‘‘किस्सा-ए-आज़ादी उर्फ 67 साला बर्बादी’’

15 अगस्त, 1947 को भारत आज़ाद तो हुआ लेकिन ये आज़ादी देश के चन्द अमीरज़ादों की तिजोरियों में कैद होकर रह गयी है। वास्तविक आज़ादी का अर्थ यह कत्तई नहीं है कि एक तरफ तो भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में अनाज सड़ जाता है वहीं दूसरी तरफ रोज़ाना 9000 बच्चे भूख व कुपोषण से दम तोड़ देते हैं। भगतसिंह के शब्दो में आज़ादी का अर्थ यह कत्तई नहीं था कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज आकर देश पर काबिज़ हो जायें। अजय ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि देश की जनता पिछले 66 सालों के सफ़रनामे से समझ चुकी है कि ये आज़ादी भगतसिंह व उनके साथियों के सपनों की आज़ादी नहीं है जहाँ पर 84 करोड़ आबादी 20 रु. प्रतिदिन पर गुज़ारा करती हो तथा पिछले 15 वर्षों में ढ़ाई लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हों, वहीं संसद-विधानसभाओं में बैठने वाले नेताओं मंत्रियों को ऊँचे वेतन के साथ सारे ऐशो-आराम मिल रहे हों।

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