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  • एक हज़ार कारण हैं कि हम विद्रोह करें, और बस एक ही काफ़ी है कि अब और प्रतीक्षा न करें!

    एक सरकारी आँकड़े के अनुसार, देश की 75 फ़ीसदी माँओं को पोषणयुक्त भोजन नहीं मिलता। विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, यू.एन.एफ़.पी.ए. और विश्व बैंक द्वारा तैयार की गयी ‘मैटर्नल मॉर्टेलिटी रिपोर्ट’ (2007) के अनुसार, पूरी दुनिया में गर्भावस्था या प्रसव के दौरान 5.36 लाख स्त्रियाँ मर जाती हैं। इनमें से 1.17 लाख मौतें सिर्फ़ भारत में होती हैं। भारत में प्रसव के दौरान 1 लाख में से 450 स्त्रियों की मौत हो जाती है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मृत्यु के 47 फ़ीसदी मामलों में कारण ख़ून की कमी और अत्यधिक रक्तस्राव होता है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत सहित सभी विकासशील देशों में गर्भवती और सद्यः प्रसूता स्त्रियों के मामले में 99 फ़ीसदी मौतें ग़रीबी, भूख और बीमारी के चलते होती हैं।

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  • हरियाणा सरकार खुलकर सुज़ुकी के एजेण्ट की भूमिका में

    मारुति मज़दूरों के दमन ने हरियाणा सरकार की मंशा साफ़ कर दी है कि वे खुली तानाशाही के साथ मारुति सुज़ुकी के एजेण्ट का काम करेगी। फिलहाल अभी भी मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन कैथल में विरोध-प्रदर्शन जारी रखकर हरियाणा सरकार पर दबाव बनाने के लिए जन-समर्थन जुटा रही है। लेकिन 1 जून और 11 जून के विरोध प्रदर्शन के बाद हरियाणा सरकार मज़दूरों की किसी भी माँग पर झुकने के लिए तैयार नहीं है।

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  • सर्वहारा वर्ग में व्याप्त ढुलमुलयक़ीनी, फूट, व्यक्तिवादिता आदि का मुक़ाबला करने के लिए उसकी राजनीतिक पार्टी के अन्दर कठोर केन्द्रीयता और अनुशासन होना ज़रूरी है

    वर्ग अभी क़ायम हैं और सत्ता पर सर्वहारा वर्ग का अधिकार होने के बाद बरसों तक सभी जगह क़ायम रहेंगे। हो सकता है कि इंगलैंड में, जहाँ किसान नहीं है (लेकिन फिर भी छोटे मालिक हैं!), यह काल और देशों से कुछ छोटा हो। वर्गों को समाप्त करने का मतलब सिर्फ़ ज़मींदारों और पूँजीपतियों को मिटाना ही नहीं है – वह काम तो हमने अपेक्षाकृत आसानी से पूरा कर लिया – उसका मतलब छोटे पैमाने पर माल पैदा करने वालों को भी मिटाना है और उन्हें ज़बर्दस्ती हटाया नहीं जा सकता, उन्हें कुचला नहीं जा सकता, हमें उनके साथ मिल-जुलकर रहना है, सिर्फ़ एक लम्बे समय तक, बहुत धीरे-धीरे सतर्कतापूर्ण संगठनात्मक काम करके ही इन लोगों को फिर से शिक्षित-दीक्षित किया जा सकता है और नये साँचे में ढाला जा सकता है (और यह किया जाना चाहिए)। ये लोग सर्वहारा वर्ग के चारों ओर एक टुटपुँजिया परिवेश पैदा कर देते हैं, जो सर्वहारा वर्ग में भी घर कर जाता है और उसे भ्रष्ट कर देता है, जिसके कारण सर्वहारा वर्ग लगातार टुटपुँजिया ढुलमुलयक़ीनी; फूट, व्यक्तिवादिता और हर्षातिरेक तथा घोर निराशा के बारी-बारी से आने वाले दौरों का शिकार रहता है। इन चीज़ों का मुक़ाबला करने के लिए आवश्यक है कि सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक पार्टी के अन्दर कड़ी से कड़ी केन्द्रीयता और अनुशासन रहे ताकि ‘सर्वहारा वर्ग की संगठनात्मक भूमिका (और वही उसकी मुख्य भूमिका है) सही तौर से, सफलता-पूर्वक और विजय के साथ पूरी की जा सके।

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  • मेट्रो के ठेका कर्मचारियों ने प्रदर्शन कर डी.एम.आर.सी. प्रशासन का पुतला फूंका!

