Author: Jun Puth

  • Benares Grapevine-2: परेशान चेहरे और लड़खड़ाते घुटने


    अस्‍सी चौराहे स्थित पप्‍पू की दुकान पर एक लंबा सा आदमी चाय पीने आया। उसकी लंबाई औसत से कुछ ज्‍यादा थी। एक व्‍यक्ति ने उसे देखकर दूसरे से कहा, ”ई आइबी क हौ।” दूसरे ने सुना और तीसरे को बताया। तीसरे ने उसमें मूल्‍यवर्द्धन किया, ”अरे, तीन-चार मिला हउवन। दू ठे घाटे पे घूमत रहलन।” बात आगे बढ़ी। चौथे ने बताया कि अकेले आइबी वाले नहीं, बल्कि सीआइए और रॉ वाले भी आए हुए हैं। एक पांचवें व्‍यक्ति ने इन बातों को सुन कर कहीं फोन मिलाया और बताया, ”अबे, पता हौ, आइबी, रॉ अउर सीआइए क टीम बनारस में आयल हौ। अस्‍सी पर हउवन सब।” वहां से बात आगे बढ़ी और कुछ पत्रकारों को विश्‍वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली कि शहर में छापा पड़ने वाला है। अगले दिन के अखबारों की हेडलाइन थी: ”शहर के चप्‍पे-चप्‍पे पर आइबी की निगाह, पड़ सकते हैं छापे, संवेदनशील हालात।”

    बनारस की पत्रकारिता का यह किस्‍सा पिछली रात तुलसी घाट पर महंतजी विश्‍वम्‍भर मिश्र के छोटे भाई डॉक्‍टर साहब ने अनौपचारिक बातचीत में सुनाते हुए शहर की पत्रकारिता पर अफ़सोस जताया। कहने का अर्थ ये कि बनारस में कौन सी बात ख़बर बन जाए और कौन सी ख़बर बतकही, कुछ कहा नहीं जा सकता है। मसलन, कल सवेरे मेरी डेढ़ घंटे की नींद खोलने के लिए एक फोन आया। फोन करने वाले ने सूचना दी कि आम आदमी पार्टी ने एक सर्वे जारी किया है जिसके मुताबिक बनारस में ”आप” पहले स्‍थान पर, बसपा दूसरे पर, भाजपा तीसरे पर, सपा चौथे पर और कांग्रेस पांचवें स्‍थान पर रहेगी। अब, सवाल ये है कि क्‍या कोई भी पार्टी खुद को हारता हुआ कहती है? अगर नहीं, तो इसमें मौलिक क्‍या है? बहरहाल, जंगल की आग की तरह यह सर्वे ऐसा फैला कि दोबारा झपकी आने पर भी यही ख़बर देने के लिए किसी और का फोन आ गया। किसी तरह दिन शुरू हुआ, तो व्‍योमेश शुक्‍ल ने फोन कर दिया कि विष्‍णु खरे के कमरे में हूं, आइए। विष्‍णुजी हाफ पैंट में बैठे कॉफी पी रहे थे। पहुंचा गया। वे अब भी रीयल पॉलिटिक पर कायम थे। व्‍योमेश लगातार पान दिए जा रहे थे। उन्‍हें अभी दो दिन रुकना था लेकिन हमें मार्केट में निकलने की जल्‍दी थी। लेनिन के ज़माने का सवाल अब भी दुनिया में कायम था: ”क्‍या करें?” विष्‍णुजी ने अपनी इच्‍छा प्रकट की, ”अगर प्रियंका न भी आ सकें तो कम से कम उनका कोई संदेश वाला वीडियो रिकॉर्ड करवा कर लोगों में बंटवा दिया जाए। इसका बहुत असर पड़ेगा।” मैंने कहा, ”ये करेगा कौन?” वे बोले, ”मेरी तो सोनिया, प्रियंका या राहुल किसी से भी पहचान नहीं है।” मैंने कहा, ”मेरी तो किसी कांग्रेसी सभासद तक से पहचान नहीं है।” सवाल गंभीर था, जवाब नदारद। व्‍योमेश बोले, ”कुछ करते हैं।”

    शाम को व्‍योमेश ने सचमुच कुछ तो किया। उन्‍होंने फिर फोन किया, ”विष्‍णु खरे और शबनम हाशमी नई सड़क पर कांग्रेस के मंच से बोल रहे हैं।” लहजा सूचित करने का था, लेकिन पहुंचने पर उन्‍होंने सभा में बैठने का आग्रह कर डाला। ज़ाहिर है सभा ईसा भाई की थी और वहां अजय राय के आने की भी अटकलें थीं, लेकिन यह कांग्रेसी अपनापा देखकर मुझे थोड़ी वितृष्‍णा हुई। मित्र व्‍यालोक का चप्‍पल टूटा था, सो हम लोगों ने इस समय का सदुपयोग किया और गली में से नया चप्‍पल खरीद ले आए। लौटे तो हाथ में अखबार में लिपटा चप्‍पल था और मंच पर विष्‍णु खरे। सड़क के बीचोबीच कतार में लगी लाल कुर्सियों पर बैठे मुसलमान भाइयों को वे भरभराई आवाज में संबोधित कर के अजय राय के लिए वोट मांग रहे थे। रियल पॉलिटिक शबाब पर था। संचालक ने उन्‍हें दिल्‍ली से आया पत्रकार बताया था, तो लोगों में उनका वज़न बढ़ गया था। वे बोले, और मंच से उतरते वक्‍त लड़खड़ा गए। मुझे अटलजी की याद हो आई।

    खैर, बनारस के अल्‍पसंख्‍यक इलाकों में मेरी देखी यह पहली कांग्रेसी सभा थी। पचासेक लोग रहे होंगे। अजय राय को नहीं आना सो नहीं आए। बड़ी अजीब स्थिति है, कि कांग्रेस और मुसलमानों के बीच का रिश्‍ता समझ में नहीं आ रहा। हमने दिन में न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस के कार्यक्रम ”वाराणसी: ब्‍लैक एंड वाइट” के शूट पर मदनपुरा के तमाम मुसलमानों से बार-बार पूछा कि वे किसे वोट देंगे। सबने बिना किसी अपवाद के केजरीवाल और झाड़ू का नाम लिया। इस लोकतंत्र में मुसलमान कभी भी अपनी पसंद ज़ाहिर नहीं करता है। यह बात हम सब जानते हैं। मेरे जाने पहली बार ऐसा हुआ कि मुसलमान बोल रहा है। नाम बोल रहा है। पसंद बता रहा है। क्‍या करें? उस पर भरोसा कर लें? अब तक के चुनावों का सबक ये रहा है कि भरोसा न किया जाए। मेरे मित्र रोहित प्रकाश एक अलहदा बात कहते हैं कि संभव है मोदी के डर से इस बार मुसलमान ज्‍यादा असर्टिव हुआ हो और अपने को खोल रहा हो। यह संभावना है, लेकिन केजरीवाल का नाम इनके मुंह से सुनकर अभ्‍यास यही बताता है कि वे केजरीवाल को वोट नहीं देंगे। इस बात से कांग्रेसी खुश हैं। बनारस में कांग्रेसियों का कोई नामलेवा नहीं है, ऐसा नहीं है। विष्‍णु खरे या शबनम हाशमी या फिर तीस्‍ता सीतलवाड़ का कांग्रेसी प्रचार उनकी दुकानदारी से उतना ही ताल्‍लुक रख सकता है जितना उनके अपने चुनावी विश्‍लेषण से। अजय राय के नाम पर मतदाताओं की चुप्‍पी कुछ कह रही है। उसे सुनने की ज़रूरत है। इसके बरक्‍स एक और आवाज है जो पूर्वांचल के खांटी सामंती चरित्र से निकल रही है।

    रविदास गेट पर केशव की दुकान पर पान खाते एक पुलिसकर्मी मिले। छपरा निवासी थे। अजय राय से दुखी थे। बोले, ”पिछले चुनाव में हम बिधायकजी के संगे लगातार लगल रहली। हमरा चुनाव आयोग नोटिस भेज दिहलस। कोई बात ना.. बिधायक जी क सम्‍मान रहे। लेकिन अबकी ऊ ठीक नाहीं कइलन।” ऑटोमैटिक गति से पान बांधते राजेंदरजी की आंखें लाल हो गईं। वे बोले, ”जो राजनीत के लिए अपने भाई के कफ़न का सौदा कर ले, उसका कोई चरित्र है?” सिपाहीजी बोले, ”बताइए, ई सरवा गवाह है अपने भाई की हत्‍या में… कुछ तो लिहाज करना चाहिए था। ई न जीती।” पता नहीं इस कोण से कितने लोग सोच रहे हैं। मुख्‍तार का समर्थन लेकर अजय राय ने क्‍या कफ़न का सौदा सियासत के लिए कर लिया? क्‍या सियासत को इस उच्‍च आदर्शवादी स्‍तर पर जाकर सोचने वाले सामान्‍य लोग भी हैं? क्‍या अपने भाई की हत्‍या का बदला मोदी को हराने की चुनौती से बड़ा होना चाहिए?  ये ऐसे सवाल हैं जिन पर बनारस बहस कर रहा है। सवाल प्राथमिकताओं का है।

    एक और सवाल है। क्‍या नरेंद्र मोदी को हराने के लिए अजय राय उतने ही सीरियस हैं जितने अरविंद केजरीवाल? यह सवाल ज्‍यादा गंभीर है। ज़रूरी नहीं कि गंभीरता सड़कों पर दिखाई ही दे, लेकिन सड़कों के सन्‍नाटे के पार रात के धुंधलके में जो बनारस में घट रहा है, वह भी मामूली नहीं। नई सड़क की सभा के दौरान खबर मिली कि शरद यादव तुलसी घाट पहुंचने वाले हैं। उनकी पार्टी जेडीयू ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया है। वे महंतजी को श्रद्धांजलि देने रात साढ़े ग्‍यारह बजे उनके घर पहुंचे। अप्रत्‍याशित रूप से चार पत्रकार वहां मौजूद थे। मैंने पूछा, ”सिर्फ बनारस में मोदी का विरोध कर के क्‍या सारी सेकुलर ताकतें वड़ोदरा में उन्‍हें वाकओवर नहीं दे रही हैं?” शरद यादव ने जवाब दिया, ”ये बेकार का सवाल है।” मैंने दुहराया, ”क्‍या बनारस की समरसता को बचाना प्राथमिक है या मोदी को हराना? ” वे मुस्‍करा कर बोले, ”भाई, हम सत्‍ता में तो हैं नहीं। बहुत कमज़ोर हैं। हमारी जितनी ताकत है उतना कर रहे हैं।” दालान से निकल कर सीढि़यों से ऊपर आते वक्‍त वे लड़खड़ा गए। उन्‍हें सहारा देकर लाया गया। मुझे अटलजी की फिर याद आ गई।

    दरअसल, घुटने कमज़ोर हों तो हर आदमी अटलजी हो जाता है। मसलन, आज सवेरे शबनम हाशमी बहुत चिंतित थीं कि 9 तारीख को कबीर मठ में सूफ़ी गायन के लिए एडीएम ने उन्‍हें मंजूरी नहीं दी। वे मतदाता जागरूकता की बात कर रहे हैं और किसी का भी प्रचार करने वाले कार्यक्रमों को मंजूरी नहीं दे रहे। आज सवेरे-सवेरे बनारस के अखबारों में कांग्रेस प्रचार के लिए 60,000 परचे बंटवा चुकीं शबनम के चेहरे पर लेकिन इसका कोई उत्‍साह नहीं था। एक मित्र कह रहे थे कि राहुल गांधी के कांग्रेस की सत्‍ता में मज़बूत होने के बाद कुछ बदलाव आया है। कांग्रेस पोषित एनजीओ और व्‍यक्तियों को भाव नहीं दिया जा रहा और वे अपनी जगह दोबारा बहाल करवाने के लिए चार कदम आगे बढ़कर कांग्रेस के पक्ष में काम कर रहे हैं। यह बात कितनी सही है और कितनी गलत, यह तो नहीं पता लेकिन शबनम हाशमी को रायबरेली में परचा बांटने पर आरएसएस के लोगों द्वारा धमकाए जाने की घटना पर एक लेखक ने 4 तारीख को कबीर मठ में वाजिब टिप्‍पणी की थी, ”रायबरेली में साम्‍प्रदायिक फासीवाद का कौन सा खतरा है? ज़रा उनसे पूछिए कि वे वहां किसका परचा बांट रही थीं?” इस तरह के कई सवाल हैं जो बनारस के मोदी विरोधी खेमे में तैर रहे हैं, इसके बावजूद कुछ कमज़ोर घुटने मोदी को हराने के लिए किसिम किसिम की सीढि़यां उतर-चढ़ रहे हैं।

    बनारस की पत्रकारिता में ऐसे औसत से ”लंबे लोग” आकर्षण का केंद्र होते हैं। ये खबरें बना रहे हैं, अफ़वाह के पात्र बन रहे हैं और अंतत: सहानुभूति के पात्र बन जा रहे हैं। जनता के लिए ऐसे लोग बस नए चेहरे हैं। नई सड़क पर कांग्रेसी सभा जहां हो रही थी, उसके बगल वाली गली में गुटखा चबाता एक नौजवान इदरीस मंच की ओर देखते हुए कहता है, ”जीतना मोदी को है, परेशान सब लोग हो रहे हैं।” यही परेशानी फि़लहाल नरेंद्र मोदी के सबसे मजब़ूत मुहावरे के बरक्‍स बनारस को बना-बिगाड़ रही है।

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  • Benares Grapevine-1: सांस्‍कृतिक मार्च और फ्लैग मार्च के बीच

