने दिया. वहां पर जुटे महिला, दलित और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों तथा दो शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं को साथ लेकर प्रदर्शनकारी दोपहर 2 बजे संसद मार्ग थाना के प्रभारी अधिकारी को यह ज्ञापन देने गए कि उन्हें जंतर मंतर पर रुकने की इजाजत दी जाए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन इस समूह को थाना के सामने बैरिकेड पर रोक दिया गया. जब महिलाओं ने जाने देने और थाना प्रभारी से मिलने की इजाजत देने पर जोर दिया तो पुलिसकर्मी उन्हें पीछे हटाने के नाम पर उनके साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे. वुमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन की कल्याणी मेनन सेन के मुताबिक, जो प्रदर्शनकारियों का हिस्सा थीं, पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के गुप्तांगों को पकड़ा और उनके गुदा को हाथ से दबाया. शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं और अनेक महिला कार्यकर्ताओं (समाजवादी जन परिषद की वकील प्योली स्वातीजा, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की सुमेधा बौद्ध और एनटीयूआई की राखी समेत) पर इसी घटिया तरीके से हमले किए गए. बताया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी चिल्ला रहा था, ‘अरे ये ऐसे नहीं मानेंगे, लाठी घुसाओ.’ इस घिनौने हमले के बाद अनेक कार्यकर्ताओं को पकड़ कर एक घंटे से ज्यादा हिरासत मे रखा गया.

    इस नवउदारवादी दौर में जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक जगहें सुनियोजित तरीके से खत्म कर दी गई हैं और इन जगहों को राज्य की राजधानियों के छोटे से तयशुदा इलाके और दिल्ली में जंतर मंतर तक सीमित कर दिया गया है. लोग यहां जमा हो सकते हैं और पुलिस से घिरे हुए वे अपने मन की बातें कह सकते हैं, लेकिन वहां उनकी बातों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता. यह भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है. इस बदतरीन मामले में गांव के पूरे समुदाय को दो महीने तक धरने पर बैठना पड़ा है, अपने आप में यही बात घिनौनी है. उनकी जायज मांग की सुनवाई करने के बजाए – वे अपने पुनर्वास के लिए एक सुरक्षित जगह मांग रहे हैं क्योंकि वे भगाणा में नहीं लौट सकते – सरकार लोकतंत्र की इस सीमित और आखिरी जगह से भी उन्हें क्रूरतापूर्वक बेदखल कर रही है. यह बात यकीनन इसे दिखाती है कि ये दलितों के लिए वे ‘अच्छे दिन’ तो नहीं हैं, जिनका वादा मोदी सरकार ने किया था. दिल्ली पुलिस सीधे सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आता है और यहां पुलिस तब तक इतने दुस्साहस के साथ कार्रवाई नहीं करती जब तक उसे ऐसा करने को नहीं कहा गया हो. यह बात भी गौर करने लायक है कि हरियाणा और दिल्ली की पुलिस ने, जहां प्रतिद्वंद्वी दल सत्ता में हैं, समान तरीके से कार्रवाई की है. तो संदेश साफ है कि विरोध वगैरह जैसी बातों की इजाजत नहीं दी जाएगी. क्योंकि अगर जंतर मंतर और आजाद मैदान जैसी जगहें आबाद रहीं तो फिर कोई ‘अच्छे दिनों’ का नजारा कैसे कर पाएगाॽ

    पहला विकेट गिरा

    ऊपर की कार्रवाई तो सरकार की सीधी कार्रवाई थी, लेकिन कपट से भरी ऐसी अनेक कार्रवाइयां ऐसे संगठनों ने भी की हैं, जिनके हौसले भाजपा की जीत के बाद बढ़े हुए हैं. भगाणा के प्रदर्शनकारियों को उजाड़े जाने से ठीक दो दिन पहले 2 जून को पुणे में एक मुस्लिम नौजवान को हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. दशक भर पुराना यह हिंदू दक्षिणपंथी गिरोह फेसबुक पर शिव सेना के बाल ठाकरे और मराठा प्रतीक छत्रपति शिवाजी की झूठी तस्वीरें लगाए जाने का विरोध कर रहा था. पुणे पुलिस के मुताबिक, इन झूठी तस्वीरों वाला फेसबुक पेज पिछले एक साल से मौजूद था और उसको 50,000 लाइक्स मिली थीं. भीड़ को उकसाने के लिए हिंदू राष्ट्र सेना के उग्रवादियों ने इस बहुप्रशंसित पेज के लिंक को चैटिंग के जरिए तेजी से फैलाया. उनका कहना था कि यह पेज एक मुसलमान ‘निहाल खान’ द्वारा बनाया गया और चलाया जाता है, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह असल में एक हिंदू नौजवान निखिल तिकोने द्वारा चलाया जाता है, जो काशा पेठ के रहने वाले हैं. फिर इस गड़बड़ी का अहसास होते ही इस पेज को शुक्रवार को सोशल नेटवर्किंग साइटों से हटा लिया गया और तब इस मुद्दे पर विरोध को हवा देने की जरूरत नहीं रह गई थी. लेकिन हिंदू राष्ट्र सेना और शिव सेना के गुंडे सोमवार को प्रदर्शन करने उतरे. पुणे के बाहरी इलाके हदसपार में शाम उन्होंने एक बाइक रोकी, इसके सवार को उतारा और उसके सिर पर हॉकी स्टिक और पत्थरों से हमला किया और दौरे पर ही उसे मार डाला. मार दिया गया वह व्यक्ति मोहसिन सादिक शेख नाम का एक आईटी-प्रोफेशनल था और उसका उन तस्वीरों से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन चूंकि उसने दाढ़ी रख रखी थी और हरे रंग का पठानी कुर्ता पहन रखा था हमलावरों ने उसे मार डाला. शेख के साथ जा रहे उनके रिश्ते के भाई बच गए जबकि दो दूसरे लोगों अमीन शेख (30) और एजाज युसूफ बागवान (25) को चोटें आईं. पुलिस ने पहले हमेशा की तरह इस रटे रटाए बहाने के नाम पर इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की कि हमलावर शिवाजी की मूर्ति का अपमान किए जाने और एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़कों द्वारा बलात्कार किए जाने की अफवाह के कारण वहां जमा हुए थे. मानो इससे एक बेगुनाह नौजवान की हत्या जायज हो जाती हो.

    शेख की हत्या के फौरन बाद, आनेवाले दिनों के बारे में बुरे संकेत देता हुआ एक एसएमएस भेजा गया जिसमें मराठी में कहा गया था: पहिली विकेट पडली (पहला विकेट गिर गया). इस संदेश को मद्देनजर रखें और शेख को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियारों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि यह एक योजनाबद्ध कार्रवाई थी. पुलिस ने रोकथाम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए. हालांकि उसको बस इसी का श्रेय दिया जा सकता है, खास कर संयुक्त आयुक्त संजय कुमार को, कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र सेना के प्रमुख धनंजय देसाई समेत 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनमें से 17 पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. देसाई पर शहर के विभिन्न थानों में पहले से ही दंगा करने और रंगदारी वसूलने के 23 मामले दर्ज हैं. लेकिन इस फौरी कार्रवाई को इसके मद्देनजर भी देखना चाहिए कि आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार अपना धर्मनिरपेक्ष मुखौटा दिखाने की कोशिश करेगी. लेकिन चूंकि मोदी सरकार इस पर चुप है, इसलिए संकेत अच्छे नहीं दिख रहे हैं.

    ऐसा लगता है कि खेल शुरू हो गया है. देखना यह है कि नरेंद्र मोदी इस खेल में किस भूमिका में उतरते हैं.

  • अल्पसंख्यक अधिकार और राज्य हिंसा

    शासक वर्ग के संकट के नतीजे में जिस तरह से राज्य की केंद्रीय भूमिका के साथ अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं उसमें सुभाष गाताड़े का यह लेख एक जरूरी पाठ है. यह अगस्त 2013 ‘साहित्य और मानवाधिकार’ शीर्षक पर इंग्लिश विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत व्याख्यान है.

    अगर मैं नहीं जलता
    अगर आप नहीं जलते
    हम लोग नहीं जलते
    फिर अंधेरे में उजास कौन करेगा
    – नाजिम हिकमत


    1.
    कुछ समय पहले एक अलग ढंग की किताब से मेरा साबिका पड़ा जिसका शीर्षक था ‘रायटर्स पुलिस’ जिसे ब्रुनो फुल्गिनी ने लिखा था। जनाब बुल्गिनी जिन्हें फ्रांसिसी संसद ने पुराने रेकार्ड की निगरानी के लिए रखा था, उसे अपने बोरियत भरे काम में अचानक किसी दिन खजाना हाथ लग गया जब दो सौ साल पुरानी पैरिस पुलिस की फाइलें वह खंगालने लगे। इन फाइलों में अपराधियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा लेखकों एवं कलाकारों की दैनंदिन गतिविधियों का बारीकी से विवरण दिया गया था। जाहिर था कि 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में महान लेखकों पर राजा की बारीकी निगरानी थी।

    जाहिर है कि अन्दर से चरमरा रही हुकूमत की आन्तरिक सुरक्षा की हिफाजत में लगे लोगों को यह साफ पता था कि ये सभी अग्रणी कलमकार भले ही कहानियां लिख रहे हों, मगर कुलीनों एवं अभिजातों के जीवन के पाखण्ड पर उनका फोकस और आम लोगों के जीवनयापन के मसलों को लेकर उनके सरोकार मुल्क के अन्दर जारी उथलपुथल को तेज कर रहे हैं। उन्हें पता था कि उनकी यह रचनाएं एक तरह से बदलाव के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि कानून एवं सुरक्षा के रखवालों द्वारा विचारों के मुक्त प्रवाह पर बन्दिशें लगाने के लिए की जा रही वे तमाम कोशिशें बेकार साबित हुई और किस तरह सामने आयी फ्रांसिसी क्रान्ति दुनिया के विचारशील, इन्साफपसन्द लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन कर सामने आयी।

    या आप ‘अंकल टॉम्स केबिन’ या ‘लाईफ अमंग द लोली’ नामक गुलामी की प्रथा के खिलाफ अमेरिकी लेखिका हैरिएट बीचर स्टोव द्वारा लिखे गए उपन्यास को देखें। इसवी 1852 में प्रकाशित इस उपन्यास के बारे में कहा जाता है कि उसने अमेरिका के ‘‘गृहयुद्ध की जमीन तैयार की’। इस किताब की लोकप्रियता का अन्दाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 19 वीं सदी का वह सबसे अधिक बिकनेवाला उपन्यास था। कहा जाता है कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, जिन्होंने गुलामी की प्रथा की समाप्ति के लिए चले गृहयुद्ध की अगुआई की, जब 1862 में पहली दफा हैरिएट बीचर स्टोव से मिले तो उन्होंने चकित होकर पूछा ‘‘ तो आप ही वह महिला जिन्होंने लिखे किताब ने इस महान युद्ध की नींव रखी।’

    ईमानदारी की बात यह है कि मैं कभी भी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं मगर मैं साहित्य में समाहित इस जबरदस्त ताकत का हमेशा कायल रहता हूं। यह अकारण नहीं कि पहली समाजवादी इन्कलाब के नेता लेनिन ने, लिओ टालस्टॉय को ‘रूसी क्रान्ति का दर्पण’ कहा था या उर्दू-हिन्दी साहित्य के महान हस्ताक्षर प्रेमचन्द अपनी मृत्यु के 75 साल बाद आज भी लेखकों एवं क्रान्तिकारियों द्वारा समान रूप से सम्मानित किए जाते हैं।

    और जब मैं यह विवरण पढ़ता हूं और ‘भविष्य को देखने की’ साहित्य की प्रचण्ड क्षमता का आकलन करने की कोशिश करता हूं तब यह उम्मीद करता हूं कि अब वक्त़ आ गया है कि इस स्याह दौर में साहित्य उस भूमिका को नए सिरेसे हासिल करे।

    2.

    इसमें कोई दोराय नहीं कि यह एक स्याह दौर है, अगर आप निओन साइन्स और चमक दमक से परे देखने की या हमारे इर्दगिर्द नज़र आती आर्थिक बढ़ोत्तरी के तमाम दावों के परे देखने की कोशिश करें। जनता की बहुसंख्या का बढ़ता दरिद्रीकरण और हाशियाकरण तथा अपनी विशिष्ट पहचानों के चलते होता समुदायों का उत्पीड़न अब एक ऐसी सच्चाई है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। तरह तरह के अल्पसंख्यक – नस्लीय, एथनिक, धार्मिक आदि – को दुनिया भर में बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण एशिया के इस हिस्से में स्थितियां वाकई बेहद विपरीत दिखती हैं। बहुसंख्यकवाद का उभार हर तरफ दिखाई देता है। एक दिन भी नहीं बीतता जब हम पीड़ित समुदायों पर हो रहे हमलों के बारे में नहीं सुनते। दक्षिण एशिया के इस परिदृश्य की विडम्बना यही दिखती है कि एक स्थान का पीड़ित समुदाय दूसरे इलाके में उत्पीड़क समुदाय में रूपान्तरित होता दिखता है।

    कुछ समय पहले इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि महात्मा बुद्ध के सिद्धान्त के स्वयंभू रक्षक ‘बर्मा के बिन लादेन’ में रूपान्तरित होते दिखेंगे। मुमकिन है कि आप सभी ने ‘गार्डियन’ में प्रकाशित या ‘टाईम’ में प्रकाशित उस स्टोरी को पढ़ा हो जिसका फोकस विराथू नामक बौद्ध भिक्खु पर था, जो 2,500 बौद्ध भिक्खुओं के एक मठ का मुखिया है और जिसके प्रवचनों ने अतिवादी बौद्धों को मुस्लिम इलाकों पर हमले करने के लिए उकसाया है। बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा जिन पर बहुसंख्यकवादी बौद्धों द्वारा जबरदस्त जुल्म ढाये जा रहे हैं सभी के सामने है।

    बर्मा की सीमा को लांघिये, बांगलादेश पहुंचिये और आप बिल्कुल अलग नज़ारे से रूबरू होते हैं। यहां चकमा समुदाय – जो बौद्ध हैं, हिन्दू और अहमदिया – जो मुसलमानों का ही एक सम्प्रदाय है – वे सभी इस्लामिक अतिवादियों के निशाने पर दिखते हैं। कुछ समय पहले ‘हयूमन राइटस वॉच’ ने हिन्दुओं के खिलाफ वहां जारी हिंसा के बारे में रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें उनके मकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों या मन्दिरों को जलाने का जिक्र था। यह उसी वक्त की बात है जब बांगलादेश जमाते इस्लामी के वरिष्ठ नेताओ ंके खिलाफ 1971 में किए गए युद्ध अपराधों को लेकर मुकदमे चले थे और कइयों को सज़ा सुनायी गयी थी। हालांकि वहां सत्ता में बैठे समूहों या अवाम के अच्छे खासे हिस्से ने ऐसे हमलों की लगातार मुखालिफत की है, मगर स्थितियां कब गम्भीर हो जाए इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

    पड़ोसी पाकिस्तान में इस्लामीकरण की तेज होती प्रक्रिया के अन्तर्गत न केवल हिन्दुओं, अहमदियाओं और ईसाइयों पर बल्कि शिया मुसलमानों पर भी हमले होते दिखते हैं। एक वक्त़ था जब पाकिस्तान में प्रचलित इस्लाम अपनी सूफी विरासत का सम्मान करता था, मगर स्थितियां इस मुका़म तक पहुंची है कि ऐसी सभी सूफी परम्पराएं अब निरन्तर हमले का शिकार हो रही हैं। जाने माने पाकिस्तानी विद्धान एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज हुदभॉय इसे पाकिस्तान का ‘सौदीकरण’ या ‘वहाबीकरण’ कहते हैं। सूफी मज़ारों पर आत्मघाती हमले और बसों को रोक कर हजारा मुसलमानों का कतलेआम या लड़कियों को शिक्षा देने वाले स्कूलों पर बमबारी जैसी घटनाएं अब अपवाद नहीं रह गयी हैं। ईशनिन्दा के कानून के अन्तर्गत वहां किस तरह गैरमुस्लिम को निशाने पर लिया जा रहा है और किस तरह पंजाब (पाकिस्तान) के गवर्नर सलमान तासीर को इस मानवद्रोही कानून को वापस लेने की मांग करने के लिए शहादत कूबूल करनी पड़ी, इन सभी घटनाओं के हम सभी प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं।

    ‘सार्क’ प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा मालदीव भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ता दिखता है। श्रीलंका जो तमिल विद्रोहियों की सरगर्मियों के चलते दशकों तक सूर्खियों में रहा, वह इन दिनों सिंहल बौद्ध अतिवादियों की गतिविधियों के चलते इन दिनों चर्चा में रहता है, जो वहां की सत्ताधारी तबकों के सहयोग से सक्रिय दिखते हैं। कुख्यात बोडू बाला सेना के बारे में समाचार मिलते हैं कि किस तरह वह मुस्लिम प्रतिष्ठानों पर हमले करती है, ‘पवित्रा इलाकों’ से मस्जिदों तथा अन्य धर्मों के प्रार्थनास्थलों को विस्थापित करने का निर्देश देती है, यहां तक कि उसने मुसलमानों के लिए धार्मिक कारणों से प्रिय हलाल मीट को बेचने पर भी कई स्थानों पर रोक लगायी है। बर्मा की तरह यहां पर भी मुस्लिम विरोधी खूनी मुहिम की अगुआई बौद्ध भिक्खु करते दिखते हैं।

    अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र कहलानेवाला भारत भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है।

    3.

