Author: Reyaz-ul-haque

  • वाह रे कारपोरेट मीडिया का ‘लोकतंत्र’ ! मेक्सिको के कुछ सबक

    पी. कुमार मंगलम का यह लेख मेक्सिको में चुनावों और प्रायोजित आंदोलनों तथा दलों के जरिए फासीवादी, जनविरोधी उभारों और जन संघर्षों को दबाने के साम्राज्यवादी प्रयोगों की रोशनी में भारत में पिछले कुछ समय से चल रही लहरों की (पहले ‘आप’ की लहर और अब मोदी की) पड़ताल करता है. एक जरूरी लेख.


    नरेंद्र मोदी या फिर अरविंद केजरीवाल/राहुल गांधी (यहाँ  कभी अगर क्रमों की अदला-बदली होती है, तो वह आखिरकार मीडिया कुबेरों के स्वार्थोँ से ही तय होती है)? आजकल अगर आप दोस्तों-रिश्तेदारों, लोकतंत्र के अपने अनुभवों का रोना रोते बुजुर्गों और अतिउत्साहित ‘नये’ वोटरों को सुनें, तो बात यहीं शुरु और खत्म हुआ करती है। जब 2014 के लोकसभा चुनावों का दौर शुरू हो चुका है, तब सभी संभावित राजनीतिक विकल्पों की गहरी पड़ताल के बजाए पूरी बात का सिर्फ़ इन चेहरों पर टंग जाना क्या स्वाभाविक है! आदि-समाजवाद से लेकर ‘ग्लोबलाईज़्ड’ समय के बीच की खिचड़ी सच्चाइयों से निकलते अनेकों जनसंघर्षों के इस दौर में सिर्फ़ ‘परिवार’, ‘संघ-परिवार’ और “अपनी ईमानदारी” की ‘उपलब्धि’ लिए घूमते इन चेहरों का यूं छाया रहना तो और भी अचरज भरा है! हालांकि, अगर इन दिनों चारों ओर से आ रही ‘पल-पल की खबरों’ पर गौर करें, तो चुनावों के मीडियाई नियंत्रण की कड़ियाँ अपने-आप खुलने लगती हैं। साथ ही, दुनिया के ‘सबसे बड़े’ भारतीय लोकतंत्र का खोखलापन भी नजर आता है। वैसे, बात सिर्फ भारत की ही नहीं है। ‘विकासशील’ या फिर ‘तीसरी दुनिया’ का ठप्पा झेलते देशों में ‘जनता का शासन’ अक्सर न दिखने वाले या फिर दिखने में लुभाऊ लगने वाले ऐसे ही फंदों से जकड़ा है। यहाँ हम लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको में जनतंत्र के पिछले कुछ दशकों के अनुभवों की चर्चा करते हुए अपनी बात स्पष्ट करेंगे।

    मेक्सिको: हड़प लिए गए लोकतंत्र की त्रासदी

    हम शायद ही कभी यह सोचते हैँ कि सिर्फ एक देश संयुक्त राज्य अमरीका का आम प्रयोग (हिदी में और ज्यादा) में अमरीका कहा जाना एक शब्द के गलत प्रयोग से कहीं ज्यादा है। जैसाकि समकालीन लातीनी अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो का कहना है, यह इस एक देश (अब से आगे यू.एस.) के द्वारा अपनी दक्षिणी सीमा के बाद शुरू होते लातीनी अमरीका का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और राजनीति हथियाकर इस पुरे क्षेत्र को “एक दोयम अमरीका” में बदल देने की पूरी दास्तान है। यहाँ हम इस भयावह सच के पूरे ताने-बाने और अभी तक चल रहे सिलसिले की बात तो नहीँ कर सकते, लेकिन मेक्सिको की बात करते हुए इसके कई पहलू खुलेँगे।

    भूगोल के हिसाब से उत्तरी अमरीका मेँ होने और यू.एस. से बिल्कुल सटे होने के बावजूद मेक्सिको स्पानी भाषा और स्पानी औपनिवेशिक इतिहास के साथ सीधे-सीधे दक्षिणी अमरीका का हिस्सा है। इस जुड़ाव की सबसे अहम बात यह है कि 1810-25 के बीच स्पानी हुकूमत से बाहर निकले मेक्सिको, मध्य और दक्षिणी अमरीका के देशों (इन तीनों को मिलाकर बना क्षेत्र ही लातीनी अमरीका कहलाता है) में बोई गई सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी, धनिकोँ के राजनीतिक वर्चस्व और यू.एस. की दादागिरी की नर्सरी भी यही देश रहा है। बात चाहे इस ‘आज़ादी’ के बाद भी स्पेनवंशी क्रियोल और मिली-जुली नस्ल के स्थानीय पूँजीपतियों के पूरे देश के संसाधन, संस्कृति और सत्ता पर कब्जे की हो या 1844-48 में यू.एस द्धारा मेक्सिको की आधी जमीन लील लिये जाने की हो, मेक्सिको कल और आज के लातीनी अमरीका की कई झाँकिया दिखलाता है।

    ‘आज़ाद’ मेक्सिको की लगातार भयावह होती गैरबराबरियों के खिलाफ वहां के भूमिहीन किसानों और खान मजदूरोँ का गुस्सा 1910 की मेक्सिको क्रांति बनकर फूटा। हालांकि, बहुत जल्द ही ब्रिटिश, फ्रांसीसी और आगे चलकर यू.एस. के बाज़ार और पैसे पर पलते क्रियोल वर्ग ने बदलाव के संघर्षों को बर्बरता से कुचल डाला था। 1930 के दशक मेँ उत्तर के पांचो विया और दक्षिण मेँ चियापास क्षेत्र के एमिलियानो सापाता जैसे क्रांतिकारी नेताओं की हत्या कर बड़ी पूँजी और सामाजिक भेदभाव की शक्तियों ने पूरे राज्य तंत्र पर कब्जा कर लिया था। 1929 में राष्ट्रपति रहे प्लूतार्को कायेस ने पीआरआई (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन इंस्तितुसियोनाल-व्यवस्थागत क्रांति का दल) बनाकर इन शक्तियों को संगठन और वैचारिक मुखौटा दिया। जैसाकि नाम से ही जाहिर है, यह पार्टी क्रांति के दौर में जोर-शोर से उठी समानता और न्याय की मांगों[1] को एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्रपति प्रणाली वाली व्यवस्था में दफनाने की शुरुआत थी।

    प्लुतार्को कायेस के बाद आए सभी राष्ट्रपतियों ने जनआकांक्षाओं का गला घोंटने वाली इस व्यवस्था को मजबूत किया। मजेदार बात यह कि यह सब लगातार जनता के नाम पर, लोकप्रिय नायकों की मूर्तियां वगैरह बनवाकर तथा लोकगीतों-लोककथाओं के कानफोड़ू सरकारी प्रचार के साथ-साथ किया गया! यह भी बताते चलें कि मूलवासियों सहित अन्य वंचित तबकों की कीमत पर विदेशी पूंजी का रास्ता बुहारती पीआरआई सरकारें यू. एस. शासन-व्यवस्था की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं थी। आश्चर्य नहीं कि जब 1950 के दशक में हालीवुड में “कम्युनिस्ट” कहकर चार्ली चैपलिन जैसे कलाकारों को निशाना बनाया जा रहा था, तब वहां के सरकारी फिल्मकारों ने मेक्सिको क्रांति के नायकों को खलनायक दिखा कई फिल्में ही बना डाली! 1953 में आई एलिया काज़ान की ऐसी ही एक फिल्म में चियापास के भुमिहीन किसानों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता को बातूनी और छुटभैया गुंडा बना दिया गया था!

    ‘आज़ाद’ मेक्सिको के आर्थिक-राजनीतिक हालातों की कुछ बारीकियाँ 1947 के बाद के भारत को समझने में मदद करती हैं। मसलन, जहां मेक्सिको में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, सत्ता और समाज में हावी रहे क्रियोल वर्ग ने नए निज़ाम पर जबरन कब्जा किया, वहीं भारत में अंग्रेजी राज से उपजे सवर्ण जमींदार 1947 के बाद “देशभक्ति” और खादी ओढ़कर पूरी व्यवस्था पर पसर गए! फिर, जहां मेक्सिको में शासक वर्गों ने पीआरआई का लुभावना सरकारी मुखौटा तैयार किया, वहीं ‘आज़ाद’ भारत की कांग्रेस ब्राह्मणवादी सामंतों के हाथों कैद होकर रह गई थी। यह जरूर है कि मेक्सिको में चियापास के मूलवासियों सहित भूमिहीनों-छोटे किसानों पर खुलेआम चली राजकीय हिंसा (जिसकी जड़ें अत्यधिक हिंसक औपनिवेशिक इतिहास में हैं) के बरअक्स भारत में यह हिंसा ‘लोकतंत्र’, ‘विकास’ और ‘राष्ट्रवाद’ के दावे से दबा दी जाती रही है। स्वरूप जो भी रहा हो, पूरी व्यवस्था पर गिनती के शोषक वर्गों के कब्जे ने दोनों ही देशों की बड़ी आबादी को अपनी ही जमीन पर तिल-तिल कर खत्म होने को मजबूर किया। इस पूरी प्रक्रिया में अपनी जीविका, भाषाओं और संस्कृतियों पर रोज ‘विकास’ के हमले झेलते भारत और मेक्सिको के मूलवासी बहुल क्षेत्र “सत्ता-केंद्र से पूरी योजना के साथ थोपे गये पिछड़ेपन” की जीती-जागती मिसाल बने (विलियम्स 2002)। वैसे,1991 के बाद से ‘जनहित’ के नाम पर बड़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुलकर किसानों-मजदूरों की जमीन और रोजगार छिनते भारतीय लोकतंत्र का ‘मानवीय’ मुखौटा अपने-आप उतर गया है। इस पूरे दौर की एक खास बात यह रही है कि बड़े मीडिया समुह नव-उदारवादी नीतियों के सबसे बड़े पैरोकार बन पूरे देश में इन्हें लागू करने वाले दलों को एकमात्र राजनीतिक विकल्प बना कर पेश कर रहे हैं। ‘ग्लोबल’ कहकर खुद पर इठलाती कारपोरेट मीडिया के इस गोरखधंधे को समझने के लिये भी मेक्सिको एक अच्छा उदाहरण है, जो वैश्वीकरण की उलटबासियाँ  काफी पहले से झेल रहा है।

    मेक्सिको: वैश्वीकरण और मीडियाक्रेसी का मकड़जाल

    यू. एस. से सटे होने के कारण मेक्सिको और फिर मध्य अमरीकी देश वैश्वीकरण के पहले शिकारों में रहे हैं। ‘उदारीकरण’ ‘आर्थिक सुधार’ आदि का लुभावना चेहरा देकर वैश्वीकरण की जो नीतियां आज पूरी दुनिया में लागू की जा रही हैं, मेक्सिको काफी पहले से उन सबकी प्रयोगशाला रहा है (शायद यहीं से यह कहावत भी निकलती है: मेक्सिको, भगवान से इतना दूर और यू.एस. के इतना करीब!)। एक और खास बात यह कि लातीनी अमरीका के ज्यादातर देशों के उलट, जहां नव-उदारवादी नीतियां भयानक तानाशाहियों के द्धारा थोपी गईं [2], मेक्सिको में देश बेचने का काम छ्ह साला चुनावों के साथ और संसाधनों की लूट का हिस्सा मध्यवर्ग में बांटकर किया गया। हालांकि, 1980 के बीतते-बीतते शोषित तबकों को हथियार और कभी-कभी ‘भागीदारी’ के सरकारी झुनझुने तथा मध्यवर्ग को ‘राष्ट्रवाद’ और ‘विकास’ के दावे से साधते रहने की पीआरआई की रणनीति चूक गई थी। तब, जहां महंगाई और मेक्सिकन मुद्रा पेसो की कीमत में भारी गिरावट से कंगाल हुए उच्च और मध्य वर्ग सरकार को नकारा घोषित कर रहे थे, वहीं सालों की लूट और अनदेखी से बरबाद आबादी का बड़ा हिस्सा अपने आंदोलन खड़ा कर रहा था।

    1988 के राष्ट्रपति चुनावों में वंचित तबकों के जमीन और जीवन की मांगों को साथ लेकर तेउआनतेपेक कार्देनास पीआरडी (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन देमोक्रातिका-लोकतांत्रिक क्रांति का दल)  के झंडे के साथ पीआरआई उम्मीदवार कार्लोस सालिनास गोर्तारी के खिलाफ़ लड़े। व्यापक जनसमर्थन और जबरदस्त लोकप्रियता, कार्देनास के पिता पूर्व समाजवादी राष्ट्रपति लासारो कार्देनास थे, के बावजूद वे चुनाव हार गए। जीत और हार का बहुत कम फासला किसी राजनीतिक उलटफेर से नहीं, बल्कि सोची-समझी सरकारी साजिश से तय हुआ था। इलेक्ट्रॉनिक मतों की गिनती में कार्देनास शुरू से आग चल रहे थे कि ठीक आधी रात को मशीनें ‘अचानक’ खराब हो गईं। और जब उन्हें ‘ठीकठाक’ कर अगली सुबह नतीजों का एलान किया गया, तो कार्देनास राष्ट्रपति के बजाय राष्ट्रपति के भूतपूर्व उम्मीदवार बन चुके थे! लोकतंत्र के खुल्लम-खुल्ला अपहरण में इस बार सरकारी भोंपू बने बड़े मीडिया ने 1994 के चुनावों में अपनी भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ा ली थी। तब, पहले से ज्यादा संगठित पीआरडी की चुनौती को एक-दूसरे का पर्याय बने पीआरआई और राज्यसत्ता (जैसे अपने यहां कांग्रेस/बीजेपी/संस्थागत ‘वाम’ और सरकार) तथा सबसे बड़े मीडिया समूह तेलेवीसा ने मिलकर खत्म कर डाला था। श्रम ‘सुधार’ और ‘उदार’ कर-व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से यू.एस. का हुक्म बजाते नाफ्टा [3] करार पर पीआरआई की बलैयाँ  लेने वाली तेलेवीसा ने अपने कारनामों से जनमत सरकार के पक्ष में या ठीक-ठीक कहें तो पीआरडी के खिलाफ़ मोड़ दिया था।

    सबसे पहले, तेलेवीसा ने अपने बड़े नेटवर्क और उसपर आम लोगों के भरोसे को भंजाते हुए पीआरआई उम्मीदवार एर्नेस्तो सेदियो को अन्य उम्मीदवारों के मुकाबले 10 गुना ज्यादा प्रचार दिया। फिर, पीआरआई विरोधी मतों को बांटने के लिए 1980 में खड़ी हुई कट्टर कैथोलिक रुझानों वाली पार्टी पीएएन (पार्तिदो दे ला आक्सियोन नासियोनाल- राष्ट्रीय कारवाई का दल) को पीआरडी से ज्यादा तवज्जो देकर ‘विपक्ष’ बनाया गया। इतना ही नहीं, पीआरडी की राजनीतिक चुनौती को कुंद करने के लिए बिल्कुल उसी के सुर में मजदूर-किसान हित और व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाली पीटी (पार्तिदो दे लोस त्राबाखादोरेस-मजदूर दल) को रातों-रात सनसनीखेज तरीके से देश का ‘हीरो’ बना दिया गया! यह और बात है कि इस पार्टी का न तो पहले कभी नाम सुना गया था और न ही देश में इसका कोई संगठन था! यह सब करते हुए बाकी खबरें (हां, कहने के लिए तो वे खबरें ही थी!) भी पीआरआई की जीत के हिसाब से तय हो रहीं थी। मसलन, चुनाव से ठीक पहले सर्बिया-बोस्निया गृहयुद्ध और दूसरे देशों के अंदरूनी झगड़ों को बार-बार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। इशारा साफ था, अगर मेक्सिको को टूटने या कमजोर होने से बचाना है, तो देशवासियों को ‘अनुभवी’ और ‘सबको साथ लेकर चलने वाली’ पीआरआई का साथ देना ही चाहिए! यहां पीआरडी, जिसके हजारों कार्यकर्ता सरकारी हिंसा का शिकार हुए, और चियापास में भूमिहीन मूलवासियों के हथियारबंद सापातिस्ता आंदोलन को बतौर ‘खलनायक’ पेश किया गया।  

    तेलेवीसा की अगुआई में बड़ी मीडिया की इन सब कलाबाजियों का नतीजा पीआरडी की एक और हार तथा पीआरआई की ‘जीत’ के रूप में सामने आया। पहले से ही विदेशी पूंजी पर टिके और नाफ्टा में प्रस्तावित कर ‘सुधार’ आदि से अपनी कमाई कई गुना बढ़ाने को आतुर बड़ी मीडिया ने इस जीत को को तुरत-फुरत ‘ऐतिहासिक’ भी बता दिया था! वैसे इस जीत का असली खिलाड़ी तो सिर्फ रेफरी होने का ढोंग कर रहा यही मीडिया था, जिसने अपनी और अन्य धनकुबेरों की बेशुमार दौलत की खातिर मुनाफे की एक और सरकार बनवा दी थी। यहां बताते चलें कि पीआरआई के लिए चंदे की खातिर रखे गए सिर्फ़ एक रात्रि-भोज के दौरान 750 मिलियन डालर (करीब 45 सौ करोड़ रु.) जुटाए गए, जिसमें 70 मिलियन डालर (करीब 4 सौ 27 करोड़ रू.) तो तेलेवीसा के मालिक एमीलीयो इसकारागा ने ही दिए थे!