    अभिषेक श्रीवास्‍तव 


    कल रात शहर में पुलिस का फ्लैग मार्च हुआ। रात साढ़े दस बजे के करीब जब हमने दुर्गाकुंड से लंका की ओर जाते हुए नीली-पीली बत्तियों वाली सायरन बजाती पुलिस की करीब दो दर्जन गाडि़यां देखीं, तो किसी अनिष्‍ट की आशंका में मन सिहर उठा। दुर्गाकुंड पर अरविंद केजरीवाल रुके हैं और लंका पर बीएचयू है। मैंने अरविंद केजरीवाल का प्रचार करने और बनारस के चुनाव पर एक फिल्‍म बनाने आए पूर्व पत्रकार अविनाश दास को फोन लगाया। उन्‍होंने पहले तो दो मिनट बाद कॉल बैक करने को कहा, फिर काफ़ी देर बाद बाद बात होने पर शहर में किसी हत्‍या के होने की खबर सुनाई। फिर उन्‍होंने हत्‍या और पुलिस के काफि़ले के बीच संबंध तलाश कर मुझे दोबारा कॉल कर के बताया कि अरविंद केजरीवाल सुरक्षित हैं और यह तो पुलिस का फ्लैग मार्च था। इस सूचना के काफ़ी पहले जब हम इस काफि़ले का पीछा करते लंका पहुंचे थे तो एक सिपाही ने पूछने पर बताया था कि यह पुलिस का बल प्रदर्शनहै। दूसरे सिपाही ने कहा, ”भ्रमणहै। लंका पर चाय पी रहे बीएचयू के एक सज्‍जन ने बताया कि शहर में फांसीवादआया है। मैंने पूछा कहां है, तो उन्‍होंने जवाब दिया, ”सुने कि दिनवा में कबीर मठ में रहा।
    दिमाग फलैशबैक में चला गया। दरअसल, दिन में हुआ यों कि कबीर मठ में आयोजित सांप्रदायिक फासीवाद विरोधी कन्‍वेंशन विरासत कबीरमें जब हमारे अजीज़ मित्र नवीन कुमार न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस के लिए वॉक थ्रू करने जा रहे थे, तो पृष्‍ठभूमि से हमारे एक और मित्र इरफ़ान भाई ने एक पंचलाइन फेंकी थी, ”एक मोदी को हराने के लिए दिल्‍ली से सौ मोदी आए हैं।नवीन ने उसे लपक लिया, लेकिन अपने तरीके से बदल भी दिया। ऑन एयर बोले, ”एक मोदी को हराने के लिए दिल्‍ली से बनारस में जनता के दस्‍ते आए हैं।मैंने सोचा, जनता से ही बात की जाए। सो, जहां दोपहर का खाना बन रहा था, उस आंगन में अनमनी सी बैठी एक महिला के पास जाकर बैठ गया। यह महिला कबीर मठ के महंतजी के ड्राइवर की पत्‍नी थी। कुछ शुरुआती बातचीत के बाद उन्‍होंने कहा, ”ये सब सीखे-सिखाए लोग हैं। आपसे में एक-दूसरे को भाषण दे रहे हैं। अरे, जनता के बीच जाएं तो समझ में आवै कि उसकी क्‍या प्राब्‍लम है।मैंने कहा, ”लेकिन मोदी को तो नहीं आना चाहिए न?” उन्‍होंने कहा, ”ऊ तो जनते न तय करेगी भइया। जिसको जवन बटन दबाना होगा, दबइबे करेगा। ई सब तो पढ़े-लिखे लोग हैं। ज्‍यादातर तो यहां के वोटर भी नहीं हैं। आए हैं तो मेहमान हैं। खाना बन गया है। खा के जाएं। बेमतलब मोदी मोदी कर रहे हैं। इससे तो मोदी को अउरो बल मिलेगा, चाहे ऊ कइसनो होए।
    पास में चबूतरे पर कबीरमठ के एक महराजजी उखड़े से बैठे थे। मैं सट कर बैठ गया। पूछा, ”महराज, ई सब क्‍या हो रहा है?” करीब दो मिनट तक पहले तो मुझे घूरते रहे, फिर बाएं हाथ में बंधी एचएमटी की पुरानी घड़ी दिखाते हुए दाएं हाथ की अंगुली 12 पर ले जाकर बोले, ”ए टाइम रोज खाना मिलता है। आज देखिए, दू बज रहा है।इस वाक्‍य को उन्‍होंने तीन बार बोला। मैंने ज़ोर दिया, ”लेकिन प्रोग्रमवा के बारे में कुछ बोलिए। कइसा लगा?” वे फिर दो मिनट मौन रहे और अचानक ताली पीट-पीट कर बोलने लगे, ”भरा हो पेट तो संसार जगमगाता है/खाली हो पेट तो ईमान डगमगाता है।यह वाक्‍य भी उन्‍होंने तीन बार बोला। ताली की आवाज़ से महंत देवशरणजी की नज़र  उन पर गई और वे उन्‍हें चुप करवाने लगे। ताली रुकी, तो बैकग्राउंड से एक बेहद महीन सी आवाज़ आई, ”हमें फासीवादी ताकतों को रोकना ही होगा।जाकर देखे, तब पता चला, तीस्‍ता सीतलवाड़ बोल रही थीं।
    दरअसल, सवेरे से लेकर दो बजे तक तकरीबन सभी लोग खाली पेट ही कन्‍वेंशन में बैठे, खड़े या टहल रहे थे। बहुत लोग बोल चुके थे और बहुत से बोलने बाकी थे। अधिकतर लोग वक्‍ता को लाउडस्‍पीकरों से सुन रहे थे, लेकिन देख कहीं और रहे थे, बतिया कहीं और रहे थे और कुछ नामी-गिरामी लोग चैनलों को बाइट देने में व्‍यस्‍त थे। टीवी वाले सामान्‍यत: चर्चित चेहरों को पहचान जा रहे थे या फिर हर चैनल एक-दूसरे को फॉलो कर रहा था। दिल्‍ली और अन्‍य जगहों से नरेंद्र मोदी का विरोध करने यहां आए गणमान्‍य लोगों में सिर्फ एक व्‍यक्ति था जिसने अब तक बाइट नहीं दी थी, न ही भाषण दिया था। सहारा समय चैनल का एक ठिगना सा लोकल रिपोर्टर उस व्‍यक्ति की पर्सनाल्‍टी देखकर हतप्रभ उसे घूरे जा रहा था। वह कहीं से उसका नाम जानने की फि़राक़ में था। ऐसा लहीम-शहीम गोरा-चिट्टा दाढ़ीदार आदमी किसी का भी स्‍वाभाविक तौर से ध्‍यान आकृष्ट कर सकता है। मैंने रिपोर्टर से पूछा, ”का घूरत हउवा?” उसने मुंह बा कर पूछा, ”ई के हौ भाय?” ”अरे, जावेद नक़वी यार… बहुत भारी पत्रकार हउवन दिल्‍ली क। अरे, पाकिस्‍तान क अखबरवा ना हौ डान, वही क संपादक हउवन…।पाकिस्‍तान का नाम सुनते ही उसकी आंखों में ला रजा एक्‍सक्‍लूसिवटाइप चमक आ गई। जावेद तक पहुंच कर उसने अपना माइक उनके मुंह में दे दिया। अब तक मैं जनता के दस्‍तेको समझने की कोशिश कर रहा था, तो सोचा जावेद से भी सट लिया जाए। बाइट खत्‍म होने के बाद मेरी जावेद से बात होने लगी, तो बोले, ”यार ये बताओ, मैं तीन दिन से हूं, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुम्‍हें क्‍या समझ में आ रहा है?” मैं कुछ ज्‍यादा कहने की स्थिति में नहीं था क्‍योंकि पान तकरीबन घुल चुका था। मेरा संकट समझते हुए वे बोले, ”एक डेथ विश होती है, जिसमें आदमी मरने की इच्‍छा करता है। कुछ जानवरों में यह पाई जाती है। मुझे लगता है कि यह कन्‍वेंशन, इसमें बैठे लोग एक ऐसी डेथ विश के शिकार हैं जो बिना कुछ सोचे-समझे टीले के मुहाने से कूद कर मर जाना चाहते हैं। इन्‍हें समझ ही नहीं आ रहा कि दरअसल क्‍या होने वाला है।मैंने मूड़ी हिलाई और कबीर मंदिर के चबूतरे पर भोजन करने का प्रयास करते जावेद भाई को ज़मीन पर लगती पांत में दरी पर बैठाकर नवीन के साथ लिट्टी-चोखा खाने कबीरचौरा निकल गया।
    तीन बजे के आसपास संसार जगमगा रहा था। मेरा भी पेट भर चुका था। वक्‍ताओं का भी। श्रोताओं का भी। ईमान डगमगाने की सब्‍जेक्टिव स्थिति गायब हो चुकी थी। महराजजी खाकर सोने चले गए थे। ड्राइवर की घरवाली कुछ और मुखर हो चली थी और महंत देवरशरणजी तेज़-तेज चक्‍कर काटते हुए मेरी ओर आ रहे थे। उन्‍हें देखकर मैं रुक गया। आते ही बोले, ”अइसा है, आठ बजे तक ये प्रोग्राम खतम करवाइए, जीटीवी वालों का प्रोग्राम होना है।” मैंने कहा, ”लेकिन आठ से नौ तो दास्‍तानगोई है। कइसे होगा? आप अइसा है कि संजयजी (कन्‍वेंशन के संयोजक और प्रलेस के सचिव) से बात करिए एक बार… वही संयोजक हैं।” वे बोले, ”काSSS संयोजक? डोनेसन तो दिए नहीं… जीटीवी वाले डोनेसन दिए हैं चंदा… और ई लोग खा-पी के प्‍लेट फैला दिए, पूरा प्रांगण गंदा कर दिए। अब कौन साफ़ करेगा? अरे भाई, दूर-दूर से आए हैं तो आपका सम्‍मान है, लेकिन कुछ हमारे बारे में भी तो सोचिए। इसीलिए हम ई सब प्रोग्राम के लिए मठ नहीं देते हैं। उस पर से राजनीतिक बात कर रहे हैं लोग…।” मैंने उनके डगमगाते ईमान और भरे पेट के अंतर्सम्‍बन्‍ध को दोबारा खंगालते हुए कुछ झूठे आश्‍वासन देते हुए उन्‍हें शांत कराया और संजयजी को बुलाने के बहाने से मंच की ओर बढ़ गया और चुपचाप जाकर कथाकार वीरेंद्र यादव के बगल में बैठ गया। अचानक मंच पर नज़र पड़ी कि कवि विष्‍णु खरे भी विराजमान हैं और संयोग से उनके वक्‍तव्‍य की बारी है। जाने क्‍या सूझी, मैं उठकर लाउडस्‍पीकर के पास चला गया और उनका वक्‍तव्‍य रिकॉर्ड करने लगा।
    इस रिफ्लेक्‍स ऐक्‍शन का बनारस के चुनाव से जुड़ा एक हालिया संदर्भ हालांकि है, लेकिन उसे बताना यहां ठीक नहीं होगा। विष्‍णु जी हमेशा की तरह असहमत स्‍वर में बोले, ”… असल में क्‍या है कि ये सुबह से जो मैं यहां इस सभा में सुन रहा हूं, मुझे लगता है कि एक बनमानुस हमारे घर में बैठा हुआ है। उस बनमानुस की लंबाई पर, चौड़ाई पर, जातियों-प्रजातियों पर तो हम चर्चा कर रहे हैं, लेकिन उस बनमानुस का आज यहां बनारस से क्‍या करें, ये कोई बतला नहीं पा रहा है या बतलाना नहीं चाहता। एक और दिलचस्‍प बात ये है कि लगता है कि हमने वड़ोदरा को वाकओवर दे दिया। मतलब नरेंद्र मोदी का ये हक़ है कि वड़ोदरा से वो चुनकर आए, बनारस से ना आए। ये भी एक सवाल है। मैं चूंकि realpolitik से वास्‍ता रखता हूं, सच्‍चे पॉलिटिक्‍स से, दैनंदिन पॉलिटिक्‍स से, इसलिए बनारस की आज की राजनीति की बात करना चाहता हूं और यह बात मैं ऐसे कर रहा हूं जैसे कि मैं बनारस का आदमी हूं। कल्‍पना कीजिए मैं बनारस का हूं… मैं अपने को एग्‍जामिन कर रहा हूं कि अगर मैं बनारस का आदमी होता तो मैं क्‍या करता। इस पर बात नहीं हो रही है, शायद… मैं यह निवेदन करना चाहूंगा कि सबसे पहले तो मैं मोदी की मुखालिफ़त करता हूं। दोबारा मैं मोदी से पूछता कि जिस तरह तुमने अपनी पत्‍नी छोड़ दी है, क्‍या बनारस को भी छोड़ दोगे। क्‍या बनारस के साथ सात फेरे लेकर तुम बनारस को भी दोड़ दोगे, इसकी गारंटी कहां है? वो non-commital है, कुछ कह नहीं रहा है इस बारे में। तो मोदी को तो यहां से जीतने नहीं देना है, ये बात साफ़ हो गई। आप मोदी की तमाम खामियां निकालते हैं… मैं मान लेता हूं। जब आप कहते हैं कि बनारस से मोदी को नहीं जीतना चाहिए, मैं मान लेता हूं, मैं बनारस का आदमी हूं। लेकिन मेरे अंदर जो बनारस का आदमी बैठा हुआ है, वो पूछता है कि साहब, मोदी को हमने वोट नहीं दिया। इसके बाद किसको दें?
    ”किसको वोट दें कि मोदी हार जाए? वोट न देने का मतलब तो मोदी की जीत होगी… क्‍या हमारे पास कोई फॉर्मूला है? हां है। पिछले चुनाव में मुरली मनोहर जोशी 17000 वोट से हारा था। मान लीजिए कि कोई कांग्रेस का सपोर्ट कर रहा है… वो माफिया, गुंडा, हत्‍यारा है… मान लिया। क्‍या ये लोग मोदी से गिरे हुए हैं? क्‍या इन्‍होंने मोदी से ज्‍यादा हत्‍याएं की हैं? क्‍या इनसे मोदी से भी ज्‍यादा खतरा है आगामी पांच साल में आपको? यदि नहीं है, तो बनारस के व्‍यक्ति के तौर पर मैं ये देखूंगा कि मैं बसपा को वोट दूं, सपा को वोट दूं या कांग्रेस को वोट दूं। मेरा गणित कहता है, बतौर बनारसी, कि सपा को वोट देने से मोदी नहीं हार सकता… बसपा भी मोदी को नहीं हरा सकती… अकेले मुसलमान भी मोदी को नहीं हरा सकता। सुनिए, मैं रियालपॉलिटिक बात कर रहा हूं… बहुत जरूरी बात कर रहा हूं… ये बेकार की बाल की खाल निकालना… मोदी को ऐसे हराओगे क्‍या? बतौर बनारसी, मैं कांग्रेस को समर्थन करूंगा। मैं अपील करूंगा कि मुसलमान भी कांग्रेस का समर्थन करें, रियालपॉलिटिक लोग भी कांग्रेस का समर्थन करें… मेरे ड्राइंगरूम में एक बनमानुस बैठा है… मुझे उसे खत्‍म करना है और हम लोग फालतू की आदर्शवादी बातें करें, ये कहें कि जिसको वोट देना है उसको दें। इससे बड़ी जहालत की बात क्‍या हो सकती है? नहीं भाई… ये तो देखो, मोदी के लिए केकवॉक है। इसलिए मेरे बनारसी सहधर्मियों, कांग्रेस-मुसलमानों का समर्थन प्राप्‍त करो, सपा को तोड़ो, बसपा को तोड़ो, और मोदी को हराओ।”
    बनारस के ऐतिहासिक साम्‍प्रदायिक फासीवाद विरोधी सम्‍मेलन में इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास नहीं बन पाया है। पहले तो विष्‍णु खरे के धन्‍यवाद बोलने के बाद सबने ताली बजाई, उसके बाद अचानक अवधेश प्रधान की ओर से तेज़-तेज़ आवाज़ आने लगी, ”ये आपने कैसे कह दिया? ये बयान आपको वापस लेना होगा। ये तो कांग्रेस को केकवॉक देने जैसा हो गया। कांग्रेस ने ही इस देश में भाजपा को इतना बढ़ाया है…।”’ और देखते-देखते अवधेश प्रधान के अगल-बगल सटे कुछ लोग उन्‍हीं की आवाज़ में बोलने लगे। करीब आधा दर्जन लोग मंच पर चढ़ने की कोशिश करने लगे। भारत की संसद जैसा कुछ-कुछ अहसास होने लगा। सबसे आगे की पंक्ति में बैठे पूर्व पुलिस अधिकारी विभूति नारायण मंद-मंद मुस्‍काने लगे। विष्‍णु खरे का चेहरा कड़ा हो आया। अचानक मीरा कुमार की भूमिका में आए युवा कवि व्‍योमेश शुक्‍ल, जिन्‍होंने छूटते ही कह डाला कि यह विष्‍णु खरे का निजी बयान है और आयोजन समिति को इस पर खेद है। फिर पीछे से किसी ने कहा कि अजय राय का ही समर्थन करना था तो सबसे पहले इस बात को सवेरे कह देना चाहिए था। दिल्‍ली से आए कुछ एनजीओवाले भी उद्वेलित होने की कोशिश करते दिखे, लेकिन पीछे से मुफ़ीद मौका पाकर धारीदार टी-शर्ट वाला एक नौजवान चिल्‍ला उठा, ”मोदी-मोदी”। हुंकारी में दूसरी आवाज़ के नितान्‍त अभाव के चलते दो सेकंड बाद वह खिसक लिया।     
    फिर व्‍योमेश शुक्‍ल ने स्‍पष्‍टीकरण दिया कि विष्‍णु खरे आयोजन समिति के सदस्‍य नहीं हैं, इसलिए इनके बयान को निजी माना जाए। अवधेश प्रधान पुराने फॉर्म में लौट आए थे। वे चुप होने को तैयार नहीं थे। उनसे सटे कुछ लोग उन्‍हीं के बराबर गुस्‍सा होना चाह रहे थे। विभूतिजी अब भी मंद-मंद मुस्‍का रहे थे। मास्‍टर रामाज्ञा शशिधर सबसे पीछे बैठे उन्‍हीं की नकल में आत्‍मलीन थे। स्थिति नियंत्रण के बाहर जाती दिखी और दबाव सघन होने लगा तो मैंने मंच पर जाकर विष्‍णु खरे को चुपके से ढांढस बंधाया कि लोकतंत्र है और आपने अपनी बात कही है, दबाव में वापस मत लीजिएगा। अविनाश दास कई साल से मेरे सार्वजनिक प्रसारण में एक अदद ब्‍लैक फ्रेम की तलाश में थे, सो उन्‍होंने तड़ से अपने अत्‍याधुनिक मोबाइल से फेसबुक पर मुझे कांग्रेसी एजेंट करार दे दिया और विष्‍णु खरे को मेरा संरक्षक। व्‍योमेश शुक्‍ल की हृष्‍ट-पुष्‍ट काया विवाद को संभाल ले गई, लेकिन भरे पेट लोगों का ईमान तो अब डोल चुका था। अवधेश प्रधान ने गांधीजी की मूर्ति के दाएं वाले चबूतरे पर एक कोना पकड़ा और चार लोगों के साथ एक कोना चर्चा शुरू हुई, ”हम लोग जो चंदा दिए हैं से संजय से वापस मांग लेना चाहिए।” दूसरे ने कहा, ”लगता है कांग्रेसी पैसे से आयोजन हो रहा है।” एक तीसरे ने कहा, ”अरे, सवेरे तो शबनम हाशमी ने मोदी के खिलाफ राष्‍ट्रीय पार्टी को वोट देने की बात कह के हिंट तो दिया ही था।” कन्‍वेंशन जारी था, लेकिन लाइन-लेंथ पर्याप्‍त बिगड़ चुकी थी।
    बहरहाल, किसी तरह सबने मिलकर एक बैनर समेत शाम पांच बजे सांस्‍कृतिक मार्च निकाला। मार्च के लहुराबीर पहुंचते ही पहले से तैनात पुलिसवालों ने उसे रोक लिया। हमेशा की तरह यहां वीरेंद्र यादव की संयत भाषा नहीं, गया सिंह का चेहरा नहीं, बल्कि पूर्व पुलिसकर्मी विभूति नारयण राय की मौजूदगी काम आई। कई नए लोगों को साहित्‍य जगत में उनकी अहमियत पहली बार पता चली। जुलूस आगे बढ़ा। व्‍योमेश की शर्ट का बायां बाजू पसीने से लथपथ हो चुका था। क्रांतिकारी गीत गाए जा रहे थे और कारवां लहुराबीर चौराहे के गोले में लिपटने ही वाला था, कि अचानक मुझे याद आया कि माल्‍यार्पण तो मुंशी प्रेमचंद की मूर्ति पर होना है जो जगतजंग की तरफ मुड़े रास्‍ते पर है, गोलंबर में नहीं। गोलंबर में तो मूंछ पर ताव देते चंद्रशेखर आजाद खड़े हैं। मैं भागा-भागा काशीनाथ सिंह के पास गया और यह बात बताई। तब तक कुछ लोग गोलंबर के भीतर घुस चुके थे। मैंने व्‍योमेश से कहा कि भाई साब ये चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति है। जवाब आया, ”यहां ज्‍यादा लोगों के खड़े होने की जगह है, प्रेमचंद के पास जगह कम है…।”
    प्रेमचंद जगतगंज के उस कामेश होटल की ओर ताकते रह गए जहां विभूति नारायण राय रुके हुए हैं। इधर मालाएं चंद्रशेखर आज़ाद को चढ़ गईं। दास्‍तानगोई सुनने जुलूस कबीर मठ लौट गया। ”कार्यक्रम बेहद कामयाब रहा”, ऐसी कई आवाज़ें सुनाई दीं। शाम ढलते-ढलते दास्‍तानगोई के बीच पत्रकार रवीश कुमार पधार लिए और कुछ उत्‍साही लोग उनसे चिपटने की कोशिश करते पाए गए। मठ के द्वार पर जीटीवी का सेट लग चुका था। पौने आठ बजे महंत देवशरणजी आए और पूछे, ”आठ तक खतम हो जाएगा न”। इस बार मैंने सच्‍चा आश्‍वासन दिया। डोनेशन-मुक्‍त सम्‍मेलन ठीक आठ बजे निपट लिया और डोनेशन वाले में हर-हर मोदी गूंजने लगा। संजय श्रीवास्‍तव बोले, ”अब आगे का आप लोग बताइए क्‍या करना है।” मैंने पूछा, ”मंच के कार्यक्रमों का क्‍या शिड्यूल है?” उन्‍होंने कहा, ”बस, यही था। ये मामूली थोड़ी था। जिस शहर में कोई नहीं बोल रहा मोदी के खिलाफ़, वहां यह एक बड़ा हस्‍तक्षेप था जिसकी आवाज़ दूर तक जाएगी।” डॉ. गया सिंह ने मुंह में पान दबाए मुस्‍कराते हुए उनसे पूछा, ”और कोई बचा है?” उनका आशय प्रांगण खाली होने से था। दरअसल, उन्‍हें अंत में प्रांगण खाली होने तक जीटीवी के प्रोग्राम में आई जनता से सम्‍मेलन की ‘जनता के दस्‍ते’ को सुरक्षा देने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई थी। उन्‍होंने बताया, ”असल में भाजपा वाले ई सब हमके जानेलन न… हमरे रहते कोई क हिम्‍मत न होई कि हमरे आदमी पर कोई हाथ छोड़ दे। एहि से खड़ा हई कि सब लोग निकल जाएं सेफ़ तब हम चलीं।” ”और गुरुजी, ई विष्‍णु खरे का मामला क्‍या रहा? अचानक कांग्रेस को सपोर्ट?” बोले- ”जाएदा, अराजक हैं।” मैंने पूछा, ”ई त सब जानेलन कि अराजक हैं, लेकिन फिर उनका इतना विरोध क्‍यों?” मशहूर डॉ. गया सिंह उमर के भार से पक चुकी चेहरे की मज़बूत सिलवटों में मुस्‍कराए और बोले, ”कांग्रेस का नाम नहीं लेते तो ठीक रहता न… मन में जवन भी सॉफ्ट कार्नर रहल अजय राय के प्रति ई लोगन में, ओके बिगाड़ देलन न विष्‍णु खरे नाम लेके। नाम लेके तो ई अजय राय को ही नुकसान पहुंचाए हैं। वइसे तो यहां सबका मन कांग्रेस पर ही बना था।”
    मेरे ज्ञान चक्षु खुल चुके थे। चलते-चलते गया सिंह ने पूछा, ”परसाद लेबा?” मैंने ना में जवाब दिया। सेवन के बगैर ही भीतर पर्याप्‍त प्रकाश आ चुका था। मठ के सम्‍मेलन वाले हिस्‍से में अंधेरा छा रहा था। सम्‍मेलन में कविता पोस्‍टर बनाने वाले एक चर्चित बनारसी कलाकार के छोटे से बच्‍चे ने उनसे कहा, ”पापा, उधर चलो… वहां ज्‍यादा लाइट है। वहां मोदी वाला प्रोग्राम है।”
    रात का नौ बज चुका था। पेट खाली हो रहा था। मठ के महराजजी बरतन बजा रहे थे, ”भरा हो पेट तो संसार जगमगाता है/खाली हो पेट तो ईमान डगमगाता है। खाली पेट की शांति और भरे पेट की भ्रांति को देखने के बाद मैंने और मेरे मशहूर दक्षिणपंथी दोस्‍त व्‍यालोक ने सामूहिक निर्णय लिया कि आज रात हम खाना नहीं खाएंगे। इसलिए पहले हमने केशरी के यहां टमाटर चाट चखा, फिर एक ठंडई ली, उसके बाद पप्‍पू के यहां नींबू की एक चाय ली और फिर संकटमोचन पर आम का एक पना पीकर ही काम चला लिया। लौटती में पुलिस का काफि़ला दिखा रात साढ़े दस बजे। अविनाश दास की छानबीन से पता चला कि शहर में किसी की हत्‍या हुई है, अलबत्‍ता अरविंद केजरीवाल सुरक्षित हैं।
    पता चला कि रात में पुलिस बेमतलब ऐसे ही दौड़-भाग कर रही थी। वे इसे फ्लैग मार्च कहते हैं। हमने दिन में किया। हम उसे सांस्‍कृतिक मार्च कहते हैं। दोनों मार्च के आपसी संबंध को सबसे गहरे आत्‍मसात करने वाला हिंदी का लेखक वह है जो कभी पुलिस रहा हो। 

