अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के 104 वें साल होने के अवसर पर

बहनो! सोचो ज़रा ! अकेले दिल्ली और नोएडा में लाखों औरतें कारख़ानों में खट रही हैं। अगर हम एका बनाकर मुठ्टी तान दें तो हमारी आवाज़ भला कौन दबा सकता है साथियो! बिना लड़े कुछ नहीं मिलता। मेहनतकशों के बूते ही यह समाज चलता है और उनमें हम औरतें भी शामिल हैं। ग़ुलामी की ज़िन्दगी तो मौत से भी बदतर होती है। हमें उठ खड़ा होना होगा। हमें अपने हक़, इंसाफ़ और बराबरी की लड़ाई की नयी शुरुआत करनी होगी। सबसे पहले हमें थैलीशाहों की चाकरी बजाने वाली सरकार को मजबूर करना होगा कि मज़दूरी की दर, काम के घण्टे, कारखानों में शौचालय, पालनाघर वगैरह के इन्तज़ाम और इलाज वगैरह से सम्बन्धित जो क़ानून पहले से मौजूद हैं, उन्हें वह सख़्ती से लागू करवाये। फिर हमें समान पगार, ठेका प्रथा के ख़ात्मे, गर्भावस्था और बच्चे के लालन-पालन के लिए छुट्टी के इन्तज़ाम, रहने के लिए घर, दवा-इलाज और बच्चों की शिक्षा के हक़ के लिए एक लम्बी, जुझारू लड़ाई लड़नी होगी।

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