    लैटिन अमेरिका इन क्राइसिस (संकटग्रस्त लातीनी अमरीका) के लेखक जान डब्ल्यू शेरमान ने मेक्सिको में बडी मीडिया के द्वारा रचे गए ‘लोकतंत्र’ के इस नाटक को ‘मीडियाक्रेसी’ कहा है। इस ‘मीडियाक्रेसी’ में आबादी के बड़े हिस्से की सोच पर हावी एक या एक से अधिक कॉरपोरेट मीडिया, जैसे मेक्सिको में तेलेवीसा, अपने फायदे की सरकार बनाते-गिराते रहते हैं। यहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन सी पार्टी आ रही है, बस इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि जो भी आए इस मीडिया के काम आए! अपने मतलब के लिए सत्तासीन पार्टियों की अदला-बदली तो यहां की खास रवायत है! साल 2000 आते-आते मेक्सिको यह सब कुछ देख चुका था, जब राष्ट्रपति चुनावों में जीत का सेहरा पीआरआई के बजाय पीएएन के सिर बांधा गया। धार्मिक कट्टरता के अपने सभी दावों को बड़ी चालाकी से छुपा पीएएन अब बाजार की सबसे बड़ी हिमायती पार्टी बन गई थी और देश को नए राष्ट्रपति के रूप में कोका-कोला (मेक्सिको) के मुखिया रहे विसेंते फाक्स का ब्रांडेड तोहफा दिया था!

    निष्कर्ष: भारत और मीडियाक्रेसी की ‘लहरें’

    चुनावों से ठीक पहले ज्यादातर टी.वी. और अखबार मोदी तथा उनके मनपसंद प्रचार-हथकंडों, जैसे गुजरात में ‘विकास’ की विडंबनाओं पर घुन्ना चुप्पी और आतंकवाद (मतलब आई. एम. मतलब मुसलमान!) की तोतारटंत, से सज गए हैं। पूरी दुनिया का ‘सच’ “सबसे पहले” बताने-दिखाने का दावा करने वाली बड़ी मीडिया भला “हर-हर मोदी” के उन्माद में बौड़ाए संघी लगुओं-भगुओं-सा व्यवहार क्यों कर रही  है! वैसे, कल तक यही मीडिया अस्सी-नब्बे के दशक से नेहरुवादी समाजवाद का अपना ही बुना भ्रमजाल (जिसमें चलती स्थानीय जमींदारों-पूंजीपतियों की ही थी) तोड़कर बाजार के ‘मनमोहनी’ छ्लावे बेचती कांग्रेस पर फिदा था। हो भी क्यों न, ‘खबर’ बेचने के अपने कारोबार में ठेका-प्रथा और अधिकतम काम के लिए कम-से-कम पगार जैसे उदारीकरण के ‘वरदानोँ’ का सबसे ज्यादा फायदा भी तो इसी मीडिया ने उठाया है! और आज जब शोषण और लूट की इन्हीं सब नीतियों के लिए मनमोहन सिंह “अंडरएचीवर” बन चुके हैं, तब यह मीडिया पूरी पेशेवर सफाई और ‘निष्पक्षता’ से कारपोरेट पूंजी के नए, ‘सख्त’, ‘कठोर’ आदि, आदि…सेवक बने नरेंद्र मोदी के साथ हो लिया है!

    यहां मेक्सिको के जिन अनुभवों को रखा गया है, उनकी नजर से देखें तो कांग्रेस से बड़ी मीडिया का इस तरह किनारा कर लेना ज्यादा बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। मसलन, मेक्सिको के पीआरआई की तरह कांग्रेस भी जहाँ सत्ता के सभी खुले-छुपे हिस्सों पर वर्षों की अपनी पकड़ के बावजूद (या शायद इसी वजह से) वंचित तबकों के बुनियादी मुद्दे हल नहीं कर सकी, वहीं लोकप्रिय दिखने की चुनावी मजबूरियों के चलते वह आज कॉरपोरेट मुनाफे को खुली छूट भी नहीं दे सकती। इस तरह, ‘विकास’ और ‘सबका साथ’ के दावों के अपने ही अंतर्विरोधों में टूटी-फूटी यह पार्टी सिर्फ मुनाफे के लिए ‘प्रतिबद्ध’ बड़ी पूंजी की पहली पसंद नहीं रह गई है। वहीं, एकमुश्तिया वोट बटोरने के अपने हिंदू सांप्रदायिक एजेंडे को कारपोरेटी विकास की चकमक चाशनी में पेश करते मोदी बड़ी मीडिया के लिए ज्यादा जिताऊ-बिकाऊ खिलाड़ी (जैसे मेक्सिको में पीएएन) बन चुके हैं!

    आजकल (या कम से कम मोदी को सीधे-सीधे चुनौती देने तक) बड़ी मीडिया की लाडली बनी आम आदमी पार्टी के हो-हल्ले के पीछे झांके, तो लोकतंत्र पर भारी पड़ते पूँजी का खेल यहाँ भी दिख जाता है। सबसे पहले, सिर्फ़ पैसों के हेरफेर को भ्रष्टाचार समझने के चलताऊ नजरिए से लैस ‘आप’ ने भ्रष्टाचार की टी.वी. पर नहीं दिखने वाली, लेकिन हमारी पूरी व्यवस्था की जड़ में बैठी सच्चाइयों (आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का है, जिसमें ज्यादातर दलित हैं) से लोगों का ध्यान हटा दिया है। फिर, इतिहास की कई नाइंसाफियों की उपज ऐसी सच्चाइयों को ‘सामान्य’ समझने-समझाने वाले हमारे समाज के बड़े हिस्से को बिना कोई जनांदोलन खड़ा किए ‘ईमानदार’ होने और व्यवस्था ‘बदलने’ का फास्टफुडिया इल्हाम भी दे दिया गया है! यह तब जब दलितों-मुसलमानों-स्त्रियों सहित व्यवस्था के सभी शिकारों पर ‘आम आदमी’ के इस पार्टी का रवैया बिल्कुल सतही और आखिरकार शोषक सत्ताओं और विचारों को ही आगे बढ़ाने वाला है। मसलन, औरतों के सवालों को उनकी पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक  गहराई में उठाने की बजाय यहाँ इन सवालों का निशाना रही पुरुषसत्ता को ही “महिलाओं की कमांडो फोर्स” का नया हथियार दे दिया गया है! वहीं, धार्मिकता, पूरी राजनीतिक व्यवस्था और पुलिस आदि के जरिए वार करती सांप्रदायिकता पर सीधी बहस न खड़ी कर इसे सिर्फ़ मोदी विरोध और मुसलमानों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अभी तक चल रहे सरकारी छलावे के चुनावी तोतारटंत के भरोसे छोड दिया गया है। लोकतंत्र के तमाम दावों के बावजूद आप का अंदरूनी ढाँचा (जिसमें चलती सिर्फ़ पोस्टर ब्वाय अरविंद केजरीवाल और उन्हीं के चुने कुछ टेक्नोक्रेट लोगों की ही है) और स्वराज का इसका मंत्र (जहां सर्वशक्तिशाली लोकपाल न तो जनता द्वारा चुना जाएगा और न ही उसकी कोई जन-जवाबदेही होगी) भी भागीदारी और जनवाद के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं देते।

    इस तरह, सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण तथा पूँजीपतियों के ही हित साधने वाली मौजूदा आर्थिक नीतियों पर पूरी सहमति (याद करें केजरीवाल के “अच्छे” उद्योगपतियों के ‘बिजनेस’ में दखल न देने की वह चारों तरफ छापी गई टिप्पणी!) के साथ ‘आप’ ‘मुख्यधारा’ की राजनीति के लिए कोई खतरा नहीं है। बल्कि, आज कॉरपोरेट व्यवस्था के लिए भी चंद नामों पर चलती और और देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजाना उठ रही प्रतिरोध की अनगिनत आवाजों से कोई भी गहरा जुड़ाव न रखने वाली यह पार्टी एक वफादार और ‘ईमानदार’ ‘विरोधी’ बन रही है।आश्चर्य नहीं कि इसी व्यवस्था की जय-जयकार करती बड़ी मीडिया, जो जनांदोलनों को “अराजक”, “माओवादी” आदि बताकर खबरों से गायब कर दिया करती है, शुरू से ही ‘आप’ को चमका-दमका कर खड़ा करती आई है (बहुत-कुछ मेक्सिको के पीटी की तरह)! यह जरूर है कि जबर्दस्त संगठन और हिंदुत्व के वोटखींचू ताकत की वजह से लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा इस मीडिया से ’आप’ से ज्यादा तरजीह पा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब मोदी का खूनी चेहरा रोज नए ग्राहक ढूँढ़ती बड़ी पूँजी के काम का नहीं रहेगा, तब ‘साफ-सुथरी’ ‘आप’ को दुबारा हीरो बनते देर नहीं लगेगी!

    कुल मिलाकर, चौबीसो घंटे की प्राईम टाईम खबर बने मोदी (जिनकी रैलियों और वहां जुटाई गई भीड़ को कई-कई कैमरों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है), फिलहाल सिर्फ़ विज्ञापनों की तरह बीच-बीच में दिखाए जाते केजरीवाल और छोटू बना दिए गए कांग्रेस और अन्य दलों के साथ बड़ी मीडिया लोकतंत्र का एक और “महापर्व” रचने मॆ जुट गई है। हालांकि, इस महापर्व को रचने-बेचने के लिए महाभारत और दबंग के नायकों (सभी मर्द और सवर्ण!) की आदि हो चुकी जनता को मुट्ठी बाँधे, लड़ने को तैयार मोदी और केजरीवाल/राहुल दिखाकर इनके “सीधे मुकाबले” का भुलावा भी दिया जा रहा है! और, मेक्सिको की ही तरह यहाँ भी ‘भविष्य’ के इन चेहरोँ की नूराकूश्ती मेँ हमारे जल-जंगल-जमीन को डकारते बडी पूँजी के खतरे पर कहीँ कोई बात नहीँ होती!

    टिप्पणियां:

    1. इन मांगों को उनकी पूरी गहराई और तफ़सील में मेक्सिको की दीवारों पर दर्ज करने का काम दिएगो रिबेरा, दाविद सिकिएरोस और उनके साथियों ने किया।

    2. दुनिया में पहली बार लोकप्रिय समर्थन से चुनी गई साल्वादोर आयेंदे की साम्यवादी सरकार के 1973 में तख्तापलट के साथ चिली इन देशों का सबसे कुख्यात उदाहरण बना। यू.एस. के तब के विदेश मंत्री किसिंगर ने कहा था: “हम चुपचाप हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगे, जब चिली की जनता की गैर-जिम्मेदारी से वहां कोई कम्युनिस्ट सरकार आ जाए”! 1973 में चिली के तानाशाह बने आगोस्तो पिनोचे यू.एस. के हथियारों और सैनिकों के बल पर ही सत्ता हथिया पाए थे।

    3.  North Atlantic Free Trade Agreement: उत्तर अटलांटिक मुक्त व्यापार संगठन 1 जनवरी, 1994 को यू.एस., मेक्सिको और कनाडा को शामिल करते हुए अस्तित्व में आया। ठीक इसी दिन भूमिहीन मूलवासियों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता के नारों को उठाते हुए चियापास के जंगलों और गलियों पर एकदम से छा जाने वाले सापातिस्ता फ्रंट के लड़ाकों ने इस तारीख को सचमुच ऐतिहासिक बना दिया था। सापाता के ये नए साथी गुलामी की नई शर्तें थोपने वाले इस करार को रद्द करने के साथ-साथ मेक्सिको की पूरी शासन व्यवस्था को बदलने के लिए भी लड़ रहें हैं।

    संदर्भ सूची:

    Canclini, Garcia Nestor. Hybrid Culture: Strategies for Entering and Leaving Modernity. Minneapolis, London: University of Minnesota Press. 1995.

    Galeano, Eduardo. Memoria del fuego (II): las caras y las mascaras. Madrid: Siglo Veintiuno de España Editores. 1984.

    Galeano, Eduardo. Upside Down: A Primer for the Looking Glass World (translation by Mark Fried). New York: Metropolitan Books. 2000

    Sherman, W. John. Latin America in Crisis. Colorado: Westview Press. 2000.

    Williams, Gareth. The Other Side of the Popular. Durham & London: Duke University Press. 2002

  • आखिर हम कितना गहरा खोदेंगे: अरुंधति रॉय

    एक सिलसिला सा पूरा हुआ. अरुंधति रॉय का यह व्याख्यान पढ़ते हुए आप पाएंगे कि चीजें कैसे खुद को दोहरा रही हैं. यह व्याख्यान एक ऐसे समय में दिया गया था जब भाजपा के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार चुनावों में थी, कहा जा रहा था कि भारत का उदय हो चुका है, लोग अच्छा महसूस कर रहे हैं. लोग सोच रहे थे कि एनडीए के छह सालों के शासन ने तो पीस डाला है, एक बार फिर से कांग्रेस को मौका दिया जाना चाहिए. कांग्रेस जीती भी. लेकिन आज, दस साल के बाद कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने तो पीस कर रख दिया, भाजपा को मौका दिया जाना चाहिए. हवाओं और लहरों की बड़ी चर्चा है. लेकिन इस व्याख्यान को इस नजर से भी पढ़ा जाना चाहिए, कि क्या भारत में होने वाले लगभग हरेक चुनाव इसी तरह की झूठी उम्मीदें बंधाते हुए नहीं लड़े जाते. हर बार एक दल उम्मीदें तोड़ता है और दूसरे से उम्मीदें बांध ली जाती हैं. अगला चुनाव (या बहुत हुआ तो उससे अगला या उससे अगला) चुनाव आते आते ये दल आपस में भूमिकाएं बदल लेते हैं- और जनता ठगी जाती रहती है. क्या यह कहने का वक्त नहीं आ गया है कि बस बहुत हो चुका? या बास्तांते!

    अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 6 अप्रैल 2004 को दिये गये आई.जी. खान स्मृति व्याख्यान का सम्पूर्ण आलेख है।[1] यह पहले हिन्दी में 23–24 अप्रैल 2004 को हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ (अनुवाद: जितेंद्र कुमार), और फिर अंग्रेजी में 25 अप्रैल 2004 को द हिन्दू में।


    हाल ही में एक नौजवान कश्मीरी दोस्त मुझसे कश्मीर की जिन्दगी के बारे में बात कर रहा था। राजनैतिक भ्रष्टाचार और अवसरवाद के दलदल, सुरक्षा–बलों के बेरहम वहशीपन और हिंसा में डूबे समाज की अधूरी संक्रमणशील सीमाओं के बारे में बता रहा था, जहाँ आतंकवादी, पुलिस, खुफिया अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, व्यवसायी और पत्रकार भी एक–दूसरे के रू–ब–रू होते हैं और आहिस्ता–आहिस्ता एक–दूसरे में तब्दील हो जाते हैं। वह अन्तहीन खून–खराबे, लोगों के लगातार ‘गायब’ होने, फुसफुसाहटों, भय, अनसुलझी अफवाहों के बीच जीने के बारे में और जो सचमुच हो रहा है, जो कश्मीरी जानते हैं कि हो रहा है और जो हम बाकियों को बताया जाता है कि हो रहा है, इसकी आपसी असम्बद्धता के बीच जीने के बारे में बता रहा था। उसने कहा, ‘पहले कश्मीर एक धन्धा था, अब वह पागलखाना बन चुका है।’

    जितना अधिक मैं उसकी टिप्पणी के बारे में सोचती हूँ, उतना ही ज्यादा मुझे यह वर्णन पूरे हिन्दुस्तान के लिए उपयुक्त जान पड़ता है। यह मानते हुए कि कश्मीर और – मणिपुर, नगालैण्ड और मिजोरम के – उत्तर-पूर्वी राज्य उस पागलखाने के दो अलग-अलग खण्ड हैं जिनमें इस पागलखाने के ज्यादा खतरनाक वार्ड हैं। लेकिन, हिन्दुस्तान के बीचोबीच भी, जानकारी और सूचना के बीच, जो हम जानते हैं और जो हमें बताया जाता है उसके बीच, जो अज्ञात है और जिसका दावा किया जाता है उसके बीच, जिस पर पर्दा डाला जाता है और जिसका उद्घाटन किया जाता है उसके बीच, तथ्य और अनुमान के बीच, ‘वास्तविक’ दुनिया और आभासी दुनिया के बीच जो गहरी खाई है, वह ऐसी जगह बन गयी है जहाँ अन्तहीन अटकलों और सम्भावित पागलपन का साम्राज्य फैला हुआ है। एक जहरीला घोल है जिसे हिला–हिला कर खौलाया गया है और सबसे ज्यादा घिनौने, विध्वंसक राजनैतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया गया है।