    (नोट: यह श्रृंखला बनारस में चुनाव की पृष्‍ठभूमि में वास्‍तविक पात्रों, लोकेशन और घटनाओं पर केंद्रित है। इसमें सच के सिवा और कुछ नहीं है। चूंकि यह सच लेन्‍स की बयान क्षमता से बाहर का है, इसलिए पोस्‍ट के साथ एक भी तस्‍वीर की अपेक्षा न करें।) 

         
  • जो कैमरे नहीं दिखा सकते…

    अभिषेक श्रीवास्‍तव 

    मैं बनारस में क्‍यों हूं, मुझे नहीं पता। मैं नहीं होता तो भी यह चुनाव ऐसे ही चलता, ऐसा ही दिखता जैसा दिख रहा है। मैंने कोशिश की कि इस सब झंझट से खुद को दूर रखूं, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। दरअसल, एक धोखा, एक परदा होने के बावजूद चुनाव का मौसम होता तो अच्‍छा ही है चूंकि कई परदे अनायास गिर जाते हैं। कई गिरा दिए जाते हैं। पीछे का मंज़र सामने आता है और जनता का मनेारंजन होता है। मैंने सोचा कि क्‍यों न अपना भी मनोरंजन कर लिया जाए, लेकिन महती जि़म्‍मेदारी के सतत भार से इस बार भी खुद को बचा न सका।

    बावजूद इसके कि तमाम कैमरे लंका से दशाश्‍वमेध तक बनारस में अपने-अपने ट्राइपॉड पर निश्‍चल और अहर्निश खड़े हैं, वे पुरज़ोर कोशिश कर के भी बरसों से निश्‍चल खड़े इस शहर की तासीर को पकड़ नहीं पाए हैं। ज़ाहिर है, वे ऐसा करने आए भी नहीं थे। उन्‍हें जो करना है, वे कर रहे हैं। हमें न ये करना था, न हम करेंगे।

    हम ज्‍यादा से ज्‍यादा ये कर सकते हैं कि जो रिपोर्ट नहीं किया जा रहा, जो कैमरों के अत्‍याधुनिक लेन्‍स की सीमा से बाहर की बात है, उसे दिखा सकें। इसके लिए सिर्फ कान खुले रखने हैं और नज़रें चौकस। बिल्‍कुल घाट पर बैठे उस श्‍वान की तरह जो दरअसल दिखता तो साधनारत है, लेकिन जिसकी इंद्रियां लगातार अपने परिवेश के प्रति ग्रहणशील बनी रहती हैं। ‘ग्रेपवाइन’ का अर्थ भी यही है- देखा और सुना, जिसमें स्रोत की विश्‍वसनीयता का मसला नहीं है।

    आगामी 5 मई से 11 मई तक यानी हफ्ता भर जनपथ पर आप कुछ आंखों देखे मंज़र और कानों सुने किस्‍से पढ़ कर अपना मनोरंजन और ज्ञानवर्धन कर सकते हैं। नहीं पढ़ेंगे तो कोई नुकसान नहीं होगा, इसकी गारंटी है।

    डिसक्‍लेमर यह है कि पात्रों के नाम असली होंगे, किस्‍से भी असली होंगे और लोकेशन भी। यह कवायद किसी की भावना को चोट पहुंचाने के लिए नहीं है। न इसमें राजनीति है, न अर्थनीति।

    यह विशुद्ध मनोरंजन है, बिल्‍कुल इस बार के चुनावों की तरह।

  • लोकसभा चुनाव वाया बनारस: बुद्धिजीवियों से एक सवाल

    अभिषेक श्रीवास्‍तव 



    जिस देश में हवा रात भर में बदलती है, हमारे पास फिर भी एक महीना है। हम लोग, जो कि वास्‍तव में फासीवाद को लेकर चिंतित हैं, जो मोदी के उभार की गंभीरता को समझ पा रहे हैं, उन्‍हें सच के इस क्षण में खुद से सिर्फ एक सवाल पूछने की ज़रूरत है: ”क्‍या हम वास्‍तव में वही चाहते हैं जिसके बारे में हम सोचते हैं?” 

    एक बहुत पुरानी कहावत है जिसका आशय यह है कि आपको जो चाहिए, वह प्राप्‍त नहीं हो पाने से ज्‍यादा बुरी इकलौती बात यह है कि वास्‍तव में आपका इच्छित आपको प्राप्‍त हो जाए। इस देश के वामपंथी बुद्धिजीवी लंबे समय से एक वास्‍तविक बदलाव की कामना करते आए हैं। ऐसा लगता है कि वह क्षण अब बेहद करीब आ चुका है। आज से कई साल पहले 1937 में जॉर्ज ऑर्वेल ने दि रोड टु विगन पायर में इसी प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए एक वाक्‍य लिखा था: ”हर इंकलाबी विचार अपनी ताकत का एक अंश उस गोपनीय विश्‍वास से हासिल करता है कि कुछ भी बदला नहीं जा सकता।” (स्‍लावोज जिज़ेक, लिविंग इन दि एंड टाइम्‍स, पेपरबैक का उपसंहार) दरअसल, इंकलाबी लोग इंकलाबी बदलाव की ज़रूरत का आह्वान एक किस्‍म के टोटके की तरह करते हैं जिसका उद्देश्‍य दरअसल उस ज़रूरत का विपरीत हासिल करना होता है- जो वास्‍तव में बदलाव को होने से रोक सके। इसके सहारे एक बात सुनिश्चित कर ली जाती है कि अपनी निजी जिंदगी, जो कि बेहद सुकून, आराम और सुरक्षा में बीत रही है उस पर कोई आंच न आने पाए। दूसरे, ऐसा सुनिश्चित करने के क्रम में हर एक सामाजिक स्थिति को विनाशकारी घोषित करते चला जाए और अपनी उच्‍चतर वैचारिक खुराक के हिसाब से कृत्रिम निर्मितियां गढ़ी जा सकें।

    नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा की ओर से उम्‍मीदवारी को फासीवाद की आहट का पर्याय बताकर अवास्‍तविक माध्‍यमों में हल्‍ला मचाना और साथ ही सीटों का अवास्‍तविक गणित लगाते हुए सुकून की चादर ताने रहना कि भाजपा तो सत्‍ता में नहीं आ पाएगी, आ भी गई तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे, भारत के वामपंथी बुद्धिजीवियों का समकालीन बौद्धिक शगल है। इस शगल के पीछे की वास्‍तविक तस्‍वीर को दो खबरों से समझा जा सकता है: पहली खबर बिहार से आ रही है जहां भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के वरिष्‍ठ नेता शत्रुघ्‍न प्रसाद सिंह को बेगुसराय से लोकसभा का टिकट नहीं मिलने के विरोध में उन्‍होंने 30 मार्च को पार्टी से इस्‍तीफा दे दिया और महीने भर पहले राज्‍य की 18 में से 17 इकाइयां पार्टी के राज्‍य सचिव राजेंद्र सिंह को टिकट दिए जाने के खिलाफ़ पहले ही इस्‍तीफा दे चुकी हैं। दूसरी खबर उत्‍तर प्रदेश से है जहां भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी से अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले मलिहाबाद के नेता कौशल किशोर ने अपनी बनाई राष्‍ट्रवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी से होते हुए भाजपा से टिकट ले लिया है। हिंदी के चर्चित लेखक काशीनाथ सिंह ने एक निजी मुलाकात में 24 मार्च को कहा था, ”मोदी अगर चुन के आ गया तो हम किसी को क्‍या मुंह दिखाएंगे? ये तो हमारे लिए शर्म की बात होगी। समझ नहीं आता कि दिल्‍ली के लेखक इतने निश्चिंत क्‍यों हैं। कल पंकज सिंह का फोन आया था। कह रहे थे कि निश्चिंत रहिए, भाजपा नहीं आएगी।”


    बदलाव के इस ऐन क्षण में सवाल बहुत हैं। अगर सीटों के जोड़ के हिसाब से भाजपा केंद्र की सत्‍ता में नहीं आ रही है, तो फिर फासीवाद का इतना हल्‍ला क्‍यों है? अगर मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनने जा रहे तो उनकी जगह फासीवाद कौन लाएगा? बुनियादी सवाल यह है कि क्‍या भाजपा का जीतना और मोदी का प्रधानमंत्री बनना ही फासीवाद का वाहक है या फिर फासीवाद एक प्रवृत्ति के तौर पर समाज में पहले ही आ चुका है? और अगर वास्‍तव में मोदी उर्फ फासीवाद इतना ही आसन्‍न है, तो इस समाज का फासीवाद विरोधी बौद्धिक समुदाय बदलाव के इस निर्णायक क्षण में आखिर कर क्‍या रहा है? अगर बनारस में बैठे काशीनाथ सिंह और दूसरे अमनपसंद लोग मोदी की आहट से इतने बेचैन हैं, तो दिल्‍ली के बौद्धिक गलियारों में पनप रहे आशावाद का स्रोत क्‍या है? ज़ाहिर है सेकुलरवाद के प्रति असद ज़ैदी और काशीनाथ सिंह की आस्‍थाओं में कोई फ़र्क नहीं होना चाहिए, फिर संदर्भ से काट कर बीबीसी पर प्रसारित किए गए काशीनाथ के एक साक्षात्‍कार पर ज़ैदी और दिल्‍ली के वाम बौद्धिक संप्रदाय का अचानक हुआ हमला कहीं इस तबके के करियरवाद व कृत्रिम आशावाद का डिफेंस तो नहीं है? ऐसा तो नहीं कि लंबे समय से ”भेडि़या आया, भेडि़या आया” चिल्‍लाता रहा इस देश हिंदी का प्रगतिशील बौद्धिक समाज वास्‍तव में भेडि़ए की वास्‍तविक पदचाप को भी अपनी वैचारिक निर्मिति ही मानकर आत्‍मतुष्‍ट और निष्क्रिय बना हुआ है जबकि असहमतियों के तमाम किले पूरब से पश्चिम तक चुपचाप दरकते जा रहे हैं? 

    बनारस, जहां का भूगोल और इतिहास एक-दूसरे से परस्‍पर गुम्फित रहा है, आज महज़ एक शहर नहीं रह गया है, बल्कि ऊपर पूछे गए सवालों का मुकम्‍मल जवाब बन चुका है। ये जवाब आपको सतह पर नहीं मिलेंगे। सतह पर तो जल्‍दबाज़ी में बनाई जा रही सड़कें हैं, बेढब फ्लाइओवर हैं, नकली डिवाइडर हैं और पांच हज़ार साल की संजोई अमूल्‍य गंदगी है जिसके बीच यहां जो हवा चल रही है, उसमें मोदी नाम की धूल आपकी देह के किसी भी छिद्र से भीतर प्रवेश करने को मचल रही है। ऊपर-ऊपर सिर्फ मोदी है जो वास्‍तव में हर-हर बरस रहा है। इस नारे से कांग्रेसी शंकराचार्य को दिक्‍कत हो सकती है, लेकिन बनारस की जनता को नहीं है। उसे ”हर-हर मोदी” से रोका गया, तो उसने नवरात्र से एक दिन पहले गुरुबाग के रेणुका मंदिर से ”या मोदी सर्वभूतेषु राष्‍ट्ररूपेण संस्थिता:” का नारा दे डाला। यह नारा लगाने वालों की एक नई फसल है जो बाबरी विध्‍वंस के दौर में पैदा हुई है, जिसने 1989 और 1991 के भयावह दंगे नहीं देखे हैं और जिसके भीतर अहमदाबाद का नागरिक बनने की महत्‍वाकांक्षा हिलोरें मार रही हैं, भले उसे पता न हो कि अहमदाबाद की दूरी बनारस से कितनी है। उसे न महादेव से मतलब है न देवी से। उसे काशी का महात्‍म्‍य नहीं पता। चुनाव आयोग कहता है ऐसी आबादी इस देश में 2.88 फीसदी है यानी करीब दस करोड़। इसकी उम्र 18 से शुरू होती है लेकिन इसका प्रभाव 50 के पार तक उन लोगों में भी जाता है जिन्‍होंने मदनपुरा में नज़ीर बनारसी के मकान को लपटों में घिरा देखा है। ज़रूरी नहीं कि यह भीड़ मोदी की वोटर हो, लेकिन इसकी कामयाबी इस बात में है कि यह अपने बीच खड़े किसी असहमत शख्‍स को भी अपनी सनक के आगोश में ले सकती है। मोदी सिर्फ एक नाम है, उसके पीछे उमड़ रही सनक दरअसल नई पूंजी के दौर में धार्मिक आस्‍था और राजनीतिक प्रतिबद्धता के इकट्ठे लोप से जन्‍मी सामाजिक फासीवादी प्रक्रिया की एक अभिव्‍यक्ति है। प्रथम दृष्‍टया निजी अनुभव से कहा जा सकता है कि इस महामारी को रोकना बहुत मुश्किल है।

