डॉ जिंदर सिंह मुण्डा राँची कॉलेज, राँची के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं. रणेन्द्र के आगामी उपन्यास गायब होता देश पर उनकी यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जिस परिवेश और क्षेत्र की कहानी इस उपन्यास में कही गई है, वह मुण्डा की जन्मभूमि है. इसी उपन्यास के बारे में अनुज लुगुन का यह लेख भी पढ़ें.
आधुनिक हिन्दी साहित्य प्रयोग एवं परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. बदलते सामाजिक परिदृश्य के साथ-साथ साहित्य में भी परिवर्तन स्वाभाविक हो जाता है. वर्तमान में जिन विमर्शों की ओर रचनाकारों ने ध्यान खींचा है उनमें स्त्री विमर्श, दलित विमर्श एवं आदिवासी विमर्श प्रमुख हैं.
स्त्री विमर्श पर काफी लिखा जा चुका है और लिखा भी जा रहा है. दलित विमर्श स्वानुभूति एवं सहानुभूति के वैशाखी पर आरूढ़ है. अगर आदिवासी विमर्श की बात करें तो इस पर बहुत कुछ नहीं लिखा गया है. आज जब यह सबसे ज्वलंत विषय बन चुका है ऐसे समय में कथाकार रणेन्द्र की लेखनी आदिवासी जीवन-दर्शन के साथ सामने आती है. झारखण्डी पृष्ठिभूमि पर मुण्डा जनजाति को केन्द्र में रखकर लिखा गया उपन्यास गायब होता देश एक साहसिक प्रयास है. साहस इसलिए ही नहीं कि इन्होंने इतने टेढ़े-मेढ़े रास्ते को कैसे पार किया बल्कि इसलिए भी कि एक गैर आदिवासी होकर मुण्डा जनजाति के जन्म से मृत्यु तक के सारे मिथक, अनुष्ठान, विशेषताएँ, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य एवं उनके जीवन दर्शन को ऐतिहासिक एंव वैज्ञानिक तथ्य के आधार पर कैसे सविस्तार प्रस्तुत किया!
गायब होता देश मुण्डा जनजाति की सभ्यता एवं संस्कृति का एक दस्तावेज है. एक चोट है भ्रष्ट व्यवस्था, अमानवीयता, भ्रष्ट सरकारी तंत्र, रियल एस्टेट, मीडिया तंत्र, अवसरवादी राजनीति और सभ्य समाज पर. ग्लोबल गाँव के देवता से गायब होता देश की यात्रा तक रणेन्द्र पेशागत अवसरों के कारण धरती के इन देवताओं के काफी निकट रहे हैं. अपने प्रशासनिक अनुभव की जो भी पूँजी थी उसके आधार पर उन्होंने इस उपन्यास को सजीवता प्रदान की.
यहां जो ब्योरा पेश किया गया है उसमें मिथिलांचल से लेकर छोटानागपुर के पंचपरगना क्षेत्र तक जीवन और अनुभवों का विस्तार है. मुण्डाओं के संस्कार संबंधी मिथकों को इन्होंने वैज्ञानिक एवं तार्किक ढंग से रखा है. ‘सेन गे सुसुन-मेन गे दुरंग’ अर्थात ‘चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत है’ इस रहस्य को रणेन्द्र बखूबी समझ पाये हैं तभी तो अपनी इस रचना के माध्यम से तथाकथित तौर पर अपने को सभ्य कहने वाले लोगों के आँखों से परदा हटाते हैं और सच का पिटारा खोलते हैं. दरअसल यह मुण्डा आदिवासी समुदाय प्रकृतिप्रेमी, स्वच्छंद, निर्मल मन का अधिपति, छल-प्रपंच से अपरिचित, श्रेष्ठता भाव और आत्मप्रशंसा से परहेज करने वाला, पूर्ण निश्छलता से आज तक अनजाने ही सही प्रकृति के साथ सहज समभाव बनाए हुए है. आज अट्टालिकाएँ गगन का चुंबन कर ले, सेवरजेट पर भले ही नाच ले, ब्रिटनी, स्पीयर, मेडोना, गागा, निम्सन, शकीरा और यो-यो हनी सिंह की तरह पानी-पानी करते ड्रम पर भले ही नाच ले किंतु अट्टालिकाओं को जमीन पर ही खड़ा होना है, ड्रम के विदेशी चोरी के बीट्स, मांदर की थाप और नगाडे़ की धमक और झांझ की झंझार के सम्मुख कतई नहीं टिक सकता.
