डेंगू — लोग बेहाल, “डॉक्टर” मालामाल और सरकार तमाशाई

हर साल की तरह इस वर्ष भी डेंगू देश के बहुत से शहरों, कस्बों में फैला हुआ है और आम लोगों में डेंगू की दहशत फैली हुई है। किसी को कोई बुखार हुआ नहीं कि डेंगू का ख़ौफ़ उसके मन में बैठ गया और खौफ़ज़दा आदमी से डॉक्टर क्या नहीं करवा सकता, डेंगू इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। धड़ाधड़ लेबोरेट्री टेस्ट हो रहे हैं, लोगों के “सैल” कम आ रहे हैं और जो जाल में फँसा (100 में से 95 फँस ही जाते हैं), उसको लिटाया, ग्लूकोज़ लगाया और दो-चार हज़ार रुपये मरीज़ की जेब से “डॉक्टर” की जेब में “ट्रांसफर” हो जाते हैं। अमीरों, मध्यवर्गीय इलाकों में प्राइवेट अस्पताल, क्लीनिक और मज़दूर-गरीब इलाकों में झोला-छाप डॉक्टर, सब का “सीज़न” चल निकला है, सब ख़ुश हैं। सरकारें ऐलान पर ऐलान कर रही हैं, मगर आम आदमी परेशान है, बेहाल है। महँगाई ने पहले से जीना मुश्किल कर रखा है, ऊपर से बीमारी का खर्चा और काम से भी छुट्टी। आखिर ये “सैल” कम होने का माजरा क्या है, क्या हर बुखार डेंगू होता है, और ये ग्लूकोज़, ये कौन सी “संजीवनी बूटी” है जो हर बुखार का इलाज है?

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