    घटना 22 मार्च की है। बनारस के अस्‍सी घाट से एबीपी न्‍यूज़ के चुनावी कार्यक्रम ”कौन बनेगा प्रधानमंत्री” का सीधा प्रसारण शाम आठ बजे तय था। करीब सौ एक लाल कुर्सियां लगाई गई थीं। ऐंकर अभिसार शर्मा तैयारियों में जुटे थे। लोग धीरे-धीरे इकट्ठा हो रहे थे। साढ़े सात बजे तक कुर्सियां भर गईं और लोग बेचैन होने लगे। आपसी बातचीत में सामान्‍यत: सभी केजरीवाल को खुजलीवाल कह कर संबोधित कर रहे थे। एक-दूसरे को बता रहे थे कि अपनी बारी आने पर उन्‍हें क्‍या सवाल पूछना चाहिए। सवाल ऐसे, कि अश्‍लीलता की हदों को पार कर रहे थे और एक किस्‍म की सामूहिक हिकारत अरविंद केजरीवाल की संभावित उम्‍मीदवारी (जिसकी पक्‍की घोषणा 25 को हुई) के प्रति देखने में आ रही थी। धीरे-धीरे यह बेचैनी इतनी बढ़ी कि ”हर-हर मोदी” के नारे लगने लगे। अभिसार शर्मा ने लोगों से कहा कि इस किस्‍म की हरकत काशी की संस्‍कृति का हिस्‍सा नहीं है और उन्‍हें उम्‍मीद है कि कार्यक्रम शुरू होने पर लोग नारेबाज़ी नहीं करेंगे। ऐंकर के इस निर्देश के जवाब में नारे और तेज़ हो गए। इसी बीच-बचाव में कार्यक्रम रोल हुआ। कांग्रेस के मनोज राय, सपा के कैलाश चौरसिया, बसपा के विजय जायसवाल और आम आदमी पार्टी के संजीव सिंह का परिचय करवाया गया। ऐंकर ने पहला सवाल बनारस के विकास को लेकर पूछा। पीछे से भीड़ का दबाव बढ़ा। लोग कुर्सियों से खड़े हो गए। जो पीछे खड़े थे वे आगे की ओर आने लगे। सवाल आम आदमी पार्टी के वक्‍ता तक पहुंचते-पहुंचते एक हल्‍ले में गुम हो गया और ऐसा लगा गोया दंगाइयों की कोई भीड़ पूरे परिदृश्‍य पर छा जाने को आतुर है। ऐंकर को घोषणा करनी पड़ी कि प्रोग्राम को जारी नहीं रखा जा सकता। वे ब्रेक पर चले गए और इसके बाद नेताओं समेत जाने कहां लुप्‍त हो गए। पूरे सेट पर भीड़ का कब्‍ज़ा था। अगले 16 मिनट तक ”मोदी मोदी” का नारा लगता रहा। कुछ लड़के होर्डिगों के ऊपर चढ़ गए, कुछ कुर्सियों पर, कुछ लोग अपने बच्‍चों को लेकर आए थे जो हतप्रभ खड़े देख रहे थे। जो घटना दंगे की शक्‍ल ले सकती थी, धीरे-धीरे उसमें सबको मज़ा आने लगा। जिनकी इस भीड़ और भीड़ की विवेकहीनता में कोई दावेदारी नहीं थी, वे भी न जाने किस मनोवैज्ञानिक दबाव में ”मोदी मोदी” चिल्‍लाने लगे। फिर धीरे-धीरे युवाओं के गुट बन गए जो अपनी-अपनी पोज़ीशन लेकर अलग-अलग नारे लगाने लगे। यहां किसी के भी किसी से असहमत होने की गुंजाइश नहीं थी। सब कुछ एक दिशा में जा रहा था। फ्लड लाइट बंद होने के बाद भी करीब आधे घंटे तक भीड़ जुटी रही जिसमें कौन दंगाई था ओर कौन तमाशायी, फ़र्क कर पाना मुश्किल था। यही भीड़ कुछ देर बाद अस्‍सी चौराहे पर मारवाड़ी सेवा संघ के बाहर प्रसिद्ध पप्‍पू की चाय की दुकान पर जमा हुई और सबने मिलकर आम आदमी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले एक छात्र को इतना लताड़ा कि उसके पास वहां से जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहा।


    यही दृश्‍य दो दिन बाद ”आज तक” की ऐंकर अंजना ओम कश्‍यप के साथ दुहराया गया। बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय में छात्रों और छात्राओं ने उन्‍हें राष्‍ट्रवाद का पाठ पढ़ाया, मोदी के विकास की खुराक दी और जब वे आक्रामक हुईं तो उनके ऊपर कूड़ा फेंक दिया गया। इस सनक की परिणति 25 मार्च को अरविंद केजरीवाल के ऊपर काल भैरव मंदिर में अंडा फेंकने और रोड शो के दौरान उनकी टीम पर काली स्‍याही फेंकने में हुई। स्‍याही फेंकने वालों की पहचान तो हिंदू सेना के रूप में हो गई, लेकिन अंडा फेंकने पर बनारस में यह दलील प्रचारित की गई कि बनारस का कोई आदमी ऐसी हरकत नहीं कर सकता और यह अरविंद के दिल्‍ली से लाए गए कार्यकर्ताओं का किया-धरा प्रचार स्‍टंट है। इसके अगले दिन अरविंद पर पत्‍थर उछाले गए और पांच दिन बाद हरियाणा से खबर आई कि किसी ने अरविंद को गरदन पर घूंसा जड़ दिया है। क्‍या महानगरों की आरामगाह में बैठे बुद्धिजीवियों के लिए यह चिंता की बात नहीं होनी चाहिए कि चुनावी लोकतंत्र में जिस व्‍यक्ति के इर्द-गिर्द हवा बनाई गई है, उसके खिलाफ़ एक अन्‍य व्‍यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए इतना कुछ किया जा रहा है?  आखिर को, बनारस एक सीट ही तो है और अरविंद केजरीवाल एक और उम्‍मीदवार? अगर नरेंद्र मोदी का निर्विरोध होना उनका जन्‍मसिद्ध अधिकार बताया जा रहा हो, तो यह वाकई चिंता की बात है। क्‍या फासीवाद से लड़ने के लिए मोदी के चुने जाने का अब भी इंतज़ार करना होगा?

    यह जो कुछ दिख रहा है, वह समझने की बात है कि दरअसल दिखाया भी जा रहा है। हो सकता है कि यह सच न हो, लेकिन इसे झूठ मान लेने से हमारे सवाल हल नहीं हो जाते। कुछ सच और हैं जो सतह के नीचे खदबदा रहे हैं, लेकिन जिन्‍हें दिखाने की ज़हमत कोई नहीं उठा रहा क्‍योंकि वह ”पॉपुलर” का अंश नहीं है। मामला ज़हमत उठाने का भी उतना नहीं है, जितना एक मिली-जुली स्‍कीम का है जिसके तहत टीवी कैमरों और मोदी के पीछे लगी कॉरपोरेट पूंजी के हित एक साथ सधते हैं। देश भर से बनारस आ रहे मीडिया के लिए बनारस का मतलब है गंगा के घाट, अस्‍सी का मोहल्‍ला (जिसका श्रेय बेशक अकेले काशीनाथ सिंह की पुस्‍तक ”काशी का अस्‍सी” को ही जाता है और जिसे वे खुद विडम्‍बना करार देते हैं), चौक-गोदौलिया के आसपास पक्‍का महाल का इलाका और ज्‍यादा से ज्‍यादा बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय, जिसकी मीडिया में कमान कौशल किशोर मिश्र संभाले हुए हैं जो विश्‍व हिंदू परिषद के पुराने समर्पित कार्यकर्ता हैं। अब तक किसी चैनल को प्रोफेसर दीपक मलिक या ज्ञानेंद्रपति की याद नहीं आई है। किसी ने अफलातून से बात नहीं की है। असहमतियों को जान-बूझ कर किनारे रखा जा रहा है, और ध्‍यान देने की बात है कि ये असहमतियां सिर्फ नामी शक्‍लों के रूप में नहीं हैं, बेनाम और बेचेहरा भी हैं।

    राजेश सिंह ”अभिनेता” एक ऐसे ही शख्‍स हैं जो कभी ठेकेदारी किया करते थे। बड़े भाई का निधन हुआ, फिर पिता गुज़र गए और अभिनेता आजकल काशीवार्ता अखबार में छिटपुट काम कर के जीवन चलाते हैं। स्‍थानीय लड़के उनसे मज़ा लेते हैं। ब्रह्मनाल से लेकर मणिकर्णिका के बीच किसी गली में वे सुबह के वक्‍त पाए जा सकते हैं। एक ऐसी ही सुबह वे मणिकर्णिका की सीढि़यों से ऊपर गली में बैठे मिल गए। कुछ लड़के उन्‍हें घेरे हुए अखबार पढ़ रहे थे और चिढ़ाने की मुद्रा में नरेंद्र मोदी से जुड़ी खबरें सस्‍वर पढ़कर सुना रहे थे। उन्‍होंने जवाब दिया, ”अखबार में जो लिखता है, वो हमसे-तुमसे ज्‍यादा पढ़ा-लिखा नहीं है। अखबार के चक्‍कर में मत पड़ो।” लड़कों ने ठहाका लगाया और मोदी का जाप करना शुरू किया। तब वे बोले, ”देखो, शेर तो दौड़ के शिकार करता है। बाज़ को जानते हो? हवा में उडते हुए ही शिकार पकड़ लेता है। बनारस के घर-घर में एक बाज़ बैठा है।” मैंने पूछा, ”किसकी बात कर रहे हैं? कौन किसका शिकार करेगा?” तो स्‍नेह से बोले, ”जाएदा… ज्‍यादा नहीं बोलना चाहिए। जब आदमी ही आदमी का शिकार कर रहा हो, तो हम क्‍या बोलें। समय बताएगा… अभी तो टेलर है।”

    अभिनेता तो अपने नाम के अनुरूप सूत्र में बोलते हैं, लेकिन बनारस में जो जिंदगी की जंग रोज़ लड़ रहा है, वो साफ़ बोलता है। मणिकर्णिका के इसी ठीये के पीछे चाय की गुमटी लगाने वाला गुड्डू कहता है, ”मोदी अइहन त का उखडि़हन? ई कुल नेता आपस में मिलल हउवन। सब चोर हउवन। हम त वोट न देब।” वोट नहीं देने की बात यहां कई लोग कहते मिले। मसलन, यहां के मल्‍लाहों ने एक ताजा संगठन बनाया है। कुछ दिन पहले ही निषाद समाज की एक बैठक हुई थी जिसमें यह तय हुआ कि वोट नहीं देना है। बनारस का पान कारोबारी चौरसिया समाज पारंपरिक रूप से भाजपा का वोटर रहा है लेकिन इस बार पान बेचने वाले दुकानदारों ने वाराणसी पान बीड़ा समिति नाम का एक संगठन बना लिया है जिसमें अब तक 2100 सदस्‍यों का पंजीकरण हो चुका है। यह समिति भाजपा के अलावा किसी को भी वोट कर सकती है, जिसमें अधिक संभावना सपा के प्रत्‍याशी कैलाश चौरसिया की है। बनारस को दरअसल जो चलाता है, वह यहां का पढ़ा-लिखा मध्‍यवर्ग नहीं है। बनारस की अर्थव्‍यवस्‍था को चलाने वाले हैं बुनकर, ज़रदोजी के कारीगर, मल्‍लाह, पनवाड़ी, छोटे व्‍यापारी और पटेल। इनकी ओर कैमरों की निगाह नहीं जाती, जिससे नकली सच बनी-बनाई हवा में धूल की तरह आंखों में गड़ता रहता है। यह सच एकबारगी 25 मार्च को अरविंद केजरीवाल की रैली के मंच पर जब देखने को मिला, तो उन्‍हें खारिज करने वाले कई लोगों ने अपनी मान्‍यता को बनाए रखने के लिए अपने तर्क ही उलट लिए।

    आम आदमी पार्टी की बेनियाबाग मैदान में हुई रैली कई वजहों से मीडिया में ”अंडररिपोर्टेड” या ”इल-रिपोर्टेड” रही, जिसमें एक वजह अरविंद का खुलकर अम्‍बानी और अडानी के खिलाफ़ बोलना और उनके स्विस बैंक खातों की संख्‍या को सार्वजनिक कर देना था। यह सही है कि रैली में जौनपुर, मिर्जापुर, आज़मगढ़ आदि शहरों में भारी संख्‍या में कार्यकर्ता लाए गए थे, लेकिन दिलचस्‍प यह रहा कि शाम साढ़े छह बजे तक चली रैली में भीड़ उतनी ही रही जितनी दोपहर दो बजे थी। तकरीबन 20,000 लोगों की रैली शहर के बीचोबीच कर देना बनारस में इतना भी आसान काम नहीं था, वो भी एक बाहरी के लिए जो शहर के बारे में कुछ भी न जानता हो। मंच से प्रतीकों की बौछार हो रही थी और ये प्रतीक एक नए सच के लिए ज़मीन तैयार कर रहे थे, जिसे मुस्लिम बहुल नई सड़क क्षेत्र का हर दुकानदार एक ही वाक्‍य में समेटता नज़र आया कि, ”यह बंदा लड़ेगा।” आज़ादी के दौर में बनी मोमिन कॉन्‍फ्रेन्‍स, ज़रदोज़ी-दस्‍तकारी समिति और वाल्‍मीकि समाज के प्रतिनिधियों का मंच पर होना एक असामान्‍य बात रही, लेकिन सबसे ज्‍यादा प्रतीकात्‍मक था बनारस के मुफ्ती का संबोधन और अपने आशीर्वाद के रूप में अरविंद को अपनी टोपी पहनाना, जिसके बदले में अरविंद ने आम आदमी पार्टी की टोपी मुफ्ती को पहनाई। इससे भी ज्‍यादा प्रतीकात्‍मक यह रहा कि संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल दोनों ने ही अपने भाषण के दौरान हुई अज़ान के वक्‍त भाषण रोक दिया। राजनीति अगर प्रतीकों से चलती है, तो यह प्रतीक दूर तक जाने की ताकत रखता है। मंच के पीछे लगी मुख्‍य होर्डिंग पर दाहिनी तरफ़ अरविंद केजरीवाल के साथ बाईं ओर महामना मदन मोहन मालवीय की तस्‍वीर का आशय कुमार विश्‍वास ने कुछ ऐसे समझाया, ”मालवीयजी जब हैदराबाद के निज़ाम के पास बीएचयू के लिए पैसा मांगने गए थे तो उन्‍होंने उनके ऊपर जूती फेंक दी थी। हम बनारस में आपका विश्‍वास मांगने आए हैं तो हमारे ऊपर स्‍याही फेंकी गई है।”

    बनारस में करीब तीन लाख मुसलमान वोटर हैं। शहर की किस्‍मत इनकी मुट्ठी में बंद है। भाजपा के बनारस में कुल एक लाख 70 हज़ार ठोस वोट हैं। आप पिछले चुनावों में भाजपा प्रत्‍याशियों को मिले वोट देखें, तो यह दो लाख से कुछ कम या ज्‍यादा ही बना रहता है। इसका मतलब ये है कि मोदी के आने से जो हवा बनी है, उससे अगर पचास हज़ार फ्लोटिंग वोट भी भाजपा में आते हैं तो करीब ढाई लाख वोट पार्टी को मिल सकेंगे। इससे निपटने के लिए ज़रूरी होगा कि मुसलमान एकजुट होकर वोट करे। अगर मुख्‍तार अंसारी मैदान में आ गए, तो यह संभव हो सकता है क्‍योंकि पिछली बार वोटिंग के दिन ही दोपहर में अजय राय और राजेश मिश्रा ने यह हवा उड़ाई थी कि मुख्‍तार जीत रहे हैं और पक्‍का महाल के घरों से लोगों को निकाल-निकाल कर मुरली मनोहर जोशी को वोट डलवाया था जिसके कारण जोशी बमुश्किल 17000 वोट से जीत पाए। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो जोशी हार जाते। कुछ और लोगों का मत है कि मुख्‍तार के आने से ही जोशी की जीत सुनिश्चित हुई थी और इस बार भी वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा और नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित हो जाएगी। शहर में कांग्रेस पार्टी के युवा नेता मोहम्‍मद इमरान का मानना है कि मुख्‍तार के लिए अपने प्रचार का इससे बढि़या मौका नहीं होगा और वे मोदी से पक्‍का डील कर लेंगे। इधर बनारस से लेकर दिल्‍ली तक 25 मार्च की रात के बाद से चर्चा आम है कि मुख्‍तार से मोदी से कुछ करोड़ की डील कर ही ली है। अपना दल और भाजपा के बीच भी सौ करोड़ के सौदे की चर्चा है तो लखनऊ के सियासी गलियारों में पैठ रखने वाले मान रहे हैं कि राजनाथ सिंह ने पूर्वांचल में अपने उम्‍मीदवार मुलायम सिंह यादव से एक सौदेबाज़ी के तहत उतारे हैं। जितने मुंह, उतनी बातें। बनारस की सारी बहस मोदी और मोदी विरोधी संभावित मजबूत उम्‍मीदवार पर टिकी है, जिनमें ज़ाहिर है 25 मार्च के बाद एक बहस अरविंद केजरीवाल को लेकर भी शहर के मुसलमानों में शुरू हो चुकी है।