प्रस्तुत उपन्यास पूँजीवादी विकास की सच्चाई को बयां करती है. नगरीकरण, बाजारीकरण एवं उपभोक्तावाद के नए पैमानों ने आदिवासी को जल-जंगल और जमीन से बेदखल कर दर-दर भटकने को मजबूर करता रहा है. जल-जंगल और जमीन इनकी पुरखों की संपत्ति है इसके बिना जीवन अधूरा है. अपने ही घर से बेघर हुए ये बेचारे करें तो क्या करें? प्रतिरोध की आवाज उठाने का अर्थ है कि उसे नक्सलवादी घोषित किया जा सकता है, एन्काउटंर हो सकता है या तो जेल की काली कोठरी में धकेला जा सकता है. दिकुओं ने (बाहरी तत्वों) सिर्फ लूटने का ही काम किया. परमेश्वर पाहन, सोमेश्वर बाबा, सोनामनी, अनुजा, नीरज, सोमा एवं एतवा जैसे समाज के कुछ लोग इन तत्वों के खिलाफ गोलबंद होते हैं तो उनकी आवाज भी दबा दी जाती है. ऐसे समय सरकारी या गैर सरकारी कोई भी तंत्र काम नहीं करता. किशन विद्रोही जैसे सच्चे पत्रकार अगर लिखने का हिम्मत भी जुटा पाते हैं तो उन्हे धक्के मार कर निकाल दिया जाता है. घुट-घुट कर जीने की विवशता उन्हें कहीं का नहीं छोड़ती अंततः मौत भी रहस्यमय बन कर रह जाती है. रियल एस्टेट, बहुद्देशीय कंपनियों एवं भ्रष्ट व्यवस्था सरकारी तंत्र को बेनकाब कर दुनिया को असली चेहरा दिखाने का काम करता है यह उपन्यास.
औद्योगिक पूँजीवाद से लेकर उपभोक्तावादी पूँजीवाद तक हिन्दुस्तान के आदिवासी इलाके आन्तरिक उपनिवेशवाद के शिकार रहे हैं. कल तक कल-कारखानों, बाँधों, खनन-परिसरों के लिए हमारी जमीन, जंगल, जल, चाहिए था, आज इनके साथ-साथ रियल एस्टेट को भी हमारी जमीने चाहिए. गाँव, शहर, स्लम, यहाँ तक कि हमारे अन्तिम संस्कार की भूमि (ससन) भी इनके लालच की जद में आ गई है. अपने विशिष्ट शिल्प में यह उपन्यास यही भयानक यर्थाथ दिखलाने में सफल होता दिखता है. यही उपन्यासकार की सफलता है कि पाठक को सिहरन से भरता रचना के साथ बहाता मुण्डा जीवन के बहुआयामी रंगों से सुपरिचित करवाता है. रचना एक खतरे की घंटी की तरह हमें आगाह करती है कि हमारी पहचान एवं हमारी अस्मिता संकट में है. हमारी संस्कृति-सभ्यता, भाषा, कला, पारंपरिक नृत्य, गीत, व्यंजन, वाद्य-यंत्र, गाँव, हाट-बाजार, पेड़-पौधे, फल-फूल, पशु-पक्षी, हमसे दूर होते जा रहे हैं.
गायब होता देश टोटल पैकेज है. जहाँ प्रेम भी है और उलगुलान (क्रांति) भी, दर्शन भी है, तर्कशास्त्र भी, विज्ञान भी है साथ ही इतिहास भी, अतीत का गौरव भी है और भविष्य के प्रति सचेष्टता भी. यहाँ सुख-दुःख, हार-जीत, अच्छाई-बुराई, गुण-अवगुण सब कुछ है. एक चुनौती खड़ी की है रणेन्द्र ने पाठकों के लिए किस तरह इस रचनासागर में गोता लगाये. कुछ भी हो जो एक बार इस सागर में डुबकी लगा लेता है उसे फिर यह रचना अपने से बाहर निकलने नहीं देती. दूर तक पीछा करती है.
‘गायब होता देश’: मुण्डाओं का वर्तमान, अतीत और भविष्य
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