    हर बार जब कोई तथाकथित आतंकवादी हमला होता है, सरकार थोड़ी–बहुत या बिना किसी छानबीन के, इसकी जिम्मेवारी किसी के सर पर मढ़ने के लिए दौड़ पड़ती है। गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आगजनी, संसद भवन पर 13 दिसम्बर 2001 का हमला या छत्तीसिंहपुरा (कश्मीर) में मार्च 2000 को तथाकथित आतंकवादियों द्वारा सिखों का जनसंहार इसके कुछ बड़ी–बड़ी मिसालें हैं। (वे तथाकथित आतंकवादी, जिन्हें बाद में सुरक्षा–बलों ने मार गिराया, बाद में निर्दोष साबित हुए। बाद में राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि खून के फर्जी नमूने डीएनए जाँच के लिए पेश किये गये थे।[2] इनमें से हर मामले में जो साक्ष्य सामने आये, उनसे बेहद बेचैन कर देने वाले सवाल उभरे और इसलिए मामले को फौरन ताक पर धर दिया गया। गोधरा का मामला लीजिए–जैसे ही घटना घटी, गृहमंत्री ने घोषणा की कि यह आई.एस.आई. का षड्यंत्र है। विश्व हिन्दू परिषद का कहना है कि यह पेट्रोल बम फेंक रहे मुसलमानों की भीड़ का काम था।[3] गम्भीर सवाल अनसुलझे रह जाते हैं। अटकलों का कोई अन्त नहीं है। हर आदमी जो जी चाहे मानता है, लेकिन घटना का इस्तेमाल संगठित साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने के लिए किया जाता है।

    11 सितम्बर के हमले की घटना के इर्द–गिर्द बुने गये झूठ और प्रपंच का उपयोग अमरीकी सरकार ने एक नहीं, बल्कि दो देशों पर हमला करने के लिए किया–और ऊपरवाला ही जाने आगे–आगे होता है क्या? भारत सरकार इसी रणनीति का इस्तेमाल करती है–दूसरे देशों के साथ नहीं, बल्कि अपने ही लोगों के खिलाफ।

    पिछले एक दशक के अर्से में पुलिस और सुरक्षा–बलों द्वारा मारे गये लोगों की गिनती हजारों में है। हाल में मुम्बई के कई पुलिसवालों ने प्रेस के सामने खुले तौर पर स्वीकार किया कि अपने ऊँचे अधिकारियों के ‘आदेश’ पर उन्होंने कितने ‘गैंगस्टरों’ का सफाया किया।[4] आन्ध्र प्रदेश में औसतन एक साल में तकरीबन दो सौ ‘चरमपन्थियों’ की मौत ‘मुठभेड़’ में होती है।[5] कश्मीर में, जहाँ हालात लगभग जंग जैसे हैं, 1989 के बाद से अनुमानतः 80 हजार लोग मारे जा चुके हैं। हजारों लोग गायब हैं।[6] ‘गुमशुदा लोगों के अभिभावक संघ’ (एपीडीपी) के अनुसार अकेले 2003 में तीन हजार से अधिक लोग मारे गये हैं, जिनमें से 463 फौजी हैं।[7] ‘अभिभावक संघ’ के अनुसार अक्टूबर 2002 में जब से मुफ्ती मोहम्मद सरकार ‘मरहम लगाने’ के वादे के साथ सत्ता में आयी, तब से 54 लोगों की हिरासती मौत हुई है।[8] प्रखर राष्ट्रवाद के इस युग में जब तक मारे गये लोगों पर गैंगस्टर, आतंकवादी, राजद्रोही, या चरमपन्थी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, उनके हत्यारे राश्ट्रीय हित के धर्मयोद्धाओं के तौर पर छुट्टा घूम सकते हैं और किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते। अगर यह सच भी होता (जो कि निश्चय ही नहीं है) कि हर आदमी जो मारा गया है वह सचमुच गैंगस्टर, आतंकवादी, राजद्रोही, या चरमपन्थी था–तो यह बात हमें सिर्फ यही बताती है कि इस समाज के साथ कोई भयंकर गड़बड़ी है जो इतने सारे लोगों को ऐसे हताषा–भरे कदम उठाने पर मजबूर करता है।

    भारतीय राज्य–व्यवस्था में लोगों को उत्पीड़ित और आतंकित करने की तरफ जो रुझान है उसे ‘आतंकवाद निरोधक अधिनियम’ (पोटा) को पारित करके संस्थाबद्ध और संस्थापित कर दिया गया है, जिसे दस राज्यों ने लागू भी कर दिया है। पोटा पर सरसरी निगाह डालने से भी यह पता चल जायेगा कि वह क्रूरतापूर्ण और सर्वव्यापी है। यह ऐसा अनगिनत फंदों वाला और सर्वसमावेशी कानून है जो किसी को भी अपनी गिरफ्त में ले सकता है–विस्फोटकों के जखीरे के साथ पकड़े गये अल–कायदा का कार्यकर्ता भी और नीम के नीचे बाँसुरी बजा रहा कोई आदिवासी भी। पोटा की हुनरमन्दी की खासियत यह है कि सरकार इसे जो बनाना चाहे, यह बन सकता है। जीने के लिए हम उनके मोहताज हैं जो हम पर राज करते हैं। तमिलनाडु में राज्य सरकार इसका इस्तेमाल अपनी आलोचना का दम घोंटने के लिए करती है।[9] झारखण्ड में 3200 लोगों को, जिनमें ज्यादातर गरीब आदिवासी हैं और जिन पर माओवादी होने का आरोप लगाया गया है, पोटा के तहत अपराधी ठहराया गया है।[10] पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस कानून का उपयोग उन लोगों के खिलाफ किया जाता है जो अपनी जमीन और आजीविका के अधिकार के हनन का विरोध करने की जुर्रत करते हैं।[11] गुजरात और मुम्बई में इसे लगभग पूरे तौर पर मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता र्है।[12] गुजरात में, 2002 के राज्य प्रायोजित जनसंहार के बाद, जिसमें अनुमानतः 2000 मुसलमान मारे गये और डेढ़ लाख बेघर कर दिये गये, 287 लोगों पर पोटा लगाया गया, जिनमें 286 मुसलमान और एक सिख है।[13] पोटा में इस बात की छूट दी गयी है कि पुलिस हिरासत में हासिल बयान कानूनी सबूत के तौर पर माने जा सकते हैं। हकीकतन, पोटा निजाम के तहत, पुलिसिया छानबीन की जगह पुलिस यातना ले लेती है। यह ज्यादा त्वरित, ज्यादा सस्ता है और शर्तिया नतीजे पैदा करने वाला है। अब कीजिए बात सरकारी खर्च घटाने की।

    मार्च 2004 में, मैं पोटा पर हो रही जनसुनवाई में मौजूद थी।[14] दो दिनों तक लगातार हमने अपने इस अद्भुत लोकतन्त्र में हो रही घटनाओं की लोमहर्षक गवाहियाँ सुनीं। मैं यकीनन कह सकती हूँ कि हमारे पुलिस थानों में सब कुछ होता है–लोगों को पेशाब पीने पर मजबूर करने, उन्हें नंगा करने, जलील करने, बिजली के झटके देनें, सिगरेट के जलते हुए टोटों से जलाये जाने, गुदा में लोहे की छड़ें घुसेड़ने से ले कर पीटने और ठोकरें मार–मार कर जान ले लेने तक।

    देश भर में पोटा के आरोपित सैकड़ों लोग, जिनमें कुछ बहुत छोटे बच्चे भी शामिल हैं, कैद करके जमानत के बिना, विशेष पोटा अदालतों में, जो जनता की छानबीन से परे हैं, सुनवाई के इन्तजार में हिरासत में रखे गये हैं। पोटा के तहत धरे गये अधिकतर लोग एक या दो अपराधों के दोषी हैं। या तो वे गरीब हैं–ज्यादातर दलित और आदिवासी। या फिर वे मुसलमान हैं। पोटा आपराधिक कानून की इस माने हुए नियम को उलट देता है कि कोई भी व्यक्ति तब तक दोषी नहीं है, जब तक उसका अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। पोटा के तहत आपको तब तक जमानत नहीं मिल सकती जब तक आप साबित नहीं कर देते कि आप निर्दोष हैं और वह भी उस अपराध के सिलसिले में जिसका औपचारिक आरोप आप पर नहीं लगाया गया है। सार यह है कि आपको यह साबित करना होगा कि आप निर्दोष हैं भले ही आपको उस अपराध का सान–गुमान भी न हो जो फर्जिया तौर पर आपने किया है। और यह हम सब पर लागू होता है। तकनीकी तौर पर हम एक ऐसा राष्ट्र हैं, अपराधी ठहराये जाने का इन्तजार कर रहा है।

    यह मानना भोलापन होगा कि पोटा का ‘दुरुपयोग’ हो रहा है। इसके विपरीत इसका इस्तेमाल ठीक–ठीक उन्हीं कारणों से किया जा रहा है, जिसके लिए यह बनाया गया था। असल में तो अगर मलिमथ समिति की सिफारिशों को लागू किया जाये तो पोटा जल्दी ही बेकार हो जायेगा। मलिमथ समिति ने सिफारिश की है कि किन्हीं सन्दर्भों में सामान्य आपराधिक कानून को पोटा के प्रावधानों के मुताबिक ढाला जाय।[15] इसके बाद कोई अपराधी नहीं रहेगा, सिर्फ आतंकवादी होंगे, साफ-सुथरा हल है, झंझट बचेगा।

    जम्मू–कश्मीर और अनेक पूर्वोत्तर राज्यों में आज ‘सैन्य बल विशेष अधिकार अधिनियम’ न केवल सेना के अफसरों और कमीशन–प्राप्त जूनियर अधिकारियों को, बल्कि गैर–कमीशन–प्राप्त जूनियर अधिकारियों को भी किसी व्यक्ति पर हथियार रखने या कानून–व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाने के सन्देह में बल–प्रयोग (यहाँ तक कि मार भी डालने) की इजाजत देता है।[16] सन्देह में! किसी भी भारतवासी को इस बारे में कोई भ्रम नहीं हो सकता कि इसका क्या मतलब होता है। सुरक्षा बलों द्वारा यातना, गुमशुदगी, हिरासत में मौत, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की जो घटनाएँ दर्ज की गयी हैं, वे आपका खून जमा देने के लिए पर्याप्त हैं। इस सब के बावजूद, अगर हिन्दुस्तान को अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी और खुद अपने मध्यवर्ग के बीच एक वैध लोकतन्त्र की छवि बनाये रखने में सफल है, तो यह एक जीत ही है।

    ‘सैन्य बल विशेष अधिकार अधिनियम’ उस अधिनियम का और भी कठोर प्रारूप है, जिसे लॉर्ड लिनलिथगो ने भारत छोड़ो आन्दोलन से निपटने के लिए 15 अगस्त 1942 को पारित किया था। 1958 में इसे मणिपुर के कुछ हिस्सों में लागू किया गया, जिन्हें ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया गया था। 1965 में पूरा मिजोरम, जो तब असम का हिस्सा था, ‘अशांत’ घोशित कर दिया गया। 1972 में इस अधिनियम के तहत त्रिपुरा भी आ गया। और 1980 के आते–आते पूरे मणिपुर को ‘अशांत’ घोषित कर दिया गया।[17] इससे ज्यादा और कौन–से सबूत चाहिए कि दमनकारी कदम उल्टा नतीजा देते हैं और समस्या को सुलझाने के बजाय उलझा देते हैं?

    लोगों का उत्पीड़न करने और उनका सफाया कर देने की इस अशोभन उत्सुकता के साथ–साथ भारतीय राज्य–व्यवस्था में उन मामलों की छानबीन करके उन्हें अदालतों तक पहुँचाने न्याय देने की लगभग प्रकट अनिच्छा भी दिखाई देती है, जिनमें भरपूर साक्ष्य मौजूद हैं: 1984 में दिल्ली में तीन हजार सिखों का संहार, 1993 में मुम्बई में और 2002 में गुजरात में मुसलमानों का संहार (आज तक किसी को सजा नहीं), कुछ साल पहले जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चन्द्रशेखर की हत्या, 12 वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के शंकर गुहा नियोगी की हत्या–इसके चन्द उदाहरण हैं।[18] जब पूरी राज्य मशीनरी ही आपके खिलाफ खड़ी हो, तो चश्मदीद गवाहियाँ और ढेर सारे प्रामाणिक सबूत तक नाकाफी हो जाते हैं।

    इस बीच, बड़ी पूँजी से निकलने वाले अखबारों में उल्लसित अर्थषास्त्री हमें बताते हैं कि सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर अभूतपूर्व है, अप्रत्याशित है। दुकानें सामानों से अटी पड़ी हैं। सरकारी गोदाम अनाज से भरे हुए हें। इस चकाचौंध से बाहर कर्ज में डूबे किसान सैकड़ों की तादाद में आत्म–हत्या कर रहे हैं।[19] देश भर से भुखमरी और कुपोषण की खबरें आ रही हैं, फिर भी सरकार ने अपने गोदामों में 6 करोड़, 30 लाख टन अनाज सड़ने दिया।[20] एक करोड़ 20 लाख टन अनाज निर्यात करके घटायी गयी दरों पर बेचा गया जिन दरों पर भारत सरकार भारत के गरीब लोगों को नहीं देना चाहती थी।[21] सुप्रसिद्ध कृषि अर्थषास्त्री उत्सा पटनायक ने सरकारी आँकड़ों के आधार पर भारत में तकरीबन सौ वर्षों की अन्न उपलब्धता और अन्न की खपत की गणना की है। उन्होंने हिसाब लगाया है कि 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों और 2001 के बीच वार्षिक अन्न उपलब्धता घट कर द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों से भी कम हो गयी है, जिनमें बंगाल के अकाल वाले वर्ष शामिल हैं, जिसमें 30 लाख लोगों ने भुखमरी से जानें गँवा दी थीं।[22] जैसा कि हम प्रोफेसर अमर्त्य सेन की कृतियों से जानते हैं, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं भूख से हुई मौतों को अच्छी नजर से नहीं देखतीं। इस पर ‘स्वतंत्र समाचार माध्यमों’ में नकारात्मक टीका–टिप्पणी और आलोचना होने लगती है।[23]

    लिहाजा, कुपोषण और स्थायी भुखमरी के खतरनाक स्तर आजकल पसन्दीदा आदर्श हैं। तीन साल से कम उम्र के 47 फीसदी हिन्दुस्तानी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और 46 फीसदी की विकास रुक गया है।[24] उत्सा पटनायक अपने अध्ययन में बतलाती है कि भारत के लगभग 40 फीसदी ग्रामवासियों की अन्न की खपज उतनी ही है जितनी कि उप–सहारा अफ्रीका के लोगों की खाते हैं।[25] आज ग्रामीण भारत में एक औसत परिवार हर साल 1990 के दशक के आरम्भिक वर्षों की तुलना में 100 किग्रा कम अनाज खाते हैं।[26]

    लेकिन भारत के शहरों में, जहाँ कहीं भी आप जायें–दुकान, रेस्टोरेंट, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, जिम्नेजियम, हॉस्पिटल–हर जगह आपके सामने टीवी के पर्दे होंगे, जिनपर चुनावी वादों के पूरे हो चुके दिखेंगे। भारत चमक रहा है, ‘फील गुड’ कर रहा है। आपको महज किसी की पसलियों पर पुलिसवाले के बूटों की धमक पर अपने कान बन्द करने हैं, महज गन्दगी, झोपड़–पट्टियों, सड़कों पर चीथड़ों में जर्जर टूटे हुए लोगों से अपनी निगाहें हटानी हैं और उन्हें टीवी के किसी दोस्ताना पर्दे पर डालनी हैं, और आप उस दूसरी खूबसूरत दुनिया में दाखिल हो जायेंगे। बॉलीवुड की हरदम ठुमके लगाती, कमर मटकाती, नाचती–गाती दुनिया, तिरंगा फहराते और ‘फील गुड’ करते, स्थायी रूप से साधन–सम्पन्न और हरदम खुश हिन्दुस्तानियों की दुनिया। दिनों–दिन यह कहना मुश्किल होता जा रहा है कि कौन–सी दुनिया असली है और कौन–सी दुनिया आभासी। पोटा जैसे कानून टेलीविजन स्विच के मानिन्द हैं। आप इनका प्रयोग गरीब, तंग करने वाले, अवांछित लोगों को पर्दे पर से हटाने के लिए कर सकते हैं।

    ***

    भारत में एक नये तरह का अलगाववादी आन्दोलन चल रहा है। क्या इसे हम ‘नव–अलगाववाद’ कहें? यह ‘पुराने अलगाववाद’ का विलोम है। इसमें वे लोग जो वास्तव में एक बिलकुल दूसरी अर्थ–व्यवस्था, बिलकुल दूसरे देश, बिलकुल दूसरे ग्रह के वासी हैं, यह दिखावा करते हैं कि वे इस दुनिया का हिस्सा हैं। यह ऐसा अलगाव है जिसमें लोगों का अपेक्षाकृत छोटा तबका लोगों के एक बड़े समुदाय से सब कुछ– जमीन, नदियाँ, पानी, स्वाधीनता, सुरक्षा, गरिमा, विरोध के अधिकार समेत बुनियादी अधिकार–छीन कर अत्यन्त समृद्ध हो जाता है। यह रेखीय, क्षेत्रीय अलगाव नहीं है, बल्कि ऊपर को उन्मुख अलगाव है। असली ढाँचागत समायोजन जो ‘इंडिया शाइनिंग’ को, ‘भारत उदय’ को भारत से अलग कर देता है। यह इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को सार्वजनिक उद्यम वाले भारत से अलग कर देता है।

    यह ऐसा अलगाव है जिसमें सार्वजनिक तन्त्र, उत्पादक सार्वजनिक सम्पदा, पानी, बिजली, परिवहन, दूरसंचार, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, प्राकृतिक संसाधन–वह सारी सम्पदा जिसे, यह माना जाता है कि, जनता की नुमाइन्दगी करने वाले भारतीय राज्य को धरोहर की तरह सँजो कर रखना चाहिए, वह सम्पदा जिसे दशकों के अर्से में सार्वजनिक धन से निर्मित किया और सुरक्षित रखा गया है–उसे राज्य निजी निगमों को बेच देता है। भारत में 70 प्रतिशत आबादी–70 करोड़ लोग–ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है।[27] उनकी आजीविका प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। इन्हें उनसे छीन लेना और थोक में निजी कम्पनियों को बेचना बर्बर पैमाने पर बेदखल करने और कंगाल बना देने की शुरुआत है।

    इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड कुछेक व्यापारिक घरानों और बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जागीर बनने की ओर बढ़ रहा है। इन कम्पनियों के प्रमुख कार्याधिकारी (सीईओ) इस देश को, इसके तन्त्र और इसके संसाधनों, इसके संचार माध्यमों और पत्रकारों के नियन्ता होंगे। लेकिन जनता के प्रति उनकी देनदारी शून्य होगी। वे पूरी तरह से–कानूनी, सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक रूप से–जवाबदेही से बरी होंगे। जो लोग कहते हैं कि भारत में कुछ प्रमुख कार्याधिकारी प्रधानमन्त्री से ज्यादा ताकतवर हैं, वे जानते हैं कि वे क्या कह रहे हैं।

    इस सब के आर्थिक आशयों से बिलकुल अलग, भले ही यह वह सब हो जिसका गुण–गान होता है (जो यह नहीं है)–चमत्कारिक, कार्यकुशल, अद्भुत–क्या इसकी राजनीति हमें स्वीकार है? अगर भारतीय राज्य अपनी जिम्मेदारियों को मुट्ठी भर निगमों के यहाँ गिरवी रखने का फैसला करता है तो क्या इसका मतलब यह है कि चुनावी लोकतन्त्र की रंगभूमि पूरी तरह अर्थहीन है? या अब भी इसकी कोई भूमिका रह गयी है?