    इस बहस को नज़रंदाज़ करने वालों की संख्‍या पर्याप्‍त है। जो लोग पहले कह रहे थे कि अरविंद केजरीवाल की ज़मानत जब्‍त हो जाएंगी, वे आज भी अपने दावे पर कायम हैं। बीएचयू के पुराने छात्र नेता और आजकल कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम गांव, गरीब, गांधी यात्रा के संयोजक विनोद सिंह एक मार्के की बात कहते हैं, ”अरविंद केजरीवाल कांग्रेस का नया भिंडरावाले हैं। जिस तरह कांग्रेस ने अकालियों को खत्‍म करने के लिए पंजाब में भिंडरावाले को प्रमोट किया था और अंतत: वह खुद कांग्रेस के लिए भस्‍मासुर साबित हुआ, उसी तरह केजरीवाल भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस के सहयोग से तो उतर गए लेकिन वह कांग्रेस का ही सफाया कर बैठेंगे। केजरीवाल मोदी के वोट नहीं काटेंगे, बल्कि भाजपा विरोधी वोट काटेंगे। इसके बावजूद उनकी बनारस में बहुत बुरी हार होनी तय है क्‍योंकि बनारस का एक-एक आदमी जानता है कि काल भैरव के दरबार में कम से कम बनारस का आदमी तो अंडा नहीं फेंक सकता। यह काम खुद केजरीवाल के वेतनभोगी कार्यकर्ताओं का किया-धरा है जिन्‍हें लेकर वे दिल्‍ली से आए थे।”

    यह लेख लिखे जाने तक बनारस से कांग्रेस के प्रत्‍याशी की घोषणा नहीं हुई थी। अटकलें तमाम नामों पर थीं, लेकिन फिलहाल स्‍थानीय नामों को ही आगे माना जा रहा है। इनमें सबसे ऊपर अजय राय, फिर राजेश मिश्रा का नाम आ रहा है। बीच में एक हवा संकटमोचन के महंत विश्‍वम्‍भर मिश्र के नाम की भी उड़ी थी, जिसका जि़क्र किए जाने पर काशीनाथ सिंह ने काफी उम्‍मीद से कहा, ”अगर विश्‍वम्‍भर तैयार हो गए तो खेल पलट सकता है। अनंत नारायण तो तैयार नहीं होंगे। विश्‍वम्‍भर के नाम पर शहर के ब्राह्मण शायद भाजपा की जगह कांग्रेस के साथ आ जाएं, हालांकि विश्‍वम्‍भर के ऊपर न लड़ने का दबाव भी उतना ही होगा। अगर विश्‍वम्‍भर वाकई लड़ जाते हैं, तो यह अच्‍छी खबर होगी।” दरअसल, हरीन पाठक, कलराज मिश्र, मुरली मनोहर जोशी से लेकर लालमुनि चौबे तक के साथ भाजपा के भीतर जो बरताव किया गया है, उसे लेकर उत्‍तर प्रदेश के ब्राह्मणों के भीतर एक रोष है। ब्राह्मणों को लग रहा है कि राजनाथ सिंह अपने राज में सिर्फ ठाकुरों को प्रमोट कर रहे हैं। इसीलिए ब्राह्मण भीतर ही भीतर किसी विकल्‍प की तलाश में हैं और आज की स्थिति में यह बहुत संभव है कि ब्राह्मणों का वोट बसपा और कांग्रेस के बीच बंट जाए। तब मोदी की जीत की राह इतनी आसान नहीं रहेगी, जितनी उनकी बनाई हवा में दिख रही है।

    मोदी की जीत की राह में दो अन्‍य आशंकाएं प्रबल हैं जिन पर बनारस में चर्चा हो रही है। पहली आशंका तो यही है कि मोदी अगर बनारस से जीत भी गए तो वे अपनी सीट वड़ोदरा के लिए छोड़ देंगे। शहर में ऑटो चलाने वाले मोदी के कट्टर समर्थक लालजी पांडे कहते हैं, ”अगर मोदी बनारस क सीट छोड़लन, त समझ ला कि बनारस से भाजपा क पत्‍ता हमेशा बदे साफ हौ।” इसी बात को रोहनिया स्थित शूलटंकेश्‍वर महादेव मंदिर के पुजारी कुछ यूं कहते हैं, ”मोदी मने विकास। जब मोदिये न रहिहें त विकास कवने बात क। तब त सोचे के पड़ी। आपन वोट खराब कइले कवन फायदा।” एक दूसरी आशंका भाजपा और संघ को जानने-समझने वाले पढ़े-लिखे लोगों में प्रबल है। संघ चितपावन ब्राह्मणों की संस्‍था है जिसमें कभी भी कोई गैर-ब्राह्मण सत्‍ता के शीर्ष पर नहीं रहा है। कल्‍याण सिंह, विनय कटियार और उमा भारती के उदाहरण इस बात की ताकीद करते हैं कि पिछड़ा और दलित कभी भी भाजपा अथवा संघ में नेतृत्‍वकारी पद तक नहीं पहुंच सकता और पहुंच भी गया तो टिक नहीं सकता। ज्‍यादा से ज्‍यादा उसका इस्‍तेमाल किया जाता है। यह बात कुछ लोगों को भीतर से हिलाए हुए है।

    चुनावी समीकरणों पर तो फिलहाल सिर्फ अटकल ही लगाई जा सकती है। सबके अपने-अपने विश्‍लेषण हैं और हर विश्‍लेषण खेमेबंदी का शिकार है। जिनका कोई राजनीतिक खेमा नहीं है, वे मोदी को बनारस से सिर्फ इसलिए जितवाना चाहते हैं क्‍योंकि वे अपने शहर से इस देश का प्रधानमंत्री चुनकर भेजना चाह रहे हैं। बनारस की सामान्‍य सवर्ण जनता यही सोचती है। दरअसल, बनारस के लोग भी मानते हैं कि यहां पर सांसद, विधायक, पार्षद आदि सब भारतीय जनता पार्टी से लंबे समय से होने के बावजूद विकास का काम नहीं हुआ है। बिजली विभाग से इसी साल लेखपाल के पद से रिटायर हुए एक कट्टर मोदी समर्थक का कहना है, ”जोशी यहां से लड़ते तो पक्‍का हार जाते। भाजपा को लोग पसंद थोड़े करते हैं। वो तो मोदी आ गए, इसलिए उनके नाम का इतना हल्‍ला है। उसके बोलने की कला, साहस, साफ़गोई, बोल्‍डनेस, कड़कपन, यही सब लोगों को भा रहा है। लोगों को अब भाजपा-वाजपा, जाति-धर्म से मतलब नहीं है। बस कैंडिडेट का मामला है। मोदी को जिताकर प्रधानमंत्री बनवाना है। यही बनारस का एजेंडा है।” और मोदी का एजेंडा बनारस में क्‍या है? इस सवाल पर वे सतर्क हो जाते हैं, ”मोदी का क्‍या एजेंडा होगा? वो जानता है कि बनारस से लड़ेगा तो पूरे पूर्वांचल की सीटों पर लहर चलेगी। एक कैंडिडेट पूरे इलाके को अपने पक्ष में कर रहा है, इसके अलावा और क्‍या एजेंडा होगा?” और दंगे? यहां फिर से दंगा हुआ तो? वे कहते हैं, ”ना ना… वो जमाना गया। अब लोग जाति-धर्म से काफी ऊपर उठ चुके हैं। लोगों को विकास चाहिए। विकास के लिए मोदी चाहिए।” क्‍या आप गुजरात के विकास के बारे में कुछ जानते हैं? ”आप ही लोग तो बताते हो। मीडिया ने ही हल्‍ला किया है विकास का। मैं तो गुजरात गया नहीं। मीडिया कहता है तो सही ही होगा।”

    यह एक दुश्‍चक्र है। मोदी मतलब विकास और विकास की यह कहानी मीडिया ने लोगों को बताई है। अरविंद केजरीवाल इसी कहानी का प्रत्‍याख्‍यान गढ़ रहे हैं। तमाम एनजीओ गुजरात के विकास का सच अपने-अपने तरीके से लोगों को समझाने में जुटे हैं। एक पुस्तिका भी कुछ संगठनों द्वारा बाज़ार में उतारी गई है। दिलचस्‍प यह है कि जिस फासीवाद का नाम लेकर मोदी को एक्‍सपोज़ करने का अभियान चलाया जा रहा है, वह लोगों को समझ नहीं आता। इससे ज्‍यादा दिलचस्‍प यह है कि वैकल्पिक मीडिया और मुख्‍यधारा के मीडिया में मौजूद असहमति के अधिकतर स्‍वर अंग्रेज़ी के हैं, जिनका बनारस या कहें समूचे उत्‍तर भारत के ज़मीनी मानस से कोई लेना-देना नहीं है। काशीनाथ सिंह कहते हैं, ”हमने आज तक जनता से कम्‍युनिकेट ही नहीं किया। दुर्भाग्‍य से कम्‍युनिस्‍ट पार्टियां अपनी करनी से खत्‍म होती गईं। अब भुगतना तो पड़ेगा।”

    मीडिया, विकास और मोदी के इस त्रिकोण से बाहर कुछ वास्‍तविक प्रयास भी किए जा रहे हैं, हालांकि उनका वज़न भी उतना ही हवाई है जितना नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना। एक कोशिश की गई थी कि मोदी के खिलाफ गांधीवादी संदीप पाण्‍डे को बनारस से उतारा जाए। समाजवादी जन परिषद के नेता अफलातून की यह कोशिश तो रंग नहीं ला सकी, लेकिन उन्‍होंने इतना कर दिया है कि साझा संस्‍कृति मंच के बैनर तले बीते 26 मार्च को बनारस के जिलाधिकारी को एक ज्ञापन सौंपा है जिसमें मीडिया द्वारा बनारस की भ्रामक रिपोर्टिंग को रोकने की गुहार लगाई गई है। साझा संस्‍कृति मंच वही संगठन है जिसने बाबरी विध्‍वंस के बाद और दीपा मेहता की फिल्‍म का सेट तोड़े जाने के बाद शहर में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम की थी। एक बार फिर वह सक्रिय हो रहा है। काशीनाथ सिंह बताते हैं कि एक परचा तैयार किया जा रहा है नरेंद्र मोदी के खिलाफ, और वे प्रलेस, जलेस व जसम जैसे संगठनों के संपर्क में भी हैं। कोशिश यह भी की जा रही है कि 12 मई के मतदान से कम से कम बीस दिन पहले रंगमंच, संस्‍कृति और फिल्‍म के क्षेत्र से कुछ सेकुलर सेलिब्रिटी चेहरों को बनारस में लाकर कुछ दिन ठहराया जाए। काशी कहते हैं कि इस बार जबकि बनारस को सबसे ज्‍यादा बिस्मिल्‍ला खान और नज़ीर बनारसी की ज़रूरत थी, दोनों की कमी बहुत अखरेगी।

    बनारस में फिलहाल जो स्थिति है, जैसा हमने ऊपर देखा, उससे कुछ ठोस जवाब तो मिल ही सकते हैं। पहली बुनियादी बात तो यह है कि फासीवाद के पर्याय के तौर पर नरेंद्र मोदी नाम के व्‍यक्ति से खतरा उतना वास्‍तविक नहीं है जितना कि उनके नाम पर फैलाई जा रही फासीवादी प्रवृत्तियों से है। हाल में मोदी पर हमले के नाम पर हुई कुछ कथित आतंकियों की गिरफ्तारी छोटा सा उदाहरण भर है। नरेंद्र मोदी का केंद्र में आना या न आना- दोनों ही स्थितियों में अगले एक माह के भीतर देश का सामाजिक ताना-बाना उस तेजी से बिखरेगा जितना यह पिछले दस साल में नहीं हुआ। अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गए, तो उन्‍हें फासीवाद की पकी-पकाई फसल काटने को मिल जाएगी और हमारे पास सोचने का वक्‍त शायद नहीं बचेगा। अगर वे नहीं भी आए, तो इस दौरान समाज का हुआ तीव्र फासिस्‍टीकरण किसी दूसरी सत्‍ता को निरंकुश होने में उतनी ही ज्‍यादा आसानी पैदा करेगा। दोनों ही स्थितियां नवउदारवादी प्रोजेक्‍ट और वित्‍तीय पूंजी के हित में होंगी, चाहे वे सेकुलरवाद के नाम पर कांग्रेस द्वारा पैदा की जाएं या मोदी के नाम पर भाजपा के द्वारा। इस लिहाज़ से मोदी एक ऐसा दुतरफा औज़ार हैं जिसे लोकसभा चुनाव 2014 नाम की सान पर बस धार दी जा रही है। यह औज़ार दोनों तरफ से काटेगा, इसलिए सीटें गिनवा कर और चुनावी गणित लगाकर अपनी-अपनी आश्‍वस्तियों के स्‍वर्ग में बने रहने का फिलहाल कोई अर्थ नहीं है।


    अर्थ के लिए एक बार फिर जिज़ेक की पुस्‍तक ”लिविंग इन दि एंड टाइम्‍स” के उपसंहार से हम वाक्‍य उधार लेंगे: ”हमारे संघर्ष को उन पहलुओं पर केंद्रित होना चाहिए जो ट्रांसनेशनल सार्वजनिक वृत्‍त (पब्लिक स्‍फीयर) को खतरा पैदा कर रहे हैं।” जिज़ेक कहते हैं कि यह खतरा एक स्‍तर पर संगठित साइबरस्‍पेस के भीतर ”आम बौद्धिकता” के निजीकरण के रूप में भी अभिव्‍यक्‍त हो रहा है (फेसबुक, ट्विटर, क्‍लाउड कंप्‍यूटिंग, इत्‍यादि)। वे कहते हैं कि हमें हर उस बिंदु पर कम्‍युनिस्‍ट संघर्ष को संगठित करना होगा जहां सामाजिक तनाव इसलिए हल नहीं हो पा रहा है क्‍योंकि वह तनाव दरअसल ”नकली” है, जिसका नियामक विचारधारात्‍मक धुंध में तय किया जा रहा है। एक आंदोलन के तौर पर कम्‍युनिज्‍़म को ऐसे हर गतिरोध में दखल देना चाहिए जिसका सबसे पहला कार्यभार यह हो कि वह समस्‍या को नए सिरे से परिभाषित करे तथा सार्वजनिक विचारधारात्‍मक स्‍पेस में समस्‍या को जिस तरीके से प्रस्‍तुत किया जा रहा है और जिस तरीके से समझा जा रहा है, सीधे उसे खारिज करे।  

    पहला मतदान 7 अप्रैल को है और आखिरी 12 मई को। जिस देश में हवा रात भर में बदलती है, हमारे पास फिर भी एक महीना है। हम लोग, जो कि वास्‍तव में फासीवाद को लेकर चिंतित हैं, जो मोदी के उभार की गंभीरता को समझ पा रहे हैं, उन्‍हें सच के इस क्षण में खुद से सिर्फ एक सवाल पूछने की ज़रूरत है: ”क्‍या हम वास्‍तव में वही चाहते हैं जिसके बारे में हम सोचते हैं?” 

    (समकालीन तीसरी दुनिया के अप्रैल अंक से साभार) 
  • चुनावी बिसात पर सजी मोहरें और हिंदू राष्ट्र का सपना