    जहां तक अल्पसंख्यक अधिकारों का सवाल है तो यहां की परिस्थितियां भी अपने पड़ोसी मुल्कों से गुणात्मक तौर पर भिन्न नहीं हैं। संविधान को लागू करने के वक्त़ डा अम्बेडकर ने साठ साल पहले दी चेतावनी आज भी मौजूं जान पड़ती है कि एक व्यक्ति एक वोट से राजनीतिक जनतंत्रा में प्रवेश करते इस मुल्क में एक व्यक्ति एक मूल्य कायम करना अर्थात सामाजिक जनतंत्रा कायम करना जबरदस्त चुनौती वाला काम बना रहेगा।

    कई अध्ययनों और सामाजिक परिघटनाओं के अवलोकन के माध्यम से अल्पसंख्यक अधिकारों की वास्तविक स्थिति को जांचा जा सकता है। इनमें सबसे अहम है साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना। इसकी विकरालता को समझने के लिए हम साम्प्रदायिक विवाद को लेकर चन्द आंकड़ों पर निगाह डाल सकते हैं।

    केन्द्रीय गृहमंत्रालय से सम्बद्ध महकमा ब्युरो आफ पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेण्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक 1954 से 1996 के बीच हुए दंगों की 21,000 से अधिक घटनाओं में लगभग 16,000 लोग मारे गए, जबकि एक लाख से अधिक जख्मी हुए। इनमें से महज मुट्ठीभर लोगों को ही दंगों में किए गए अपराध के लिए दंडित किया गया। और हम यह नहीं भूल सकते कि यह सभी ‘आधिकारिक’ आंकड़े हैं, वास्तविक संख्या निश्चित ही काफी अधिक होगी।
    प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आयोजित सिख विरोधी जनसंहार को हम याद कर सकते हैं जब राष्ट्रीय स्तर पर सिख हमले का शिकार हुए और आधिकारिक तौर पर दिल्ली की सड़कों पर एक हजार से अधिक निरपराध – अधिकतर सिख – गले में जलते टायर डाल कर या ऐसे ही अन्य पाशवी तरीकों से मार दिए गए। हर कोई जानता है कि यह कोई स्वतःस्फूर्त हिंसा नहीं थी, वह बेहद संगठित, सुनियोजित हिंसा थी जिसमें तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के नेता शामिल थे। इसकी जांच के लिए कई आयोग बने, जिनमें सबसे पहले आयी थी ‘सिटिजन्स फार डेमोक्रेसी’ द्वारा तैयार की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट ने स्पष्टता के साथ कांग्रेस के नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था।

    क्या आज कोई यकीन कर सकता है कि दिल्ली, जो भारत जैसे सबसे बड़े जनतंत्र की राजधानी है, वह महज तीस साल पहले आधिकारिक तौर पर एक हजार से अधिक निरपराधों के – जिनका बहुलांश सिखों का था – सरेआम हत्या का गवाह बनी और आज दस जांच आयोगों और तीन विशेष अदालतों के बाद, सिर्फ तीन लोग दंडित किए जा चुके हैं और बाकी मुकदमे अभी उसी धीमी रफ्तार से चल रहे हैं, जबकि इस सामूहिक संहार के असली कर्ताधर्ता एवं मास्टरमाइंड अभी भी बेदाग घूम रहे हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम सिखों के खिलाफ हुई इस हिंसा के असली कर्णधारों को दंडित नहीं करते, वह हमारे वक्त़ के ‘हिन्दू हृदय सम्राटों’ को वैधता प्रदान करता रहेगा जिन्होंने 2002 में गुजरात की अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा को ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ के पैकेज में प्रस्तुत किया है।
    जैसे कि एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा है गुजरात 2002 की इस संगठित हिंसा के तीन विचलित करनेवाले पहलुओं को लेकर सभी की सहमति होगी। ‘‘एक यही कि यह जनसंहार शहरी भारत की हृदयस्थली में मीडिया की प्रत्यक्ष मौजूदगी में हुआ’, ‘दूसरे जिन्होंने इस जनसंहार को अंजाम दिया वह इसके तत्काल बाद इन अपराधों के चलते सत्ता में लौट सके’ और ‘तीसरे, इतने सालों के बाद भी कहीं से भी पश्चात्ताप की कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती है।’

    यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हर सम्वेदनशील, मानवीय, न्यायप्रिय व्यक्ति तथा संगठन इस समूची परिस्थिति को लेकर आंखें मूंद कर रह सकता है या चुप्पी के इस षडयंत्र को तोड़ने के लिए तैयार है। क्या हमारे स्तर पर यह मानना उचित होगा कि हम उस जनसंहार को चन्द ‘बीमार हत्यारों’, ‘कुछ धूर्त मस्तिष्कों की हरकतों’ तक सीमित रखें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों – जिन्होंने इसकी योजना बनायी और उस पर अमल किया – को बेदाग छोडें़ ?

    इस हक़ीकत को देखते हुए कि आज की तारीख में दंगा कराने का काम बकौल पाल आर ब्रास ‘संस्थागत दंगा प्रणालियों’ की अवस्था तक पहुंचा है, यह मुनासिब नहीं होगा कि हम किसी भी दंगे में स्वतःस्फूर्तता के तत्व तक अपने आप को सीमित रखें। हमें इस बात पर बार बार जोर देना पड़ेगा क्योंकि आज दंगा पीड़ितों से न्याय से बार बार इन्कार को लेकर ‘स्वतःस्फूर्तता’ का यही जुमला दोहराया जाता है। इस पहलू की चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश सुश्री इंदिरा जयसिंह ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था:

        ‘ हमारी कानूनी प्रणाली इस बुनियादी प्रश्न को सम्बोधित करने में असफल रही है: आखिर ऐसी जनहत्याओं को लेकर राज्य के मुखिया की संवैधानिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी क्या होती है’ और उनकी सिफारिश थी: ‘वे सभी जिन्होंने ऐसी हत्याओं को अंजाम दिया हो उन्हें जिम्मेदार ठहराने के अलावा, हमें उन लोगों को भी जिम्मेदार मानना होगा जिनके हाथों में सत्ता के सूत्रा रहे हैं, जो न केवल हत्याओं को रोकने में असफल रहे, बल्कि घृणा आधारित वक्तव्यों से ऐसी हत्याओं की जमींन तैयार करते हुए उन्होंने उसे समझ में आने लायक प्रतिक्रिया घोषित किया।’’

    इस समूची बहस की याद नए सिरेसे ताज़ा हो जाती है जब हम देखते हैं कि यह नेल्ली कतलेआम का इकतीसवां साल है और इस जघन्य हत्याकाण्ड के कर्ताधर्ता आज भी खुलेआम घुम रहे हैं। वह फरवरी 18, 1983 का दिन था जब हथियारबन्द समूहों ने असम के जिला नागौन में 14 गांवों में छह घण्टे के अन्दर 1,800 मुसलमानों को (गैरसरकारी आंकड़ा: 3,300) मार डाला। आज़ाद हिन्दोस्तां के धार्मिक-नस्लीय जनसंहार के इस सबसे बर्बर मामले में हमलावरों ने यह कह कर अपने हत्याकाण्ड को जायज ठहराया कि मरनेवाले सभी बांगलादेश के अवैध आप्रवासी थे। इस मामले की जांच के लिए बने आयोग – तिवारी कमीशन – की रिपोर्ट, जो ढाई दशक पहले सरकार को सौंपी गयी, आज भी वैसी ही पड़ी हुई है। उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई होना दूर रहा। और सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच वहां एक अलिखित सहमति बनी है कि इस मामले को अब खोला न जाए।

    4.

    कई तरीके हो सकते हैं जिसके माध्यम से बाहरी दुनिया के सामने भारत को प्रस्तुत किया जाता है, प्रोजेक्ट किया जाता है। कुछ लोगों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्रा है, जबकि बाकियों के लिए वह दुनिया की तेज गति से चल रही अर्थव्यवस्था है जिसका अब विश्व मंच पर ‘आगमन’ हो चुका है। लेकिन शायद ही कोई हो यह कहता है कि वह ‘जनअपराधों की भूमि’ है जहां ऐसे अपराधों के अंजामकर्ताओं को शायद ही सज़ा मिलती हो। जनमत को प्रभावित करनेवाले लोग कहीं भी उस अपवित्रा गठबन्धन की चर्चा नहीं करते हैं जो सियासतदानों, माफियागिरोहों और कानून एवं व्यवस्था के रखवालों के बीच उभरा है जहां ‘जनअपराधों को अदृश्य करने’ की कला में महारत हासिल की गयी है। और ऐसे जनअपराधों के निशाने पर – धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोग, सामाजिक श्रेणियों में सबसे नीचली कतार में बैठे लोग या देश के मेहनतकश – दिखते हैं।

    क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि 42 दलितों – जिनमें मुख्यतः महिलाएं और बच्चे शामिल थे – का आज़ाद हिन्दोस्तां का ‘पहला’ कतलेआम तमिलनाडु के तंजावुर जिले के किझेवनमन्नी में (1969) में सामने आया था जहां तथाकथित उंची जाति के भूस्वामियों ने इसे अंजाम दिया था, मगर सभी इस मामले में बेदाग बरी हुए क्योंकि अदालती फैसले में यह कहा गया कि ‘इस बात से आसानी से यकीन नहीं किया जा सकता कि उंची जाति के यह लोग पैदल उस दलित बस्ती तक पहुंचे होंगे।’ गौरतलब है कि कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में मजदूरों ने वहां हड़ताल की थी और अदालत में भले ही उन शोषितों को न्याय नहीं मिला होगा मगर वहां के संघर्षरत साथियों ने भूस्वामियों के हाथों मारे गए इन शहीदों की स्मृतियों को आज भी संजो कर रखा है, हर साल वहां 25 दिसम्बर को – जब यह घटना हुई थी – हजारों की तादाद में लोग जुटते हैं और चन्द रोज पहले यहां उनकी याद में एक स्मारक का भी निर्माण किया गया।

    अगर हम स्वतंत्र भारत के 60 साला इतिहास पर सरसरी निगाह डालें तो यह बात साफ होती है कि चाहे किझेवनमन्नी, यहा हाशिमपुरा (जब यू पी के मेरठ में दंगे के वातावरण में वहां के 42 मुसलमानों को प्रांतीय पुलिस ने सरेआम घर से निकाल कर भून दिया था 1986), ना बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बम्बई में शिवसेना जैसे संगठनों द्वारा प्रायोजित दंगों में मारे गए 1,800 लोग (जिनका बहुलांश अल्पसंख्यकों का था, 1992 और जिसको लेकर श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी है), ना ही राजस्थान के कुम्हेर में हुए दलितों के कतलेआम (1993) और न ही अतिवादी तत्वों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों के संहार (1990) जैसे तमाम मामलों में किसी को दंडित किया जा सका है। देश के विभिन्न हिस्सों में हुए ऐसे ही संहारों को लेकर ढेर सारे आंकड़े पेश किए जा सकते हैं।

    और हम यह भी देखते हैं कि उत्तर पूर्व और कश्मीर जैसे इलाकों में, दशकों से कायम सशस्त्रा बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसे दमनकारी कानूनों ने सुरक्षा बलों को एक ऐसा कवच प्रदान किया है कि मनगढंत वजहों से उनके द्वारा की जानेवाली मासूमों की हत्या अब आम बात हो गयी है। हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मणिुपर की फर्जी मुठभेड़ों को लेकर बनाए गए सन्तोष हेगडे कमीशन की रिपोर्ट हालिया रिपोर्ट पढ़ सकते हैं और जिन चुनिन्दा घटनाओं की जांच के लिए उन्हें कहा गया था उसका विवरण देख सकते हैं। बहुत कम लोग इस तथ्य को स्वीकारना चाहेंगे कि कश्मीर आज दुनिया का सबसे सैन्यीकृत इलाका है और विगत दो दशकों के दौरान वहां हजारों निरपराध मार दिए गए हैं।

    आप यह जान कर भी विस्मित होंगे कि किस तरह ऐस जनअपराधों को या मानवता के खिलाफ अपराधों को सत्ताधारी तबकों द्वारा औचित्य प्रदान किया जाता है या वैधता दी जाती है, जहां मुल्क का प्रधानमंत्राी राजधानी में सिखों के कतलेआम के बाद – जिसे उसकी पार्टी के सदस्यों ने ही अंजाम दिया – यह कहता मिले कि ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन हिलती ही है।’ या किसी राज्य का मुख्यमंत्राी उसके अपने राज्य में मासूमों के कतलेआम को न्यूटन के ‘क्रिया प्रतिक्रिया’ के सिद्धान्त से औचित्य प्रदान करे।

    ऐसे तमाम बुद्धिजीवी जो ‘हमारी महान संस्कृति’ में निहित सहिष्णुता से सम्मोहित रहते हैं और उसकी समावेशिता का गुणगान करते रहते हैं, वह यह जान कर आश्चर्यचकित होंगे कि किस तरह आम जन, अमनपसन्द कहलानेवाले साधारण लोग रातों रात अपने ही पड़ोसियों के हत्यारों या बलात्कारियों में रूपान्तरित होने केा तैयार रहते है और किस तरह इस समूचे हिंसाचार और उसकी ‘उत्सवी सहभागिता’ के बाद वही लोग चुप्पी का षडयंत्रा कायम कर लेते हैं। बिहार का भागलपुर इसकी एक मिसाल है – जहां 1989 के दंगों में आधिकारिक तौर पर एक हजार लोग मारे गए थे, जिनका बहुलांश मुसलमानों का था – जहां लोगाईं नामक गांव की घटना आज भी सिहरन पैदा करती है। दंगे में गांव के 116 मुसलमानों को मार दिया गया था और एक खेत मंे गाड़ दिया गया था और उस पर गोबी उगा दिया गया था।

    निस्सन्देह अल्पसंख्यक अधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता के तौर पर हम राज्य और दक्षिणपंथी बहुसंख्यकवादी संगठनों को देख सकते हैं मगर क्या उसे सामाजिक वैधता नहीं होती। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि एक ऐसे मुल्क में जहां अहिंसा के पुजारी की महानता का बखान करता रहता है, एक किस्म की हिंसा को न केवल ‘वैध’ समझा जाता है बल्कि उसे पवित्रता का दर्जा भी हासिल है। दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य उत्पीड़ित तबकों के खिलाफ हिंसा को प्राचीन काल से धार्मिक वैधता हासिल होती रही है और आधुनिकता के आगमन ने इस व्यापक परिदृश्य को नहीं बदला है। भारत एकमात्रा ऐसा मुल्क कहलाता है जहां एक विधवा को अपने मृत पति की चिता पर जला दिया जाता रहा है। अगर पहले कोई नवजात बच्ची को बर्बर ढंग से खतम किया जाता था आज टेक्नोलोजी के विकास के साथ इसमें परिवर्तन आया है और लोग यौनकेन्द्रित गर्भपात करवाते हैं। यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि आखिर क्यों भारत दुनिया का एकमात्रा मुल्क है जहां 3 करोड 30 लाख महिलाएं ‘गायब’ हैं। रेखांकित करनेवाली बात यह है कि ऐसी तमाम प्रथाओं एवं सोपानक्रमों की छाप – जिनका उदगम हिन्दू धर्म में दिखता है – अन्य धर्मों पर भी नज़र आती है। इस्लाम, ईसाइयत या बौद्ध धर्म में जातिभेद की परिघटना – जिसकी बाहर कल्पना नहीं की जा सकती – वह यहां मौजूद दिखती है।