    ‘मुक्त बाजार’ (जो दरअसल मुक्त होने से कोसों दूर है) को राज्य की जरूरत है और बेतरह जरूरत है। गरीब देशों में जैसे–जैसे अमीर और गरीब लोगों के बीच असमानता बढ़ती जाती है, राज्य का काम भी बढ़ता जाता है। अकूत मुनाफा देने वाले ‘प्यारे सौदों’ की गश्त पर निकली बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ विकासशील देशों में राज्य मशीनरी की साँठ–गाँठ के बिना इन सौदों को तय नहीं कर सकतीं, न इन परियोजनाओं को चला सकती हैं। आज कॉर्पोरेट भूमण्डलीकरण को गरीब देशों में वफादार, भ्रष्ट, सम्भव हो तो निरंकुश सरकारों के अन्तर्राष्ट्रीय संघ की जरूरत है ताकि अलोकप्रिय सुधार लागू किये जा सकें और विद्रोह कुचले जा सकें। इसे कहा जाता है ‘निवेश का अच्छा माहौल बनाना।’ 

    जब हम वोट डालते हैं, तब हम चुनते हैं कि राज्य की उत्पीड़नकारी दमनकारी शक्तियाँ हम किस पार्टी के हवाले करना चाहेंगे।

    फिलहाल भारत में हमें नव–उदारवादी पूंजीवाद और साम्प्रदायिक नव–फासीवाद की, एक–दूसरी को काटती, खतरनाक धाराओं के बीच से रास्ता बनाना है। जहाँ ‘पूँजीवाद’ शब्द की चमक अभी फीकी नहीं पड़ी है, वहीं ‘फासीवाद’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर लोगों को खिझा देता है। हमें अपने आप से पूछना होगा: क्या हम इस शब्द का सटीक प्रयोग कर रहे हैं? क्या हम परिस्थिति को बढ़ा–बढ़ा कर देख रहे हैं? क्या हमारे रोजमर्रा के अनुभव फासीवाद सरीखे हैं?

    जब कोई सरकार कमोबेश खुले–आम ऐसे जनसंहार का समर्थन करती है जिसमें किसी एक अल्पसंख्यक समुदाय के दो हजार लोग बर्बरतापूर्वक मार दिये जाते हैं, तो क्या यह फासीवाद है? जब उस समुदाय की औरतों के साथ सरे–आम बलात्कार होता है और उन्हें जिन्दा जला दिया जाता है, तो क्या यह फासीवाद है? जब सर्वोच्च सत्ता इस बात की गारण्टी करती है कि किसी को इन अपराधों की सजा न मिले, तो क्या यह फासीवाद है? जब डेढ़ लाख लोग अपने घरों से खदेड़ दिये जाते हैं, दड़बों में बन्द कर दिये जाते हैं और आर्थिक और सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिये जाते हैं, तो क्या यह फासीवाद है? जब देश भर में नफरत के शिविर चलाने वाला सांस्कृतिक गिरोह, प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री, कानूनमन्त्री, विनिवेशमन्त्री की प्रशंसा और सम्मान का पात्र बन जाता है, तो क्या यह फासीवाद है? जब विरोध करने वाले चित्रकारों, लेखकों, विद्वानों और फिल्म–निर्माताओं को गाली दी जाती है, उन्हें धमकाया जाता है और उनकी कृतियों को जलाया, प्रतिबन्धित और नष्ट किया जाता है, तो क्या यह फासीवाद है?[28] जब सरकार एक फरमान जारी करके स्कूलों की इतिहास की पाठ्य–पुस्तकों में मनमाने परिवर्तन कराती है, तो क्या यह फासीवाद है? जब भीड़ प्राचीन ऐतिहासिक दस्तावेजों के अभिलेखागार पर आक्रमण करती है और उसमें आग लगा देती है, जब हर छुटभैया नेता पेशेवर मध्यकालीन इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता होने का दावा करता है, जब कष्ट साध्य विद्वत्ता को आधारहीन लोकप्रिय दावेदारी के बल पर खारिज कर दिया जाता है, तो क्या यह फासीवाद है?[29] जब हत्या, बलात्कार, आगजनी और भीड़ के न्याय को सत्ताधारी पार्टी और उससे दाना–पानी पाने वाले बौद्धिकों का गिरोह सदियों पहले की गयी वास्तविक या झूठी ऐतिहासिक गलतियों का समुचित प्रतिकार कह कर जायज ठहराता है, तो क्या यह फासीवाद है? जब मध्यवर्ग और ऊँचे तबके के लोग एक क्षण को रुक कर च्च–च्च करते हैं और मजे से फिर अपनी जिन्दगी में रम जाते हैं, तो क्या यह फासीवाद है? जब इस सबकी सरपरस्ती करनेवाले प्रधानमन्त्री को राजनीतिज्ञ और भविष्य द्रष्टा कह कर उसकी जय–जयकार की जाती है तब क्या हम भरे–पूरे फासीवाद की बुनियाद नहीं रख रहे होते?

    उत्पीड़ित और पराजित लोगों का इतिहास बहुत हद तक अनलिखा रह जाता है–यह सच्चाई सिर्फ सवर्ण हिन्दुओं पर लागू नहीं होती। अगर ऐतिहासिक भूलों को सुधारने के राजनैतिक रास्ते पर चलना ही हमारा चुना हुआ रास्ता है तो निश्चय ही भारत के दलितों और आदिवासियों को हत्या, आगजनी और बेलगाम कहर बरपा करने का अधिकार है?

    रूस में कहा जाता है कि अतीत अनुमान से परे है। भारत में, स्कूली पाठ्य–पुस्तकों के साथ हुई छेड़–छाड़ के अनुभव से हम जानते हैं कि यह बात कितनी सच है। अब सभी ‘छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी’ बस यही उम्मीद लगाये रखने की हालत में पहुँचा दिये गये हैं कि बाबरी मस्जिद खुदाई में पुरातत्व–विदों को राम मन्दिर का कोई अवशेष नहीं मिलेगा। अगर यह सच भी हो कि भारत की हर मस्जिद के नीचे कोई–न–कोई मन्दिर है तो फिर मन्दिर के नीचे क्या था? शायद किसी और देवी–देवता का कोई और हिन्दू मन्दिर। शायद कोई बौद्ध स्तूप। बहुत करके कोई आदिवासी समाधि। इतिहास सवर्ण हिन्दूवाद से शुरू नहीं हुआ, हुआ था क्या? कितना गहरे हम खोदेंगे? कितना उलटेंगे–पलटेंगे। ऐसा क्यों हुआ कि एक तरफ मुसलमान जो सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से इस देश का अटूट अंग है, बाहरी और आक्रमणकारी कहे जाते हैं और क्रूरता से निशाना बनाये जाते हैं, जबकि सरकार विकास अनुदान के लिए ठेकों और कॉर्पोरेट सौदों पर उस हुकूमत के साथ करार करने में व्यस्त है जिसने सदियों तक हमें गुलाम बनाये रखा। 1876 से 1902 के बीच, भयंकर अकालों के दौरान लाखों हिन्दुस्तानी भूख से मर गये, जबकि अंग्रेज सरकार राशन और कच्चे माल का निर्यात करके इंग्लैण्ड भेजती रही। ऐतिहासिक तथ्य मरने वालों की संख्या सवा करोड़ से तीन करोड़ के बीच बताते हैं।[30] बदला लेने की राजनीति में इस संख्या की भी तो कोई जगह होनी चाहिए। नहीं होनी चाहिए क्या? या फिर प्रतिशोध का मजा तभी आता है जब उसके शिकार कमजोर और अशक्त हों और आसानी से निशाना बनाये जा सकते हों?

    फासीवाद को सफल बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। और इतनी ही कड़ी मेहनत ‘निवेश का बेहतर माहौल बनाने’ के लिए करनी पड़ती है। क्या दोनों साथ–साथ बेहतर काम करते हैं? ऐतिहासिक रूप से, कॉर्पोरेशनों को फासीवाद से किसी तरह से गुरेज नहीं रहा है। सीमेन्स, आई.जी. फारबेन, बेयर, आईबीएम और फोर्ड ने नाजियों के साथ व्यापार किया था।[31] हमारे पास भी बिलकुल हाल का उदाहरण सीआईआई (कनफेडेरेशन ऑफ इण्डियन इण्डस्ट्री, भारतीय उद्योग संघ) का है, जिसने 2002 के गुजरात जनसंहार के बाद राज्य सरकार के आगे घुटने टेक दिये थे।[32] जब तक हमारे बाजार खुले है, एक छोटा–सा घरेलू फासीवाद अच्छे सौदे के रास्ते में रुकावट नहीं बनेगा।

    यह दिलचस्प है कि जिस समय तत्कालीन वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह भारत के बाजार को नव–उदारवाद के लिए तैयार कर रहे थे, लगभग उसी समय लालकृष्ण आडवानी साम्प्रदायिक उन्माद को हवा देते हुए और हमें नव-फासीवाद के लिए तैयार करते हुए अपनी पहली रथ-यात्रा पर निकले हुए थे।[33] दिसम्बर 1992 में उन्मादी भीड़ ने बाबरी मस्जिद को तहस–नहस कर दिया। 1993 में महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार ने एनरॉन के साथ बिजली खरीद के सौदे पर हस्ताक्षर किये। यह भारत में पहली निजी बिजली परियोजना थी। एनरॉन समझौता विध्वसंक साबित होने के बावजूद भारत में निजीकरण के युग की शुरुआत कर गया।[34] अब जब कांग्रेस चारदीवारी पर बैठ कर रिरिया रही है, भारतीय जनता पार्टी ने उसके हाथ से मशाल छीन ली है। सरकार के दोनों हाथ मिल कर अभूतपूर्व जुगलबन्दी कर रहे हैं। एक थोक के भाव देश बेचने में व्यस्त है, जबकि दूसरा ध्यान बँटाने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कर्कश, बेसुरा राग अलाप रहा है। पहली प्रक्रिया की भयावह निर्ममता दूसरी प्रक्रिया के पागलपन में सीधे जा मिलती है।

    आर्थिक रूप से भी यह जुगलबन्दी एक कारगर नमूना है। मनमाने निजीकरण से पैदा होनेवाले अकूत मुनाफों (और ‘इण्डिया शाइनिंग’ की कमाई) का एक हिस्सा हिन्दुत्व की विशाल सेना–आर.एस.एस., विहिप, बजरंग दल और बेशुमार दूसरी खैराती संस्थाओं और ट्रस्टों को मदद पहुँचाता है जो स्कूल, अस्पताल और सामाजिक सेवाएँ चलाते हैं। देश भर में इन संगठनों की दसियों हजार शाखाएँ फैली हुई हैं। जिस नफरत का उपदेश ये वहाँ देते हैं, वह पूँजीवादी भूमण्डलीकरण के हाथों निरन्तर बेदखली और दरिद्रता का शिकार लोगों की अनियन्त्रित कुण्ठा से मिल कर गरीबों द्वारा गरीबों के विरुद्ध हिंसा को जन्म देती है। यह इतना कारगर पर्दा है जो सत्ता के तन्त्र को सुरक्षित और चुनौतीरहित बनाये रखता है।

    बहरहाल, जनता की हताशा को हिंसा में बदल देना ही हमेशा काफी नहीं होता। ‘निवेश का अच्छा माहौल’ बनाने के लिए राज्य को अक्सर सीधा हस्तक्षेप भी करना पड़ता है। हाल के वर्षों में, पुलिस ने शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर, जिनमें ज्यादातर आदिवासी थे, कई बार गोलियाँ चलायी हैं। झारखण्ड में नगरनार; मध्यप्रदेश में मेंहदी खेड़ा; गुजरात में उमर गाँव; उड़ीसा में रायगढ़ और चिल्का और केरल में मुतंगा में लोग मारे गये हैं। लोग वन भूमि में अतिक्रमण करने के लिए मारे जाते हैं और उस समय भी जब वे बाँधों, खदान खोदने वालों और इस्पात के कारखानों से वनों की रक्षा कर रहे होते हैं। दमन–उत्पीड़न चलता ही रहता है, चलता ही रहता है। जम्बुद्वीप टापू, बंगाल; मैकंज ग्राम, उड़ीसा। पुलिस द्वारा गोली चलाने की लगभग हर घटना में जिन पर गोली चलायी गयी होती है उन्हें फौरन उग्रवादी करार दे दिया जाता है।]35]

    ***

    जब उत्पीड़ित जन उत्पीड़ित होने से इन्कार कर देते हैं तब उन्हें आतंकवादी कह दिया जाता है और उनके साथ वैसा ही सलूक होता है। आतंक के विरुद्ध युद्ध के इस युग में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में 181 देशों ने इस साल मतदान किया। अमरीका तक ने प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया। भारत मतदान से बाहर रहा।[36] मानवाधिकार पर चैतरफा हमले के लिए मंच तैयार किया जा रहा है।

    इस हालत में, आम लोग एक अधिकाधिक हिंसक होते राज्य के हमलों का मुकाबला कैसे करें?

    अहिंसक सिविल नाफरमानी की जगह सिकुड़ गयी है। अनेक वर्षों तक संघर्ष करने के बाद कई जन प्रतिरोध आन्दोलनों की राह बन्द हो गयी है और वे अब ठीक ही महसूस कर रहे हैं कि दिशा बदलने का वक्त आ गया है। वह दिशा क्या होगी, इस पर गहरे मतभेद हैं। कुछ लोगों का मानना है कि हथियारबन्द संघर्ष ही एकमात्र रास्ता बचा है। कश्मीर और पूर्वोत्तर को छोड़ कर, जमीन की विशाल पट्टियाँ, झारखण्ड, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और मध्यप्रदेश के पूरे–पूरे जिले उन लोगों के नियन्त्रण में हैं जो इस विचार के हामी हैं।[37] दूसरों ने अधिकाधिक मात्रा में यह मानना शुरू कर दिया है कि उन्हें चुनावी राजनीति में हिस्सा लेना चाहिए–व्यवस्था के भीतर घुस कर अन्दर से उसको बदलने की कोशिश करनी चाहिए। (क्या यह कश्मीरी अवाम के सामने मौजूद विकल्पों जैसी नहीं है?) याद रखने की बात यह है कि जहाँ दोनों के तरीके मूल रूप से अलग–अलग हैं, वहीं दोनों एक बात पर सहमत हैं कि अगर इसे मोटे शब्दों में कहें तो अब बहुत हो गया। या बास्ता।

    भारत में इस समय ऐसी कोई बहस नहीं हो रही, जो इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसका नतीजा, देश के जीवन को बदल कर रख देगा–चाहे बेहतरी की तरफ बदले, चाहे बदतरी की तरफ। अमीर, गरीब, शहरी, ग्रामीण–हरेक के लिए।

    हथियारबन्द संघर्ष राज्य की ओर से की गयी हिंसा को बड़े पैमाने पर उकसा देता है। कश्मीर और समूचे पूर्वोत्तर राज्यों को इसने जिस दलदल की ओर धकेल दिया है, उसे हमने देख लिया है। तो हम क्या वहीं करें, जो प्रधानमन्त्री की सलाह है कि हमें करना चाहिए? विरोध छोड़ दें और चुनावी राजनीति के अखाड़े में दाखिल हो जायें? रोड शो में शामिल हो जायें? निरर्थक गाली–गलौज के कर्कश आदान–प्रदान में भाग लें, जिसका एकमात्र उद्देश्य उस मिली–भगत और सम्पूर्ण सहमति पर पर्दा डालना है जो तकरार में जुटे इन लोगों के बीच वैसे पहले से ही लगभग पूरी तरह मौजूद है? हमें भूलना नहीं चाहिए कि हर महत्वपूर्ण मुद्दे–परमाणु बम, बड़े बाँध, बाबरी मस्जिद विवाद और निजीकरण–पर बीज कांग्रेस ने बोये और फिर भाजपा ने उसकी घिनौनी फसल काटने के लिए सत्ता सँभाली।