    आनन्‍दस्‍वरूप वर्मा 
    16वीं लोकसभा के लिए चुनाव की सरगर्मी अपने चरम पर है और 7 अप्रैल से मतदान की शुरुआत भी हो चुकी है। इस बार का चुनाव इस दृष्टि से अनोखा और अभूतपूर्व है कि समूची फिजा़ं में एक ही व्यक्ति की चर्चा है और वह है नरेंद्र मोदी। भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी जिन्हें बड़े जोर-शोर से प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किया गया है। इनके मुकाबले में हैं कांग्रेस के राहुल गांधी और एक हद तक ‘आम आदमी पार्टी’ के अरविंद केजरीवाल। केजरीवाल ने अभी कुछ ही दिनों पहले अपनी पार्टी बनायी है और देखते-देखते उनकी हैसियत इस योग्य हो गयी कि वह राष्ट्रीय राजनीति में जबर्दस्त ढंग से हस्तक्षेप कर सकें। कांग्रेस और भाजपा के बीच भारतीय राजनीति ने जो दो ध्रुवीय आकार ग्रहण किया था उसे तोड़ने में ‘आप’ ने एक भूमिका निभायी है और दोनों पार्टियों के नाकारापन से ऊबी जनता के सामने नए विकल्प का भ्रम खड़ा किया है। केजरीवाल पूरी तरह राजनीति में हैं लेकिन एक अराजनीतिक नजरिए के साथ। उनका कहना है कि वह न तो दक्षिणपंथी हैं, न वामपंथी और न मध्यमार्गी। वह क्या हैं इसे उन्होंने ज्यादा परिभाषित न करते हुए लगभग अपनी हर सभाओं, बैठकों और संवाददाता सम्मेलनों में बस यही कहा है कि वह प्रधानमंत्राी बनने के लिए नहीं बल्कि देश बचाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। जिस तरह से सुब्रत राय शैली में चीख-चीख कर वह अपने देशभक्त होने और बाकी सभी को देशद्रोही बताने में लगे हैं उससे उनकी भी नीयत पर संदेह होता है। वैसे, आम जनता की नजर में अपनी कार्पोरेट विरोधी छवि बनाने वाले केजरीवाल ने उद्योगपतियों की एक बैठक में कह ही दिया कि वह पूंजीवाद विरोधी नहीं हैं और न पूंजीपतियों से उनका कोई विरोध है। उनका विरोध तो बस ‘क्रोनी कैपीटलिज्म’ से है। बहरहाल, इस टिप्पणी का मकसद मौजूदा चुनाव को लेकर लोगों के मन में पैदा विभिन्न आशंकाओं पर विचार करना है। 
    समूचे देश में इस बार गजब का ध्रुवीकरण हुआ है। अधिकांश मतदाता या तो मोदी के खिलाफ हैं या मोदी के पक्ष में। चुनाव के केंद्र में मोदी हैं और सभी तरह के मीडिया में वह छाए हुए हैं। जिस समय इंडिया शाइनिंग का नारा भाजपा ने दिया था या जब ‘अबकी बारी-अटल बिहारी’ का नारा गूंज रहा था उस समय भी प्रचार तंत्र पर इतने पैसे नहीं खर्च हुए थे जितने इस बार हो रहे हैं। जो लोग मोदी को पसंद करते हैं वे भाजपा के छः वर्ष के शासनकाल का हवाला देते हुए कहते हैं कि क्या उस समय आसमान टूट पड़ा था? पूरे देश में क्या सांप्रदायिक नरसंहार हो रहे थे? क्या नागरिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया था? नाजी जर्मनी की तरह क्या पुस्तकालयों को जला दिया गया था और बुद्धिजीवियों को देश निकाला दे दिया गया था? ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था। फिर आज इतनी चिंता क्यों हो रही है? तमाम राजनीतिक दलों की तरह भाजपा भी एक राजनीतिक दल है और अगर वह चुनाव के जरिए सत्ता में आ जाती है तो क्या फर्क पड़ने जा रहा है? किसी के भी मन में इस तरह के सवाल उठने स्वाभाविक हैं। हालांकि जो लोग यह कह रहे हैं वे भूल जा रहे हैं कि उसी काल में किस तरह कुछ राज्यों की पाठ्यपुस्तकों में हास्यास्पद पाठ रखे गये और ईसाइयों को प्रताड़ित किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही ‘राजधर्म’ की बात कह कर अपने को थोड़ा अलग दिखा लिया हो पर केंद्र में अगर उनकी सरकार नहीं रही होती तो क्या नरेंद्र मोदी इतने आत्मविश्वास से गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम कर सकते थे? तो भी, अगर सचमुच कोई राजनीतिक दल चुनाव के जरिए जनता का विश्वास प्राप्त करता है (भले ही चुनाव कितने भी धांधलीपूर्ण क्यों न हों) तो उस विश्वास का सम्मान करना चाहिए। 
    लेकिन यह बात राजनीतिक दलों पर लागू होती है। मोदी के आने से चिंता इस बात की है कि वह किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक दल का लबादा ओढ़कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे फासीवादी संगठन के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव मैदान में है। 1947 के बाद से यह पहला मौका है जब आर.एस.एस. पूरी ताकत के साथ अपने उस लक्ष्य तक पहुंचने के एजेंडा को लागू करने में लग गया है जिसके लिए 1925 में उसका गठन हुआ था। खुद को सांस्कृतिक संगठन के रूप में चित्रित करने वाले आर.एस.एस. ने किस तरह इस चुनाव में अपनी ही राजनीतिक भुजा भाजपा को हाशिए पर डाल दिया है इसे समझने के लिए असाधारण विद्वान होने की जरूरत नहीं है। लाल कृष्ण आडवाणी को अगर अपवाद मान लें तो जिन नेताओं को उसने किनारे किया है वे सभी भाजपा के उस हिस्से से आते हैं जिनकी जड़ें आर.एस.एस. में नहीं हैं। इस बार एक प्रचारक को प्रधानमंत्री बनाना है और आहिस्ता-आहिस्ता हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा पूरा करना है। इसीलिए मोदी को रोकना जरूरी हो जाता है। इसीलिए उन सभी ताकतों को किसी न किसी रूप में समर्थन देना जरूरी हो जाता है जो सचमुच मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोक सकें। 
    इस चुनाव में बड़ी चालाकी से राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। अपनी किसी चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने यह नहीं कहा कि वह राम मंदिर बनाएंगे। अगर वह ऐसा कहते तो एक बार फिर उन पार्टियों को इस बात का मौका मिलता जिनका विरोध बहुत सतही ढंग की धर्मनिरपेक्षता की वजह है और जो यह समझते हैं कि राम मंदिर बनाने या न बनाने से ही इस पार्टी का चरित्र तय होने जा रहा है। वे यह भूल जा रही हैं कि आर.एस.एस की विचारधारा की बुनियाद ही फासीवाद पर टिकी हुई है जिसका निरूपण काफी पहले उनके गुरुजी एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ पुस्तक में किया था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि ‘भारत में सभी गैर हिन्दू लोगों को हिन्दू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी और हिन्दू धर्म का आदर करना होगा और हिन्दू जाति और संस्कृति के गौरवगान के अलावा कोई और विचार अपने मन में नहीं लाना होगा।’ इस पुस्तक के पांचवें अध्याय में इसी क्रम में वह आगे लिखते हैं कि ‘वे (मुसलमान) विदेशी होकर रहना छोड़ें नहीं तो विशेष सलूक की तो बात ही अलग, उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा, उनके कोई विशेष अधिकार नहीं होंगे-यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं।’ भाजपा के नेताओं से जब इस पुस्तक की चर्चा की जाती है तो वह जवाब में कहते हैं कि वह दौर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का था और उस परिस्थिति में लिखी गयी पुस्तक का जिक्र अभी बेमानी है। लेकिन 1996 में तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आधिकारिक तौर पर इस पुस्तक से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह पुस्तक न तो ‘परिपक्व’ गुरुजी के विचारों का और न आरएसएस के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है। यह और बात है कि इस पुस्तक के प्रकाशन के एक वर्ष बाद ही 1940 में गोलवलकर आरएसएस के सरसंघचालक बने। काफी पहले सितंबर 1979 में समाजवादी नेता मध्ुलिमये ने अपने एक साक्षात्कार में गोलवलकर की अन्य पुस्तक ‘बंच ऑफ थाट्स’ के हवाले से बताया था कि गोलवलकर ने देश के लिए तीन आंतरिक खतरे बताए हैं- मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट। 
    गोलवलकर की पुस्तक ‘वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ 1939 में लिखी गयी थी लेकिन आज नरेन्द्र मोदी के मित्र और भाजपा के एक प्रमुख नेता सुब्रमण्यम स्वामी गोलवलकर के उन्हीं विचारों को जब अपनी भाषा में सामने लाते हैं तो इसका क्या अर्थ लगाया जाय। 16 जुलाई 2011 को मुंबई से प्रकाशित समाचार पत्र डीएनए में ‘हाउ टु वाइप आउट इस्लामिक टेरर’ शीर्षक अपने लेख में उन्हांेने ‘इस्लामी आतंकवाद’ से निपटने के लिए ढेर सारे सुझाव दिए हैं और कहा है कि अगर कोई सरकार इन सुझावों पर अमल करे तो भारत को पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र बनाया जा सकता है। अपने लेख में उन्होंने लिखा है कि ‘इंडिया यानी भारत यानी हिन्दुस्तान हिन्दुओं का और उनलोगों का राष्ट्र है जिनके पूर्वज हिन्दू थे। इसके अलावा जो लोग इसे मानने से इनकार करते हैं अथवा वे विदेशी जो पंजीकरण के जरिए भारतीय नागरिक की हैसियत रखते हैं वे भारत में रह तो सकते हैं लेकिन उनके पास वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए।’ गौर करने की बात है कि गोलवलकर और सुब्रमण्यम स्वामी दोनों इस पक्ष में हैं कि जो अपने को हिन्दू नहीं मानते हैं उनके पास किसी तरह का नागरिक अधिकार नहीं होना चाहिए। अपने इसी लेख में सुब्रमण्यम स्वामी ने सुझाव दिया कि काशी विश्वनाथ मंदिर से लगी मस्जिद को हटा दिया जाय और देश के अन्य हिस्सों में मंदिरों के पास स्थित अन्य 300 मस्जिदों को भी समाप्त कर दिया जाय। उन्होंने यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने की मांग करते हुए कहा है कि संस्कृत की शिक्षा को और वंदे मातरम को सबके लिए अनिवार्य कर दिया जाय। भारत आने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की समस्या के समाधान के लिए उनका एक अजीबो-गरीब सुझाव है। उनका कहना है कि ‘सिलहट से लेकर खुल्ना तक के बांग्लादेश के इलाके को भारत में मिला लिया जाय’।
    आप कह सकते हैं कि सुब्रमण्यम स्वामी को आर.एस.एस या नरेंद्र मोदी से न जोड़ा जाय। लेकिन जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में एक अत्यंत सांप्रदायिक लेख लिखने और ‘हेडलाइंस टुडे’ चैनल के पत्रकार राहुल कंवल को बेहद आपत्तिजनक इंटरव्यू देने के बाद ही उन्हें दुबारा भाजपा में शामिल कर लिया गया और जैसा कि वह खुद बताते हैं, उनके सुझाव पर ही पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया। राहुल कंवल को उन्होंने जो इंटरव्यू दिया था उसमें उन्होंने कहा कि ‘भारत में 80 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं। अगर हम हिन्दू वोटों को एकजुट कर लें और मुसलमानों की आबादी में से 7 प्रतिशत को अपनी ओर मिला लें तो सत्ता पर कब्जा कर सकते हैं। मुसलमानों में काफी फूट है। इनमें से शिया, बरेलवी और अहमदी पहले से ही भाजपा के करीब हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि मुसलमानों का समग्र रूप से कोई एक वोट बैंक है। आप खुद देखिए कि पाकिस्तान में किस तरह बर्बरता के साथ शिया लोगों का सफाया किया गया। हमारी रणनीति बहुत साफ होनी चाहिए। हिन्दुओं को एक झंडे के नीचे एकजुट करो और मुसलमानों में फूट डालो।’ यह इंटरव्यू 21 जुलाई 2013 का है। इसी इंटरव्यू में उन्होंने आगे कहा है कि ‘अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो निश्चित तौर पर अयोध्या में राममंदिर का निर्माण होगा। इस मुद्दे पर पीछे जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। हम कानूनी रास्ता अख्तियार करेंगे और मुसलमानों को भी मनाएंगे। मंदिर का मुद्दा हमेशा भाजपा के एजेंडे पर रहा है।’ 
    डीएनए में प्रकाशित लेख के बाद हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों के अंदर तीखी प्रतिक्रिया हुई क्योंकि सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी डॉक्टरेट की उपाधि हॉर्वर्ड से ली है और वहां वह अभी भी एक पाठ्यक्रम पढ़ाने जाते हैं। हॉर्वर्ड अकादमिक समुदाय ने स्वामी के लेख को अत्यंत आक्रामक और खतरनाक बताते हुए इस बात पर शर्मिंदगी जाहिर की कि उनके विश्वविद्यालय से जुड़ा कोई व्यक्ति ऐसे विचार व्यक्त कर सकता है। विश्वविद्यालय ने फौरी तौर पर यह भी फैसला किया कि इकोनॉमिक्स पर जिस समर कोर्स को पढ़ाने के लिए स्वामी वहां जाते हैं उस कोर्स को हटा दिया जाय। बाद में एक लंबी बहस के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वामी के उस लेख वाले अध्याय पर पर्दा डाल दिया गया लेकिन इस विरोध को देखते हुए डीएनए अखबार ने अपनी वेबसाइट पर से स्वामी के लेख को हटा दिया। 
    किसी राजनीतिक दल के रूप में भाजपा के आने अथवा भाजपा के किसी प्रत्याशी के प्रधानमंत्राी बनने से भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! लेकिन यहां मामला कुछ और है। 
    अभी जो लोग नरेन्द्र मोदी को लेकर चिंतित हैं उनकी चिंता पूरी तरह वाजिब है।
    (‘समकालीन तीसरी दुनिया’, अप्रैल 2014 का संपादकीय)
  • Statement on Loksabha Elections by eminent writers


    As India heads towards another general election soon we, the undersigned, would like to warn the people of India about the rising danger of bigotry, communal divide, organised violence on and hatred for sections of people in the country.

    At a time when conflicts are on the increase worldwide and both the global and national economy are in deep crisis due to falling incomes, rising inflation and unemployment there is a search for a ‘messiah’, a superman who will save us all and restore lost glory or take us towards new ones very soon.

    We have been subjected to a media blitz in recent times to convince us that Narendra Modi is the man we need now. This corporate media campaign has already overawed the Bhartiya Janta Party to surrender before the ‘Strongman of Gujarat’.  He is being portrayed as a man who has the solution for all the complex economic, social and cultural challenges the country faces today. Modi’s infamous role in the massacre of over 3000 Muslims in his state in 2002 is being brushed aside and he is promoted as morally ‘fit enough’ to lead the nation. False statistical claims, full of half-truths, are being used to present Gujarat as a model that all of India should follow to attain high economic growth. The voices of reason critical of Modi within his own party are being ignored and even attacked to silence them. Narendra Modi is being portrayed as the ‘tough man’ who is capable of taking hard decisions.

    The history of the last century tells us that in similar situations, people of different nations have, in their desperation to find a way out, often opted for such ‘tough men’. The results have been disastrous for them. A yearning for ‘hard decisions’ makes us surrender our collective wisdom as well as conscience to such men, who then proceed to rob us of our humanity. This desire for toughness and a hard state has led to the rise of fascist regimes and genocides in the past. The people of Italy, Germany and other countries of Europe have paid a very high price for their folly and the world is yet to fully recover from their misadventures. Generations have suffered an abiding sense of   guilt for a decision taken by their predecessors. 

    Added to it is the fact that The Rashtriya Swyamsevak Sangh (RSS) is now actively promoting Narendra Modi as the next prime minister. RSS is an organization, which has been propagating the idea of India as a Hindu Rashtra, a super identity under which all other identities, religious or cultural, are subsumed. India’s strength lies in the confidence that identities of various shapes, sizes and colours have enjoyed over the millennia, a history that forms the very basis of the modern idea of India.

    It is precisely this willingness to accept and celebrate diversity that has prevented India from going the way some of her neighbor countries have gone.  Any attempt to homogenize India by the brute force of numbers will lead to permanent discord, perpetual violence and the ultimate disintegration of the entity we now recognize as India. The idea of India inevitably includes plurality, mutual respect, accommodation and vital diversity and that idea faces a real threat today.

    We do need governments, which can take firm decisions to safeguard and ensure the material wellbeing of the people, especially, the most vulnerable sections among them. And yet we also need to take care that we do not fall into the trap of simplistic claims of there being instant solutions to any national problem. We do need to reiterate the values that constitute the very idea of India, an idea, which promises the smallest of identities a space and a rightful stake in the nation. A person like Narendra Modi, who is a permanent source of anxiety and insecurity for very large sections of our society, cannot and should not be allowed to lead India.

    This upcoming Lok Sabha election will again be a test for people of India: are we strong enough to reject the idea of a hard state and a hard leader? Are we sensitive enough not to support an ideology that renders invisible large sections of the population or people?  Can we prevent the politics of hatred and contempt for democracy from triumphing over the great Indian tradition of tolerance and brotherhood?


    U R Ananthamurthy             

    Namwar Singh               
    Ashok Vajpeyi                       
    Apoorvanand

    Anoop Sethi
    Amarjeet Singh Chandan

    Kumar Ambuj
    Chandrakant Patil

    Chandrakant Deotale
    Vishnu Khare 

    Prafull Shiledar

    Satish Kalsekar
    Laltu

    Yogendra Ahuja
    Abhishek Srivastava
  • मोदी को जिताना हमारे लिए शर्म की बात होगी: काशीनाथ सिंह

    लोकसभा चुनाव में बनारस से नरेंद्र मोदी की उम्‍मीदवारी पर बीबीसी को दिए अपने साक्षात्‍कार के कारण अचानक चर्चा में आए हिंदी के वरिष्‍ठ लेखक काशीनाथ सिंह शहर के उन विरल लोगों में हैं, जिनके यहां पत्रकारों का मजमा लगा है। दिल्‍ली से बनारस पहुंचने वाला हर पत्रकार काशीनाथ सिं‍ह का साक्षात्‍कार लेना चाहता है, लिहाजा सबको वे क्रम से समय दे रहे हैं। प्रस्‍तुत है अरविंद केजरीवाल की रैली से ठीक एक दिन पहले 24 मार्च को काशीनाथ सिंह से उनके घर पर हुई अभिषेक श्रीवास्‍तव की बातचीत के प्रमुख अंश।



    बीबीसी वाले इंटरव्‍यू का क्‍या मामला था… अचानक आपकी चौतरफा आलोचना होने लगी?
    (हंसते हुए) उन्‍होंने जो दिखाया वह पूरी बात नहीं थी। बात को काटकर उन्‍होंने प्रसारित किया जिससे भ्रम पैदा हुआ। मैं आज से नहीं बल्कि पिछले पांच दशक से लगातार फासीवादी ताकतों के खिलाफ बोलता-लिखता रहा हूं। मेरा पूरा लेखन सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ रहा है। आप समझिए कि अगर काशी के लोगों ने इस बार मोदी को चुन लिया तो हम मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाएंगे। यह हमारे लिए शर्म की बात होगी।

    वैसे चुनाव का माहौल क्‍या है? आपका अपना आकलन क्‍या है?
    देखिए, ये आज की बात नहीं है। साठ के दशक में काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय में चला आंदोलन हो या फिर बाबरी विध्‍वंस के बाद की स्थिति, बनारस के लोग हमेशा से यहां की गंगा-जमुनी संस्‍कृति की हिफ़ाज़त के लिए खड़े रहे हैं। हम लोग जब साझा संस्‍कृति मंच की ओर से मोर्चा निकालते थे, तो नज़ीर बनारसी साहब मदनपुरा में हमारा स्‍वागत करने के लिए खड़े होते थे और यहां के मुसलमानों को अकेले समझाने में जुटे रहते थे। बाद में खुद नज़ीर साहब के मकान पर हमला किया गया, फिर भी वे मरते दम तक फासीवाद के खिलाफ़ खड़े रहे। आपको याद होगा कि दीपा मेहता आई थीं यहां पर शूटिंग करने, उनके साथ कैसा सुलूक किया गया। उस वक्‍त भी हम लोगों ने मीटिंग की थी और परचा निकाला था।