    इस परिदृश्य को बदलना होगा अगर भारत एक मानवीय समाज के तौर पर उभरना चाहता है। यह चुनौती हम सभी के सामने है। अगर इस उपमहाद्वीप के रहनेवाले लोग यह संकल्प लें कि ‘दुनिया का यह सबसे बड़ा जनतंत्रा’ भविष्य में ‘जन अपराधों की भूमि’ के तौर पर न जाना जाए तो यह काम जल्दी भी हो सकता है। इसे अंजाम देना हो तो सभी न्यायप्रिय एवं अमनपसन्द लोगों एवं संगठनों को भारत सरकार को इस बात के लिए मजबूर करना होगा कि वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के जनसंहार के लिए बने कन्वेन्शन के अनुरूप अपने यहां कानून बनाए। गौरतलब है कि भारत ने इस कन्वेन्शन पर 1959 में दस्तख़त किए थे मगर उसके अनुरूप अपने यहां कानूनों का निर्माण नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जनअपराधों को लेकर न्याय करने की भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली की क्षमता हमेशा ही सन्देह के घेरे में रही है। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि उपरोक्त ‘कन्वेन्शन आन द प्रीवेन्शन एण्ड पनिशमेण्ट आफ द क्राइम आफ जीनोसाइड’ के हिसाब से जीनोसाइड अर्थात जनसंहार की परिभाषा इस प्रकार है:

        – ऐसी कोईभी कार्रवाई जिसका मकसद किसी राष्ट्रीय, नस्लीय, नृजातीय या धार्मिक समूह को नष्ट करने के इरादे से अंजाम दी गयी निम्नलिखित गतिविधियां
        क) समूह के सदस्यों की हत्या ;
        ख) समूह के सदस्यों को शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना ;
        ग) किसी समूह पर जिन्दगी की ऐसी परिस्थितियां लादना ताकि उसका भौतिक या शारीरिक विनाश हो
        घ) ऐसे कदम उठाना ताकि समूह के अन्दर नयी पैदाइशों को रोका जा सके
        च) समूह के बच्चों को जबरन किसी दूसरे समूह को हस्तांतरित करना

    हम आसानी से अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि अगर असली जनतंत्र पसन्द लोग सत्ताधारी तबकों पर हावी हो सकें तो हम जनअपराधों पर परदा डाले रखने या दंगाइयों या हत्यारों के सम्मानित राजनेताओं में रूपान्तरण को रोक सकते हैं और जनअपराधों पर परदा डालने के दोषारोपण से मुक्त हो सकते हैं।

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    हमें यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए कि साम्प्रदायिक हिंसा भले ही अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमले की सबसे क्रूर अभिव्यक्ति हो, मगर भेदभाव के बहुविध स्तर अस्तित्व में रहते हैं। मुस्लिम समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति को जानने पर केन्द्रित रही सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर सरसरी निगाह डालें – जिसे संसद के सामने नवम्बर 2006 में प्रस्तुत किया गया था – तो विचलित करनेवाली स्थिति दिखती है। शिक्षा और सरकारी रोजगार तथा विभिन्न स्तरों पर वंचना की उनकी स्थिति को रेखांकित करने के अलावा उसने दो महत्वपूर्ण तथ्यों की तरफ इशारा किया था। भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति और जनजाति की स्थिति से भी नीचे है और भले ही भारत की आबादी में मुसलमानों की तादाद 14 फीसदी हो, मगर नौकरशाही में उनका अनुपात 2.5 फीसदी ही है। उसने आवास, काम और शैक्षिक क्षेत्रा में समानता विकसित करने के लिए बहुविध सुझाव भी पेश किए थे।

    यह बात अधिक विचलित करनेवाली है कि वास्तविक व्यवहार में कुछ नहीं किया जा रहा है। नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्युरो की हालिया रिपोर्ट इस पर रौशनी डालती है, जो बताती है कि आज भले ही भारत में पुलिस की संख्या बढ़ा रहे हैं मगर जहां तक अल्पसंख्यक समुदाय के हिस्से की बात है, तो वह प्रतिशत कम हुआ है।

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    कुछ समय पहले आप सभी ने डब्लू डब्लू डब्लू गुलैल डाट कॉम पर प्रख्यात खोजी पत्रकार आशीष खेतान द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को देखा होगा जिसमें इस बात का दस्तावेजीकरण किया गया था कि ‘गोपनीय फाइलें इस तथ्य को उजागर करती हैं जिसका मुसलमानों को पहले से सन्देह रहा है: यही कि राज्य जानबूझ कर निरपराधों को आतंकवाद के आरोपों में फंसा रहा है।’ जबकि इलाकाई मीडिया में या उर्दू मीडिया में इस रिपोर्ट को काफी अहमियत मिली मगर राष्ट्रीय मीडिया ने एक तरह से खेतान के इस खुलासे को नज़रअन्दाज़ किया कि किस तरह आधे दर्जन के करीब आतंकवाद विरोधी एंजेन्सियों के आन्तरिक दस्तावेज इस बात को उजागर करते हैं कि राज्य जानबूझ कर मुसलमानों को आतंकी मामलों में फंसा रहा है और उनकी मासूमियत को परदा डाले रख रहा है।

    पत्रकार ने ‘आतंकवाद केन्द्रित तीन मामलों की-ं 7/11 टेªन बम धमाके, पुणे ; पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट ; मालेगांव धमाके 2006 जांच की है और पाया है कि इसके अन्तर्गत 21 मुसलमानों को यातनाएं दी गयीं, अपमानित किया गया और बोगस सबूतों के आधार पर उन पर मुकदमे कायम किए गए। और जब उनकी मासूमियत को लेकर ठोस सबूत पुलिस को मिले तबभी अदालत को गुमराह किया जाता रहा।’’

    हम अपने हालिया इतिहास के तमाम उदाहरणों को उदधृत कर सकते हैं जहां ऐसी आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के लिए – जिनको हिन्दुत्व आतंकियों ने अंजाम दिया था – अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को जेल में ठंूसा जाता रहा है। फिर चाहे मालेगांव 2006 के बम धमाके का मामला हो या मक्का मस्जिद धमाके की घटना हो या समझौता एक्स्प्रेस बम विस्फोट की घटना हो – हम यही देखते हैं कि इन्हें संघ के कार्यकर्ता अंजाम देते रहे – मगर दोषारोपण मुसलमानों पर होता रहा। यह भी सही है कि राज्य मशीनरी के एक हिस्से की ऐसे मामलों में संलिप्तता के बिना ऐसा सम्भव नहीं था।

    जांच एजेंसियां अब तक देश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय हिन्दुत्ववादी संगठनों को देश के अलग अलग हिस्सों में हुई बम विस्फोट की सोलह (मुख्य) घटनाओं के लिए जिम्मेदार मानती हैं। आम लोगों को लग सकता है कि ऐसे सभी बम विस्फोट राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के असन्तुष्ट तत्वों द्वारा किए गए हैं, इससे बड़ा झूठ दूसरा हो नहीं सकता।

    अगर हम विकसित होते गतिविज्ञान पर गौर करें तो पाएंगे कि यह ‘आतंकी मोड़’ एक तरह से हिन्दुत्व संगठनों द्वारा तैयार की गयी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है जब उन्होंने तय किया कि वह ‘दंगे के आतंक’ से वह अब ‘बम के आतंक’ की तरफ मुडेंगे। उन्होंने पाया कि अब पुरानी रणनीति अधिक ‘लाभदायक’ साबित नहीं हो रही हैं और नयी रणनीति अधिक उचित हैं और मुल्क में फासीवाद के निर्माण के लिए लाभदायक है।

    हम देख सकते हैं कि वह दो प्रक्रियाओं – एक राष्ट्रीय और दूसरी अन्तरराष्ट्रीय – का परिणाम है। गुजरात 2002 के जनसंहार में हिन्दुत्व ब्रिगेड की संलिप्तता की वैश्विक स्तर पर जितनी भर्त्सना हुई कि उसे दंगे की राजनीति की तरफ नये सिरेसे देखने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस बात का एहसास गहराया कि साम्प्रदायिक दंगों को अंजाम देने का वांछित राजनीतिक लाभ नहीं मिलता बल्कि साम्प्रदायिक राजनीति के माध्यम से निकले राजनीतिक लाभ अन्य कारणों से निष्प्रभावी हो जाते हैं। एक दूसरा कारक जो हिन्दुत्व ब्रिगेड की इस नयी कार्यप्रणाली के लिए अनुकूल था वह यह सहजबोध जिसका निर्माण 9/11 के बहाने अमेरिका ने किया था। ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के नाम पर अमेरिका ने जो मुहिम शुरू की थी उसमें एक विशिष्ट समुदाय और उसके धर्म – इस्लाम – को निशाना बनाया गया था।

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    ऐसे अवसर आते हैं जब आप अपने आप को बहुत निराशा की स्थिति में पाते हैं – ऐसी स्थिति जब धरती के इस हिस्से में रहनेवाले हर शान्तिकामी एवं न्यायप्रिय व्यक्ति के सामने आयी वर्ष 2002 में उपस्थित हुई थी जब हम सूबा गुजरात में सरकार की शह या अकर्मण्यता से सामने आ रहे जनसंहार से रूबरू थे। आज़ाद हिन्दोस्तां के इतिहास का वह सबसे पहला टेलीवाइज्ड दंगा अर्थात टीवी के माध्यम से आप के मकानों तक चौबीसों घण्टे ‘सजीव’ पहुंचनेवाला दंगा था।
    अगर भारत सरकार ने जीनोसाइड कन्वेन्शन अर्थात जनसंहार कन्वेन्शन पर दस्तखत किए होते तो हिंसा के अंजामकर्ता या जिनकी संलिप्तता के चलते दंगे हो सके उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के लिए सलाखों के पीछे डाला जाता। समय का बीतना और शान्ति का कायम हो जाना इस सच्चाई को नकार नहीं सकता कि आज भी वहां न्याय नहीं हो सका है।

    बदले हुए हालात पर गौर करें। एक ऐसा शख्स – जिसने आधुनिक नीरो की तर्ज पर इन ‘दंगों’ को होने दिया वह आज की तारीख में ‘विकास पुरूष’ में रूपान्तरित हुआ दिखता है और उसके नए पुराने मुरीद उसे ही देश के भविष्य का नियन्ता बनाने के लिए आमादा हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इस मुल्क का चुनावी गतिविज्ञान इस तरह आगे बढ़े कि यह शख्स भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे। मुमकिन है कि एक अधिक समावेशी, अधिक सहिष्णु, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक शान्तिप्रिय मुल्क बनाने की हमारी ख्वाहिशें, हमारी आकांक्षाएं और हमारी कोशिशें फौरी तौर पर असफल हों।

    क्या हमें इस परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिए और अपनी ‘नियति’ के प्रति समर्पण करना चाहिए।

    निश्चितही नहीं।

    इसका अर्थ होगा जनतंत्र के बुनियादी सिद्धान्तों को बहुसंख्यकवाद के दहलीज पर समर्पित करना। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत के शासन के अलावा जनतंत्रा का मतलब होता है, अल्पमत के जीवन के अधिकारों एवं मतों की सुरक्षा और अधिक महत्वपूर्ण, यह कानूनी सम्भावना कि आज का राजनीतिक अल्पमत भविष्य में चुनावी बहुमत हासिल करेगा और इस तरह शान्तिपूर्ण तरीके से व्यवस्था को बदल देगा।

    यह वर्ष 2001 का था जब नार्वे में अफ्रीकी नार्वेजियन किशोर बेंजामिन हरमानसेन की नवनात्सी गिरोह ने हत्या की, जो उस मुल्क के इतिहास की पहली ऐसी हत्या थी। आगे जो कुछ हुआ उसकी यहां कल्पना करना भी सम्भव नहीं होगा। अगले ही दिन दसियांे हजार नार्वे के निवासी राजधानी ओस्लो की सड़कों पर उतरे और उन्होंने किशोर को न्याय दिलाने की मांग की और इस विशाल प्रदर्शन की अगुआई नार्वे के प्रधानमंत्राी जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने की जिन्होंने यही कहा: ‘यह हमारा तरीका नहीं है ; अपने समाज में नस्लीय अपराधों के लिए कोई स्थान नहीं है।’’ एक साल के अन्दर पांच सदस्यीय पीठ ने दो हमलावरों को दोषी ठहराया और उन्हें 15 साल की सज़ा सुनायी।

    ‘‘यह हमारा तरीका नहीं है…।’’

    मुझे यह किस्सा तब याद आया जब नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्राी डा अमर्त्य सेन, भारत की सरजमीं पर यहां के नवनात्सी समूहों के निशाने पर आए जब उन्होंने कहा कि वह मोदी के देश का प्रधानमंत्राी बनने के हक में नहीं हैं क्यांेकि उनके शासन में धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं होंगे। अधिकतर लोगों ने डा सेन के वक्तव्य को गौर से नहीं पढ़ा होगा: ‘‘मुझे लगा कि बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है, न केवल मेरा अधिकार, कि मैं अल्पसंख्यकों के सरोकारों पर बात करूं। अक्सर बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा होने के नाते हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं।’’
    हमारी अपनी आंखों के सामने जनतंत्रा को खोखला करने की इन तमाम कोशिशों पर हमें गौर करना ही होगा।

    अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षित करने में अहमियत इस बात की होगी कि हम जनतंत्र के बुनियादी मूल्य को अपनाएं और तहेदिल से उस पर अमल करे ताकि हम ऐसे शासन का निर्माण कर सकें जहां धर्म और राजनीति में स्पष्ट फरक हो। राज्य की धर्मनिरपेक्षता और नागरिक समाज का धर्मनिरपेक्षताकरण हमारा सरोकार बनना चाहिए।

    दोस्त अक्सर मुझे पूछते हैं कि आप क्यों जनतंत्र को गहरा करने और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने पर जोर देते हो। इसका एकमात्रा कारण यही है कि जिस दिन हम अपने इस ‘ध्रुवतारे’ को भूल जाएंगे, फिर वह दिन दूर नहीं होगा जब हम भी अपने पड़ोसी मुल्क के नक्शेकदम पर चलेंगे जिसने राष्ट्र के आधार के तौर पर धर्म को चुना और जो आज विभिन्न आंतरिक कारणों से अन्तःस्फोट का शिकार होता दिख रहा है।

    8.

    जब हमारे इर्दगिर्द ऐसे हालात हों और आप के इर्दगिर्द खड़ी उन्मादी भीड़ किसी नीरो को अपना नेता मानने के लिए आमादा हो तब उम्मीद के सोतों के लिए कहां देखा जा सकता है ?