    इसका यह मतलब नहीं है कि संसद का कोई महत्व नहीं है और चुनावों को नजरअन्दाज कर देना चाहिए। अलबत्ता, एक फासीवादी प्रवृत्ति वाली खुल्लम–खुल्ला साम्प्रदायिक पार्टी और एक अवसरवादी साम्प्रदायिक पार्टी के बीच सचमुच अन्तर है। निश्चय ही, जो राजनीति खुले तौर पर गर्व के साथ नफरत का प्रचार करती है, उसमें और काँइयेपन से लोगों को आपस में लड़ाने वाली राजनीति में सचमुच अन्तर है।

    लेकिन यह सही है कि एक की विरासत ने ही हमें दूसरी की भयावहता तक पहुँचाया है। इन दोनों ने मिल कर उस वास्तविक विकल्प को क्षरित कर दिया है जो संसदीय लोकतन्त्र में मिलना चाहिए। चुनावों के गिर्द रचा गया उन्माद और मेले–ठेले का माहौल संचार माध्यमों में केन्द्रीय स्थान इसलिए ले लेता है, क्योंकि हर आदमी पक्के तौर पर जानता है कि जीते चाहे जो कोई, यथास्थिति मूल रूप से कतई नहीं बदलने जा रही है। (संसद में जोरदार बहस–मुबाहसे और आवेग–भरे भाषणों के बाद भी पोटा को हटाने की प्राथमिकता किसी पार्टी के चुनाव अभियान का हिस्सा नहीं बनी। वे सभी यह जानते हैं कि उन्हें इसकी जरूरत है, इस रूप में या उस रूप में)।[38] चुनाव के दौरान या विपक्ष में रहते हुए वे जो भी कहें, केन्द्र या राज्य की कोई भी सरकार, कोई भी राजनैतिक दल–दक्षिणपन्थी, वामपन्थी, मध्यमार्गी या हाशिये का–नव–उदारवाद के अश्वमेध के घोड़े को नहीं पकड़ सका है। ‘भीतर’ से कोई क्रान्तिकारी बदलाव नहीं आयेगा।

    व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं मानती कि चुनावी अखाड़े में उतरना वैकल्पिक राजनीति का रास्ता है। ऐसा किसी किस्म के मध्यवर्गीय नकचढ़ेपन के कारण नहीं–कि ‘राजनीति गन्दी चीज है’ या ‘सभी नेता भ्रष्ट हैं’–बल्कि इसलिए कि मेरा मानना है कि महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ कमजोर जगहों से नहीं, बल्कि मजबूत जगहों से लड़ी जानी चाहिए।

    नव–उदारवाद और साम्प्रदायिक फासीवाद के दोहरे हमले का निशाना गरीब और अल्पसंख्यक समुदाय बन रहे हैं। जैसे–जैसे नव–उदारवाद गरीब और अमीर के बीच, ‘इण्डिया शाइनिंग’ और भारत के बीच खाई को चौड़ा करता जा रहा है, वैसे–वैसे मुख्यधारा की किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए गरीब और अमीर दोनों के हितों का प्रतिनिधित्व करने का नाटक करना अधिकाधिक हास्यास्पद होता जा रहा है, क्योंकि एक के हितों का प्रतिनिधित्व दूसरे की कीमत पर किया जा सकता है। सम्पन्न भारतीय के नाते मेरे ‘हित’ (अगर मैं साधने की सोचूँ तो) आन्ध्र प्रदेश के गरीब किसानों के हितों से मुश्किल से ही मेल खायेंगे।

    गरीबों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनैतिक पार्टी गरीब पार्टी होगी। उसके पास धन की बहुत कमी होगी। आजकल बिना धन के चुनाव लड़ना सम्भव नहीं है। कुछेक मशहूर सामाजिक कार्यकर्ताओं को संसद में भेज देना तो दिलचस्प है, लेकिन राजनैतिक रूप से सार्थक नहीं है। यह प्रक्रिया इस लायक नहीं है कि उसमें अपनी सारी उर्जा खपा दी जाए। व्यक्तिगत करिश्मा, व्यक्तित्व की राजनीति क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं ला सकती।

    लेकिन गरीब होना कमजोर होना नहीं हैं। गरीबों की ताकत सरकारी इमारतों या अदालती दरवाजों के भीतर नहीं है। वह तो बाहर, खेतों, पहाड़ों, घाटियों, सड़कों और इस देश के विश्वविद्यालयों के परिसरों में है। वहीं बातचीत करनी चाहिए। वहीं लड़ाई छेड़ी जानी चाहिए।

    अभी तो ये जगहें दक्षिणपन्थी हिन्दू राजनीति के हवाले कर दी गयी हैं। उनकी राजनीति के बारे में आपके विचार जो भी हों, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे इन जगहों पर मौजूद हैं और कड़ी मेहनत कर रहे हैं। जैसे–जैसे राज्य अपनी जिम्मेवारियों से मुँह मोड़ कर स्वास्थ्य, शिक्षा और आवष्यक सार्वजनिक सेवाओं को आर्थिक संसाधन देना बन्द करता जा रहा है, वैसे–वैसे संघ परिवार के सिपाही उन क्षेत्रों में दाखिल होते गये हैं। घातक प्रचार करती अपनी हजारों शाखाओं के साथ–साथ वे स्कूल, हस्पताल, दवाखाने, एम्बुलेंस सेवाएँ, दुर्घटना राहत निकाय भी संचालित करते हैं। वे शक्तिहीनता के बारे में जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि लोगों, खासकर शक्तिहीन लोगों की न सिर्फ रोजमर्रा की, सीधी–साधी व्यावहारिक जरूरतें होती हैं, बल्कि उनकी भावनात्मक, आध्यात्मिक, मनोरंजनपरक आवश्यकताएँ और इच्छाएँ भी होती हैं। उन्होंने ऐसी घिनौनी कुठाली बनायी है जिसमें गुस्सा, हताशा, रोजमर्रा की जिल्लत– और बेहतर भविष्य के सपने–सब एक साथ पसाये जा सकते हैं और खतरनाक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किये जा सकते हैं। इस बीच, परम्परागत मुख्यधारा का वामपन्थ अब भी ‘सत्ता हथियाने’ के सपने देख रहा है, लेकिन समय की पुकार को सुनने और कदम उठाने के सिलसिले में अजीब कड़ापन और अनिच्छा प्रदर्शित कर रहा है। वह अपनी ही घेरेबन्दी का शिकार हो गया है और पहुँच से बाहर ऐसे बौद्धिक स्थान में सिमट गया है जहाँ प्राचीन बहसें ऐसी आदिकालीन भाषा में चलायी जा रही हैं, जिसे नाममात्र के लोग ही समझ सकते हैं।

    संघ परिवार के हमले के सामने चुनौती का थोड़ा–बहुत आभास पेश करने वाली एकमात्र ताकत वो जमीनी प्रतिरोध आन्दोलन हैं, जो छिटपुट तौर पर पूरे देश में चल रहे हैं और ‘विकास’ के प्रचलित नमूने के कारण हो रही बेदखली और मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ लड़ रहे हैं। इनमें से अधिकांश आन्दोलन एक–दूसरे से अलग–थलग हैं और ‘विदेशी पैसे पानेवाले एजेण्ट’ होने के निरन्तर आरोप के बावजूद, उनके पास पैसे या संसाधन नहीं हैं। वे आग से जूझने वाले महान योद्धा हैं। उनकी पीठ दीवार से सटी हुई है; लेकिन उनके कान धरती की धड़कन सुनते हैं; वे जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। अगर वे इकट्ठा हो जायें, अगर उनकी मदद की जाये, तो वे बड़ी ताकत बन सकते हैं। उनकी लड़ाई को, जब भी वह लड़ी जायेगी, आदर्शवादी लड़ाई होना होगा, कठोर विचारधारात्मक नहीं।

    ऐसे समय, जब अवसरवाद की तूती बोल रही है, जब उम्मीद दम तोड़ती लग रही है, जब हर चीज रूखी–सूखी सौदेबाजी हो गयी है, हमें सपने देखने का साहस जुटाना होगा। रोमांस पर फिर से दावेदारी करनी होगी। न्याय में, स्वतन्त्रता में और गरिमा में विश्वास का रोमांस। सबके लिए। हमें एकजुट हो कर लड़ाई लड़नी होगी और उसके लिए हमें समझना होगा कि यह दैत्याकार पुरानी मशीन कैसे काम करती है। कौन कीमत चुकाता है, किसे फायदा होता है।

    देश भर में छिटपुट चलने वाले और अलग–अलग मुद्दों की लड़ाई अकेले लड़ने वाले अनेक प्रतिरोध आन्दोलनों ने समझ लिया है कि उनकी किस्म की विशेष हित वाली राजनीति, जिसका कभी समय और जगह थी, अब काफी नहीं है। चूँकि अब वे हाशिये पर आ गये हैं, इसलिए अहिंसक प्रतिरोध की रणनीति से मुँह मोड़ लिया जाय, यह मुनासिब नहीं होगा। लेकिन यह गम्भीर आत्म–निरीक्षण करने की जरूरत की तरफ इशारा करता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम लोग जो लोकतन्त्र को फिर से हासिल करना चाहते हैं, वे अपने चाल–चलन और काम करने के तरीके में समतावादी और जनतान्त्रिक हैं। अगर हमारे संघर्ष को उन आदर्शों पर खरा उतरना है तो हमें उन अन्दरूनी नाइन्साफियों को खत्म करना होगा जो हम दूसरों पर ढाते हैं, महिलाओं पर ढाते हैं, बच्चों पर ढाते हैं। मिसाल के लिए जो साम्प्रदायिकता से लड़ रहे हैं, उन्हें आर्थिक अन्याय पर आँख नहीं बन्द करनी चाहिए। जो लोग बड़े बाँध या विकास की परियोजनाओं के खिलाफ लड़ रहे हैं, उन्हें साम्प्रदायिकता से या अपने क्षेत्र में जातीय दमन से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए, भले ही तात्कालिक रूप से उन्हें अपनी फौरी मुहिम में कुछ नुकसान उठाना पड़े। अगर तदबीर के तकाजे और मौकापरस्ती हमारी आस्था के आड़े आ–जा रही है, तब हममें और मुख्यधारा के नेताओं में कोई अन्तर नहीं रह जायेगा। अगर हम न्याय चाहते हैं तो यह न्याय और समानता सबके लिए होनी चाहिए, न कि कुछ खास समुदायों के लोगों के लिए, जिनके पास हितों को ले कर कुछ पूर्वाग्रह है। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता है। हमने अहिंसक प्रतिरोध को ‘फील गुड’ के राजनैतिक अखाड़े में सिकुड़ जाने दिया है, जिसकी सबसे बड़ी सफलता संचार माध्यमों के लिए फोटो खिंचाने के अवसर हैं और सबसे कम सफलता उपेक्षा है।

    हमें प्रतिरोध की रणनीति का मूल्यांकन करके उस पर तुरन्त विचार करना होगा, वास्तविक लड़ाइयाँ छेड़नी होंगी और असली नुकसान पहुँचाना होगा। हमें याद रखना है कि दाण्डी मार्च बेहतरीन राजनैतिक नाटक ही नहीं था, वह ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक आधार में सेंध लगाना था।

    हमें राजनीति के अर्थ की पुनर्व्याख्या करनी होगी। ‘नागरिक समाज’ की पहलकदमियों का ‘एनजीओकरण’ हमें विपरीत दिशा में ले जा रहा है।[39] वह हमें अराजनैतिक बना रहा है। हमें ‘फण्ड’ और ‘चन्दे’ का मोहताज बना रहा है। हमें सिविल नाफरमानी के अर्थ की पुनःकल्पना करनी होगी।

    शायद हमें जरूरत है लोकसभा के बाहर एक चुनी हुई छाया–संसद की, जिसके समर्थन और अनुमोदन के बगैर संसद आसानी से नहीं चल सकती। ऐसी संसद जो एक जमींदोज नगाड़ा बजाती रहती है, जो समझ और सूचना में साझेदारी करती है (जो सब मुख्यधारा के समाचार–माध्यमों में उत्तरोत्तर अनुपलब्ध हो रहा है)। निडरता से, लेकिन अहिंसात्मक तरीके से हमें इस मशीन के पुर्जों को बेकार बनाना होगा, जो हमें खाये जा रही है।

    हमारे पास समय बहुत कम है। हमारे बोलने के दौरान भी हिंसा का घेरा कसता जा रहा है। हर हाल में बदलाव तो आना ही है। वह खून से सना हुआ भी हो सकता है या खूबसूरती में नहाया हुआ भी। यह हम पर मुनहसिर है।

    संदर्भ और टिप्पणियां

    1.    14 फरवरी 2003 को आई. जी. खान की हत्या पर, देखें पार्वती मेनन, ‘ए मैन ऑफ कम्पैशन,’ फ्रंटलाइन (इण्डिया), 29 मार्च–11 अप्रैल, 2003। इण्टरनेट पर उपलब्ध: http://www.frontlineonnet.com/fl2007/stories/20030411400.htm  (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    2.    हिना कौसर आलम और पी.बालू, ‘जे एण्ड के (जम्मू एण्ड कश्मीर) फजेज डीएनए सैम्पल्स टू कवर अप किलिंग्स, टाइम्स ऑफ इण्डिया, 7 मार्च 2002।

    3.    देखें कम्यूनलिज्म कॉम्बैट, ‘गोधरा,’ और वरदराजन द्वारा सम्पादित ‘गुजरात’ में ज्योति पुनवाणी, ‘द कारनेज ऐट गोधरा।’

    4.    सोमित सेन, ‘शूटिंग टर्न्स स्पॉटलाइट ऑन एनकाउण्टर कॉप्स,’ टाइम्स ऑफ इण्डिया, 23 अगस्त 2003।

    5.    डब्ल्यू चन्द्रकान्त, क्रैकडाउन ऑन सिविल लिबर्टीज ऐक्टिविस्ट्स इन दि ऑफिंग?’, द हिन्दू, 4 अक्टूबर 2003, जिसमें लिखा है:

    पुलिस के प्रतिशोध के डर से अनेक कार्यकर्ता गुप्तवास में चले गये हैं। उनके भय बेबुनियाद नहीं हैं, क्योंकि राज्य की पुलिस मनमाने डंग से मुठभेड़ें करती रही है। जहाँ पुलिस नक्सलवादी हिंसा के आँकड़े अक्सर जारी करती है, वह अपनी हिंसा के शिकार लोगों का जिक्र करने से गुरेज करती है। आन्ध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी ने, जो पुलिस द्वारा की गयी हत्याओं का लेखा–जोखा रख रही है, 4000 से ज्यादा मौतों की फेहरिस्त पेश की है जिनमें से 2000 पिछले महज आठ वर्षों में की गयी हैं।

    के.टी. संगमेश्वरन, ‘राइट्स ऐक्टिविस्ट्स अलेज गैंगलॉर्ड–कॉप नेक्सस,’ द हिन्दू, 22 अक्टूबर 2003।

    6.    जम्मू कश्मीर कोअलिशन फॉर सिविल सोसाइटी के अध्ययन, स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स इन जम्मू ऐण्ड कश्मीर बीटविन 1900–2006 (श्रीनगर 2006), में अनुमान प्रकट किया गया है कि 1990 और 2004 के बीच जम्मू और कश्मीर में मरने वालों की असली तादाद 70,000 से अधिक थी, जबकि भारत सरकार ने 1990 से 2005 तक सिर्फ 47,000 मृतकों की सूचना दी। देखें, ऐजाज हुसैन, ‘मुस्लिम, हिन्दू प्रोटेस्ट्स इन इण्डियन कश्मीर,’ एसोसिएट प्रेस, 1 जुलाई 2008; डेविड रोहडे, ‘इण्डिया ऐण्ड कश्मीर सेपेरेटिस्ट्स बिगिन टॉक ऑन एंण्डिंग स्ट्राइफ,’ न्यूयॉर्क टाइम्स, 23 जनवरी 2004, पृ.ए8; डोएचे–प्रेस एजेन्तुर, ‘थाउजेण्ड्स मिसिंग, अनमार्क्ड ग्रेव्ज टेल कश्मीर स्टोरी,’ 7 अक्टूबर 2003।

    7.    लापता लोगों के माता–पिता के संगठन (एपीडीपी), श्रीनगर की अप्रकाशित रिपोर्ट।

    8.    देखें एडवर्ड ल्यूस, ‘कश्मीरीज न्यू लीडर प्रॉमिसेज ‘‘हीलिंग टच’’, फाइनैन्शियल टाइम्स (लन्दन), 28 अक्टूबर 2002, पृ. 12।

    9.    रं मार्सेलो, ऐण्टी–टेरेरिज्म लॉ बैक्ड बाई इण्डियाज सुप्रीम कोर्ट, फाइनैन्शियल टाइम्स (लन्दन) 17 दिसम्बर 2003, पृ. 2।

    10.    पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), ‘ए प्रिलिमिनेरी फैक्ट फाइण्डिंग ऑन पोटा केसेज इन झारखण्ड,’ डेल्ही इण्डिया, 2 मई 2003। इण्टरनेट पर उपलब्ध: http://pucl.org/Topics/Law/2003/poto–jharkhand.htm (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    11.    ‘पीपुल्स ट्रिब्यून हाइलाइट्स मिसयूज ऑफ पोटा’, द हिन्दू, 18 मार्च 2004।