    इस बार की क्‍या योजना है? कोई बातचीत हुई है लेखकों से आपकी?
    लगातार फोन आ रहे हैं। दुर्भाग्‍य है कि कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों ने अपनी करनी से अपनी स्थिति खराब कर ली, वरना माहौल कुछ और होता। हम लोग इस बार भी लेखकों, रंगकर्मियों, संस्‍कृतिकर्मियों, फिल्‍मकारों से लगातार संवाद में हैं। एक परचा ड्राफ्ट किया जा रहा है। जल्‍द ही सामने आएगा। कोशिश है कि कुछ नामी-गिरामी चेहरों को कुछ दिन बनारस में टिकाया जाए। समस्‍या यह है कि बनारस से बाहर के लेखक नरेंद्र मोदी के खतरे की गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं। कल ही पंकज सिंह से बात हुई। उनका फोन आया था। कह रहे थे कि चिंता मत कीजिए, भाजपा सरकार नहीं बनेगी। मुझे लगता है कि यह नि‍श्चिंतता कहीं घातक न साबित हो।

    आप एक ऐसे लेखक हैं जो लगातार अपनी ज़मीन पर बना रहा और जिसने स्‍थानीय पात्रों को लेकर रचनाएं लिखीं। बनारस के स्‍वभाव को देखते हुए क्‍या आपको लगता है कि यहां का मतदाता मोदी के उसी शिद्दत से फासीवाद से जोड़कर देख पा रहा है?
    देखिए, बनारस यथास्थितिवादी शहर है। पुरानी कहावत है- कोउ नृप होय हमें का हानि। यहां के लोग इसी भाव में जीते हैं। इस बार हालांकि यह यथास्थितिवाद फासीवाद के पक्ष में जा रहा है। लोगों के बीच कोई काम नहीं हो रहा। आखिर उन तक अपनी बात कोई कैसे पहुंचाए। जिस अस्सी मोहल्‍ले पर मैंने किताब लिखी, अब वहां जाने लायक नहीं बचा है। मुझे दसियों साल हो गए वहां गए हुए। सब भाजपाई वहां इकट्ठा रहते हैं। लोगों के बुलाने पर जाता भी हूं तो पोई के यहां बैठता हूं। दरअसल, लोगों को लग रहा है कि बनारस से इस बार देश को प्रधानमंत्री मिलना चाहिए। यह एक बड़ा फैक्‍टर है। लोगों को लग रहा है कि लंबे समय बाद बनारस इतने लाइमलाइट में आया है, बड़े नेता यहां से खड़े हो रहे हैं। लोगों को लगता है कि मोदी को जितवाना उनकी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न है।

    लेकिन जो बात टीवी चैनलों के माध्‍यम से आ रही है, जिस हवा की बात की जा रही है, वह तो अस्‍सी और पक्‍का महाल के इर्द-गिर्द ही है। बाकी बनारस का क्‍या?
    ये बड़ी विडम्‍बना है। असल में ”काशी का अस्‍सी” इतनी चर्चित है कि यहां जो कोई नया अधिकारी आता है, उसे ही पढ़कर बनारस को समझता है। अभी कल ही दिल्‍ली से एक पत्रकार आई थीं और किताब का जि़क्र कर रही थीं। जिस अस्‍सी के बारे में मैंने लिखा है किताब में, वह बहुत पुरानी बात हो चुकी। वह अस्‍सी अब वैसा नहीं रहा। और बनारस सिर्फ अस्‍सी नहीं है। विडम्‍बना है कि इस किताब को पढ़कर लोग सोचते हैं कि अस्‍सी से ही बनारस का मूड जान लेंगे। अब इसका क्‍या किया जाए।    

    मोदी अगर जीत गए तो क्‍या माहौल खराब होने की आशंका है?
    बेशक, लेकिन एक आशंका लोगों के मन में यह भी है कि मोदी इस सीट को रखेंगे या वड़ोदरा चले जाएंगे। जहां तक मेरा मानना है, बनारस का य‍थास्थितिवाद फासीवाद की ज़मीन तो तैयार करेगा लेकिन यही प्रवृत्ति इस शहर को फासीवाद से अछूता बनाए रखेगी। लेकिन सवाल सिर्फ बनारस का नहीं, देश का है। अगर मोदी के खिलाफ़ कोई संयुक्‍त उम्‍मीदवार सारी पार्टियां मिलकर उतार देतीं, तो शायद उनकी लड़ाई मुश्किल हो जाती। अरविंद केजरीवाल को ही समर्थन दिया जा सकता था। पता नहीं कांग्रेस की क्‍या स्थिति है, आप लोग बेहतर जानते होंगे।

    कांग्रेस से तो दिग्विजय सिंह का नाम चल रहा है। संकटमोचन के महंत विश्‍वम्‍भरजी और काशी नरेश के लड़के अनंतजी की भी चर्चा है…।
    दिग्विजय सिंह का तो पता नहीं, लेकिन अगर विश्‍वम्‍भर तैयार हो गए तो खेल पलट सकता है। अनंत नारायण तो तैयार नहीं होंगे। विश्‍वम्‍भर के नाम पर शहर के ब्राह्मण शायद भाजपा की जगह कांग्रेस के साथ आ जाएं, हालांकि विश्‍वम्‍भर के ऊपर न लड़ने का दबाव भी उतना ही होगा। अगर विश्‍वम्‍भर वाकई लड़ जाते हैं, तो यह अच्‍छी खबर होगी।

    हां, इधर बीच ब्राह्मणों में कुछ नाराज़गी भी तो है भाजपा को लेकर… ?
    ये बात काम कर सकती है। हो सकता है कि भाजपा के वोट आ भी जाएं, लेकिन एनडीए बनाने के क्रम में मोदी छंट जाएंगे। पता नहीं राजनाथ के नाम पर सहमति बनेगी या नहीं, हालांकि राजनाथ ने काफी सधी हुई रणनीति से ठाकुरों को पूर्वांचल में टिकट दिए हैं। संघ के भीतर तो ठाकुरों को लेकर भी रिजर्वेशन है ही। हां, ब्राह्मण अगर नाराज़ है तो मुझे लगता है कि हमें एक ऐसे उम्‍मीदवार की कोशिश करनी होगी जो भाजपा के ब्राह्मण वोट काट सके।

    मतलब ब्राह्मणवाद इस बार फासीवाद की काट होगा?
    (हंसते हुए) हो सकता है… ब्राह्मणवाद के साथ तो हम लोग जीते ही आए हैं, उसे बरदाश्‍त करने की हमारी आदत है, कुछ और सह लेंगे। लेकिन फासीवाद तो मौका ही नहीं देगा।

    क्‍यों नहीं ऐसा करते हैं कि हिंदी के व्‍यापक लेखक, बुद्धिजीवी, संस्‍कृतिकर्मी समुदाय की ओर से आप ही प्रतीक के तौर पर चुनाव लड़ जाएं मोदी के खिलाफ़?
    (ठहाका लगाते हुए) देखो, हमें जो करना है वो तो हम करेंगे ही। हमने पहले भी ऐसे मौकों पर अपनी भूमिका निभाई है, आज भी हम तैयारी में जुटे हैं। अभी महीना भर से ज्‍यादा का वक्‍त है। उम्‍मीद है दस-बारह दिन में कोई ठोस कार्यक्रम बने। मैंने प्रलेस, जलेस, जसम आदि संगठनों से और खासकर शहर के रंगकर्मियों से बात की है। शबाना आज़मी, जावेद अख्‍़तर, गुलज़ार आदि को शहर में लाने की बात चल रही है। कुछ तो करेंगे ही, चुप नहीं बैठेंगे।

    चुनाव और मोदी के संदर्भ में नामवरजी से कोई संवाद…?
    नहीं, अब तक तो उनसे कोई बात नहीं हुई है। देखते हैं… करेंगे।


    (शुक्रवार पत्रिका में प्रकाशित और साभार) 
  • बनारस धूल बैठने का इंतज़ार कर रहा है

    अभिषेक श्रीवास्‍तव 


    बनारस से लौटकर 




    बनारस में ज्ञान की खोज कबीर की देह पर गुरु रामानंद के पैर पड़ जाने जैसी कोई परिघटना होती है। यहां सायास कुछ भी नहीं मिलता, निरायास सब मिल जाता है। यहां बहसें हर ओर हैं, लेकिन बात को पकड़ना मुश्किल है। बात, कही भी जा सकती है। बात, अनकही भी होती है। मसलन, मणिकर्णिका घाट की सीढि़यों से ठीक पहले गली में एक चाय की दुकान पर पांच नौजवान अख़बार के पन्‍ने पलट रहे हैं। दिन के दो बजे हैं। एक के बाद एक शवों की आमद जारी है। अचानक एक नौजवान पास में गुमसुम बैठे अधेड़ उम्र के एक शख्‍स को संबोधित करते हुए एक ख़बर का शीर्षक पढ़ता है, ”गुरुजी, ई देखा, का छपल हौ। मगरमच्‍छ से खेलते थे बाल नरेंद्र!” अधेड़ व्‍यक्ति किसी भार को गरदन पर से हटाते हुए पूरी मेहनत से सिर उठाता है और कहता है, ”मगरमच्‍छ से खेला, शेर से खेला, सियार से खेला, बाकी आदमी से मत खेला। यहां तो आदमी ही आदमी से खेल रहा है।”

    बीते छह दशक से इस देश में चल रहे आदमी और आदमी के बीच के खेल की सबसे बड़ी पारी का इस बार गवाह बने बनारस की फि़ज़ां में टनों धूल उड़ रही है। हमेशा सड़कों पर रहने वाले यहां के लोगों ने अपने मुंह पर काली पट्टी बांध रखी है। चौकाघाट पर ड्यूटी बजा रहे हवलदार सालिकराम यादव मुंह पर बंधी काली पट्टी के भीतर से बोलते हैं, ”और क्‍या किया जाए? टीबी-कैंसर होने से तो अच्‍छा है न कि मुंह-नाक बंद कर के रखें।” यहां सड़कें पहले भी बनी हैं। काफिले पहले भी गुज़रे हैं। धूल पहले भी उड़ी है। दो दशक पहले लालकृष्‍ण आडवाणी की रथयात्रा के लिए यहां सड़कें बनी थीं तो बाबरी ढहा दी गई। धूल इतनी उड़ी कि धुंध में लोगों को पता ही नहीं चला कि किसकी तलवार है और किसका सिर। तब एक नज़ीर बनारसी हुआ करता था जिसने अपनी जान जोखिम में डाली थी। फिर बरसों बाद दीपा मेहता की फिल्‍म के सेट पर धूल उड़ी तो मदनपुरा में खुद नज़ीर का मकान इस धुंध का शिकार बन गया। इस बार न नज़ीर हैं न उनका मकान। धूल पुरज़ोर है। बनारस के लोगों ने फिलहाल खुद को बचाने के लिए काली पट्टियों को बांधने की नायाब तरकीब निकाली है। हर आदमी जैन मुनि लग रहा है, सिवाय उस काले रंग के, जो अपने भीतर एक प्रतिरोध को समोए हुए है।

    यह प्रतिरोध आपको ऊपर से नहीं दिखेगा। ऊपर सिर्फ हवा है। लहर है। धूल है। यह धूल हर हर कर के बरस रही है टीवी कैमरों के सामने और फोटोग्राफरों के लेन्‍स को चीरती हुई। कैमरे की आंख से जो दिख रहा है, वह बनारस नहीं है, इस बात की ताकीद करने वालों की पूरी एक कौम है जो मौत से भी ठंडी गलियों और चबूतरों पर गरदन झुकाए बैठी है। उन्‍हें पूछने वाला अबकी कोई नहीं है। जिन्‍होंने बनारस के अस्‍सी पर शामें गुजारी हैं, वे जानते हैं कि यह प्रतिरोध पप्‍पू की चाय की दुकान पर नहीं, पोई की दुकान पर मौजूद है। वे जानते हैं कि लंका पर केशव के यहां धूल उड़ती मिलेगी, उसके नीचे की परतें टंडनजी की दुकान पर ही दिख सकती हैं। बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के पुराने छात्र नेता राकेश मिश्रा कहते हैं, ”मोदी की लड़ाई इतनी आसान नहीं है। लोग जानते हैं कि मोदी के आने के बाद इस शहर में क्‍या होगा, लेकिन संकट ये है कि मोदी विरोधी वोटों को इकट्ठा करने वाला कोई दमदार उम्‍मीदवार नहीं है।”


    इस बार बनारस से लोकसभा चुनाव के उम्‍मीदवारों के नाम देखिए: बसपा से विजय जायसवाल, सपा से कैलाश चौरसिया, आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल, कौमी एकता दल से मुख्‍तार अंसारी और भाजपा से नरेंद्र मोदी। कांग्रेस से अभी नाम तय नहीं हुआ है। दिग्विजय सिंह, अजय राय, राजेश मिश्रा, संकटमोचन के महंत विश्‍वम्‍भर मिश्रा और काशी नरेश के पुत्र अनंत नारायण सिंह के नामों पर दांव लगाया जा रहा है। शुरुआत में सभी भाजपा विरोधी दलों द्वारा एक संयुक्‍त उम्‍मीदवार की बात आई थी, लेकिन इसके परवान चढ़ने से पहले ही सबने अपने-अपने उम्‍मीदवार घोषित कर दिए। उधर अपना दल के साथ भाजपा का समझौता हो गया जिसके कारण पटेल-भूमिहार बहुल रोहनिया संसदीय क्षेत्र का समीकरण बदल चुका है। प्रत्‍याशियों के लिहाज से बेशक नरेंद्र मोदी सबसे मज़बूत उम्‍मीदवार दिखते हैं, लेकिन सवाल बड़ा है कि आखिर भाजपा को वोट कौन देगा?

    राकेश मिश्रा बताते हैं, ”भाजपा के बनारस में कुल एक लाख 70 हज़ार ठोस वोट हैं। आप अगर पिछले चुनावों में भाजपा प्रत्‍याशियों को मिले वोट देखें, तो यह दो लाख से कुछ कम या ज्‍यादा ही बना रहता है। इसका मतलब ये है कि मोदी के आने से जो हवा बनी है, उससे अगर पचास हज़ार फ्लोटिंग वोट भी भाजपा में आते हैं तो करीब ढाई लाख वोट पार्टी को मिल सकेंगे। इससे निपटने के लिए ज़रूरी होगा कि मुसलमान एकजुट होकर वोट करे। अगर मुख्‍तार मैदान में आ गए, तो यह संभव हो सकता है क्‍योंकि पिछली बार वोटिंग के दिन ही दोपहर में अजय राय और राजेश मिश्रा ने यह हवा उड़ाई थी कि मुख्‍तार जीत रहे हैं और पक्‍का महाल के घरों से लोगों को निकाल-निकाल कर मुरली मनोहर जोशी को वोट डलवाया था जिसके कारण जोशी बमुश्किल 17000 वोट से जीत पाए। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो जोशी हार जाते।” कुछ और लोगों का मत है कि मुख्‍तार के आने से वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा और नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित हो जाएगी। कांग्रेस पार्टी के युवा नेता मोहम्‍मद इमरान का मानना है कि मुख्‍तार के लिए अपने प्रचार का इससे बढि़या मौका नहीं होगा और वे मोदी से पक्‍का डील कर लेंगे। इधर बनारस से लेकर दिल्‍ली तक 25 मार्च की रात के बाद से चर्चा आम है कि मुख्‍तार से मोदी से कुछ करोड़ की डील कर ही ली है। अपना दल और भाजपा के बीच भी सौ करोड़ के सौदे की चर्चा है तो लखनऊ के सियासी गलियारों में पैठ रखने वाले मान रहे हैं कि राजनाथ सिंह ने पूर्वांचल में अपने उम्‍मीदवार मुलायम सिंह यादव से एक सौदेबाज़ी के तहत उतारे हैं। जितने मुंह, उतनी बातें। सारी बहस मोदी और मोदी विरोधी संभावित मजबूत उम्‍मीदवार पर टिकी है, जिनमें ज़ाहिर है कि एक बहस अरविंद केजरीवाल को लेकर भी है।

    केजरीवाल बनारस की चुनावी बहस में 25 मार्च के बाद आए हैं। उससे पहले लोग उनका नाम सुनते ही हंस दे रहे थे। दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा देना केजरीवाल के लिए नकारात्‍मक साबित हुआ है। लोग खुलेआम पूछ रहे हैं कि जब वे हर बात पर जनता से राय लेते हैं, तो क्‍या इस्‍तीफा देने से पहले भी उन्‍हें जनता से रायशुमारी नहीं करना चाहिए थी। बात वाजिब भी है, लेकिन मोदी के नाम पर उड़ाई जा रही धूल और चलाई जा रही हवा में केजरीवाल को दरअसल खारिज करने का भाव यहां ज्‍यादा है, गोया उन्‍हें मोदी के खिलाफ चुनाव में उतरने का कोई अधिकार ही न हो। यह एक किस्‍म का अंदरूनी भय है, जिसके बारे में पूछे जाने पर मोदी समर्थक हिंसक तरीके से ”मोदी मोदी” चिल्‍ला उठते हैं। यही भय 25 की सुबह रोड शो के दौरान केजरीवाल के ऊपर स्‍याही और अंडे फेंके जाने में दिखा। अरविंद की रैली से ठीक पहले बेनियाबाग मैदान के बाहर ड्यूटी पर खड़े पुलिसवालों की राय थी कि अगर मुख्‍तार अपना नाम वापस ले लें, तो केजरीवाल अकेले मोदी के लिए काफी होगा। उनके मुताबिक मुख्‍तार के आने से मोदी की जीत की संभावना बढ़ जाएगी। सामान्‍य तौर पर लोग यह मान रहे हैं कि अरविंद की ज़मानत नहीं बचेगी। ये लोग अधिकतर सवर्ण हैं जिनका दूसरे समुदायों के वोटिंग पैटर्न से ज्‍यादा लेना-देना नहीं है। बीस हज़ार लोगों से खचाखच भरे बेनिया मैदान में हुई अरविंद की रैली में मोमिन कॉन्‍फ्रेंस, बुनकर समाज, वाल्‍मीकि समाज, दस्‍तकारी-ज़रदोज़ी समिति और मुफ्ती की मंच पर मौजूदगी ने हालांकि उन्‍हें खारिज करने वाले कुछ लोगों को दोबारा सोचने पर मजबूर किया है।