    साहित्य ही ऐसा स्त्रोत हो सकता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि उसी ने लोगों को शीतनिद्रा से जगाने का काम किया है और उनमें बड़े बड़े दुश्मनों को ललकारने की हिम्मत पैदा की है।

    मैं अपनी प्रस्तुति को फ्रांसिसी इतिहास के एक प्रसंग से समाप्त करना चाहूंगा जिसे ‘द्रेफ्यू काण्ड’ कहा जाता है। वह 1890 का दौर था जब फ्रांस में एक यहुदी सैन्य अधिकारी द्रेफ्यू को ‘देशद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार कर सेण्ट हेलेना द्वीप भेज दिया गया था। उसे तब गिरफ्तार किया गया था जब वह अपने बच्चे के साथ खेल रहा था। पुलिस ने उसके खिलाफ इतना मजबूत मामला बनाया था कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इससे उसे जिन्दगी भर जेल में ही रहना पड़ेगा।

    संयोग की बात कही जा सकती है कि महान फ्रांसिसी लेखक एमिल जोला ने इस काण्ड के बारे में जाना और इस घटना को लेकर अख़बारों में लेखमाला लिखी जिसका शीर्षक था ‘आई एक्यूज’ अर्थात ‘मेरा आरोप है’ जिसमें यहुदी सैन्य अधिकारी की मासूमियत को रेखांकित किया गया था और यहभी बताया गया था कि किस तरह वह एक साजिश का शिकार हुए। े उपरोक्त लेख में जोला ने यह भी बताया कि द्रेफ्यू के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करनेवाले सभी लोग किस तरह ‘यहुदियों से घृणा’ करते थे। लेखों की इस श्रृंखला का असर यह हुआ कि द्रेफ्यू को रिहा करने की मुहिम अधिक तेज हुई और सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा।

    क्या अब वक्त़ नहीं आया है कि आतंकवाद के फर्जी आरोपों को लेकर आज जो तमाम द्रेफ्यू जेल में हैं या अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले तेज हो रहे हैं, उस परिस्थिति में साहित्य के रचयिता और विद्यार्थी एक सुर में अपनी आवाज़ बुलन्द करें और कहें ‘आई एक्यूज’।

  • बस, बहुत हो चुका: आनंद तेलतुंबड़े का नया लेख

    आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख एक बेशर्म और बेपरवाह राष्ट्र को संबोधित है. एक ऐसे राष्ट्र को संबोधित है जो अपने ऊपर थोप दी गई अमानवीय जिंदगी और हिंसक जातीय उत्पीड़नों को निर्विकार भाव से कबूल करते हुए जी रहा है. यह लेख बदायूं में दो दलित किशोरियों के बलात्कार और हत्या के मामले से शुरू होता है और राज्य व्यवस्था, पुलिस, कानून और इंसाफ दिलाने वाले निजाम तक के तहखानों में पैवस्त होते हुए उनके दलित विरोधी अपराधी चेहरे को उजागर करता है. मूलत: द हिंदू में प्रकाशित इस लेख के साथ इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में छपे उनके मासिक स्तंभ मार्जिन स्पीक का ताजा अंक भी पढ़ें. अनुवाद रेयाज उल हक

    यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा गांव की है. इसमें दो दलित लड़कियों की लाश पेड़ से टंगी हुई है और तमाशबीनों की एक भीड़ हैरानी से खड़ी देख रही है. यह तस्वीर हमारे राष्ट्रीय चरित्र को सबसे अच्छे तरीके से बयान करती है. हम कितना भी अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं, किसी भी हद की नाइंसाफी सह सकते हैं, और पूरे सब्र के साथ अपने आस पास के किसी भी फालतू बात को कबूल कर सकते हैं. यह कहने का कोई फायदा नहीं कि वे लड़कियां हमारी अपनी बेटियां और बहनें थीं, हम तब भी इसी तरह हैरानी और निराशा से भरे हुए उन्हें उसी तरह ताकते रहे होते, जैसी भीड़ में दिख रहे लोग ताक रहे हैं. सिर्फ पिछले दो महीनों में ही, जबकि हमने एक देश के रूप में नरेंद्र मोदी और अच्छे दिनों के उसके वादे पर अपना वक्त बरबाद किया, पूरे देश में दलित किशोरों और किशोरियों के घिनौने बलात्कारों और हत्याओं की एक बाढ़ सी आ गई.

    लेकिन इस फौरन उठने वाले गुस्से से अलग, इन उत्पीड़नों के लिए सचमुच की कोई चिंता मुश्किल से ही दिखती है. शासकों को इससे कोई सरोकार नहीं है, मीडिया की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, और फिर इसको लेकर प्रगतिशील तबका उदासीन है और खुद दलितों में भी ठंडा रवैया दिख रहा है. यह शर्मनाक है कि हम दलितों के बलात्कार और हत्या को इस तरह लेते हैं कि वे हमारे सामाजिक ताना-बाने का अटूट हिस्सा हैं और फिर हम उन्हें भुला देते हैं.

    मनु का फरमान नहीं हैं बलात्कार

    जब भी हम जातियों की बातें करते हैं, तो हम शतुरमुर्ग की तरह एक मिथकीय अतीत की रेत में अपना सिर धंसा लेते हैं और अपने आज के वक्त से अपनी आंखें मूंद लेते हैं. हम पूरी बात को आज के वक्त से काट देते हैं, जिसमें समकालीन जातियों का ढांचा कायम है और अपना असर दिखा रहा है. यानी हम ठोस रूप से आज के बारे में बात करने की बजाए अतीत के किसी वक्त के बारे में बातें करने लगते हैं. आज जितने भी घिसे पिटे सिद्धांत चलन में हैं वे या तो यह सिखाते हैं कि चुपचाप बैठे रहो और कुछ मत करो या फिर वे जाति की पहचान का जहर भरते हैं – जो कि असल में एक आत्मघाती प्रवृत्ति है. वे हमारे शासकों को उनकी चालाकी से भरी नीतियों के अपराध से बरी कर देते हैं जिन्होंने आधुनिक समय में जातियों को जिंदा बनाए रखा है. यह सब सामाजिक न्याय के नाम पर किया गया. संविधान ने अस्पृश्यता को गैरकानूनी करार दिया, लेकिन जातियों को नहीं. स्वतंत्रता के बाद शासकों ने जातियों को बनाए रखना चाहा, तो इसकी वजह यह नहीं थी कि वे सामाजिक न्याय लाना चाहते थे बल्कि वे जानते थे कि जातियों में लोगों को बांटने की क्षमता है. बराबरी कायम करने की चाहत रखने वाले एक देश में आरक्षण एक ऐसी नीति हो सकता है, जिसका इस्तेमाल असाधारण मामले में, अपवाद के रूप में किया जाए. औपनिवेशिक शासकों ने इसे इसी रूप में शुरू किया था. 1936 में, अनुसूचित जातियां ऐसा ही असाधारण समूह थीं, जिनकी पहचान अछूत होने की ठोस कसौटी के आधार पर की गई थी. लेकिन संविधान लिखे जाने के दौरान इसका दायरा बढ़ा दिया गया, जब पहले तो एक बेहद लचर कसौटी के आधार पर एक अलग अनुसूची बना कर इसको आदिवासियों तक विस्तार दिया गया और फिर बाकी उन सबको इसमें शामिल कर लिया गया, जिनकी पहचान राज्य द्वारा ‘शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों’ के रूप में की जा सकती हो. 1990 में मंडल आरक्षणों को लागू करते हुए इस बाद वाले विस्तार का इस्तेमाल हमारे शासकों ने बेहद सटीक तरीके से किया, जब उन्होंने जातिवाद के घोड़े को बेलगाम छोड़ दिया.

    उनके द्वारा अपनाई गई इन और ऐसी ही दूसरी चालाकी भरी नीतियों ने उस आधुनिक शैतान को पैदा किया है जो दलितों के जातीय उत्पीड़न का सीधा जिम्मेदार है. समाजवाद की लफ्फाजी के साथ शासक वर्ग देश को व्यवस्थित रूप से पूंजीवाद की तरफ ले गया. चाहे वह हमारी पहली पंचवर्षीय योजना के रूप में बड़े पूंजीपतियों द्वारा बनाई गई बंबई योजना (बॉम्बे प्लान) को अपना कर यह दिखावा करना हो कि भारत सचमुच में समाजवादी रास्ते पर चल रहा है, या फिर सोचे समझे तरीके से किए गए आधे अधूरे भूमि सुधार हों या फिर हरित क्रांति की पूंजीवादी रणनीति को सब जगह लागू किया जाना हो, इन सभी ने भारी आबादी वाले शूद्र जाति समूहों में धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया जिनकी भूमिका केंद्रीय पूंजीपतियों के देहाती सहयोगी की थी. अब तक जमींदार ऊंची जातियों से आते थे, लेकिन अब उनकी जगह इन धनी किसानों ने ले ली, और उनके हाथ में ब्राह्मणवाद की पताका थी. दूसरी तरफ, अंतरनिर्भरता बनाए रखने वाली जजमानी प्रथाओं के खत्म होने से दलित ग्रामीण सर्वहारा बनकर और अधिक असुरक्षित हो गए. वे अब धनी किसानों से मिलने वाली खेतिहर मजदूरी पर निर्भर हो गए थे. जल्दी ही इससे मजदूरी को लेकर संघर्ष पैदा हुए जिनको कुचलने के लिए सांस्कृतिक रूप से उजड्ड जातिवाद के इन नए पहरेदारों ने भारी आतंक छेड़ दिया. इस कार्रवाई के लिए उन्होंने जाति और वर्ग के एक अजीब से मेल का इस्तेमाल किया. तमिलनाडु में किल्वेनमनी में 1968 में रोंगटे खड़े कर देने वाले उत्पीड़न से शुरू हुआ यह सिलसिला आज नवउदारवाद के दौर में तेज होता गया है. जो शूद्र जोतिबा फुले के विचारों के मुताबिक दलितों (अति-शूद्रों) के संभावित सहयोगी थे, नए शासकों की चालाकी भरी नीतियों ने उन्हें दलितों का उत्पीड़क बना दिया.

    उत्पीड़न को महज आंकड़ों में न देखें

    ‘‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. यहां तक कि शेयर बाजार सूचकांकों तक में उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन दलितों पर उत्पीड़न में केवल इजाफा ही होता है. लेकिन तब भी ये बात हमें शर्मिंदा करने में नाकाम रहती है. हम अपनी पहचान बन चुकी बेर्शमी और बेपरवाही को ओढ़े हुए अपने दिन गुजारते रहते हैं, कभी कभी हम कठोर कानूनों की मांग कर लेते हैं – यह जानते हुए भी कि इंसाफ देने वाले निजाम ने उत्पीड़न निरोधक अधिनियम को किस तरह नकारा बना दिया है. जबसे ये अधिनियम लागू हुआ, तब से ही जातिवादी संगठन इसे हटाने की मांग करते रहे हैं. मिसाल के लिए महाराष्ट्र में शिव सेना ने 1995 के चुनावों में इसे अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बनाया था और महाराष्ट्र सरकार ने अधिनियम के तहत दर्ज किए गए 1100 मामले सचमुच वापस भी ले लिए थे.

    दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामलों को इस अधिनियम के तहत दर्ज करने में भारी हिचक देखने को मिलती है. यहां तक कि खैरलांजी में, जिसे एक आम इंसान भी जातीय उत्पीड़न ही कहेगा, फास्ट ट्रैक अदालत को ऐसा कोई जातीय कोण नहीं मिला कि इस मामले में उत्पीड़न अधिनियम को लागू किया जा सके. खैरलांजी में एक पूरा गांव दलित परिवार को सामूहिक रूप से यातना देने, बलात्कार करने और एक महिला, उसकी बेटी और दो बेटों की हत्या में शामिल था, महिलाओं की बिना कपड़ों वाली लाशें मिली थीं जिन पर हमले के निशान थे, लेकिन इन साफ तथ्यों के बावजूद सुनवाई करने वाली अदालत ने नहीं माना कि यह कोई साजिश का मामला था या कि इसमें किसी महिला की गरिमा का हनन हुआ था. यहां तक कि उच्च न्यायालय तक ने इस घटिया राय को सुधारने के लायक नहीं समझा. उत्पीड़न के मामलों में इंसाफ का मजाक उड़ाए जाने की मिसालें तो बहुतेरी हैं. इंसाफ दिलाने का पूरा निजाम, पुलिस से लेकर जज तक खुलेआम असंगतियों से भरा हुआ है. किल्वेनमनी के पहले मामले में ही, जहां 42 दलित मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धनी जमींदार, जिनके पास कारें तक हैं, ऐसा जुर्म नहीं कर सकते और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया. रही पुलिस तो उसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा. ज्यादातर पुलिसकर्मी तो वर्दी वाले अपराधी हैं. वे उत्पीड़न के हरेक मामले में दलितों के खिलाफ काम करते हैं. चाहे वो खामियों से भरी हुई जांच हो और/या आधे-अधूरे तरीके से की गई पैरवी हो, संदेह का दायरा अदालतों के इर्द गिर्द भी बनता है जिन्होंने मक्कारी से भरे फैसलों का एक सिलसिला ही बना रखा है. हाल में, पटना उच्च न्यायालय ने अपने यहां चल रहे दलितों के जनसंहार के मामलों में एक के बाद एक रणवीर सेना के सभी अपराधियों को बरी करके दुनिया को हैरान कर दिया. हैदराबाद उच्च न्यायालय ने भी बदनाम सुंदुर मामले में यही किया, जिसमें निचली अदालतों ने सभी दोषियों को रिहा कर दिया था.

    अपराधियों का हौसला बढ़ाया जाता है

    इंसाफ देने वाले निजाम द्वारा कायम की गई इस परिपाटी ने अपराधियों का हौसला ही बढ़ाया है कि वे दलितों के खिलाफ किसी भी तरह का उत्पीड़न कर सकते हैं. वे जानते हैं कि उनको कभी सजा नहीं मिलेगी. पहले तो वे यह देखते हैं कि जो दलित अपने अस्तित्व के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं, वे यों भी उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. इस तरह उत्पीड़न के अनेक मामले तो कभी सामने तक नहीं आ पाते हैं, जिनमें से ज्यादातर दूर दराज के देहाती इलाकों में होते हैं. और अगर किसी तरह उत्पीड़न का कोई मामला दबाया नहीं जा सका, तो असली अपराधी तो पुलिस की गिरफ्त से बाहर ही रहते हैं और न्यायिक प्रक्रिया के लपेटे में उनके छुटभैए मातहत आते हैं. पुलिस बहुत कारीगरी से काम करती है जिसमें वह जानबूझ कर जांच में खामियां छोड़ देती है, मामले की पैरवी के लिए किसी नाकाबिल वकील को लगाया जाता है और आखिर में एक पक्षपात से भरे फैसले के साथ मामला बड़े बेआबरू तरीके से खत्म होता है. यह पूरी प्रक्रिया अपराधियों को काफी हौसला देती है.

    क्या भगाना के उन बलात्कारियों के दुस्साहस का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिन्होंने 13 से 18 साल की चार दलित किशोरियों का क्रूरता से पूरी रात सामूहिक बलात्कार किया और फिर पड़ोस के राज्य में ले जाकर उन्हें झाड़ियों में फेंक आए और इसके बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि सबकुछ रफा दफा हो जाएगाॽ जो लड़कियां अपने अपमान को चुनौती देते हुए राजधानी में अपने परिजनों के साथ महीने भर से इंसाफ की मांग करते हुए बैठी हैं और कोई उनकी खबर तक नहीं ले रहा है, क्या इसकी कल्पना की जा सकती है कि यह सब उन्हें कितना दर्द पहुंचा रहा होगाॽ क्या हम देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके के छुपे हुए जातिवाद की कल्पना कर सकते हैं, जिसने एक गैर दलित लड़की के बलात्कार और हत्या पर राष्ट्रव्यापी गुस्से की लहर पैदा कर दी थी, उसे निर्भया नाम दिया था, लेकिन वो भगाना की इन लड़कियों की पुकार पर चुप्पी साधे हुए हैॽ महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के खरडा गांव के 17 साल के दलित स्कूली लड़के नितिन को जब दिनदहाड़े पीट-पीट कर मारा जा रहा था – सिर्फ इसलिए कि उसने एक ऐसी लड़की से बात करने का साहस किया था जो एक प्रभुत्वशाली जाति से आती है – तो क्या उस लड़के और उसके गरीब मां-बाप की तकलीफों की कल्पना की जा सकती है, जिनका वह इकलौता बेटा थाॽ और क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि इन दो बेगुनाह लड़कियों पर क्या गुजरी होगी, जिनके साथ अपराधियों ने रात भर बलात्कार किया और फिर पेड़ पर लटका कर मरने के लिए छोड़ दियाॽ और मामले यहीं खत्म नहीं होते. पिछले दो महीनों में इन दोनों राज्यों में उत्पीड़न के ऐसे ही अनगिनत मामले हुए, लेकिन उन्हें मीडिया में जगह नहीं मिली. क्या यह कल्पना की जा सकती है कि अपराधी बिना राजनेताओं की हिमायत के ऐसे घिनौने अपराध कर सकते हैंॽ इन सभी मामलों में राजनीतिक दिग्गज अपराधियों का बचाव करने के लिए आगे आए: हरियाणा में कांग्रेस के दिग्गजों ने, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दिग्गजों ने और महाराष्ट्र में एनसीपी के दिग्गजों ने अपराधियों का बचाव किया.