    12.    ‘पीपुल्स ट्रिव्यूनल।’ ‘ह्यूमन राइट्स वॉच आस्क सेन्टर टू रिपील पोटा’ द हिन्दू, 18 मार्च 2004 भी देखें।

    13.    देखें लीना मिश्रा, ‘240 पोटा केसेज, ऑल अगेंस्ट माइनॉरिटीज,’ टाइम्स ऑफ इण्डिया, 15 सितम्बर 2003 और ‘पीपुल्स ट्रिब्युनल हाइलाइट्स मिसयूज ऑफ पोटा,’ 18 मार्च 2004। टाइम्स ऑफ इण्डिया ने पेश की गयी गवाही की गलत सूचना दी। जैसा कि प्रेस ट्रस्ट का लेख दर्ज करता है, गुजरात में, ‘सूची में एकमात्र गश्ैरमुस्लिम एक सिख है, लिवरसिंह तेजसिंह सिकलीगर, जिसका उल्लेख उसमें सूरत के एक वकील हसमुख ललवाला पर जानलेवा हमला करने के लिए हुआ था और जिसने अप्रैल (2003) में सूरत की पुलिस हिरासत में कथित रूप से फाँसी  लगा ली थी।’ गुजरात पर देखें, रॉय, ‘डेमोक्रेसीः हू इज शी ह्वेन शी इज ऐट होम?’ (हिंदी में: लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है)।

    14.    देखें, पीपल्स ट्रिब्युनल ऑन पोटा ऐण्ड अदर सिक्यूरिटी लेजिसलेशन्ज, द टेरर ऑफ पोटा (नई दिल्ली, इण्डिया, 13–14 मार्च 2004)। इण्टरनेट पर उपलब्ध http://www.sabrang.com/pota.pdf (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    15.    ‘ए प्रो–पुलिस रिपोर्ट,’ द हिन्दू, 20 मार्च 2004। ऐमनेस्टी इण्टरनेशनल, ‘इण्डियाः रिपोर्ट ऑफ दी मलिमथ कमिटी रिफॉर्म्स ऑफ द क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम: सम कमेंट्स,’ 19 सितम्बर 2003 (एएसए 20/025/2003)।

    16.    ‘जे एण्ड के (जम्मू एण्ड कश्मीर) पैनल वॉण्ट्स ड्रेकोनियन लॉज विदड्रॉन,’ द हिन्दू, 23 मार्च 2003। साउथ एशियन ह्यूमन राइट्स डॉक्यूमेंटेशन सेन्टर (एसएएचआरडीसी), ‘आर्म फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट: ए स्टडी इन नैशनल सिक्यूरिटी टिरिनी,’ नवम्बर 1995, http://www.hrdc.net/sahrdc/resources/armed_forces.htm (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    17.    ‘ग्रोथ ऑफ ए डीमन: जेनिसिस ऑफ दी आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट, 1958’ और सम्बन्धित दस्तावेज, मणिपुर अपडेट्स। इण्टरनेट पर उपलब्ध है, देखें, http://www.geocities.com/manipurupdate/December_features_1.htm (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    18.    देखें, एडवर्ड ल्यूस, ‘मास्टर ऑफ ऐम्बिग्विटी,’ फाइनैन्शियल टाइम्स (लन्दन), 3–4 अप्रैल 2004, पृ. 16। 31 मार्च 2007 को चन्द्रशेखर प्रसाद की हत्या। देखें, ऐन्ड्रयू नैश, ‘ऐन इलेक्शन ऐट जेएनयू,’ हिमाल, दिसम्बर 2003।

    19.    पी. साइनाथ, ‘नियो–लिबरल टेरेरिज्म इन इण्डिया: दी लार्जेस्ट वेव ऑफ सुइसाइड्स इन हिस्ट्री,’ काउण्टरपंच, फरवरी 2009। इण्टरनेट पर उपलब्धः http://www.counterpunch.org/sainath02122009.html

    20.    एन.ए. मजूमदार, एलिमिनेट हंगर नाओ, पॉवर्टी लेटर, बिजनेस लाइन, 8 जनवरी 2003।

    21.    ‘फूडग्रेन एक्सपोर्ट मे स्लो डाउन दिस फिष्ष्स्कल (इयर),’ इण्डिया बिजनेस इनसाइट, 2 जून 2003, ‘इण्डिया–ऐग्रिकल्चर सेक्टर: पैराडॉक्स ऑफ प्लेंटी,’ बिजनेस लाइन, 26 जून 2001, रणजीत देवराज, ‘फार्मर्स प्रोटेस्ट अगेन्स्ट ग्लोबलाइजेशन,’ इण्टर प्रेस सर्विस, 25 जनवरी 2001।

    22.    उत्सा पटनायक, ‘फॉलिंग पर कैपिटा अवेलिबिलिटी ऑफ फूडग्रेन्स फॉर ह्यूमन कन्जंप्शन इन द रिफॉर्म्स पीरियड इन इण्डिया,’ अखबार, (2 अक्टूबर 2001)। इण्टरनेट पर उपलब्धः http://indowindow.virtualstack.com/akhabar/article.php?article=44category=3&issue=12 (29 मार्च 2009 को देखा गया।) पी. साइनाथ, ‘हैव टॉर्नाडो, विल ट्रैवल,’ द हिन्दू मैग्जीन, 18 अगस्त 2002। सिल्विया नसर, ‘प्रोफइल: द कॉन्शेन्स ऑफ द डिस्मल साइन्स,’ न्यूयॉर्क टाइम्स, 9 जनवरी 1994 पृ. 3-8। मारिया मिश्रा, ‘हार्ट ऑफ स्मगनेस: अनलाइक बेल्ज्यिम, ब्रिटेन इज स्टील कम्प्लेसेंटली इगनोरिंग द गोरी क्रुऐलिटीज ऑफ इट्स एम्पायर,’ द गार्जियन, (लन्दन) 23 जुलाई 2002, पृ. 15। उत्सा पटनायक, ‘ऑन मेजरिंग, ‘‘फैमिन’’ डेथ्स: डिफ्रेंट क्राइटीरिया फॉर सोशयलिज्म ऐण्ड कैपिटलिज्म,’ अखबार, 6 (नवम्बर–दिसम्बर 1999)। इण्टरनेट पर उपलब्धः http://www.indowindow.com/akhabar/article.php?article= 74&category=8&issue=9 (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    23.    अमर्त्य सेन, ‘डेवेलपमेन्ट ऐज फ्रीडम’ (न्यूयॉर्क: अल्फ्रेड ए, नॉफ, 1999)

    24.    ‘द वेस्टेड इण्डिया,’ द स्टेट्समैन (इण्डिया), 17 फरवरी 2001। ‘चाइल्डब्लेन,’ द स्टेट्समैन (इण्डिया), 24 नवम्बर 2001।

    25.    उत्सा पटनायक, ‘द रिपब्लिक ऑफ हंगर ऐण्ड अदर एसेज,’ (गुड़गाँव: थ्री एसेज कलेक्टिव, 2007)।

    26.    प्रफुल्ल बिदवई, ‘इण्डिया एडमिट्स सीरियस अग्रेरियन क्राइसिस,’ सेण्ट्रल क्रॉनिकल (भोपाल), 9 अप्रैल 2004।

    27.    रॉय, पॉवर पोलिटिक्स, द्वितीय संस्करण, पृ. 13।

    28.    उदाहरण के लिए देखें, रणदीप रमेश, ‘बांग्लादेशी राइटर गोज इनटू हाइडिंग’, द गार्जियन (लन्दन), 27 नवम्बर 2007, पृ. 25, यह देशनिकाला प्राप्त और 2004 से कलकत्ता में रह रही लेखिका तसलीमा नसरीन के बारे में है, रणदीप रमेश, ‘बैण्ड आर्टिस्ट मिसेज डेल्हीज फर्स्ट आर्ट शो,’ द गार्जियन (लन्दन), 23 अगस्त 2008, पृ. 22। यह निष्कासित चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन के बारे में है, और सोमिनी सेनगुप्ता, ‘ऐट ए यूनिवर्सिटी इन इण्डिया, न्यू अटैक्स ऑन ऐन ओल्ड स्टाइल: इरोटिक आर्ट,’ न्यूयॉर्क टाइम्स, 19 मई 2007, पृ. B7। यह महाराजा शिवाजीराव विश्वविद्यालय के छात्रों की प्रदर्शनी के बारे में। अरुंधति रॉय, ‘तसलीमा नसरीन ऐण्ड ‘‘फ्री स्पीच,’’’ नई दिल्ली, इण्डिया 13 फरवरी 2008 भी देखें, इण्टरनेट पर उपलब्ध http://www.zmag.org/znet/viewArticle/166646 (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    29.    शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने जेम्स डब्ल्यू. लेन की पुस्तक ‘शिवाजी: हिन्दू किंग इन इस्लामिक इण्डिया (ऑक्सफोर्डः ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, 2003) की ‘सभी प्रतियों को जलाने का आह्वान’ किया। देखें, ‘मॉकरी ऑफ द लॉ,’ द हिन्दू 3 मई 2007। प्रफुल्ल बिदवई, ‘मेक्कार्थी, वेयर आर यू?’ फ्रंटलाइन (इण्डिया); 10–23 मई 2003, इसमें विख्यात इतिहासकार रोमिला थापर के खिलाफ चलाये गये अभियान के बारे में लिखा गया है; और अनुपमा कटकम, ‘‘पॉलिटिक्स ऑफ वैण्डलिज्म, फ्रंटलाइन (इण्डिया), 17–30 जनवरी 2004, पुणे स्थित भण्डारकर संस्थान पर हमले के बारे में।

    30.    देखें, माइक डेविस, लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्स: एल निन्यो फैमिन्स ऐण्ड द मेकिंग ऑफ द थर्ड वल्र्ड (न्यूयॉर्क: वर्सो, 2002) ‘टेबल पी 1: एस्टिमेटेड फैमिन मोर्टैलिटी,’ पृ. 7।

    31.    दूसरे स्रोतों के अलावा, देखें एडविन ब्लेक, आईबीएम ऐण्ड द होलोकॉस्ट: द स्ट्रैटिजिक अलायन्स बिटवीन नाजी जर्मनी ऐण्ड अमेरिकाज मोस्ट पावरफुल कॉर्पोरेशन (न्यूयॉर्क: थ्री रिवर्स प्रेस, 2003)।

    32.    ‘फॉर इण्डिया इनकॉर्पोरेटेड, साइलेंस प्रोटेक्ट्स द बॉटम लाइन, टाइम्स ऑफ इण्डिया, 17 फरवरी 2003। ‘सीआईआई अपोलोजाइजेज टू मोदी,’ द हिन्दू, 7 मार्च 2003।

    33.    आडवाणी ने 25 सितम्बर 1990 को सोमनाथ से यात्रा शुरू की थी। 2005 में उन्होंने कहा कि उनकी 15 साल पहले की ऐतिहासिक राम रथ यात्रा तभी पूरी मानी जायेगी जब अयोध्या में मन्दिर बन जायेगा। देखें, विशेष सम्वाददाता, ‘यात्रा कम्पलीट ओनली आफ्टर टेम्पल इज बिल्ट, सेज आडवाणी,’ द हिन्दू, 26 सितम्बर 2005।

    34.    देखें रॉय, पावर पॉलिटिक्स, द्वितीय संस्करण, पृ. 35–86।

    35.    अन्य स्रोतों के साथ, देखें निर्मलांग्शु मुखर्जी, ‘ट्रेल ऑफ द टेरर कॉप्स,’ जेडनेट, 17 नवम्बर 2008। इण्टरनेट पर उपलब्ध http://www.zmag.org/zspace/nirmalangshumukherji (29 मार्च 2009 को देखा गया)।

    36.    22 दिसम्बर 2003 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में ‘आतंकवाद से लड़ाई में मानवाधिकारों और आधारभूत स्वतन्त्रताओं की रक्षा’ के प्रस्ताव से अपने–आप को अलग रखने वाला भारत अकेला देश था।AA/RES/58/187 (अप्रैल 2004)।

    37.    देखें, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया, इण्डियाज नक्सलाइट्स मेकिंग एफर्ट्स टू स्प्रेड टू न्यू एरियाज,’ बीबीसी वर्ल्ड वाइड मॉनिटरिंग, 4 मई 2003 और ‘माओइस्ट कॉल फ्रीजेज झारखण्ड, नेबर्स,’ द स्टेट्समैन (इण्डिया), 15 जून 2006।

    38.    कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग सरकार ने 2004 में पोटा को रद्द कर दिया क्योंकि वह अत्यन्त क्रूर पाया गया था, और कहा कि उसका दुरुपयोग हुआ था और वह उलटे नतीजे देने वाला था, लेकिन फिर सरकार ने ‘अवैध गतिविधि निरोधक अधिनियम में संशोधनों के रूप में और भी कड़ा आतंककारी कानून लागू कर दिया। संशोधन 15 दिसम्बर 2008 को संसद में पेश किये गये और अगले ही दिन स्वीकार कर लिये गये। लगभग कोई बहस नहीं हुई। देखें प्रशान्त भूषण, ‘टेरेरिज्म: आर स्ट्रौंगर लॉज द आन्सर?’ द हिन्दू, 1 जनवरी 2009।

    39.    देखें अरुंधति रॉय, ऐन ऑर्डिनरी पर्सन्स गाइड टू एम्पायर में ‘पब्लिक पावर इन द एज ऑफ एम्पायर’ (नई दिल्ली: पेंगुइन बुक्स, इण्डिया 2005)। अरुंधति रॉय, ‘पब्लिक पावर इन द एज ऑफ एम्पायर, (न्यूयॉर्क सेवन स्टोरीज प्रेस, 2004) में भी प्रकाशित।

  • संकीर्ण राष्ट्रवाद की जमीन

    लाल्टू

    कट्टरपंथ की जमीन कैसे बनती है? आगामी चुनावों में नवउदारवाद, सांप्रदायिकता और सुविधापरस्ती के गठजोड़ से निकट भविष्य में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और संघ परिवार की जड़ें और मजबूत होने की संभावनाएं लोकतांत्रिक सोच रखने वाले सभी लोगों के लिए चिंता का विषय हैं। औसत भारतीय नागरिक घोर सांप्रदायिक न भी हो, पर बढ़ते सांप्रदायिक माहौल के प्रति उदासीनता से लेकर सांप्रदायिक आधार पर गढ़े गए राष्ट्रवाद में व्यापक आस्था हर ओर दिखती है। आखिर तमाम तरह की मानवतावादी कोशिशों और धरती पर हर इंसान की एक जैसी संघर्ष की स्थिति की असीमित जानकारी होने के बावजूद ऐसा क्यों है कि दुनिया के तमाम मुल्कों में लोग संकीर्ण राष्ट्रवादी सोच के बंधन से छूट नहीं पाते! इस जटिलता के कई कारणों में एक, शासकों द्वारा जनता से सच को छिपाए रख उसे राष्ट्रवाद के गोरखधंधे में फंसाए रखना है। इतिहास का ऐसा नियंत्रण महंगा पड़ता है।

    पिछले पचास सालों से गोपनीय रखी गर्इं दो सरकारी रिपोर्टों पर डेढ़ साल पहले चर्चाएं शुरू हुई थीं। इनमें से एक, 1962 के भारत और चीन के बीच जंग पर है। दूसरी, आजादी के थोड़े समय बाद हैदराबाद राज्य को भारतीय गणराज्य में शामिल करने के सिलसिले में हुए ऑपरेशन पोलो नामक पुलिस कार्रवाई पर है। पहली रिपोर्ट को लिखने वाले भारतीय सेना के दो उच्च-अधिकारी ब्रूक्स और भगत थे। दूसरी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के करीब माने जाने वाले पंडित सुंदरलाल की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने तैयार की थी। पहली रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा अब सार्वजनिक हो चुका है। दूसरी रिपोर्ट आज भी गोपनीय है, हालांकि अलग-अलग सूत्रों से उसके कई हिस्से सार्वजनिक हो गए हैं।

    हमारे अपने अतीत के बारे में बहुत सारी जानकारी हमें चीनी स्रोतों से मिलती है। प्राचीन काल से दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंध रहे हैं। इन सब बातों के बावजूद भारत में चीन के बारे में सोच शक-शुबहा पर आधारित है। भारत-चीन संबंधों पर हम सबने इकतरफा इतिहास पढ़ा है। हम यही मानते रहे हैं कि चीन एक हमलावर मुल्क है। हम शांतिप्रिय हैं और चीन ने हमला कर हमारी जमीन हड़प ली। ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार नेविल मैक्सवेल इस विषय पर लंबे अरसे से शोध करते रहे और उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं में इस पर आलेख छापे। सीमा विवाद पर भारत के दावे से वे कभी पूरी तरह सहमत नहीं थे। चूंकि हम लोग चीन को हमलावर के अलावा और किसी नजरिए से देख ही नहीं सकते, उनके आलेखों पर कम ही लोगों ने गौर किया। अब रिपोर्ट उजागर होने पर यह साबित हो गया है कि मैक्सवेल ने हमेशा सही बात की थी।

