http://www.thehindu.com/news/national/other-states/in-rare-apology-maoists-say-killing-nand-kumar-patel-son-was-a-big-mistake/article5239484.ece In rare apology, Maoists say killing Nand Kumar Patel, son was a ‘big mistake’ With less than a month to go for the Chhattisgarh Assembly elections, the outlawed CPI-Maoist issued a rare apology for killing the State Congress president Nand Kumar Patel and his son Dinesh. The apology, which referred to the murder as […]
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Labour Herald – Issue No.99
Africa / Asia / Caribbean / Central America /Europe / Middle East / South America Australia / New South Wales False hope on Electrolux cuts no ice with AWU [Central Western Daily] 2013-10-26 10 more labour news stories from Australia today Bangladesh Minimum-Wage Hike Won’t Appease Workers [In These Times] 2013-10-26 Canada / Ontario Rollbacks: How Does It Make You Feel? ActNOW! [USW] 2013-10-27 21 more … Continue reading
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Oct 27: Something, anything, to eat, plead jungle mahal’s tribal women
http://kashmirtimes.com/newsdet.aspx?q=24519 Something, anything, to eat, plead jungle mahal’s tribal women By Saadia Azim The Jungle Mahal region of West Bengal, which spans the three districts of West Midnapore, Bankura and Purulia, used to be notorious for providing safe passage to Maoist rebels transiting between Bengal and neighouring Jharkhand. Today, however, people here are facing a […]
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Haryana – Update on clampdown against Oct 27 protest by Maruti workers
[The details of the scheduled protest can be found here. – Ed कैथल में धारा 144 के लागु किये जाने का विरोध करें! प्रशासन के अजनतांत्रिक रवैय्ये को चुनौती दें! साथियों, मारुति मजदूरों और हमारे परिजनों द्वारा 27 अक्टूबर को आयोजित किए जा रहे विशाल प्रदर्शन को रोकने के लिए प्रशासन ने पूरे कैथल जिले […]
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Delhi – A critical report on education reforms
[This report has been received from Lok Shikshak Manch, who have been critical of neo-liberal reforms in primary and secondary education, like contractualization of teaching positions, privatization and NGO-ization of schools etc. It is a critique of a study by Karthik Murlidharan, which concluded that private schools perform better than state run schools. – Ed] […]
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अक्टूबर 2013
- सावधान! फ़ासीवादी शक्तियाँ अपने ख़तरनाक खेल में लगी हैं!
- पेरिस कम्यून: पहले मज़दूर राज की सचित्र कथा (ग्यारहवीं किस्त)
- पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में दिमागी बुखारः 35 वर्ष से जारी है मौत का ताण्डव
- पूँजीवादी लोकतंत्र का फटा सुथन्ना और चुनावी सुधारों का पैबन्द
- डेंगू — लोग बेहाल, “डॉक्टर” मालामाल और सरकार तमाशाई
- कैसा है यह लोकतंत्र और यह संविधान किसकी सेवा करता है (तेईसवीं क़िस्त)
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सावधान! फ़ासीवादी शक्तियाँ अपने ख़तरनाक खेल में लगी हैं!
फ़ासीवाद पूँजीवादी ढांचे के अंदर ‘खूंटे से बंधे कुत्ते’ की तरह होता है जिसकी जंजीर पूँजीपति वर्ग के हाथों में रहती है। पूँजीवादी ढांचे के अंदर इसकी मौजूदगी लगातार बनी रहती है। जैसे ही पूँजीपति वर्ग के लिए सत्ता के दूसरे रूपों जैसे संसदीय जनवाद के द्वारा लोगों पर अपना नियंत्रण रखना और पूँजीवादी लूट को जारी रखना असंभव हो जाता है उसी समय फ़ासीवाद का क्रूर खंजर वक्त के अँधेरे कोनों से निकल के सामाजिक रंगमंच पर आ प्रकट होता है और अपने आकाओं, वित्तीय पूँजी की सेवा में मेहनतकश लोगों पर टूट पड़ता है।
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लुधियाना में टेक्सटाइल मज़दूर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर
मज़दूरों ने श्रम विभाग और प्रशासन तक अपनी आवाज़ पहुँचाई है। लेकिन सरकारी मशीनरी मज़दूरों के हक में कोई भी कदम उठाने को तैयार नहीं है। श्रम विभाग कार्यालय में पर्याप्त संख्या में अधिकारी और कर्मचारी ही नहीं हैं और जो हैं भी वो पूँजीपतियों के पक्के सेवक हैं। अन्य क्षेत्रों के कारखानों की तरह टेक्सटाइल कारखानों में भी श्रम कानून लागू नहीं होते हैं। मज़दूर पीस रेट पर काम करते हैं और कुछ महीने मज़दूरों को बेरोज़गारी झेलनी पड़ती है। बाकी समय उन्हें 12-14 घण्टे कमरतोड़ काम करना पड़ता है। देश-विदेश में बिकने वाले शाल व होज़री बनाने वाले इन मज़दूरों को बेहद गरीबी की ज़िन्दगी जीनी पड़ रही है। ‘बिगुल’ द्वारा इन मज़दूरों के बीच किये गये निरन्तर प्रचार-प्रसार और संगठन बनाने की कोशिशों की बदौलत अगस्त 2010 में टेक्सटाइल मज़दूरों के एक हिस्से ने अपना संगठन बनाकर एक नये संघर्ष की शुरुआत की थी। पिछले वर्ष तक इस संघर्ष की बदौलत 38 प्रतिशत पीसरेट/वेतन वृद्धि और ई.एस.आई. की सुविधा हासिल की गयी है। लेकिन लगातार बढ़ती जा रही महँगाई के कारण स्थिति फिर वहीं वापस आ जाती है। मालिकों के मुनाफे तो बढ़ जाते हैं लेकिन वे अपनेआप मज़दूरों की मज़दूरी बढ़ाने, बोनस देने तथा अन्य अधिकार देने को तैयार नहीं होते। एकजुट होकर लड़ाई लड़ने के सिवाय कोई अन्य राह मज़दूरों के पास बचती नहीं है।
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रहे-सहे श्रम अधिकारों के सफ़ाये की तेज़ होती कोशिशें
पूँजीपति अपने रास्ते से सारी अड़चनें हटा देना चाहते हैं। उन्हें कागजों पर रह गए श्रम कानून भी चुभ रहे हैं। आज देश के कोने-कोने से मज़दूरों द्वारा श्रम कानून लागू करने की आवाज उठ रही है हालांकि संगठित ताकत की कमी के कारण मज़दूर मालिकों और सरकारी ढाँचें पर पर्याप्त दबाव नहीं बना पाते। पूँजीपतियों को श्रम विभागों और श्रम न्यायालयों में मज़दूरों द्वारा की जाने वाली शिकायतों और केसों के कारण कुछ परेशानी झेलनी पड़ती है। इन कारणों से पूँजीपति वर्ग मज़दूरों के कानूनी श्रम अधिकारों का ही सफाया कर देना चाहता है।
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