    अमेरिका में काले लोगों को पीट-पीट कर मारने की घटनाओं के जवाब में काले नौजवानों ने बंदूक उठा ली थी और गोरों को सिखा दिया था कि कैसे तमीज से पेश आया जाए. क्या जातिवादी अपराधी यह चाहते हैं कि भारत में इस मिसाल को दोहराया जाएॽ

  • गुंडों की सल्तनत का महापर्व: आनंद तेलतुंबड़े

    आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख दलितों की जिंदगी के एक ऐसे सफर पर ले चलता है, जहां हिंसक उत्पीड़नों, हत्याओं और बलात्कारों को उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बना दिया गया है. अनुवाद रेयाज उल हक.

    एक तरफ जब मीडिया में लोकतंत्र के महापर्व की चकाचौंध तेज हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ देश के 20.1 करोड़ दलितों को अपने अस्तित्व के एक और रसातल से गुजरने का अनुभव हुआ. उन्होंने शैतानों और गुंडों की सल्तनत का महापर्व देखा. बहरहाल, उनके लिए लोकतंत्र बहुत दूर की बात रही है. इस अजनबी तमाशे में वे यह सोचते रहे कि क्या उन्हें इस देश को अब भी अपना देश कहना चाहिएॽ

    ‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में जो बात परेशान करती है वह देश की समझदार आबादी का दोमुहांपन है. यह वो तबका है जिसने डेढ़ साल पहले नोएडा की एक लड़की के क्रूर बलात्कार पर तूफान मचा दिया था, और इसकी तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन उसने हरियाणा के जाटलैंड में चार नाबालिग दलित लड़कियों के बलात्कार पर या फिर ‘फुले-आंबेडकर’ के महाराष्ट्र में एक दलित स्कूली छात्र की इज्जत के नाम पर हत्या पर चुप्पी साध रखी है. इस चुप्पी की अकेली वजह जाति है, इसके अलावा इसे किसी और तरह से नहीं समझा जा सकता. अगर देश के उस छोटे से तबके की यह हालत है, जिसे संवेदनशील कहा जा सकता है, तब दलित जनता बेवकूफी और उन्माद के उस समुद्र से क्या उम्मीद कर सकती है, जिसमें जाति और संप्रदाय का जहर घुला हुआ हैॽ

    भगाना की असली निर्भयाएं

    भगाना हरियाणा में हिसार से महज 13 किमी दूर एक गांव है जो राष्ट्रीय राजधानी से मुश्किल से तीन घंटे की दूरी पर है. 23 मार्च को यह गांव उन बदनाम जगहों की लंबी फेहरिश्त में शामिल हो गया, जहां दलितों पर भयानक उत्पीड़न हुए हैं. उस दिन शाम को जब चार दलित स्कूली छात्राएं – मंजू (13), रीमा (17), आशा (17) और रजनी (18) – अपने घरों के पास खेत में पेशाब करने गई थीं तो प्रभुत्वशाली जाट जाति के पांच लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. उन्होंने उन लड़कियों को नशीली दवा खिला कर खेतों में उनके साथ बलात्कार किया और फिर उन्हें कार में उठा कर ले गए. शायद उनके साथ रात भर बलात्कार हुआ और फिर उन्हें सीमा पार पंजाब के भटिंडा रेलवे स्टेशन के बाहर झाड़ियों में छोड़ दिया गया. जब उनके परिजनों ने गांव के सरपंच राकेश कुमार पंगल से संपर्क किया, जो अपराधियों का रिश्तेदार भी है, तो वह उन्हें बता सकता था कि लड़कियां भटिंडा में हैं और उन्हें अगले दिन ले आया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारी नशीली दवाओं के असर में और गहरी वेदना के साथ लड़कियां अगली सुबह झाड़ियों में जगीं और मदद के लिए स्टेशन तक गईं, लेकिन उन्हें दोपहर बाद 2.30 बजे तक इसके लिए इंतजार करना पड़ा जब राकेश और उसके चाचा वीरेंदर लड़कियों के परिजनों के साथ वहां पहुंचे. लौटते वक्त परिजनों को ट्रेन से भेज दिया गया और लड़कियों को कार में बिठा कर भगाना तक लाया गया. रास्ते में राकेश ने उनके साथ गाली-गलौज और बदसलूकी की, उन्हें पीटा और धमकाते हुए मुंह बंद रखने को कहा. जब वे गांव पहुंचे तो दलित लड़को ने कार को घेर लिया और लड़कियों को सरपंच के चंगुल से निकाला. अगले दिन लड़कियों को मेडिकल जांच के लिए हिसार के सदर अस्पताल ले जाया गया. वहां सुबह से दोपहर बाद डेढ़ बजे तक जांच चली, जो समझ में न आने वाली बात थी. लड़कियों ने बताया कि डॉक्टरों ने कौमार्य की जांच के लिए टू फिंगर टेस्ट जैसा अपमानजनक तरीक अपनाया जिसकी इतनी आलोचना हुई है और सरकार ने बलात्कार के मामले में इसका इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा रखा है. 200 से ज्यादा दलित कार्यकर्ताओं के दबाव और मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद सदर हिसार पुलिस थाना ने (एससी/एसटी) उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की. हालांकि लड़कियों द्वारा दिए गए बयान में राकेश और वीरेंदर का नाम होने के बावजूद उनको इससे बाहर रखा.

    ऐसा हिला देने वाला अपराध भी पुलिस को कार्रवाई करने के लिए कदम उठाने में नाकाम रहा. खैरलांजी की तरह, जब हिसार मिनी सेक्रेटेरिएट पर 120 से ज्यादा दलित जुटे और जनता का गुस्सा भड़क उठा तथा शिकायतकर्ता लड़कियों के साथ भगाना के 90 दलित परिवार दिल्ली में जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से धरना पर बैठे तब हरियाणा पुलिस हरकत में आई और उसने 29 अप्रैल को पांच बलात्कारियों – ललित, सुमित, संदीप, परिमल और धरमवीर – को गिरफ्तार किया. दलित परिवार इंसाफ मांगने के मकसद से दिल्ली आए हैं, लेकिन इसके साथ साथ एक और वजह है. वे गांव नहीं लौट सकते क्योंकि उन्हें डर है कि बर्बर जाट उनकी हत्या कर देंगे. इन दलित मांगों को सुनने और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के बजाए हिसार जिला अदालत अपराधियों को रिहा करने के मामले को देख रही है. हालांकि ये बहादुर लड़कियां, असली निर्भयाएं, खुद अपनी आपबीती जनता के सामने रख रही हैं, लेकिन दिलचस्प रूप से मीडिया ने बलात्कार से गुजरने वाली महिलाओं की पहचान को सार्वजनिक नहीं करने के कायदे का पालन नहीं किया, जैसा कि उसने गैर दलित ‘निर्भयाओं’ के साथ बेहद सतर्कता के साथ किया था. राजनेताओं के बकवास बयानों से तिल का ताड़ बनाने में जुटे मीडिया ने इन परिवारों द्वारा किए जा रहे विरोध की खबर को दिखाने के लायक तक नहीं समझा – एक अभियान शुरू करने की तो बात ही छोड़ दीजिए, जैसा उसने उन ज्यादातर बलात्कार मामलों में किया है, जिनमें बलात्कार की शिकार कोई गैर दलित होती है. ऐसी भाषा में बात करने से नफरत होती है, लेकिन उनका व्यवहार इसी भाषा की मांग करता है.

    दिसंबर 2012 में जारी की गई पीयूडीआर की जांच रिपोर्ट इसके काफी संकेत देती है कि भगाना बलात्कार महज अमानवीय यौन अपराध भर नहीं है बल्कि ये दलितों को सबक सिखाने के उपाय के बतौर इस्तेमाल किया गया है. वहां दलित परिवार जाटों द्वारा अपनी जमीन, पानी और श्मशान भूमि पर कब्जा कर लेने और अलग अलग तरीकों से उन्हें उत्पीड़ित करने के खिलाफ विरोध कर रहे थे.

    महाराष्ट्र के चेहरे पर एक और दाग

    हरियाणा की घिनौनी खाप पंचायतों वाले जाट इज्जत के नाम पर हत्या के लिए बदनाम हैं, लेकिन फुले-शाहूजी-आंबेडकर की विरासत का दावा करने वाले सुदूर महाराष्ट्र में एक गरीब दलित परिवार से आने वाले 17 साल के स्कूली लड़के को आम चुनावों की गहमागहमी के बीच 28 अप्रैल को एक मराठा लड़की से बाद करने के लिए दिन दहाड़े बर्बर तरीके से मार डाला गया. यह दहला देने वाली घटना अहमदनगर जिले के खरडा गांव में हुई. फुले का पुणे यहां से महज 200 किमी दूर है, जहां से उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ विद्रोह की चिन्गारी सुलगाई थी. दलित अत्याचार विरोधी क्रुति समिति की एक जांच रिपोर्ट ने उस क्रूर तरीके के बारे में बताया है, जिससे गांव के सिरे पर एक टिन की झोंपड़ी में रहने वाले और एक छोटे से मिल में पत्थर तोड़ कर गुजर बसर करने वाले भूमिहीन दलित दंपती राजु और रेखा आगे से उनके बेटे को छीन लिया गया. नितिन आगे को गांव के एक संपन्न और सियासी रसूख वाले मराठा परिवार से आनेवाले सचिन गोलेकर (21) और उसके दोस्त और रिश्तेदर शेषराव येवले (42) ने पीट पीट कर मार डाला. नितिन को स्कूल में पकड़ा गया, उसके परिसर में ही उसे निर्ममता से पीटा गया, फिर उसे घसीट पर गोलेकर परिवार के ईंट भट्ठे पर ले आया गया, जहां उनकी गोद और पैंट में अंगारे रखकर उसे यातना दी गई और फिर उनकी हत्या कर दी गई. इसके बाद उसका गला घोंट दिया गया, ताकि इसे आत्महत्या के मामले की तरह दिखाया जा सके. नितिन से प्यार करने वाली गोलेकर परिवार की लड़की के बारे में खबर आई कि उसने आत्महत्या करने की कोशिश की और ऐसी आशंका जताई जा रही है उसे भी जाति की बलिवेदी पर नितिन के अंजाम तक पहुंचा दिया गया.

    स्थानीय दलित कार्यकर्ताओं के दबाव में, अगले दिन नितिन की लाश की मेडिकल जांच के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया जिसमें उसने आरोपितों पर हत्या करने, सबूत गायब करने, गैरकानूनी जमावड़े और दंगा करने का आरोप लगाया है. यह मामला भारतीय दंड विधान के तहत और उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम की धारा 3(2)(5) और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 7 (1)(डी) के तहत भी दर्ज किया गया है. पुलिस ने सभी 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है, जिसमें दोनों मुख्य अपराधी और एक नाबालिग लड़का शामिल है. लेकिन दलित अब यह जानते हैं कि दलितों के खिलाफ किए गए अपराध के लिए देश में संपन्न ऊंची जाति के किसी भी व्यक्ति को अब तक दोषी नहीं ठहराया गया है. अपनी दौलत के बूते और सबसे विवेकहीन पार्टी में – जिसका नाम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) है – अपनी पहुंच के बूते गोलेकर परिवार को शायद जेल में बहुत दिन नहीं बिताने पड़ेंगे. आखिरकार एनसीपी के दिग्गजों के रोब-दाब वाले इस अकेले जिले में ही, हाल के बरसों में हुए खून से सने जातीय उत्पीड़न के असंख्य मामलों में क्या हुआॽ नवसा तालुका के सोनाई गांव के तीन दलित नौजवानों संदीप राजु धनवार, सचिम सोमलाल धरु और राहुल राजु कंदारे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने ‘इज्जत’ के नाम पर उनकी हत्या की थीॽ धवलगांव की जानाबाई बोरगे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने बोरगे को 2010 में जिंदा जला दिया थाॽ उन लोगों का क्या हुआ जिन्होंने 2010 सुमन काले का बलात्कार करने के बाद उनकी हत्या कर दी थी या फिर उनका जिन्होंने वालेकर को मार कर उनकी देह के टुकड़े कर दिए थे, या 2008 में बबन मिसाल के हत्यारों का क्या हुआॽ यह अंतहीन सूची हमें बताती है कि इनमें से हरेक उत्पीड़न में असली अपराधी कोई धनी और ताकतवर इंसान था, लेकिन दोषी ठहराया जाना तो दूर, मामले में उस नामजद तक नहीं बनाया गया.

    जागने का वक्त

    अपने अकेले बेटे को इस क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी ‘हत्याओं’ की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की ‘बलात्कारों’ की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. इन मानवीय त्रासदियों को आंकड़ों में बदलने वाली सक्रिय सहभागिता, जिनके बगैर वे भुला दी गई होती, गुम हो गई है. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं. इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं. युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं.

    इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया. वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया. वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है. ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं. भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है. यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है. यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है.

    दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका!

  • बौद्धिकों के बदले सुर

    लाल्टू

    नई सरकार बनने के बाद उदारवादी माने जाने वाले बुद्धिजीवियों में बदले हालात में खुद को ढालने की कोशिशें दिखने लगी हैं। ऐसी ही एक कोशिश हाल में अंगरेजी के ‘द हिंदू’ अखबार में छपे शिव विश्वनाथन के आलेख में दिखती है। नरेंद्र मोदी द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा और फिर उसके बाद गंगा आरती से बात शुरू होती है। टीवी पर यह दृश्य आने पर संदेश आने लगे कि बिना कमेंट्री के पूरी अर्चना दिखाई जाए। कइयों का कहना था कि इस तरह पूरी पूजा की रस्म को पहली बार टीवी पर दिखाया गया। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी की गंगा आरती पहली बार दिखाई गई। पर धार्मिक रस्म हमेशा टीवी पर दिखाई जाती रही हैं। राष्ट्रीय नेता सार्वजनिक रूप से धार्मिक रस्मों में शामिल होते रहे हैं, यह हर कोई जानता है। तो एक अध्येता को यह बड़ी बात क्यों लगी? शिव बताते हैं कि मोदीजी के होने से यह संदेश मिला कि हमें अपने धर्म से शर्माने की जरूरत नहीं है। यह पहले नहीं हो सकता था।

    कौन-सा धर्म? कैसी शर्म? क्या मोदी महज एक धार्मिक रस्म निभा रहे थे? अगर ऐसा है तो इसके पहले कितनी बार उन्होंने यह आरती की?