    रिपोर्ट में भारत की जिस ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ को गलत ठहराया गया है, उसका सीधा मतलब यही होता है कि भारतीय फौज ने घुसपैठी छेड़छाड़ कर चीन को लड़ने को मजबूर किया। अक्तूबर 1962 की उस जंग के कुछ महीने पहले तक चीन ने कई तरीकों से कोशिश की कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर बातचीत हो, पर भारत का निर्णय यह था कि हमारी इकतरफा तय की गई सीमाओं पर कोई बातचीत नहीं हो सकती।

    यह सबको पता था कि दोनों देशों के बीच बहुत सारा इलाका बीहड़ क्षेत्र है, जहां सैकड़ों मीलों तक कोई नहीं रहता, और सीमा तय करना आसान नहीं है। बीसवीं सदी के पहले पांच दशकों में चीन की हालत बड़ी खराब थी और खासकर पश्चिमी सीमाओं तक नियंत्रण रख पाना उनके लिए संभव न था, इसलिए उपनिवेशवादी बर्तानवी अफसरों ने जान-बूझ कर भी चीन की सीमा को पीछे की ओर हटाया हुआ था। भारत ने स्थिति का पूरा फायदा उठाते हुए ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ के तहत घुसपैठ की। आखिर जंग हुई, जिसमें भारत को शिकस्त मिली।

    आज भी सीमा विवाद पर भारत सरकार का रवैया बदला नहीं है। अपनी दक्षिणी सीमा पर लगे तमाम मुल्कों में भारत ही एक ऐसा देश है, जिसके साथ चीन सीमा विवाद सुलझाने में विफल रहा है। जबकि आज अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद से और जीपीएस तकनीक के द्वारा यह संभव है कि चप्पे-चप्पे तक जमीन मापी जा सके और सीमा सही-सही तय की जा सके। सही और गलत क्या है, इस पर बहस हो सकती है। पर जब सरकार पचास सालों तक अपनी गलतियों को नागरिकों से छिपा कर रखती है तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

    हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के इतिहास के भी शर्मनाक अध्याय हैं। हैदराबाद के निजाम के शासन में शहर हैदराबाद के बाहर रियासत में बेइंतहा पिछड़ापन था। जमींदार (जो तकरीबन सभी हिंदू थे) रिआया पर मध्य-काल की तरह अत्याचार करते थे। इसी का परिणाम था कि तेलंगाना में उग्र साम्यवादी आंदोलन फैला और आजादी के दौरान और तुरंत बाद के वर्षों में इसने जनयुद्ध की शक्ल अख्तियार कर ली।

    निजाम के सलाहकारों में इस्लामी कट्टरपंथियों की अच्छी तादाद थी। हैदराबाद राज्य ने भारत या पाकिस्तान में विलय होने की जगह आजाद मुल्क रहना चाहा। सरदार पटेल के गृहमंत्री रहने के दौरान सिख और मराठा बटालियन की फौजें भेज कर पांच दिनों की लड़ाई के बाद हैदराबाद का भारत में विलय कर लिया गया।

    निजाम की ओर से लड़ने वाले रजाकारों की संख्या पांच हजार थी। रजाकारों ने क्रूरता से ‘भारत में विलय के समर्थकों’ का दमन किया। पर यह कम लोग जानते हैं कि भारतीय फौजें हैदराबाद के मुसलमानों के साथ कैसे पेश आर्इं। जब पंडित सुंदरलाल समिति ने जांच की तो पता चला कि अड़तालीस हजार मुसलमानों की हत्या की गई थी, जिनमें से अधिकतर निर्दोष थे। बलात्कार और लूट की इंतिहा न थी। चूंकि यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं है, इसलिए इस आंकड़े की सच्चाई पर सवाल उठ सकते हैं। पर यह रिपोर्ट क्यों छिपाई जा रही है?

    ऐसी कई बातें हैं, जहां सरकार का रवैया लोगों से सच छिपाने का है। इन दो रिपोर्टों का उल्लेख प्रासंगिक है। कहा जा सकता है कि हमारा देश गरीब है और ऐसी जानकारी जिससे लोगों में सरकार के प्रति आस्था कम हो, उसे गोपनीय ही रहने दिया जाए तो बढ़िया है। पर अगर हमारे पास संसाधनों की कमी है तो हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि हम सभी जरूरी बातों का खुलासा करें ताकि सामूहिक और लोकतांत्रिक रूप से ऐसे निर्णय लिए जाएं जो सबके हित में हों। सच यह है कि अगर हम अपने पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद सुलझा लें तो हमारा सामरिक खर्च बहुत कम हो जाएगा और हम शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बुनियादी मुद्दों पर उचित ध्यान दे पाएंगे। इसी तरह अतीत की गलतियों को हम मान लें तो समुदायों के बीच बेहतर संबंध पनपेंगे और देश सर्वांगीण उन्नति की ओर बढ़ेगा।

    इसके विपरीत ऐसा राष्ट्रवाद जो हमें भूखे और कमजोर रह कर पड़ोसी मुल्कों के साथ वैमनस्य का संबंध बनाए रखने को मजबूर करता है, जो लघु संप्रदायों परहुए जुल्मों को नजरअंदाज करता है, वह हमारे हित में कतई नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि हम पड़ोसी मुल्कों के सामने घुटने टेक दें या लघु संप्रदायों की खामियों को अनदेखा करें। पर सच को छिपा कर और झूठ के आधार पर लोगों को भड़काए रख कर देश में स्थिरता और संपन्नता कभी नहीं आ सकती।

    आज हम लगातार ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं कि इस तरह का संकीर्ण राष्ट्रवाद लोगों के मन में घर करता जा रहा है। ऐसा माहौल बनता जा रहा है कि तथ्यों को सामने लाने का औचित्य कम ही दिखता है। एक ओर नफरत की लहर में डूबे लोग हैं, दूसरी ओर उनको सुविधापरस्त लोगों का साथ मिल रहा है। पूंजी के सरगना, जिनको मानवता से कुछ भी लेना-देना नहीं है, खुलकर ऐसे नेतृत्व का समर्थन कर रहे हैं जो देश को निश्चित रूप से विनाश की ओर धकेल देगा।

    एक ऐसा मुख्यमंत्री जो स्वयं जेल जाने से बाल-बाल बचता रहा है, जिसके मंत्रिमंडल में रहे एक शख्स को आजीवन कारावास मिला हुआ है; राज्य के पूर्व पुलिस प्रमुख और उसके सहयोगी जेल में बंद हैं, वह झूठे विकास का नारा देकर और ऊलजलूल झूठी बातें कर लोगों का समर्थन जुटाने में सफल हो रहा है।

    पहली नजर में ये बातें एक दूसरे से अलग लगती हैं। पर सचमुच ये एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। एक बड़े देश का नागरिक और मुख्य-धारा के साथ होने में एक झूठे गर्व का अहसास होता है जो हमें अप्रिय सच को जानने से दूर ले जाता है। जब तक यह अहसास सीमित रहता है और सामूहिक जुनून में नहीं बदलता, तब तक कोई समस्या नहीं है। जिस तरह का जुनून और सांप्रदायिकता नरेंद्र मोदी के समर्थन में सक्रिय हैं, उसका उदाहरण बीसवीं सदी के यूरोप के इतिहास में है। तकरीबन नब्बे साल पहले इसी तरह की घायल राष्ट्रीयता की मानसिकता के शिकार इटली और जर्मनी के लोगों ने क्रमश: फासीवादियों और नाजी पार्टी के लोगों को जगह दी। इनके सत्ता पर काबिज होने के बाद उन मुल्कों का क्या हश्र हुआ वह हर कोई जानता है।

    जर्मन लोग आज तक यह सोच कर अचंभित होते हैं कि एक पूरा राष्ट्र यहूदियों के खिलाफ नस्लवादी सोच का शिकार कैसे हो गया? विनाश के जो पैमाने तब तैयार हुए और दूसरी आलमी जंग में इनके मित्र देश जापान पर एटमी बमों की जो मार पड़ी, उससे उबरने में कई सदियां लगेंगी। वैसी ही ताकतें भारत में भी अपनी जड़ें जमाने में सफल हो रही हैं और अगर वे सफल होती गर्इं तो अगले दशकों में दक्षिण एशिया का हश्र क्या होगा, यह सोच कर भी भय होता है।

    फासीवादी, नाजी, हिंदुत्ववादी, तालिबानी और ऐसी दीगर ताकतें झूठ और हिंसा के जरिए अमानवीयकरण की स्थिति में जी रहे लोगों को बरगलाने में सफल होती हैं। कैसी भी राजनीतिक प्रवृत्ति वाले दलों की हों, सरकारें सच को छिपा कर ऐसी स्थितियां पैदा करने में मदद करती हैं कि भुखमरी और सामाजिक अन्यायों के शिकार लोग झूठे राष्ट्रवादी गौरव में फंसे मानसिक रूप से गुलाम बन जाएं। लोग यह देखने के काबिल नहीं रह जाते कि सत्ता में आते ही कट्टरपंथी ताकतें आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला करेंगी। शिक्षा में खासतौर पर इतिहास, राजनीति विज्ञान और साहित्य जैसे विषयों में आमूलचूल बदलाव कर संकीर्ण सांप्रदायिक और मानव-विरोधी सोच को डालने की कोशिश करेंगी।

    आज कुछ सच छिपाए जा रहे हैं तो कल बिल्कुल झूठ बातों को सच बना कर किताबों में डाला जाएगा और बच्चों को वही पढ़ने को मजबूर किया जाएगा। विरोधियों के साथ हिंसक रवैया अपनाने में इन ताकतों को कोई हिचक नहीं। ऐसी सभी ताकतों के खिलाफ और सच को सामने लाने के लिए आवाज बुलंद करना जरूरी है। इसलिए सिर्फ चुनावी पटल पर मोदी और संघ परिवार का विरोध पर्याप्त नहीं; देश के इतिहास, वर्तमान और भविष्य के साथ जुड़े हर सच को उजागर करने की मांग साथ-साथ करनी होगी।
  • तीन दलित राम बने भाजपा के हनुमान: आनंद तेलतुंबड़े

    चुनाव के मौसम में जिस तरह मौकापरस्त गठबंधनों को वंचित और दलित जनता के हितों की पैरोकारी का नाम दिया जाता है, उसमें आनंद तेलतुंबड़े का यह नया लेख पढ़ना दिलचस्प है. अनुवाद: रेयाज उल हक

    बाबासाहेब आंबेडकर का झंडा ढोने का दावा करने वाले तीन दलित रामों ने – रामदास आठवले, राम विलास पासवान और राम राज (हालांकि उन्होंने कुछ साल पहले अपना नाम बदल कर उदित राज कर लिया था), सत्ता के टुकड़ों की आस में पूरी बेशर्मी से रेंगते हुए अपनी ठेलागाड़ी को भाजपा के रथ के साथ जोत दिया है. इनमें से पासवान 1996 से 2009 तक अनेक प्रधानमंत्रियों – अटल बिहारी बाजपेयी, एचडी देवेगौड़ा, आईके गुजराल और मनमोहन सिंह – के नेतृत्व में बनने वाली हरेक सरकार में केंद्रीय मंत्री (रेलवे, संचार, सूचना तकनीक, खनन, इस्पाद, रसायन एवं उर्वरक) रहे और उन्होंने खुद को एक घाघ खिलाड़ी साबित किया है. उनको छोड़ कर बाकी के दोनों राम हाल हाल तक भाजपा के सांप्रदायिक चरित्र के खिलाफ गला फाड़ कर चिल्लाते रहे थे. आठवले की रीढ़विहीनता तब उजागर हुई जब केंद्र में मंत्री बनने की उनकी बेहिसाब हसरत पूरी नहीं हुई और 2009 के लोकसभा चुनावों में वे हार गए. उन्होंने कांग्रेस के अपने सरपरस्तों पर अपने ‘अपमान’ का इल्जाम लगाना शुरू किया, जिन्होंने उन्हें सिद्धार्थ विहार के गंदे से कमरे से उठा कर महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री के रूप में सह्याद्रि के एयरकंडीशंड सूइट में बिठाया था. लेकिन कम से कम डॉ. उदित राज (हां, उन्होंने प्रतिष्ठित बाइबल कॉलेज एंड सेमिनरी, कोटा, राजस्थान से डॉक्टरेट किया था!)  ने जिस तरह से अपने भाजपा-विरोधी तर्कसंगत रुख से कलाबाजी खाई है, वह हैरान कर देने वाला है.

    एक मायने में, भारतीय लोकतंत्र के पतन को देखते हुए, दलित नेतृत्व की ऐसी मौकापरस्त कलाबाजियां किसी को हैरान नहीं करती हैं. आखिरकार हर कोई ऐसा ही कर रहा है. तब अगर दलित नेता ऐसा करते हैं तो इसकी शिकायत क्यों की जाए? आखिरकार, उनमें से अनेक अब तक कांग्रेस में रहते आए हैं, तो अब वे भाजपा में जा रहे हैं तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? हो सकता है कि भाजपा और कांग्रेस में बहुत थोड़ा ही फर्क हो, लेकिन असल में चिंतित होने की वजहें उनके पेशों और उनके बारे में जनता की अवधारणा में निहित हैं. कांग्रेस के उलट, भाजपा एक विचारधारा पर चलने वाली पार्टी है. इसका विचारधारात्मक आधार हिंदुत्व है, जिसमें शब्दों की कोई लफ्फाजी नहीं है, यह फासीवाद की विचारधारा है जिसे साफ तौर से आंबेडकर की विरोधी विचारधारा के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि उपयोगिता भाजपा से भारत के संविधान के प्रति वफादारी की मांग करती है या फिर आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों को लुभाने की मांग करती है, लेकिन उनका विचारधारात्मक रवैया उन सबके खिलाफ है. इसलिए दलित नेताओं को आंबेडकर का जयगान गाते हुए उनके साथ गद्दारी करने की इस घटिया हरकत को देखकर गहरा दुख होता है.

    आंबेडकर की विरासत

    हालांकि आंबेडकर ने हिंदू धर्म में सुधारों के विचार के साथ शुरुआत की थी जिसका आधार उनका यह खयाल था कि जातियां, बंद वर्गों की व्यवस्था हैं [कास्ट्स इन इंडिया]. यह घेरेबंदी बहिर्विवाह और अंतर्विवाह के व्यवस्था के जरिए कायम रखी जाती है। व्यवहार में इसका मतलब यह था कि अगर अंतर्विवाहों के जरिए इस व्यवस्था से मुक्ति पा ली गई तो इस घेरेबंदी में दरार पड़ जाएगी और जातियां वर्ग बन जाएंगी। इसलिए उनकी शुरुआती रणनीति यह बनी थी कि दलितों के संदर्भ में हिंदू समाज की बुराइयों को इस तरह उजागर किया जाए कि हिंदुओं के भीतर के प्रगतिशील तत्व सुधारों के लिए आगे आएं। महाड में उन्होंने ठीक यही कोशिश की है। हालांकि महाड में हुए कड़वे अनुभव से उन्होंने नतीजा निकाला कि हिंदू समाज में सुधार मुमकिन नहीं, क्योंकि इनकी जड़ें हिंदू धर्मशास्त्रों में गड़ी हुई थीं। तब उन्होंने सोचा कि इन धर्मशास्त्रों के पुर्जे उड़ाए बगैर जातियों का खात्मा नहीं होगा [एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट]। आखिर में, अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले उन्होंने वह तरीका अपनाया जो उनके विचारों के मुताबिक जातियों के खात्मे का तरीका था: उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। इतना वक्त बीत जाने के बाद, आज इस बात में कोई भी उनके विश्लेषण के तरीके की कमियों को आसानी से निकाल सकता है। लेकिन जातियों का खात्मा आंबेडकर की विरासत के केंद्र में बना रहा। इस दौरान उन्होंने जो कुछ भी किया वह दलितों को सशक्त करने के लिए किया ताकि वे उस जाति व्यवस्था के खात्मे के लिए संघर्ष कर सकें, जो उनकी निगाह में ‘स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे’ को साकार करने की राह में सबसे बड़ी रुकावट थी। चूंकि मार्क्सवादियों के उलट वे यह नहीं मानते थे कि इतिहास किसी तर्क के आधार पर विकसित होता है, कि इसकी गति को कोई नियम नियंत्रित करता है, इसलिए उन्होंने वह पद्धति अपनाई जिसे व्यवहारवाद कहा जाता है। इसमें उनपर कोलंबिया में उनके अध्यापक जॉन डिवी का असर था।

    व्यवहारवाद एक ऐसा नजरिया है जो सिद्धांतों या विश्वासों का मूल्यांकन, व्यावहारिक रूप से उन्हें लागू करने में मिली कामयाबी के आधार पर करता है। यह किसी विचारधारात्मक नजरिए को नकारता है और सार्थकता, सच्चाई या मूल्य के निर्धारण में बुनियादी कसौटी के रूप में व्यावहारिक नतीजों पर जोर देता है. इसलिए यह मकसद की ईमानदारी और उसको अमल में लाने वाले के नैतिक आधार पर टिका होता है। आंबेडकर का संघर्ष इसकी मिसाल है। अगर इस आधार से समझौता कर लिया गया तो व्यवहारवाद का इस्तेमाल दुनिया में किसी भी चीज़ को जायज ठहराने के लिए किया जा सकता है। और आंबेडकर के बाद के आंदोलन में ठीक यही हुआ। दलित नेता ‘आंबेडकरवाद’ या दलित हितों को आगे ले जाने के नाम पर अपना मतलब साधने में लगे रहे। भारत की राजनीति का ताना-बाना कुछ इस तरह का है कि एक बार अगर आप पैसा पा जाएं तो आप अपने साथ जनता का समर्थन होने का तमाशा खड़ा कर सकते हैं। एक बार यह घटिया सिलसिला शुरू हो जाए तो फिर इसमें से बाहर आना मुमकिन नहीं। इसी प्रक्रिया की बदौलत एक बारहवीं पास आठवले करोड़ों रुपए की संपत्ति जुटा सकता है, और उस आंबेडकर की विरासत का दावा कर सकता है जो बेमिसाल विद्वत्ता और दलितों-वंचितों के हितों के प्रति सर्वोच्च प्रतिबद्धता के प्रतीक हैं। करीब करीब यही बात दूसरे रामों और उनके जैसे राजनीतिक धंधेबाजों के बारे में भी कही जा सकती है। उनका सारा धंधा आंबेडकर और दलित हितों की तरक्की के नाम पर चलता है।

    दलित हित क्या हैं?