    दिल्ली मेट्रो रेल कॉरर्पोरेशन व ठेका कम्पनियों द्वारा श्रम क़ानूनों के ग़म्भीर उल्लंघन के ख़िलाफ़ दिल्ली मेट्रो रेल कामगार यूनियन के बैनर तले सैंकड़ों मेट्रो कर्मियों ने जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन किया और डी.एम.आर.सी. प्रशासन का पुतला भी फूँका। मेट्रो कर्मियों ने बताया कि मेट्रो प्रशासन और अनुबन्धित ठेका कम्पनियों की मिलीभगत के कारण ही यहाँ श्रम-क़ानूनों का पालन नहीं किया जाता; जिसके चलते मेट्रो कर्मियों के हालात बदतर हो रहे है। ज्ञात हो कि मेट्रो प्रबन्धन अगले महीने की पहली तारीख़ को क़ानूनों को ताक़ पर रखते हुए 250 मेट्रो मज़दूरों को काम से निकाल रहा है। दिल्ली मेट्रो रेल प्रबंधन की इस कार्रवाई का विरोध करते हुए दिल्ली मेट्रो रेल कामगार यूनियन की अगुवाई में मेट्रो मज़दूरों ने डी.एम.आर.सी. प्रशासन का पुतला फूँकने के बाद एक ज्ञापन केन्द्रीय श्रम-मंत्री, क्षेत्रिय श्रमायुक्त व मेट्रो प्रबन्धक मंगू सिंह को सौंपा।

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  • मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड में मज़दूर संघर्ष और अधिकारों का हनन

    यह रिपोर्ट ‘शोषण का पहिया: मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड में मज़दूर संघर्ष और अधिकारों का हनन’ मारुति के मानेसर यूनिट में 18 जुलाई 2012 को हुई हिंसा की घटना के बाद पीयूडीआर द्वारा की गयी जाँच-पड़ताल पर आधारित है। इस घटना को हुए तकरीबन एक साल बीत चुका है, जिसमें एक एचआर मैनेजर की मौत हो गयी थी और कुछ अन्य मैनेजर और मज़दूर घायल हो गये थे। बाद के महीनों में पुलिस ने इस घटना की काफी गलत तरीके से जाँच-पड़ताल करते हुए बड़ी संख्या में मज़दूरों और उनके परिवारों के सदस्यों को प्रताड़ित किया। इस जाँच के कारण मज़दूरों को गिरफ़्तार करके जेलों में बन्द कर दिया गया और आज तक बहुत से मज़दूरों को जमानत भी नहीं मिली है। पुलिस की जाँच के पूरा होने के पहले ही कम्पनी ने सैकड़ों मज़दूरों पर 18 जुलाई की घटना में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। पंजीकृत यूनियन को यूनिट के भीतर काम करने की इजाज़त नहीं दी गयी है और यूनिट के बाहर पुलिस और राज्य के अधिकारियों द्वारा लगातार इसकी गतिविधियों को दबाया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में हम इस घटना से जुड़े तथ्यों की व्यापक जाँच-पड़ताल करने के बाद, घटना और इसके गहरे संदर्भ और प्रभावों के बारे में यह रिपोर्ट जारी कर रहे हैं। इसके पहले पीयूडीआर ने मारुति में मज़दूरों के संघर्ष के बारे में दो अन्य रिपोर्ट भी प्रकाशित की थीं, जिनके शीर्षक थे: ‘पूँजी का पहिया’ (2001) और ‘बेकाबू सरमायादार’ (2007)। इन दोनों रिपोर्टों में मारुति संघर्ष के महत्त्वपूर्ण घटनाक्रमों का विश्लेषण दर्ज किया गया है। इस रिपोर्ट पर जाँच के दौरान हम मज़दूरों (ठेका, स्थाई और बर्खास्त), यूनियन के नेताओं और उनके वकील से मिले। हमने गुड़गाँव के श्रम विभाग के अधिकारियों और विभिन्न पुलिस अधिकारियों से भी बातचीत की। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद हम प्रबन्धन से नहीं मिल पाये।

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  • नोएडा में मज़दूरों का आक्रोश सड़कों पर फूटा

    नोएडा का औद्योगिक इलाका गत 20-21 फरवरी को मीडिया में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में था। वजह थी मज़दूरों के आक्रोश का सड़कों पर फूटना। पूँजीवादी ख़बरिया चैनल और अख़बार मज़दूरों को गुण्डा, अपराधी और बल्बाई घोषित कर रहे थे। मगर यही मीडिया मज़दूरों के ऊपर होने वाले रोज़-रोज़ के अन्याय और ज़ोर-ज़ुल्म पर चुप्पी साधे रहता है। देश के अन्य औद्योगिक इलाकों की तरह नोएडा के कम्पनी मालिक श्रम क़ानूनों का खुले आम उल्लंघन करते हैं, यह तो किसी से छुपा नहीं है, मगर अब तो पूरी की पूरी तनख़्वाह भी मार ली जा रही है। नोएडा में ऐसे हज़ारों मज़दूर मिल जायेंगे जिनकी एक-एक दो-दो महीने की तनख़्वाह कोई न कोई बहाना बनाकर मार ली गई है। इनमें से ज़्यादातर मामलों में मालिकों मैनेजरों और तथाकथित ठेकेदारों की मिलीभगत होती है। ऐसी ही एक घटना 20 वर्षीय मज़दूर विकास व उसके साथी मज़दूरों के साथ हुई। विकास के अनुसार वह डी – 125/63, नोएडा में हेल्पर के रूप में काम करता था।

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