पिछले 16 अगस्त को दक्षिण अफ्रीका के मारिकाना में खदान मज़दूरों पर हुई बर्बर पुलिस फायरिंग ने रंगभेदी शासन के दिनों में होने वाले ज़ुल्मों की याद ताज़ा कर दी। इस घटना ने साफ़ तौर पर यह दिखा दिया कि 1994 में गोरे शासकों से आज़ादी के बाद सत्ता में आये काले शासक लूट-खसोट और दमन-उत्पीड़न की उसी परम्परा को जारी रखे हुए हैं। सत्तारूढ़ अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ए.एन.सी.) की ‘काले लोगों के सशक्तीकरण की योजना’ का कुल मतलब काले लोगों की आबादी में से एक छोटे-से हिस्से को अमीर बनाकर पूँजीपतियों और अभिजातों की क़तार में शामिल करना है। बहुसंख्यक काली आबादी आज भी घनघोर ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपमान और उत्पीड़न में ही घिरी हुई है।
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