    सच में वह कोई धार्मिक काम नहीं था। वह आरती किसी भी धार्मिकता से बिल्कुल अलग, एक विशुद्ध राजनीतिक कदम थी। उसमें से उभरता संदेश यही था कि राजा आ रहा है।

    तकरीबन डेढ़ महीने पहले एक और आलेख में बनारस में केजरीवाल और मोदी की भिड़ंत पर शिव ने लिखा था, ‘मोदी जिस भारत-इंडिया, हिंदू-मुसलिम फर्क को थोपना चाहते हैं, बनारस उसे खारिज करता है।’ अब मोदी के जीतने पर उनका सुर बदल गया है।

    आगे वे किसी दोस्त को उद्धृत कर बिल्कुल निशाने पर मार करते हैं, अंगरेजी बोलने वाले सेक्यूलरिस्ट लोगों ने बहुसंख्यकों को अपना स्वाभाविक जीवन जीने में परेशान कर दिया। इंग्लिश वालों की दयनीय स्थिति पर मैं पहले लिख चुका हूं, पर स्वाभाविक क्या है, इस पर मेरी और शिव की समझ में फर्क है। आगे वे लिखते हैं कि वामपंथी घबरा गए हैं कि अब धर-पकड़ शुरू होगी। वैसे सही है कि इकतीस फीसद मतदाताओं ने ही भाजपा को बहुमत दिलाया है। ऐसा नहीं कि सारा मुल्क तानाशाह के साथ है। अगर मतदान में शामिल न हुए लोगों को गिनें, तो जनसंख्या का पांचवां हिस्सा भी भाजपा के साथ नहीं होगा।

    घबराने की कोई बात सचमुच नहीं है। पर क्या हम भूल जाएं कि पिछली बार के भाजपा शासन के दौरान किताबें कैसे लिखी गर्इं। आज हम सब वामपंथी दिखते हैं, पर डेढ़ महीने पहले यह डर उन्हें भी था कि मोदी हिंदू-मुसलिम फर्क को थोपना चाहते हैं। एनसीइआरटी की एक किताब में भारत विभाजन पर अनिल सेठी का लिखा एक अद्भुत अध्याय है, जिसमें दोनों ओर आम नागरिकों को विभाजन से एक जैसा पीड़ित दिखाया गया है। यह वाजिब चिंता है कि इस अध्याय को अब हटा दिया जा सकता है। यह सब जानते हैं कि दक्षिणपंथियों के आने से इतिहास की नई व्याख्या की जाएगी।

    शिव का मानना है कि उदारवादी इस बात को नहीं समझ पाए कि मध्यवर्ग के लोग तनाव-ग्रस्त हैं और मोदी ने इसे गहराई से समझा। पहले इन तनावों की वाम की समझ के साथ शिव सहमत थे, पर अब उन्हें वाम एक गिरोह दिखता है, जिसने धर्म को जीने का सूत्र नहीं, बल्कि एक अंधविश्वास ही माना। यह पचास साल पुरानी बहस है कि मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा या कि उसे उत्पीड़ितों की आह माना। आगे वे वाम को एक शैतान की तरह दिखाते हैं, जिसने संविधान में वैज्ञानिक चेतना की धारणा डाली ताकि धर्म की कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति मिले। रोचक बात यह है कि अंत में वे दलाई लामा को अपना प्रिय वैज्ञानिक कहते हैं। तो क्या वैज्ञानिक में ‘वैज्ञानिक चेतना’ की भ्रष्ट धारणा नहीं होती!

    उनके मुताबिक यह धारणा एक शून्य पैदा करती और धर्मनिरपेक्षता बढ़ाती है, जिससे ऐसा दमन का माहौल बनता है, जहां आम धार्मिक लोगों को नीची नजर से देखा जाता है। बेशक, विज्ञान को सामाजिक मूल्यों और सत्ता-समीकरणों से अलग नहीं कर सकते, पर यह मानना कि जाति, लिंगभेद आदि संस्थाएं, जिन्हें धार्मिक आस्था से अलग करना आसान नहीं, विज्ञान उनसे भी अधिक दमनकारी है, गलत है। शिव धर्मनिरपेक्षता को विक्षोभ पैदा करने वाला औजार मानते हैं। उनके अनुसार पिछली सरकार ने चुनावों के मद्देनजर लघुसंख्यकों की तुष्टि की और इससे बहुसंख्यकों को लगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। तो वह तुष्टि क्या है?

    शाहबानो का मामला, पर्सनल लॉ, कश्मीर के लिए धारा 370, कांग्रेस या दूसरे दलों के चुनावी मुद्दे तो ये नहीं हैं, हालांकि संघ परिवार के लिए ये संघर्ष के मुद्दे हैं। चुनाव के मुद्दों में आरक्षण भी है। पैसा, शराब, मादक पदार्थ, हिंसा, क्या नहीं चलता। जातिवाद और सांप्रदायिकता भी।

    सवाल है कि कहां तक गिरना ठीक है। संघ ने खासतौर पर उत्तर भारत में पिछड़े वर्गों और दलितों में झूठी बहुसंख्यक अस्मिता का अहसास पैदा किया और फिर उनमें गुस्सा पैदा किया कि तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है। दूसरी ओर अगर लघुसंख्यकों को कुछ सुविधाएं दी जाएं तो क्या वह हमारे पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ है? अगर नहीं तो सच्चर समिति की रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों से उजागर लघुसंख्यकों के बुरे हालात के मद्देनजर अगर उनकी तरफ अधिक ध्यान दिया गया तो इससे एक बुद्धिजीवी को क्या तकलीफ?

    बिना विस्तार में गए सिर्फ इस अहसास को बढ़ाना कि लघुसंख्यकों का तुष्टीकरण होता है, एक गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। होना यह चाहिए कि हम सोचें कि देश में लघुसंख्यकों का

    हाल इतना बुरा क्यों है कि उनका चुनावों के दौरान फायदा उठाना संभव होता है। उनकी माली और तालीमी हालत इतनी बुरी क्यों है कि उनके बीच से उठने वाली तरक्की-पसंद आवाजें दब जाती हैं।

    यह एक नजरिया हो सकता है कि बहुसंख्यक धर्मनिरपेक्षता को खोखला दमनकारी विचार मानते हैं। पर यह भी देखना चाहिए कि गरीबी और रोजाना मुसीबतों से परेशान लोग बहुसंख्यक अस्मिता से जुड़े राष्ट्र की संकीर्ण धारणा के शिकार हो जाते हैं, यह ऐसा विचार है, जिसके मुताबिक अपने ही अंदर दुश्मन ढूंढ़ा जाता है, जैसे जर्मनी में यहूदी, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू और भारत में मुसलमान। इसी असुरक्षा को मोदी और संघ ने पकड़ा। इसके साथ रोजाना जिंदगी में धर्म और अध्यात्म का संबंध ढूंढ़ना गलत होगा। धर्मनिरपेक्षता बहुसंख्यकों पर कोई कहर नहीं ढाती। इसके विपरीत होता यह है कि संघ परिवार जैसी ताकतों के भेदभाव वाले प्रचार से इंसान की बुनियादी प्रेम और भलमनसाहत की प्रवृत्तियां दब जाती हैं।

    शिव बताते हैं कि हमारे धर्मों में हमेशा ही संवाद की परंपरा रही है। पर इतना कहना काफी नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज में धर्म की भूमिका बड़े तबकों को क्रूरता से मनुष्येतर रखने की रही। हमारे चिकित्सा-विज्ञान की परंपरा में बहुत-सी अच्छी बातें हैं, वहीं लाशों के साथ काम करने वालों को अस्पृश्य मानना भी इसी परंपरा का हिस्सा है। एक ओर यह सही है कि हमारे लोगों के लिए धर्म पश्चिम की तरह महज रस्मी बात नहीं, वहीं यह भी सही है कि हर धार्मिक रस्म आध्यात्मिक उत्थान से नहीं जुड़ी है। इस देश के किसी भी हिस्से में सुबह उठते हुए इस बात को समझा जा सकता है, जब मंदिर-मस्जिद-गुरद्वारों से सुबह की कुदरती शांति को चीरती लाउडस्पीकरों की कानफाड़ू आवाजें सुनाई पड़ती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे जीवन में धर्म का हस्तक्षेप अधिकतर बड़ा दुखदायी होता है।

    निजी आस्था और सार्वजनिक जीवन में फर्क करने वाली धर्मनिरपेक्षता का सेहरा वाम को चढ़ाना भी गलत होगा। ऐसी खबरों की संख्या कम नहीं, जब वाम नेता पूजा मंडपों का उद्घाटन करते देखे गए थे। जिस वाम को लेकर जैसी बहस शिव या दीगर बुद्धिजीवी कर रहे हैं, वह सिर्फ अकादमिक संस्थानों के घेरे में है।

    आज ऐसी बहस को पढ़ कर लगता है मानो नई सरकार क्या बनी, भारत से स्टालिन का शासन खत्म हुआ!

    धर्मनिरपेक्षता की बात करते हुए ईसाई धर्म और विज्ञान की लड़ाई को ले आना शायद यह बताता है कि धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धारणा है। पर क्या आधुनिक राज्य-सत्ता की धारणा भारतीय है? सरसंघ चालकों का प्रेरक हिटलर क्या भारतीय था?

    इसमें कोई शक नहीं कि कई लोग इस बात से सही कारणों से परेशान होते हैं कि पेशेदार वैज्ञानिक अपनी धार्मिक आस्थाओं और विज्ञान-कर्म को अक्सर अलग नहीं कर पाते। पर इसका व्यापक समाज में चल रही प्रक्रियाओं पर कोई असर नहीं पड़ता। वैसे ही हमारे वैज्ञानिकों में नास्तिकों की संख्या बड़ी कम है। और अधिकतर व्यवस्था-परस्त हैं। किसी भी राष्ट्रीय सम्मेलन में चले जाएं तो पाएंगे कि अधिकतर वैज्ञानिक इसी चर्चा में मशगूल हैं कि गुजरात में क्या गजब का विकास हुआ है।

    सभ्यताओं को पूरब, पश्चिम में बांट कर देखना कितना सही है, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। पिछली सदी की मान्यताओं के विपरीत अब यह जानकारी आम है कि पिछले दो हजार सालों में पर्यटकों और ज्ञानान्वेषियों के जरिए धरती के एक से दूसरी ओर ज्ञान का प्रवाह व्यापक स्तर पर होता रहा है।

    यह सरासर गलत है कि हिंदुत्व को बुरा मानते हुए भी धर्मनिरपेक्ष लोग दूसरे धर्मों में मूलवाद को नर्मदिली से देखते रहे। ऐसा कहना न केवल झूठ है, बल्कि  इससे कहने वाले के निहित स्वार्थों पर सवाल उठते हैं। धर्मनिरपेक्षता में वह शैतान मत ढूंढ़िए, जिसे मध्यवर्ग के लोगों ने उखाड़ फेंका हो। सच यह है कि हममें से हरेक में एक नरेंद्र मोदी बैठा है। हमारे सांप्रदायिक सोच का फायदा उठाया जा सकता है। इकतीस फीसद मतदाताओं के अधिकतर के साथ को मोदी और संघ परिवार यही करने में सफल हुआ है। बाकी काम दस हजार करोड़ रुपयों से हुआ, जिसमें मीडिया के अधिकतर को खरीदा जाना भी शामिल है। यह तो होना ही है कि जब ‘हिंदू’ नाम का राजनीतिक समूह विशाल बहुसंख्या में मौजूद है, तो हिंदुत्व पर नजर ज्यादा पड़ेगी, जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में उदारवादी इस्लामी मूलवाद पर ज्यादा गौर करेंगे।

    यह सचमुच तकलीफदेह है कि मोदी के विरोध को शिव जैसे बुद्धिजीवी विज्ञान और आधुनिकता से जोड़ रहे हैं। वैसे यह एक तरह से विज्ञान के पक्ष में ही जाता है। आखिर 2002 से पहले मोदी के बयानों को कौन भूल सकता है। मुसलमानों के लिए उनके बयान असभ्य और अक्सर आक्रामक होते थे। ‘हम पांच हमारे पचीस’ उनका तकियाकलाम था। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे सावधान हो गए, फिर भी कभी-कभार जबान चल ही पड़ती है। यह सबको पता है। अगर विज्ञान हमें इस मानव-विरोधी कट्टरता से टक्कर लेने की ताकत देता है, तो जय विज्ञान।

    (24 मई के जनसत्ता में प्रकाशित)

  • भगाणा में अन्याय, अनसुनी आवाजें और आत्महत्या की एक कोशिश


    कल (11 मई) जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन की यह रिपोर्ट पोस्ट करते हुए एक दुखद सूचना यह भी है कि एक शिकायतकर्ता किशोरी के चाचा ने अपने गांव लौट कर आत्महत्या करने की कोशिश की है. वे आज सुबह पांच बजे अचानक भगाणा के लिए निकल गये थे। गांव में ही उन्‍होंने दोपहर बाद दो बजे कीटनाशक खाकर आत्‍महत्‍या करने की कोशिश की। उन्‍हें पहले हांसी हॉस्‍पीटल में एडमिट करवाया गया, जहां से चिकित्‍सकों ने उन्‍हें रोहतक अस्‍पताल में रेफर कर दिया है। उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है। गांव वालों का कहना है कि आत्‍महत्‍या से पहले वे कह रहे थे कि इज्‍जत तो चली गयी, अब क्‍या बच गया है। कहीं से कुछ नहीं मिलने वाला है।

    नई दिल्ली, 11 मई। हरियाणा के भगाणा गांव में सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई चार नाबालिगों के हक में न्याय की मांग के समर्थन में आज शिकायतकर्ताओं के साथ भारी संख्या में दिल्ली के सामाजिक कार्यकता, बुद्धिजीवी और विद्यार्थी भी जुटे।  यहां दिल्ली में पंत मार्ग पर स्थित हरियाणा के मुख्यमंत्री आवास पर धरना देते हुए आंदोलनकारियों ने शिकायतकर्ताओं के प्रति हरियाणा सरकार के रवैए की तीखी आलोचना की और कहा कि ऐसा लगता है कि हरियाणा सरकार सामंती उत्पीड़नकर्ताओं के पक्ष में खड़ी हो गई है और दलितों-पीड़ितों की आवाज को जानबूझ कर दफन किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर जुटे लोगों ने यहां दिल्ली में सरकार और प्रशासन से यह मांग की कि पीड़ितों पर जुल्म ढाने वाले दोषियों को  सख्त सजा दी जाए और फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन कर शिकायतकर्ताओं को जल्द से जल्द इंसाफ दिलाई जाए।

    आंदोलनकारी हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुडा से मिलना चाहते थे, लेकिन भारी संख्या में पुलिस बल ने बैरिकेड लगाकर उन्हें रोक दिया। इसके बाद आंदोलनकारियों ने अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस के कई बैरिकेड तोड़ डाले और आक्रोश से भर कर वहीं हरियाणा सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारे लगाए। जब आंदोलनकारियों का गुस्सा नहीं थमा तो उनमें से दस लोगों के प्रतिनिधिमंडल को हरियाणा के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव सुरेंद्र दहिया से बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन उन्हें कार्रवाई का भरोसा नहीं दिया। इस पर आंदोलनकारियों का गुस्सा और क्षोभ और बढ़ गया तब फिर दुबारा सात लोगों के प्रतिनिधिमंडल को बुलाया गया, जिसने सुरेंद्र दहिया के सामने जोरदार तरीके से हरियाणा और खासकर भगाणा में दलितों पर होने वाले अत्याचारों का ब्योरा दिया और जल्द कानूनी कार्रवाई करने के साथ-साथ पीड़ितों को मुआवजा देने और उनके पुनर्वास की मांग की। इसके बाद राजनीतिक सचिव की ओर से अगले बहत्तर घंटों के भीतर मांगों पर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया गया।   

    विरोध प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने भगाणा की किशोरियों के सामूहिक बलात्कार में शामिल अपराधियों को संरक्षण देने वाले गांव के सरपंच और उसके साथियों को भी तत्काल गिरफ्तार करने की मांग की। भगाणा कांड सघर्ष समिति के प्रवक्ता जगदीश काजला ने कहा कि भगाणा की इन शिकायतकर्ता बच्चियों और परिवारों के साथ हुई यह घटना हरियाणा में दबंगों के आतंक की एक छोटी बानगी है। काजला ने कहा कि जिस गांव में दबंगों ने दलित परिवारों का सम्मान से जीना असंभव कर दिया है, वे वहां लौटना चाहते, इसलिए उन्हें वहां से अलग बसाने की व्यवस्था की जाए। शिकायतकर्ता बच्चियों में से एक की मां सोना ने कहा कि हरियाणा में हमें इंसाफ नहीं मिला तो हम दिल्ली के जंतर मंतर पर आए कि यहां हमारी आवाज सुनी जाएगी, लेकिन अब एक महीने होने जा रहा है, आज तक केंद्र सरकार या दिल्ली या फिर हरियाणा के प्रशासन या किसी नेता ने हमारा दुख समझने और यहां तक बात करने तक की भी कोशिश नहीं की। सोना ने आगे कहा कि हम देश और प्रशासन से पूछना चाहते हैं कि क्या दलितों का कोई सम्मान नहीं होता, उनकी बेटियां क्या बेटी नहीं होती हैं?

