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  • असली मुद्दा ख़नन की वैधता या अवैधता का नही बल्कि पूँजी द्वारा श्रम और प्रकृति की बेतहाशा लूट का है।

    पूँजीवादी अदालतें और मीडिया अवैध खनन को वैध तरीके से चलाने की पुरज़ोर वकालत करते हैं। लेकिन मज़दूरों, मेहनतकशों के सामने तो असली सवाल यह है कि जहाँ यह ख़नन वैध तरीके से चल रहा है क्या वहाँ श्रम की लूट और प्रकृति का विनाश रुक गया है? अगर नहीं तो क्या वजह है कि सरकार, अदालतें और मीडिया मज़दूरों के श्रम की लूट के मुद्दे को एकदम गोल कर जाते हैं? उनका कुल ज़ोर ख़दानों को कानूनी बनाने पर ही क्यों रहता है। इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए हम रेत-खनन का ठोस उदाहरण लेते हैं।

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  • Delhi- Jan Sunwai by Maruti Suzuki Workers Union at Jantar Mantar, Aug 30

    JAN SUNWAI 11 AM, 30th AUGUST 2013 JANTAR MANTAR, NEW DELHI Dear Friends and Comrades, As you know, we the workers of Maruti Suzuki Manesar, continue to struggle without jobs, without bail or release, without justice. We have continued to struggle against against the false projections of industrial peace and prosperity in Gurgaon, which is […]

  • एक बार फ़िर देश को दंगों की आग में झोंककर चुनावी जीत की तैयारी

    आज पूँजीवादी राजनीति के सामने जो संकट खड़ा है, वह समूची पूँजीवादी व्यवस्था के संकट की ही एक अभिव्यक्ति है। संसद और विधानसभा में बैठने वाले पूँजी के दलालों के पास कोई मुद्दा नहीं रह गया है; जनता में असन्तोष बढ़ रहा है; दुनिया के कई अन्य देशों में जनविद्रोहों के बाद शासकों की नियति भारत के पूँजीवादी शासकों के भी सामने है; इससे पहले कि जनता का असन्तोष किसी विद्रोह की दिशा में आगे बढ़े, उनको धार्मिक, जातिगत, क्षेत्रगत या भाषागत तौर बाँट दिया जाना ज़रूरी है। और इसीलिए अचानक आरक्षण का मुद्दा, राम-मन्दिर का मुद्दा, मुसलमानों की स्थिति का मुद्दा फिर से राष्ट्रीय पूँजीवादी राजनीति में गर्माया जा रहा है। तेलंगाना से लेकर बोडोलैण्ड और गोरखालैण्ड के मसले को भी केन्द्र में बैठे पूँजीवादी घाघ हवा दे रहे हैं। जो संकट आज देश के सामने खड़ा है, उसके समक्ष दोनों ही सम्भावनाएँ देश के सामने मौजूद हैं। एक सम्भावना तो यह है कि सभी प्रतिक्रियावादी ताक़तें देश की आम मेहनतकश जनता को बाँटने और अपने संकट को हज़ारों बेगुनाहों की बलि देकर टालने की साज़िश में कामयाब हो जाये। और दूसरी सम्भावना यह है कि हम इस साज़िश के ख़िलाफ़ अभी से आवाज़ बुलन्द करें, मेहनतकशों को जागृत, गोलबन्द और संगठित करें। देश का मज़दूर वर्ग ही वह वर्ग है जो कि फ़ासीवाद के उभार का मुकाबला कर सकता है, बशर्ते कि वह ख़ुद अपने आपको इन धार्मिक कट्टरपन्थियों के भरम से मुक्त करे और अपने आपको वर्ग चेतना के आधार पर संगठित करे।

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  • पेरिस कम्यून: पहले मज़दूर राज की सचित्र कथा (नवीं किश्त)

    पेरिस कम्यून की असफ़लता का निचोड़ निकालते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने यह और अधिक स्पष्ट किया कि सर्वहारा वर्ग की सत्ता शस्त्रबल से हासिल होती है और इसी के सहारे कायम रह सकती है। यह तभी कायम रह सकती है जबकि बुर्जुआ वर्ग की सत्ता को ध्वस्त करने के बाद भी उसे सम्भलने का मौका न दिया जाये और उसके समूल नाश के लिए जंग जारी रखी जाये।

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  • FTII Students’ Association Calls for Solidarity

    Students’ Association Film and Television Institute of India, Law College Road, Pune: 411004 On the 21st of August 2013 students of the Film and Television Institute of India (FTII) and Yugpath, Pune organized a screening of ‘Jai Bhim Comrade’, followed by a discussion with Anand Patwardhan and a performance by members of the Kabir Kala […]

  • आख़िर कब खोलोगे अन्धी आस्था की पट्टी अपनी आँखों से?

