दीपांकर दा सच्चे अर्थों में एक कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी थे। वह वास्तव में जनता के आदमी थे। क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन के वह आजीवन शुभचिन्तक-सहयात्री बने रहे। भारत के जनवादी अधिकार आन्दोलन के वह एक अग्रणी सेनानी थे। ए.पी.डी.आर. के वह संस्थापक सदस्य थे और अन्तिम समय तक उसके उपाध्यक्ष थे।
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