    भगाणा गांव की एक वृद्ध महिलाए गुड्डी ने कहा कि जिन बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, उनके सम्मान और गरिमा के खिलाफ अपराध हुआ, वे खुद दिल्ली के जंतर मंतर पर न्याय की आस में बैठी है, लेकिन केंद्र या राज्य सरकार या किसी भी प्रशासन को इनकी बात सुनने की जरूरत महसूस नहीं हुई। विरोध प्रदर्शन के आखिर में भगाणा कांड संघर्ष समिति ने कहा है कि अगर इस मामले में शिकायतकर्ताओं के साथ न्याय नहीं हुआ, तो हम देशव्यापी आंदोलन छेड़ने के लिए तैयार हैं।


    भगाणा कांड संघर्ष समिति
    जगदीश काजला
    09812034593

  • बुरे दिन आने वाले हैं: आनंद तेलतुंबड़े

    आनंद तेलतुंबड़े


    पार्टी में जिस तरह की फूट है उसको देखते हुए, भाजपा ने हैरान कर देने वाले एक अनुशासन के साथ अपना चुनावी अभियान चलाया है. हाल के हफ्तों तक इसने महज विकास और संप्रग के दूसरे शासनकाल में कुशासन को ही मुख्य मुद्दा बनाए रखा. यह बड़ी कुशलता से हालात और माहौल का भी इस्तेमाल करने में कामयाब रही: अहम रूप से इसने कांग्रेस के खिलाफ जनता के गुस्से को, अगले कांग्रेसी नेता के सीधे वारिस राहुल गांधी के व्यक्तित्व की कमजोरियों को, और बदलाव के लिए कॉरपोरेट भारत के समर्थन का इस्तेमाल किया है. यह सारा कुछ उसने सटीक प्रबंधन रणनीति के साथ किया है. पार्टी के भीतर मतभेदों को एक तरफ करते हुए इसने बड़े पूंजीपतियों के दुलारे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया है. इसके लिए यह गुजरात में मोदी के शासन को उसकी काबिलियत के सबूत के रूप में पेश कर रही है. अपने गुजरात मॉडल के झूठ के लगातार उजागर होने की रत्ती भर परवाह किए बगैर मोदी ने गोएबलीय आवेश में तूफानी अभियान चलाया और चुनावों में यह मॉडल उसके लिए कारगर होता दिख रहा है. लेकिन अब जब चुनाव खत्म होने को आए हैं, अचानक भाजपा का असली इरादा सतह पर दिखने लगा है.

    सांप्रदायिकता के धारदार पंजे

    इस चुनाव में भाजपा का विकास का मुद्दा महज दिखावे की रणनीति है. विकास को मुद्दा बनाने का मतलब यह नहीं है कि भाजपा हिंदुत्व के अपने एजेंडे से ऊपर उठ गई है. भाजपा ने दिल्ली में सत्ता पर फिर से काबिज होने के मौके को साफ साफ देखा और उसने यह महसूस किया कि हिंदुत्व को जरूरत से ज्यादा जोर देने पर मतदाताओं से वैसा फायदा नहीं मिल सकेगा, जो इसकी पिछली सफलता के बाद से भारी बदलाव देख चुके हैं. लेकिन, विकास को केंद्रीय मुद्दे के रूप में पेश करने के बावजूद हिंदुत्व हमेशा इसकी पीठ पर सवार रहा है. वैसे भी, विकास और हिंदुत्व का आपस में कोई अनिवार्य रूप से विरोध नहीं है. सकल घरेलू उत्पाद या ऐसे ही पैमानों पर मापे जाने वाले विकास की जो समझदारी सब जगह पर हावी है, वो राष्ट्रीय पहचान के साथ साथ बखूबी चल सकती है, जिसे भाजपा अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ पूरी ताकत से पेश करती है. तेजी से बढ़ता हुआ मध्य वर्ग और पेशेवर शिक्षित युवा वर्ग अपनी कामयाबी और संभावनाओं को पूरे देश पर लागू करके सोचता है कि भारत एक महाशक्ति बन सकता है. इस हिंदुत्व पहचान के साथ अकेली दिक्कत धार्मिक अल्पसंख्यक और निचली जातियों को होती है, हालांकि इसकी तादाद भी तेजी से घटती जा रही है, क्योंकि वे खुद को इसके प्रभावी अवतार का सीधे सीधे शिकार होते देखती हैं.

    इसलिए अपने आधार को बढ़ाने के लिए भाजपा स्वाभाविक रूप से हिंदुत्व के बहुत अधिक प्रचार से परहेज कर रही है. पिछले बरसों में इसने अपना एक जनाधार बनाया है, जो वैसे भी जानता है कि असल में भाजपा क्या है. लेकिन भाजपा अगर प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाने का सपना देख रही है तो वह दूसरों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती. इसके अलावा, गठबंधन के दौर में, उसे उन संभावित सहयोगियों का भी खयाल रखना पड़ता है, जो इसकी विचारधारा के साथ खुले तौर पर जुड़ना पसंद नहीं करेंगे. इसलिए हिंदुत्व को पिछली सीट पर बिठा दिया गया है, जिसे भीतर ही भीतर और पूरी किफायत से इस्तेमाल किया जाना है जैसा कि उन्होंने मुजफ्फरनगर में किया या जैसे इसके छुटभैए अभी कर रहे हैं. हिंदुत्व का व्यावहारिक उपयोग हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ मजबूती से एकजुट करना है. जहां भी उसे इसकी जरूरत दिखेगी, भाजपा इसका इस्तेमाल करेगी. उत्तर प्रदेश में, भाजपा अरसे से कमजोर रही है. वहां सपा और बसपा ने क्रमश: मुसलमानों और दलितों को अपने मुख्य जनाधार के रूप में अपने साथ रखते हुए जमीनी कब्जा बनाए रखा है. इसमें उन्हें भाजपा के बंटे हुए जनाधार से भी मदद मिली है. ऐसे हालात में भाजपा हिंदुत्व के हथियार का इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेगी. लेकिन इसी के साथ वो ऐसा खुल्लमखुल्ला नहीं करेगी.

    वही बदनुमा चेहरा

    तभी अचानक मध्य अप्रैल से हिंदुत्व के अनेक छुटभैए इसका उल्लंघन करते हुए अपने धारदार पंजों के साथ सामने आने लगे. 5 अप्रैल को नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी और भाजपा के महासचिव अमित शाह ने आशंका के मुताबिक हमलों की शुरुआत करते हुए कहा कि चुनाव, राज्य में सरकार की हिमायत पाने वाले मुट्ठी भर लोगों द्वारा किए गए जनता के अपमान का बदला लेने का मौका हैं. ‘ये महज एक और चुनाव भर नहीं है. यह हमारे समुदाय के अपमान का बदला लेने का मौका है. यह चुनाव उन लोगों को एक जवाब होगा जो हमारी मांओं और बहनों के साथ दुर्व्यवहार करते आए हैं,’ उसने कहा. 19 अप्रैल को ठीक मोदी के अहमदाबाद में उसके दोस्त और विहिप के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने खबरों के मुताबिक हिंदू इलाकों में संपत्तियां खरीदनेवाले मुसलमानों को निशाना बनाते हुए अपने समर्थकों से उनको जबर्दस्ती निकाल बाहर करने को कहा. उसी दिन नीतीश सरकार में मंत्री रह चुके गिरिराज सिंह ने झारखंड के देवघर में एक चुनावी सभा में कहा कि जो मोदी का विराध कर रहे हैं उनके लिए भारत में जगह नहीं है और उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए. मोदी के नजदीकी सहकर्मियों की तरफ से आ रहे इन भयावह और घिनौने बयानों ने अनेक जानकारों को स्तब्ध कर दिया है, वे नहीं समझ पा रहे हैं कि ये लोग मोदी की संभावनाओं पर क्यों गैर जरूरी तौर पर पानी फेर रहे हैं, जबकि सारा कुछ मोदी के लिए अनुकूल ही चल रहा है.

    असल में, अनगिनत मुंहों वाले संघ परिवार की कपटता से भरी दलीलों की थाह ले पाना आमतौर पर मुश्किल होता है, भाजपा जिसका एक हिस्सा भर है. ज्यादातर तो यह हालात को परखने के लिए भी बयान जारी करती है ताकि यह जान सके कि उस पर कैसी प्रतिक्रियाएं आएंगी. तब यह दिखाने के लिए कि इसने सीमा नहीं तोड़ी है, यह भीतर से ही एक दूसरा बयान जारी करती है. जैसी की उम्मीद की जा सकती है, मोदी ने तोगड़िया के बयान को ‘नफरत से भरा बयान’ बताते हुए कहा कि ‘इस तरह के संकीर्ण बयान देकर खुद को भाजपा का शुभचिंतक साबित करने वाले लोग वास्तव में अभियान को विकास और अच्छे प्रशासन के मुद्दे से भटकाना चाहते हैं.’ आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने इसका विरोध करते हुए कहा कि ‘मैंने प्रवीण तोगड़िया से बात की है, उन्होंने ऐसे किसी बयान से इन्कार किया है. यह मनगढ़ंत है. कोई स्वयंसेवक ऐसी विभाजनकारी बातें नहीं सोच सकता. वे सभी लोगों को एक मानते हैं: एक जनता, एक राष्ट्र.’ भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर माधव के बयान को मजबूती देते हुए इससे भी आगे बढ़ गए और कहा कि तोगड़िया इस मामले में कानूनी कदम उठाने जा रहे हैं. जबकि बयान ने अपना मकसद पूरा कर लिया था, उसने अपने जनाधार को यह यकीन दिला दिया था कि भाजपा ने हिंदुत्व के मकसद को पीछे नहीं छोड़ा है. तब धर्मनिरपेक्षों और मुसलमानों ने यह सोच कर अपने मन को मना लिया कि ये या तो एक अतिउत्साही ‘भाजपा समर्थक’ की गलतबयानी थे जिसस पार्टी सहमत नहीं है, या फिर वे पूरी तरह ही गलत थे.

    हालांकि अमित शाह के मामले में, भाजपा ने यह कहते हुए उसका बचाव किया कि जो हुआ था उसके लिए धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले ही जिम्मेदार थे. ‘जो लोग सेकुलर टूरिज्म करने गए थे उन्होंने अपमान किया है, चाहे हिंदू हो या मुसलमान.’ भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने एएनआई को बताया. तोगड़िया और शाह दोनों की टिप्पणियां रणनीतिक थीं: तोगड़िया हिंदुओं को बताना चाहते थे कि कुछ भी नहीं बदला है, और शाह की भड़काऊ लफ्फाजी उत्तर प्रदेश के गैर मुस्लिम और गैर दलित मतदाताओं को पूरे उत्साह से वोट डालने के लिए उकसाने की खातिर थी. सीएसडीएस लोकनीति-आईबीएन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक यह रणनीति कारगर हो गई लगती है, जिसके मुताबिक भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साफ तौर से आगे है. सर्वेक्षण दिखाता है कि असल में मुजफ्फरनगर दंगे और उनके असर को इस साल प्रमुखता मिलती गई है. 78 फीसदी जवाबदाताओं ने मार्च में कहा कि वे 2013 के सांप्रदायिक दंगों के बारे में जानते थे, जबकि जनवरी में यही बात 64 फीसदी लोगों कही थी. इसके साथ साथ 40 फीसदी लोगों ने कहा कि वे मानते थे कि दंगों के लिए समाजवादी पार्टी ‘सबसे ज्यादा जिम्मेदार’ थी. जाहिर है कि यह एक जोखिम भरा जुआ था, लेकिन भाजपा ऐसा जुआ खेलने में माहिर है.

    ठेंगे पर गठबंधन

    भाजपा सबसे जोखिम भरा जुआ यह खेल रही है कि वो अपने संभावित सहयोगियों के साथ दुश्मनी बढ़ाती जा रही है. शायद उसने यह गलतफहमी पाल रखी है, जैसा कि उसने 2004 में ‘भारत उदय’ अभियान को लेकर पाली थी, कि वो 272 सीटों के जादुई आंकड़े को हासिल कर लेगी और इसीलिए वो अपनी अकड़ दिखाती फिर रही है. शायद यह सीधे सीधे उन दलों के खिलाफ हमलावर रुख अपना रही है जिन्होंने अभी उसे समर्थन नहीं दिया है. खुद मोदी अपने संभावित सहयोगियों ममता बनर्जी, फारूक अब्दुल्ला, जयललिता और नवीन पटनायक के खिलाफ हमले तेज करते हुए यह जुआ खेल रहा है. 8 फरवरी को, बातें बढ़ा चढ़ कर कहने के अपने अंदाज में मोदी ने कहा कि ‘तीसरा मोर्चा’, जिसके जयललिता और नवीन पटनायक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, भारत को ‘तीसरे दर्जे’ के देश में बदल देगा. इसने दोनों को नाराज कर दिया. इसी तरह ‘गुजरात’ को लेकर हांकी जा रही डींग दूसरे सहयोगियों को नहीं भा रही है क्योंकि यह उनके कामकाज को कमतर करके बताती है.

    इन छिपे हुए अपमानों के साथ साथ, मोदी ने एआईएडीएमके और डीएमके दोनों की सीधी आलोचना की कि इन्होंने तमिल लोगों के विकास की अनदेखी की है और इन्हें आपस में ही लड़ने से फुरसत नहीं मिली. जयललिता ने यह कहते हुए पलटवार किया कि गुजरात का विकास एक ‘मिथक’ है और तमिलनाडू का विकास गुजरात से कहीं अधिक प्रभावशाली है. अपने राज्य की कावेरी पट्टी के करुर में एक हालिया रैली में जयललिता ने भाजपा पर ‘विश्वासघात’ करने का आरोप लगाते हुए कहा कि तमिलनाडू तथा कर्नाटक के बीच चल रहे पानी बंटवारे के विवादास्पद मुद्दे पर उसमें और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है. उन्होंने लोगों से इसे यकीनी बनाने की मांग की कि डीएमके, कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो जाएं. मोदी ने नवीन पटनायक पर साजिश करके तीसरे मोर्चे के जरिए कांग्रेस को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया. अपने पूर्व प्रशसंक फारूक अब्दुल्ला के साथ एक वाक्युद्ध में मोदी ने कहा कि फारूक और उनके परिवार ने कश्मीर का सांप्रदायीकरण कर दिया है. हाल में कोलकाता में एक चुनावी रैली में, पश्चिम बंगाल में हुए एक कई करोड़ों के कुख्यात चिट फंड घोटाले के मामले में ममता को लेकर किए गए संकेतों के जवाब में उन्हें तृणमूल कांग्रेस की तरफ से ’शैतान’ और ’गुजरात के कसाई’ जैसी तीखी उपाधियां मिली. साथ ही पार्टी ने मानहानि के मुकदमे की धमकी भी दी.

    मोदी सत्ता तक ले जाने वाले पुलों को खुद ही क्यों जला रहा है? यह तब है जब जनमत सर्वेक्षणों का सबसे अनुकूल अनुमान भी बहुमत के आंकड़े से दूर ही बना हुआ है. बेशक इन अनुमानों में बढ़ोतरी के रुझान हैं लेकिन कोई भी भली चंगी बुद्धि वाला इंसान इन अनुमानों से बड़े नतीजे नहीं निकालेगा और अपने बहुमत को इतना पक्का नहीं मानेगा. लेकिन किसी न तरह से, भाजपा 272 के निशान को पार करने को लेकर आश्वस्त दिख रही है. इसका एजेंडा जो भी हो, इसने सबके खिलाफ उद्दंडता का प्रदर्शन करके अनजाने ही अपने अलोकतांत्रिक चरित्र की कड़वी सच्चाई उजागर कर दिया है. अगर यह सत्ता में आती है, तो यह अपने मकसद को पूरा करने की राह में आने वाली किसी भी राय के साथ सख्ती से पेश आएगी.

    अनुवाद: रेयाज उल हक

  • गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार

    तुलसीराम

    सैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं-‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

    गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है। इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है। मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं। सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया। नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

    इस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है। गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है,जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।

    उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

    इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया,जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा। इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई।

    एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी। मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

    अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए। उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं। इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

  • क्या धर्मनिरपेक्षता मायने रखती है?

    आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख न सिर्फ दलों से अलग, भारतीय राज्य के फासीवादी चरित्र को पहचानने की जरूरत पर जोर देता है बल्कि यह धर्मनिरपेक्षता की ओट में इस फासीवादी-ब्राह्मणवादी राज्य के कारोबार को चलाते रहने की सियासत को उजागर करता है. अनुवाद: रेयाज उल हक

    अपने एक हालिया साक्षात्कार में मोदी द्वारा इस बात पर घुमा फिरा कर दी गई सफाई की वजह से एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता पर बहस छिड़ गई, कि क्यों उसने मुस्लिम टोपी नहीं पहनी थी.  मानो मुसलमानों के प्रति मोदी और उसकी पार्टी के रवैए में अब भी संदेह हो, फिर से पेशेवर धर्मनिरपेक्ष उस मोदी के बारे में बताने के लिए टीवी के पर्दे पर बातें बघारने आए, जिस मोदी को दुनिया पहले से जानती है. यहां तक कि बॉलीवुड भी धर्मनिरपेक्षता के लिए अपनी चिंता जाहिर करने में पीछे नहीं रहा. चुनावों की गर्मा-गर्मी में, सबसे ज्यादा वोट पाने को विजेता घोषित करने वाली हमारी चुनावी पद्धति में, व्यावहारिक रूप से इन सबका मतलब कांग्रेस के पक्ष में जाता है, क्योंकि आखिर में शायद कम्युनिस्टों और ‘भौंचक’ आम आदमी पार्टी (आप) को छोड़ कर सारे दल दो शिविरों में गोलबंद हो जाएंगे. वैसे भी चुनावों के बाद के समीकरण में इन दोनों से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला. कम्युनिस्टों का उनकी ऐतिहासिक गलतियों की वजह से, जिसे वे सही बताए आए हैं, और आप का इसलिए कि उसने राजनीति के सड़े हुए तौर तरीके के खिलाफ जनता के गुस्से को इस लापरवाही से और इतनी हड़बड़ी में नाकाम कर दिया. अरसे से गैर-भाजपा दलों के अपराधों का बचाव करने के लिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ का एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. लेकिन किसी भी चीज की सीमा होती है. जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग की करतूतों और अयोग्यताओं ने हद पार कर दी है और इस तरह आज भाजपा को सत्ता के मुहाने पर ले आई है, तो ऐसा ही सही. यह धर्मनिरपेक्षता का सवाल नहीं है. यह स्थिति, जिसमें घूम-फिर कर दो दल ही बचते हैं, एक बड़ा सवाल पेश करती है कि क्या भारतीय जनता के पास चुनावों में सचमुच कोई विकल्प है!

    क्या कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष है?

    धर्मनिरपेक्षता के आम विपरीतार्थक शब्द सांप्रदायिकता से अलग, किसी को भी ठीक ठीक यह नहीं पता कि धर्मनिरपेक्षता क्या है. सांप्रदायिकता का मतलब संप्रदायों के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना है. औपनिवेशिक दौर से ही संप्रदायों का मतलब हिंदू और मुसलमान लगाए जाने का चलन रहा है, जबकि इन दोनों के अलावा भी इस देश में अनेक अन्य संप्रदाय हैं. चूंकि भाजपा की जड़ें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हैं, जिसका मकसद भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना है, तो यह एक सांप्रदायिक दल बन जाता है. हालांकि आरएसएस अपने हिंदुत्व को यह कह कर छुपाने की कोशिश करता है कि यह हिंदू धर्म पर आधारित नहीं है (वे यह कहने की हद तक भी जा सकते हैं कि हिंदू धर्म जैसी कोई चीज ही नहीं है), बस फर्क यही है कि अपनी समझ को उनके हाथों गिरवी रख चुके उनके अंधभक्त जानते हैं कि इसका केंद्रीय तत्व हिंदूवाद ही है. आरएसएस को दूसरे समुदायों को लुभाने के लिए ऐसे एक बहाने की जरूरत तब पड़ी जब बड़ी मुश्किलों से उसे यह समझ में आया कि हिंदू बहुसंख्या के रूप में जो चीज दिखती है वो असल में जातियों की अल्पसंख्या का एक जमावड़ा है. हालांकि इसने मुसलमानों समेत सभी समुदायों में अपने लिए किसी तरह समर्थन जुटा लिया है, तब भी यह अपने सांप्रदायिक पहचान से बच नहीं पाया है. तब सवाल यह है कि इसका राष्ट्रीय विकल्प कांग्रेस क्या धर्मनिरपेक्ष है. इसका मतलब है कि क्या वह सांप्रदायिक नहीं है?

    अगर कोई कांग्रेस के इतिहास पर सख्ती से नजर डाले तो वह साफ नकारात्मक जवाब से बच नहीं सकता. यह कांग्रेस ही थी, जिसने भारत में औपनिवेशिक ताकतों को सांप्रदायिक राजनीति के दलदल में जाने को उकसाया और इसमें मदद की जिसका अंजाम विभाजन के रूप में सामने आया. भारत को संप्रदायों के एक जमावड़े के रूप में पेश करने की औपनिवेशिक ताकतों की सचेत रणनीति के बावजूद, सभी भारतीयों की प्रतिनिधि पार्टी के रूप में उनके हाथों में खेलने की जिम्मेदारी से कांग्रेस बच नहीं सकती. यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि कांग्रेस ने मुसलमानों की एक पार्टी मुस्लिम लीग के मुकाबले में खुद को हिंदू पार्टी के रूप में पेश किया. बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना (जो कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के नेता थे) के बीच 1916 में हुए लखनऊ समझौते में, जिसने बाकी बातों के अलावा प्रांतीय परिषद चुनावों में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था कायम की. यह आगे चल कर एक ऐसी मुस्लिम राजनीति को शक्ल देने वाला था, जिसका अंजाम तीन दशकों के बाद विभाजन के रूप में सामने आना था. अगर कोई देखे तो उस त्रासदी के पीछे कांग्रेस की सांप्रदायिक बेवकूफी ही साफ दिखेगी, जिसने दसियों लाख जिंदगियों को अपनी चपेट में लिया और उपमहाद्वीप की सियासत को एक कभी न भरने वाला जख्म दिया.

    1947 के बाद भी, जब शुरुआती दशकों तक कांग्रेस के सामने कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था, इसने धर्मनिरपेक्ष चेतना को फैलाने के लिए कुछ भी नहीं किया, और इसके बजाए इसने बांटो और राज करो के औपनिवेशिक तौर तरीकों को जारी रखा. जनसंघ और भाजपा जैसे हिंदुत्व दल तब तक बहुत छोटी ताकतें बने रहे, जब तक कि कांग्रेस की चालबाजियों ने उनमें जान नहीं फूंक दी. इतिहास गवाह है कि यह राजीव गांधी द्वारा 1985 में शाह बानो मामले में दी गई दखल से शुरू हुआ. राजीव ने अपनी भारी संसदीय बहुमत का इस्तेमाल मुस्लिम भावनाओं को तुष्ट करने की खातिर, सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले को पलटने में किया. इसने हिंदुत्व ताकतों को सांप्रदायिक आग भड़काने के लिए जरूरी चिन्गारी मुहैया कराई. जैसे तैसे भरपाई करने के लिए, और इस बार हिंदुओं को खुश करने के लिए, महज कुछ ही महीनों के बाद राजीव गांधी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश किया और आग को नर्क की आग में बदलने दिया, जो आगे चल कर न सिर्फ बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाली थी, बल्कि इसके बाद सैकड़ों लोगों की जिंदगियों को भी लीलने वाली थी और भाजपा को सियासी रंगमंच पर पहुंचाने वाली थी. यहां तक कि मस्जिद को तोड़े जाने की कार्रवाई में कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की जो मौन भूमिका रही, उसके भी पर्याप्त प्रमाण हैं. असल में ऐसी मिसालों की भरमार है.

    धर्मनिरपेक्षता का हौवा

    मौजूदा सियासी हालात में असल में कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसे सचमुच धर्मनिरपेक्ष कहा जा सके. हरेक दल चुनावों में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिसाब-किताब से काम लेते हैं. धर्मनिपेक्षता का मुद्दा सिर्फ इस्लाम या मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है, इसके दायरे में संप्रदायों के सभी आधार आते हैं और इसमें निश्चित रूप से जातियों को शामिल किया जाना चाहिए, जो कि हमारे राजनेताओं का मुख्य विषय हैं. लेकिन हैरानी की बात है कि जातियां कभी भी धर्मनिरपेक्षता की बहसों में दूर दूर तक जगह नहीं पाती हैं. जैसा कि मैंने अपनी एक किताब हिंदुत्व एंड दलित्स में कहा है, सांप्रदायिकता की जड़ें जातिवाद में देखी जा सकती हैं. हिंदुत्व की ताकतों में मुसलमानों और ईसाइयों के लिए अभी जो नफरत है, वह इसलिए नहीं है कि वे एक पराई और दूसरी आस्था को मानते हैं, बल्कि बुनियादी तौर पर यह इस याद से जुड़ी हुई है कि इन संप्रदायों की व्यापक बहुसंख्या निचली जातियों से आई है. वे अब भी उनसे अस्वच्छ, असभ्य और पिछड़ों के रूप में नफरत करते हैं, जैसा कि वे दलितों से करते हैं. लेकिन ऐसी गहरी और बारीक समझ से दूर, वामपंथी उदारवादी धर्मनिरपेक्षतावादी उन सांप्रदायिक टकरावों पर गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाते हैं, जिनकी पहचान खास तौर से हिंदुओं और मुस्लिमों से जुड़ी होती है, और जातीय हिंसा की रोज रोज होने वाली घटनाओं पर अपवित्र चुप्पी साधे रहते हैं. एक अजीब से तर्क के साथ सांप्रदायिक टकरावों के प्रति चिंता को प्रगतिशील माना जाता है जबकि जातीय उत्पीड़न के लिए चिंताओं को जातिवाद माना जाता है.

    धर्मनिरपेक्षता के हौवे ने एक तरफ तो भाजपा को अपना जनाधार मजबूत करने में मदद किया है, और दूसरी तरफ कांग्रेस को अपनी जनविरोधी, दलाल नीतियों को जारी रखने में. पहली संप्रग सरकार को माकपा का बाहर से समर्थन किए जाने का मामला इसे बहुत साफ साफ दिखाता है. यह बहुत साफ था कि सरकार अपने नवउदारवादी एजेंडे को छोड़ने नहीं जा रही है. लेकिन तब भी माकपा का समर्थन हासिल करने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम की एक बेमेल खिचड़ी बनाई गई. भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर, जब असहमतियां उभर कर सतह पर आईं, तो माकपा समर्थन को वापस ले सकती थी और इस तरह सरकार और समझौते दोनों को जोखिम में डाल सकती थी. लेकिन इसने बड़े भद्दे तरीके से सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर समर्थन जारी रखा और कांग्रेस को वैकल्पिक इंतजाम करने का वक्त दिया. जब इसने वास्तव में समर्थन वापस लिया, तो न तो सरकार का कुछ नुकसान हुआ और न समझौते का. बल्कि सांप्रदायिकता का घिसा-पिटा बहाना लोगों के गले भी नहीं उतरा. अक्सर धर्मनिरपेक्षता जनता की गुजर बसर की चिंताओं पर कहीं भारी पड़ती है!

    गलत सरोकार

    सटीक रूप में कहा जाए तो धर्मनिरपेक्षता राज्य का विषय है न कि दलों का. असल में इसकी बुनियाद यह है कि समाज और इसके  अलग अलग अंग अपने अपने धर्मों को मानेंगे और उन पर चलेंगे. लेकिन ऐसे एक समाज का शासन धार्मिक मामलों में पूरी तरह तटस्थ रचना चाहिए, और उसे सभी नागरिकों के साथ समान रूप से व्यवहार करना चाहिए चाहे उनका धर्म कोई भी हो, और राज्य के पदाधिकारी काम के दौरान किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज का पालन नहीं करेंगे. भाजपा को हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार करने या किसी भी दल को इसका विरोध किए जाने की ठीक ठीक इजाजत तभी तक दी जा सकती है जब तक वे कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं खड़ी कर देते. बल्कि राज्य की तटस्थता का मतलब ही यही है कि वह इसे यकीनी बनाए. लेकिन इसके उलट सरकारी दफ्तरों में हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें सजी होना और राज्य के कामकाज में हिंदू रीति-रिवाजों का पालन किया जाना रोजमर्रा का दृश्य है. यह मुद्दा धर्मनिरपेक्षतावादियों की तरफ से चुनौती दिए जाने की मांग करता है, लेकिन किसी ने इसकी तरफ निगाह तक नहीं की है.

    जब भी कोई इसे उठाता है, तो वो अपने को अकेला पाता है. 01 मई 2010 को, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के जजों की मौजूदगी में गुजरात के राज्यपाल द्वारा एक उच्च न्यायालय की इमारत के लिए भूमि पूजन समारोह किया जा रहा था. यह समारोह पूरी तरह हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक किया जा रहा था, जिसमें एक पुजारी हवन भी करा रहा था. एक जानेमाने दलित कार्यकर्ता राजेश सोलंकी ने उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ एक याचिका दायर की. 17 जनवरी, 2011 को जज जयंत पटेल ने याचिका को पथभ्रष्ट बताते हुए रद्द कर दिया और सोलंकी पर 20 हजार रुपए का हर्जाना थोप दिया. उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की लेकिन संसाधनों की कमी की वजह से वहां भी यह फौरन खारिज कर दिया गया. इस मुकदमे को धर्मनिरपेक्षता की कसौटी बनाया जा सकता था, क्योंकि यह ठीक ठीक राज्य के धार्मिक व्यवहार को चुनौती देता था. लेकिन एक भी धर्मनिरपेक्षतावादी, किसी मीडिया, एक भी राजनीतिक दल ने इसकी तरफ निगाह नहीं उठाई.

    अगर मोदी आ गया तो

    इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी अब तक आए सभी प्रधानमंत्रियों से कहीं ज्यादा अंधराष्ट्रवादी होगा. अब चूंकि इसके प्रधानमंत्री बनने की संभावना ही ज्यादा दिख रही है तो इस पर बात करने से बचने के बजाए, अब यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि बुरा क्या हो सकता है. यह साफ है कि मोदी कार्यकाल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा, जिन्होंने उसको खुल्लमखुल्ला समर्थन दिया है. लेकिन क्या कांग्रेस सरकार क्या उनके लिए कम फायदेमंद रही है? यकीनन मोदी सरकार हमारी शिक्षा व्यवस्था और संस्थानों का भगवाकरण करेगी, जैसा कि पहले की राजग सरकारों के दौरान हुआ था. लेकिन तब भी यह बात अपनी जगह बरकरार है कि उसके बाद के एक दशक के कांग्रेस शासन ने न उस भगवाकरण को खत्म किया है और न कैंपसों/संस्थानों को इससे मुक्त कराया है. यह अंदेशा जताया जा रहा है कि यह जनांदोलनों और नागरिक अधिकार गतिविधियों पर फासीवादी आतंक थोप देगा. तब सवाल उठता है कि, जनांदोलनों पर थोपे गए राजकीय आतंक के मौजूदा हालात को देखते हुए-जैसे कि माओवादियों के खिलाफ युद्ध, उत्तर-पूर्व में अफ्स्पा, मजदूर वर्ग पर हमले, वीआईपी/वीवीआईपी को सुरक्षा देने की लहर-जो पहले से ही चल रहा है उसमें और जोड़ने के लिए अब क्या बचता है? लोग डर रहे हैं कि मोदी संविधान को निलंबित कर देगा, लेकिन तब वे शायद यह नहीं जानते कि जहां तक संविधान के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से भाग 4 की बात है-जिसमें राज्य के नीति निर्देशक तत्व हैं-संविधान मुख्यत: निलंबित ही रहा है.

    यह सच है कि इतिहास में ज्यादातर फासिस्ट चुनावों के जरिए ही सत्ता में आए हैं लेकिन वे चुनावों के जरिए हटाए नहीं जा सके. चाहे मोदी हो या उसकी जगह कोई और, अगर वो ऐसे कदम उठाने की कोशिश करेगा तो बेवकूफ ही होगा, क्योंकि ऐसा निरंकुश शासन सबसे पहले तो नामुमकिन है और फिर भारत जैसे देश में उसकी कोई जरूरत भी नहीं है. बल्कि ये सारी बातें भीतर ही भीतर पहले से ही मौजूद है और अगर हम धर्मनिरपेक्षता का अंधा चश्मा पहने रहे तो यह सब ऐसे ही चलता रहेगा.