    अपने निजी मतलब को पूरा के लिए बेकरार ये सभी दलित हितों की पुकार मचाते हैं. दलित नेताओं में यह प्रवृत्ति तब भी थी जब आंबेडकर अभी मौजूद ही थे. तभी उन्होंने कांग्रेस को जलता हुआ घर बताते हुए उसमें शामिल होने के खिलाफ चेताया था. जब कांग्रेस ने महाराष्ट्र में यशवंत राव चह्वाण के जरिए दलित नेतृत्व को हथियाने का जाल फैलाया तो आंबेडकरी नेता उसमें जान-बूझ कर फंसते चले गए. बहाना यह था कि इससे वे दलित हितों की बेहतर सेवा कर पाएंगे. उन्होंने जनता को यह कहते हुए भी भरमाया कि आंबेडकर ने नेहरू सरकार में शामिल होकर कांग्रेस के साथ सहयोग किया था. भाजपा उस हजार चेहरों वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक धड़ा है, जो हिंदुत्व पर आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पैरोकारी करता है. उसने संस्कृति और धर्म का यह अजीब घालमेल जनता को भरमाने के लिए किया है. यह भाजपा अंबडकरियों के लिए सिर्फ एक अभिशाप ही हो सकती है. असल में अनेक वर्षों तक यह रही भी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. आरएसएस ने समरसता (समानता नहीं बल्कि सामाजिक सामंजस्य) का जाल दलित मछलियों को फंसाने के लिए फेंका और इसके बाद अपनी सख्त विचारधारा में थोड़ी ढील दी. दिलचस्प है कि दलित हितों के पैरोकार नेता, शासक वर्ग (और ऊंची जातियों) की इन पार्टियों को तो अपने ठिकाने के रूप में पाते हैं लेकिन वे कभी वामपंथी दलों पर विचार नहीं करते हैं, जो अपनी अनगिनत गलतियों के बावजूद उनके स्वाभाविक सहयोगी थे. इसकी वजह सिर्फ यह है कि वामपंथी दल उन्हें वह सब नहीं दे सके, जो भाजपा ने उन्हें दिया है.

    तो फिर दलित हितों का वह कौन सा हौवा है, जिसके नाम पर ये लोग यह सारी करतब करते हैं? क्या वे यह जानते हैं कि 90 फीसदी दलितों की जिंदगी कैसी है? कि भूमिहीन मजदूरों, छोटे-हाशिए के किसानों, गांवों में कारीगरों और शहरों में झुग्गियों में रहने वाले ठेका मजदूरों और शहरी अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक सेक्टर में छोटे मोटे फेरीवाले की जिंदगी जीने वाले दलित किन संकटों का सामना करते हैं? यहां तक कि आंबेडकर ने भी अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त में यह महसूस किया था और इस पर अफसोस जताया था कि वे उनके लिए कुछ नहीं कर सके. आंशिक भूमि सुधारों के पीछे की पूंजीवादी साजिशों और हरित क्रांति ने गांवों में पूंजीवादी संबंधों की पैठ बना दी, जिसमें दलितों के लिए सुरक्षा के कोई उपाय नहीं थे. इन कदमों का दलित जनता पर विनाशकारी असर पड़ा, जिनके तहत अंतर्निर्भरता की जजमानी परंपरा को नष्ट कर दिया गया. देहातों में पहले से कायम ऊंची जातियों के जमींदारों को बेदखल करके उनकी जगह लेने वाले, सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी शूद्र जातियों के धनी किसानों द्वारा क्रूर उत्पीड़न के लिए दलितों को बेसहारा छोड़ दिया. ब्राह्मणवाद का परचम अब उन्होंने अपने हाथों में ले लिया था. बीच के दशकों में आरक्षण ने उम्मीदें पैदा कीं, लेकिन वे जल्दी ही मुरझा गईं. जब तक दलितों को इसका अहसास होता कि उनके शहरी लाभान्वितों ने आरक्षणों पर एक तरह से कब्जा कर रखा है, कि नवउदारवाद का हमला हुआ जिसने आरक्षणों को पूरी तरह खत्म ही कर दिया. हमारे राम इन सब कड़वी सच्चाइयों से बेपरवाह बने रहे और बल्कि उनमें से एक, उदित राज, ने तो आरक्षण के एक सूत्री एजेंडे के साथ एक अखिल भारतीय संगठन तब शुरू किया, जब वे वास्तव में खत्म हो चुके थे. जनता को आरक्षण के पीछे छिपी शासक वर्ग की साजिश को दिखाने के बजाए, वे शासक वर्ग की सेवा में इस झूठे आसरे को पालते-पोसते रहने को तरजीह देते हैं. क्या उन्हें यह नहीं पता कि 90 फीसदी दलितों की जरूरतें क्या हैं? उन्हें जमीन चाहिए, सार्थक काम चाहिए, मुफ्त और उचित और बेहतर शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य की देखरेख चाहिए, उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी ढांचे चाहिए और जाति विरोधी सांस्कृतिक व्यवस्था चाहिए. ये हैं दलितों के हित, और अफसोस इस बात है कि किसी दलित राम द्वारा उनकी दिशा में बढ़ना तक तो दूर, उनको जुबान तक पर नहीं लाया गया है.

    भाजपाई राम के हनुमान

    यह बात एक सच्चाई बनी हुई है कि ये राम दलित हितों के नाम पर सिर्फ अपना फायदा ही देखते हैं. उदित राज इनमें से सबसे ज्यादा जानकार हैं, अभी कल तक संघ परिवार और भाजपा के खिलाफ हर तरह की आलोचनाएं करते आए हैं जो अगर कोई देखना चाहे तो उनकी किताब ‘दलित्स एंड रिलिजियस फ्रीडम’ में यह आलोचना भरी पड़ी है. उन्होंने मायावती को बेदखल करने के लिए सारी तरकीबें आजमा लीं और नाकाम रहने के बाद अब वे उस भाजपा की छांव में चले गए हैं, जो खुद उनके ही शब्दों में दलितों का सबसे बड़ा दुश्मन है. दलितों के बीच उनकी जो कुछ भी थोड़ी बहुत साख थी, उसका फायदा भाजपा को दिलाने के लिए वे हनुमान की भूमिका अदा कर रहे हैं. दूसरे दोनों राम, पासवान और आठवले ने उदित राज के उलट भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने का फैसला किया है. वे दलितों में अपने छोटे-मोटे आधारों के बूते बेहतर सौदे पाने की कोशिश कर रहे हैं: पासवान को सात सीटें मिली हैं, जिनमें से तीन उनके अपने ही परिवार वालों को दी गई हैं, और आठवले को उनकी राज्य सभा सीट के अलावा एक सीट दी गई है. बीते हुए कल के कागजी बाघ आठवले नामदेव ढसाल के नक्शे-कदम पर चल रहे हैं, जो बाल ठाकरे की गोद में जा गिरे थे. उस बाल ठाकरे की गोद में, जो आंबेडकर और आंबडेकरी दलितों से बेहद नफरत करता था. ये काबिल लोग अपने पुराने सहयोगियों द्वारा ‘दलितों के अपमान’ (अपने नहीं) को भाजपा के साथ हाथ मिलाने की वजह बताते हैं. आठवले का अपमान तब शुरू हुआ जब उन्हें मंत्री पद नहीं मिला. उन्हें तब शर्मिंदगी नहीं महसूस हुई जब उन्होंने दलितों द्वारा मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखने के लिए दी गई भारी कुर्बानी को नजरअंदाज कर दिया और विश्वविद्यालय के नाम को विस्तार दिए जाने को चुपचाप स्वीकार कर लिया था. और न ही उन्हें तब शर्मिंदगी महसूस हुई जब उन्होंने दलित उत्पीड़न के अपराधियों के खिलाफ दायर मुकदमों को आनन-फानन में वापस ले लिया. ये तो महज कुछ उदारण हैं, पासवान और आठवले का पूरा कैरियर दलित हितों के साथ ऐसी ही गद्दारी से भरा हुआ है.

    अब वे भाजपा के राम की सेवा करने वाले हनुमान की भूमिका निभाएंगे. लेकिन यह मौका है कि दलित उनके मुखौटों को नोच डालें और देख लें कि उनकी असली सूरत क्या है: एक घटिया बंदर!

  • ‘गायब होता देश’: मुण्डाओं का वर्तमान, अतीत और भविष्य

    डॉ जिंदर सिंह मुण्डा राँची कॉलेज, राँची के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं. रणेन्द्र के आगामी उपन्यास गायब होता देश पर उनकी यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जिस परिवेश और क्षेत्र की कहानी इस उपन्यास में कही गई है, वह मुण्डा की जन्मभूमि है. इसी उपन्यास के बारे में अनुज लुगुन का यह लेख भी पढ़ें.

    आधुनिक हिन्दी साहित्य प्रयोग एवं परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. बदलते सामाजिक परिदृश्य के साथ-साथ साहित्य में भी परिवर्तन स्वाभाविक हो जाता है. वर्तमान में जिन विमर्शों की ओर रचनाकारों ने ध्यान खींचा है उनमें स्त्री विमर्श, दलित विमर्श एवं आदिवासी विमर्श प्रमुख हैं.

    स्त्री विमर्श पर काफी लिखा जा चुका है और लिखा भी जा रहा है. दलित विमर्श स्वानुभूति एवं सहानुभूति के वैशाखी पर आरूढ़ है. अगर आदिवासी विमर्श की बात करें तो इस पर बहुत कुछ नहीं लिखा गया है. आज जब यह सबसे ज्वलंत विषय बन चुका है ऐसे समय में कथाकार रणेन्द्र की लेखनी आदिवासी जीवन-दर्शन के साथ सामने आती है. झारखण्डी पृष्ठिभूमि पर मुण्डा जनजाति को केन्द्र में रखकर लिखा गया उपन्यास गायब होता देश एक साहसिक प्रयास है. साहस इसलिए ही नहीं कि इन्होंने इतने टेढ़े-मेढ़े रास्ते को कैसे पार किया बल्कि इसलिए भी कि एक गैर आदिवासी होकर मुण्डा जनजाति के जन्म से मृत्यु तक के सारे मिथक, अनुष्ठान, विशेषताएँ, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य एवं उनके जीवन दर्शन को ऐतिहासिक एंव वैज्ञानिक तथ्य के आधार पर कैसे सविस्तार प्रस्तुत किया!

    गायब होता देश मुण्डा जनजाति की सभ्यता एवं संस्कृति का एक दस्तावेज है. एक चोट है भ्रष्ट व्यवस्था, अमानवीयता, भ्रष्ट सरकारी तंत्र, रियल एस्टेट, मीडिया तंत्र, अवसरवादी राजनीति और सभ्य समाज पर. ग्लोबल गाँव के देवता से गायब होता देश की यात्रा तक रणेन्द्र पेशागत अवसरों के कारण धरती के इन देवताओं के काफी निकट रहे हैं. अपने प्रशासनिक अनुभव की जो भी पूँजी थी उसके आधार पर उन्होंने इस उपन्यास को सजीवता प्रदान की.

    यहां जो ब्योरा पेश किया गया है उसमें मिथिलांचल से लेकर छोटानागपुर के पंचपरगना क्षेत्र तक जीवन और अनुभवों का विस्तार है. मुण्डाओं के संस्कार संबंधी मिथकों को इन्होंने वैज्ञानिक एवं तार्किक ढंग से रखा है. ‘सेन गे सुसुन-मेन गे दुरंग’ अर्थात ‘चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत है’ इस रहस्य को रणेन्द्र बखूबी समझ पाये हैं तभी तो अपनी इस रचना के माध्यम से तथाकथित तौर पर अपने को सभ्य कहने वाले लोगों के आँखों से परदा हटाते हैं और सच का पिटारा खोलते हैं. दरअसल यह मुण्डा आदिवासी समुदाय प्रकृतिप्रेमी, स्वच्छंद, निर्मल मन का अधिपति, छल-प्रपंच से अपरिचित, श्रेष्ठता भाव और आत्मप्रशंसा से परहेज करने वाला, पूर्ण निश्छलता से आज तक अनजाने ही सही प्रकृति के साथ सहज समभाव बनाए हुए है. आज अट्टालिकाएँ गगन का चुंबन कर ले, सेवरजेट पर भले ही नाच ले, ब्रिटनी, स्पीयर, मेडोना, गागा, निम्सन, शकीरा और यो-यो हनी सिंह की तरह पानी-पानी करते ड्रम पर भले ही नाच ले किंतु अट्टालिकाओं को जमीन पर ही खड़ा होना है, ड्रम के विदेशी चोरी के बीट्स, मांदर की थाप और नगाडे़ की धमक और झांझ की झंझार के सम्मुख कतई नहीं टिक सकता.

    प्रस्तुत उपन्यास पूँजीवादी विकास की सच्चाई को बयां करती है. नगरीकरण, बाजारीकरण एवं उपभोक्तावाद के नए पैमानों ने आदिवासी को जल-जंगल और जमीन से बेदखल कर दर-दर भटकने को मजबूर करता रहा है. जल-जंगल और जमीन इनकी पुरखों की संपत्ति है इसके बिना जीवन अधूरा है. अपने ही घर से बेघर हुए ये बेचारे करें तो क्या करें? प्रतिरोध की आवाज उठाने का अर्थ है कि उसे नक्सलवादी घोषित किया जा सकता है, एन्काउटंर हो सकता है या तो जेल की काली कोठरी में धकेला जा सकता है. दिकुओं ने (बाहरी तत्वों) सिर्फ लूटने का ही काम किया. परमेश्वर पाहन, सोमेश्वर बाबा, सोनामनी, अनुजा, नीरज, सोमा एवं एतवा जैसे समाज के कुछ लोग इन तत्वों के खिलाफ गोलबंद होते हैं तो उनकी आवाज भी दबा दी जाती है. ऐसे समय सरकारी या गैर सरकारी कोई भी तंत्र काम नहीं करता. किशन विद्रोही जैसे सच्चे पत्रकार अगर लिखने का हिम्मत भी जुटा पाते हैं तो उन्हे धक्के मार कर निकाल दिया जाता है. घुट-घुट कर जीने की विवशता उन्हें कहीं का नहीं छोड़ती अंततः मौत भी रहस्यमय बन कर रह जाती है. रियल एस्टेट, बहुद्देशीय कंपनियों एवं भ्रष्ट व्यवस्था सरकारी तंत्र को बेनकाब कर दुनिया को असली चेहरा दिखाने का काम करता है यह उपन्यास.

    औद्योगिक पूँजीवाद से लेकर उपभोक्तावादी पूँजीवाद तक हिन्दुस्तान के आदिवासी इलाके आन्तरिक उपनिवेशवाद के शिकार रहे हैं. कल तक कल-कारखानों, बाँधों, खनन-परिसरों के लिए हमारी जमीन, जंगल, जल, चाहिए था, आज इनके साथ-साथ रियल एस्टेट को भी हमारी जमीने चाहिए. गाँव, शहर, स्लम, यहाँ तक कि हमारे अन्तिम संस्कार की भूमि (ससन) भी इनके लालच की जद में आ गई है. अपने विशिष्ट शिल्प में यह उपन्यास यही भयानक यर्थाथ दिखलाने में सफल होता दिखता है. यही उपन्यासकार की सफलता है कि पाठक को सिहरन से भरता रचना के साथ बहाता मुण्डा जीवन के बहुआयामी रंगों से सुपरिचित करवाता है. रचना एक खतरे की घंटी की तरह हमें आगाह करती है कि हमारी पहचान एवं हमारी अस्मिता संकट में है. हमारी संस्कृति-सभ्यता, भाषा, कला, पारंपरिक नृत्य, गीत, व्यंजन, वाद्य-यंत्र, गाँव, हाट-बाजार, पेड़-पौधे, फल-फूल, पशु-पक्षी, हमसे दूर होते जा रहे हैं.

    गायब होता देश टोटल पैकेज है. जहाँ प्रेम भी है और उलगुलान (क्रांति) भी, दर्शन भी है, तर्कशास्त्र भी, विज्ञान भी है साथ ही इतिहास भी, अतीत का गौरव भी है और भविष्य के प्रति सचेष्टता भी. यहाँ सुख-दुःख, हार-जीत, अच्छाई-बुराई, गुण-अवगुण सब कुछ है. एक चुनौती खड़ी की है रणेन्द्र ने पाठकों के लिए  किस तरह इस रचनासागर में गोता लगाये. कुछ भी हो जो एक बार इस सागर में डुबकी लगा लेता है उसे फिर यह रचना अपने से बाहर निकलने नहीं देती. दूर तक पीछा करती है.