    ज़ाहिर है कि हम इन स्त्री-विरोधी, रूढ़िवादी, प्रतिक्रियावादी, तानाशाहाना, और बर्बर ताक़तों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे स्त्री के अधिकारों का सम्मान करेंगी, स्त्रियों को समानता का हक़ देंगी, उनकी सुरक्षा के इन्तज़ाम करेंगी, या उन्हें समाज में पुरुषों के समान मानेंगी! यही तो वे ताक़तें हैं जो स्त्री की गुलामी के लिए ज़िम्मेदार हैं, यही तो वे लोग हैं जो स्त्री-विरोधी अपराधों के लिए जवाबदेह हैं और अक्सर स्वयं उन्हें अंजाम देते हैं, यही तो वे लोग हैं जो स्त्रियों को पुरुषों की दासी समझते हैं और उन्हें पैर की जूती बनाकर रखना चाहते हैं! इनसे भला क्या उम्मीद की जा सकती है? कुछ भी नहीं! हम एक ही चीज़ कर सकते हैं: इस समाज के सभी विद्रोही, संवेदनशील और न्यायप्रिय युवा और युवतियाँ, मेहनतकश और आम मध्यवर्गीय नागरिक सदियों पुरानी रूढ़ियों, कूपमण्डूकताओं, पाखण्ड और ढकोसलेपंथ के इन अपराधी ठेकेदारों की बन्दिशों को उखाड़ कर फेंक दें, इन्हें तबाह कर दें, नेस्तनाबूद कर दें! ये हमारे देश और समाज को पीछे ले जाने वाले प्रतिक्रियावादी हैं, राष्ट्रवादी या देशभक्त नहीं! आगे अगर हम ऐसे धार्मिक कट्टरपंथियों, बाबाओं, स्त्री-विरोधियों की कोई भी बात या प्रवचन सुनते हैं, तो हममें और भेड़ों की रेवड़ों में कोई फ़र्क नहीं रह जायेगा! अगर हम इन अन्धकार की ताक़तों के ख़िलाफ़ उठ नहीं खड़े होते तो सोचना पड़ेगा कि हम ज़िन्दा भी रह गये हैं या नहीं!

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  • दिल्ली की शाहाबाद डेयरी बस्ती में एक और बच्ची की निर्मम हत्या

    लेकिन सोचने वाली बात यह है कि ऐसे अपराध समाज में हो ही क्यों रहे हैं। इस समाज में स्त्रियां और बच्चियां महफ़ूज क्यों नहीं हैं। दरअसल, 1990 के बाद से देश में उदारीकरण की जो हवा बह रही है, उसमें बीमार होती मनुष्यता की बदबू भी समायी हुई है। पूँजीवादी लोभ-लालच की संस्कृति ने स्त्रियों को एक ‘माल’ बना डाला है और इस व्यवस्था की कचरा संस्कृति से पैदा होने वाले जानवरों में इस ‘माल’ के उपभोग की हवस भर दी है। सदियों से हमारे समाज के पोर-पोर में समायी पितृसत्तात्मक मानसिकता इसे हवा दे रही है, जो औरतों को उपभोग का सामान और बच्चा पैदा करने की मशीन मानती है, और पल-पल औरत विरोधी सोच को जन्म देती है। और ’90 के बाद लागू हुई आर्थिक नीतियों ने देश में अमीरी-ग़रीबी के बीच की खाई को अधिक चौड़ा किया है, जिससे पैसे वालों पर पैसे का नशा और ग़रीबों में हताशा-निराशा, अपराध हावी हो रहा है।

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  • Documentary on Maoism in China now. Commentary is in Japanese, but there’s lots of Chinese talking, and there are Chinese subtitles throughout.

    Democracy and Class Struggle publish this video because it contains views of some Maoists in China. We do not endorse views in this hostile Japanese NHK video.

    Subtitles from Dowland group, you can refer to this blog leftist Qingdong “heated debate about Mao Zedong” http://blog.sina.com.cn/s/blog_476da3610102e3qm.html … and right Cui Weiping published in the new financial “New Century” on

  • Twin Cities peace activists say no to U.S. military attack on Syria

    Minneapolis, MN – Peace activists in the Twin Cities are speaking out in opposition to military strikes against Syria.

    Meredith Aby of the Anti-War Committee states, “Despite the fact that the majority of Americans are against U.S. military intervention in Syria, the New York Times reports that President Obama is considering a list of targets and is talking with French President François Hollande about military action. It is critical that we protest and call the White House to say no to war with Syria. The U.S. needs to pull out of Syria – not entrench itself into this conflict further. I am deeply concerned about how many people a U.S. bombing campaign would kill.”

    Sabry Wazwaz, also of the Anti-War Committee, said, “We need to understand if the U.S. invades Syria, trust me it’s not to save the Syrian people.”

    In response the threats to attack, the organizers of the Wednesday Peace Vigil on the Lake Street-Marshall Avenue Bridge urge all opposed to a new U.S. war to join the vigil Aug. 28, between 5 and 6 p.m., to speak out against U.S. intervention in Syria. The weekly peace vigil is sponsored by the Women Against Military Madness End War Committee and Twin Cities Peace Campaign. The call for the Aug. 28 vigil to speak out against a U.S. war in Syria is endorsed by the Anti-War Committee, Minnesota Peace Action Coalition, Veterans for Peace and others.

  • Maharashtra – Statements condemning the the detention of Hem Mishra and others

    PRESS STATEMENT FROM JNU COMMUNITY In a press conference held earlier today (26th August) at the students union office in JNU, the teachers, students and an large number of student as well as cultural organizations of JNU along with the JNUSU, strongly condemned the arrest and profiling of Hem Mishra, who till very recently was […]