    बीएचयू के पुराने छात्र नेता और आजकल कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम गांव, गरीब, गांधी यात्रा के संयोजक विनोद सिंह एक मार्के की बात कहते हैं, ”अरविंद केजरीवाल कांग्रेस का नया भिंडरावाले हैं। जिस तरह कांग्रेस ने अकालियों को खत्‍म करने के लिए पंजाब में भिंडरावाले को प्रमोट किया था और अंतत: वह खुद कांग्रेस के लिए भस्‍मासुर साबित हुआ, उसी तरह केजरीवाल भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस के सहयोग से तो उतर गए लेकिन वह कांग्रेस का ही सफाया कर बैठेंगे। केजरीवाल मोदी के वोट नहीं काटेंगे, बल्कि भाजपा विरोधी वोट काटेंगे। इसके बावजूद उनकी बनारस में बहुत बुरी हार होनी तय है क्‍योंकि बनारस का एक-एक आदमी जानता है कि काल भैरव के दरबार में कम से कम बनारस का आदमी तो अंडा नहीं फेंक सकता। यह काम खुद केजरीवाल के वेतनभोगी कार्यकर्ताओं का किया-धरा है जिन्‍हें लेकर वे दिल्‍ली से आए थे।”

    बनारस की चुनावी हवा में दो बातें बहुत विश्‍वास के साथ तैर रही हैं। पहली यह, कि नरेंद्र मोदी का जीतना तय है। दूसरी यह, कि केजरीवाल की ज़मानत ज़ब्‍त हो जाएगी। नरेंद्र मोदी कैसे जीतेंगे, यह तर्क गायब है। उसी तरह केजरीवाल की ज़मानत क्‍यों ज़ब्‍त होगी, इसकी व्‍याख्‍या भी नदारद है। इन दो बातों को समझने के लिए बनारस के कुछ बाहरी इलाकों, आज़मगढ़, प्रतापगढ़ और लखनऊ से मिल रहे बदलावकारी संकेतों को उठाया जा सकता है। सबसे पहला संकेत यह है कि उत्‍तर प्रदेश का ब्राह्मण समुदाय भारतीय जनता पार्टी से क्षुब्‍ध है। हरीन पाठक से लेकर जोशी, कलराज मिश्र, लालमुनि चौबे आदि के साथ पार्टी के भीतर जो सुलूक किया गया है और जिस तरीके से राजनाथ सिंह ने पूरे पूर्वांचल को ठाकुर प्रत्‍याशियों से घेर दिया है, उससे एक संदेश यह गया है कि ब्राह्मणों के साथ भाजपा में नाइंसाफी हुई है। लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार और समाजसेवी रामकृष्‍ण की मानें तो बसपा द्वारा 21 सीटों पर ब्राह्मण प्रत्‍याशियों को खड़ा किया जाना एक सुखद संकेत है और संभव है कि ब्राह्मण एक बार फिर भाजपा को दगा दे जाएं। दूसरी बात, आजमगढ़ से मुलायम सिंह यादव के खड़े होने के नाते भाजपा का यादव वोटर भी इस बार सपा को वोट देगा, यह बात उतनी ही तय है जितनी यह कि कानपुर में जोशी और लखनऊ में राजनाथ सिंह की हार हो सकती है। मुज़फ्फरनगर दंगों पर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्‍य सरकार को दोषी ठहराए जाने की घटना ने पूर्वांचल के मुसलमानों के ज़ख्‍म हरे कर दिए हैं। प्रतापगढ़ में प्‍लाइवुड का कारोबार करने वाले मो. रईस कहते हैं, ”सपा को तो वोट देने का सवाल ही नहीं उठता।” अरविंद केजरीवाल की रैली के दिन बनारस की नई सड़क पर हर दुकानदार एक ही बात कहते मिला, ”यह बंदा मोदी को फाइट देगा।”

    कौन किसको फाइट देगा, कौन किसको वोट, इस पर कुछ भी कहना अभी खतरे से खाली नहीं है। अरविंद की रैली से एक दिन पहले रोहनिया में गंगा किनारे स्थित शूलटंकेश्‍वर महादेव पर रवींद्र श्रीवास्‍तव नाम के एक सज्‍जन मिले। वे कठपुतली के माध्‍यम से सरकारी शिक्षकों को प्रशिक्षण देते हैं। बात-बात में सौ बातों की एक बात कह बैठे, ”बस पिक्‍चर बदलती रहती है, हॉल तो वही रहता है। सब कठपुतली हैं। कौन किसे नचा देगा, यह तो एक दिन पहले ही तय होगा। बाकी आप दिमाग लगाते रहिए।” इस बात पर दो दिन पहले आदमी से आदमी के खेल की बात कहने वाले मणिकर्णिका पर मिले वे अधेड़ सज्‍जन अचानक याद आए जिन्‍होंने ”हर हर मोदी” का नारा लगाने वाले नौजवानों की ओर कातर निगाहों से देखते हुए एक शेर पढ़ा था, ”चुप हूं कि पहरेदार लुटेरों के साथ है / रोता हूं इसलिए क्‍योंकि घर की बात है।”


    घर की बात घर ही में रह जाए तो अच्‍छा। बाहर वालों से इसे साझा करना ठीक नहीं माना जाता। सब बोल रहे हैं, अपने-अपने तरीके से शहर को तौल रहे हैं, लेकिन बनारस फिलहाल अपने मुंह पर काली पट्टियां बांधे बाहरियों की उड़ाई धूल के बैठने का इंतज़ार कर रहा है। सुंदरपुर में काशीनाथ सिंह के घर से लेकर लखनऊ के हुसैनगंज के बीच चुपचाप एक मोर्चा शक्‍ल ले रहा है। जब मई की तपन में नई बनी सड़कों का कोलतार पिघलेगा, तब बनारस में कबीरा जागेगा।  

    (शुक्रवार पत्रिका में प्रकाशित और साभार)  
  • साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के दौर में भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिकता

    अर्जुन प्रसाद सिंह

    ‘अंग्रेजों की जड़े हिल चुकी हैं। वे 15 सालों में चले जायेंगे, समझौता हो जायेगा, पर इससे जनता को कोई लाभ नहीं होगा। काफी साल अफरा-तफरी में बीतेंगे। उसके बाद लोगों को मेरी याद आयेगी।’

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने यह बात 1931 में फांसी के फंदे पर लटकाये जाने के कुछ ही दिन पहले कही थी। उनका अनुमान सही निकला और करीब 16 साल बाद 1947 में एक समझौता हो गया। इस समझौते के तहत अंग्रजों को भारत छोड़ना पड़ा और देश की सत्ता की बागडोर ‘गोरे हाथों से भूरे हाथो में’ आ गई। इसके बाद सचमुच ‘अफरा-तफरी में’ काफी साल-यानी 67 साल बीत चुके हैं। अब देश की शोषित-पीड़ित जनता एवं उनके सच्चे राजनीतिक प्रतिनिधियों को भगत सिंह की याद ज्यादा सताने लगी है।

    इस साल देश की तमाम देशभक्त, जनवादी व क्रान्तिकारी ताकतें भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव की शहादत की 83वीं वर्षगांठ मना रही हैं। खासकर, क्रान्तिकारी शक्तियां इस अवसर पर केवल अनुष्ठानिक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर रहीं हैं, जैसा कि पंजाब सरकार हर साल 23 मार्च को उक्त अमर शहीदों के हुसैनीवाला स्थित समाधि-स्थल पर करती है। वे भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचारों को देश की शोषित-पीड़ित व मिहनतकश जनता के बीच ले जाने के लिए विभिन्न प्रकार के जन कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं।

    भगत सिंह ने कहा था- ‘वे (अंग्रेज) सोचते हैं कि मेरे शरीर को नष्ट कर, इस देश में सुरक्षित रह जायेंगे। यह उनकी गलतफहमी है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं। वे मेरे शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर सकते हैं, लेकिन वे मेरी आंकाक्षाओं को दबा नहीं सकते।’ सचमुच हमारे देश में न अंग्रेज सुरक्षित रह सके और न ही भगत सिंह के विचारों व आकांक्षाओं को दबाया जा सका। इतिहास साक्षी है कि ‘मरा हुआ भगत सिंह जीवित भगत सिंह से ज्यादा खतरनाक’ साबित हुआ और उनके क्रान्तिकारी विचारों से नौजवान पीढ़ी ‘मदहोश’ और ‘आजादी एवं क्रान्ति के लिए पागल’ होती रही। वह लाठियां-गोलियां खाती रही और शहीदों की कतारें सजाती रही।

    1947 के सत्ता हस्तान्तरण या आकारिक आजादी के बाद जनता के व्यापक हिस्से को लगा था कि देश व उनके जीवन की बदहाली रूकेगी और समृद्धि व खुशियाली का एक नया दौर शुरू होगा। लेकिन मात्र कुछ सालों में ही यह अहसास हो गया कि जो दिल्ली की गद्दी पर बैठे हैं वे उनके प्रतिनिधि नहीं हैं। उन्होंने देश व जनता के विकास की जो आर्थिक नीतियां अपनाईं और उनका जो नतीजा सामने आया, उससे साफ पता चल गया कि वे बड़े जमीन्दारों व बड़े पूंजीपतियों के साथ-साथ साम्राज्यवाद के भी हितैषी हैं। उनका मुख्य उद्देश्य मिहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना है और शोषक-शासक वर्गों की तिजोरियां भरना है। भगत सिंह देश के विकास की इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझते थे। तभी तो उन्होंने कहा था कि ‘कांग्रेस जिस तरह आन्दोलन चला रही है उस तरह से उसका अन्त अनिवार्यतः किसी न किसी समझौते से ही होगा।’ उन्होंनेे यह भी कहा था कि ‘यदि लाॅर्ड रीडिंग की जगह पुरूषोत्तम दास’ और ‘लार्ड इरविन की जगह तेज बहादुर सप्रू’ आ जायें तो इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ेगा और उनका शोषण-दमन जारी रहेगा। उन्होंने भारत की जनता को आगाह किया था कि हमारे देश के नेता, जो शासन पर बैठेंगे, वे ‘विदेशी पूंजी को अधिकाधिक प्रवेश’ देंगे और ‘पूंजीपतियों व निम्न-पूंजीपतियों को अपनी तरफ’ मिलायेंगे।‘ उन्होंने यह भी कहा कि ’निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग और उसके नेताओं को विदेशी शासकों के साथ जाते देखेंगे, तब उनमें शेर और लोमड़ी का रिश्ता नहीं रह जायेगा।’

    सचमुच ‘आजाद भारत’ के विकास की गति इसी प्रकार रही है। 1947 में 248 विदेशी कम्पनियां हमारे देश में कार्यरत थीं, जिनकी संख्या आज बढ़कर करीब 15 हजार हो गई हंै। आज विदेशी पूंजी एवं भारतीय दलाल पूंजी का गठजोड़ अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में दिखाई पड़ रहा है। खासकर, 1991 के बाद उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की जो प्रक्रिया चली उससे हमारे देश के शासक वर्गों का असली साम्राज्यवाद परस्त चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो गया। आज औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ कृषि व सेवा क्षेत्रों में भी विदेशी पूंजी का ‘अधिकाधिक प्रवेश’ हो रहा है। करोड़ों रू. का लाभ अर्जित करने वाली ‘नवरत्नों’ समेत दर्जनों सार्वजनिक कम्पनियों का विनिवेशीकरण किया जा रहा है और उनके शेयरों को मिट्टी के मोल बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, सिंचाई, व्यापार, सड़क, रेल, हवाई व जहाजरानी परिवहन, बैंकिंग, बीमा व दूरसंचार आदि सेवाओं का धड़ल्ले से निजीकरण किया जा रहा है और इनमें से अधिकांश क्षेत्रों में 74 से 100 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी लगाने की छूट दे दी गई है। कृषि, जो आज भी देश की कुल आबादी के कम से कम 65 प्रतिशत लोगों की जीविका का मुख्य साधन बना हुआ है, को मोन्सेन्टो व कारगिल जैसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का चारागाह बना दिया गया है। ‘निगमीकृत खेती’, बड़ी-बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं एवं ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ के नाम पर बड़े पैमाने पर किसानों व आदिवासियों की जमीन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सुपूर्द की जा रही है। पहले ये कम्पनियां खेती में खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं व अन्य कृषि उपकरणों की आपूर्ति करती थीं, अब कृषि उत्पादों के खरीद व व्यापार में भी वे अहम् भूमिका निभा रही हैं। आज कृषि समेत हमारी पूरी अर्थव्यवस्था विश्व बैंक, आई.एम.एफ. व विश्व व्यापार संगठन जैसी साम्राज्यवादी संस्थाओं के चंगुल में बुरी तरह फंस गई है। नतीजतन, लाखों कल-करखाने बंद हो रहे हैं, दसियों लाख मजदूरों-कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है और विगत 20 सालों में करीब 5 लाख  किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा है। और जब किसान-मजदूर व जनता के अन्य तबके अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष छेड़ते हैं, तो उन पर लाठियां व गोलियां बरसाई जाती हैं और उनकी एकता को खंडित करने के लिए धार्मिक उन्माद, जातिवाद व क्षेत्रवाद को भड़काया जाता है।

    जाहिर है कि साम्राज्यवादी वैश्वीकरण व लूट-खसोट के इस भयानक दौर में भगत सिंह के विचार काफी प्रासंगिक हो गये हैं। खासकर, साम्राज्यवाद, धार्मिक-अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता, जातीय उत्पीड़न, आतंकवाद, भारतीय शासक वर्गों के चरित्र, जनता की मुक्ति के लिए एक क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण व क्रान्ति की जरूरत, क्रान्तिकारी संघर्ष के तौर-तरीके और क्रान्तिकारी वर्गों की भूमिका के बारे में उनके विचारों को जानना और उन्हें आत्मसात करना आज क्रान्तिकारी समूहों का फौरी दायित्व हो गया है। आइये, अब हम भगत सिंह के कुछ मूलभूत विचारों पर गौर करें।

    साम्राज्यवाद के बारे में

    वैसे भगत सिंह ने अपने अनेक लेखों व वक्तव्यों में साम्राज्यवाद व खासकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दमनकारी चरित्र के बारे में चर्चा की है, लेकिन लाहौर षड़यन्त्र केस से सम्बन्धित विशेष ट्रिब्यूनल के समक्ष 5 मई, 1930 को दिये गए बयान में उन्होंने साम्राज्यवाद की एक सुस्पष्ट व्याख्या की है। इस बयान में कहा गया- ‘साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साजिश के अलावा कुछ नहीं है। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालयों एवं कानूनों को कत्ल करते हैं, बल्कि भयंकर हत्याकांड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग जैसे खौफनाक अपराध भी करते हैं।… शान्ति व्यवस्था की आड़ में वे शान्ति व्यवस्था भंग करते हैं।’ खासतौर पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा गया कि ‘ब्रिटिश सरकार, जो असहाय और असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गई है, गुण्डों, डाकुओं का गिरोह और लुटेरों की टोली है, जिसने कत्लेआम करने और लोगों को विस्थापित करने के लिए सब प्रकार की शक्तियां जुटाई हुई हैं। शांति-व्यवस्था के नाम पर यह अपने विरोधियों या रहस्य खोलने वालों को कुचल देती है।’ इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि भगत सिंह साम्राज्यवाद को मनुष्य व राष्ट्र के शोषण की चरम अवस्था एवं लूट-खसोट, अशान्ति व युद्ध का स्रोत मानते थे। उनकी यह व्यख्या साम्राज्यवाद की वैज्ञानिक व्याख्या के काफी करीब है।

    भारतीय पूंजीपतियों के चरित्र के बारे में

    क्रान्तिकारी खेमों के बीच भारत के पूंजीपतियों के चरित्र को लेकर काफी विवाद है। कुछ संगठन व दल इसे ‘स्वतंत्र पूंजीपति वर्ग’ की संज्ञा से विभूषित करते हैं, तो कुछ इसे ‘दलाल’ व ‘राष्ट्रीय पूंजीपतियों’ के वर्ग में विभाजित करते हैं। इसी तरह कुछ इसे ‘साम्राज्यवाद के सहयोगी’ एवं ‘आश्रित वर्ग’ के रूप में भी चिह्नित करते हैं। लेकिन भगत सिंह व उनके साथियों ने इसके समझौता परस्त व घुटना टेकु चरित्र को काफी पहले पहचान लिया था। ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के घोषणा-पत्र (जिसे मुख्यतः भगवतीचरण बोहरा ने लिखा था) में साफ शब्दों में कहा गया- ‘भारत के मिहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है। उसके सामने दोहरा खतरा है-एक तरफ से विदेशी पूंजीवाद का और दूसरी तरफ से भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का। भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनैतिक नेताओं का ‘डोमिनियन’ स्वरूप को स्वीकार करना भी हवा के इसी रूख को स्पष्ट करता है। भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपतियों से, विश्वासघात की कीमत के रूप में, सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चहता है।’ और सचमुच टाटा व बिड़ला जैसे बड़े पूंजीपतियों एवं उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों ने 1947 में भारतीय जनता के साथ विश्वासघात और बड़े जमीन्दारों के साथ सांठ-गांठ कर सत्ता की प्राप्ति की।

    धार्मिक अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता के बारे में

    धार्मिक अंधविश्वास व कट्टरपंथ ने राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में एक बड़े बाधक की भूमिका अदा की है। अंग्रेजों ने धार्मिक उन्माद फैलाकर साम्प्रदायिक दंगे करवाये और जनता की एकता को खंडित किया। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का व्यापक प्रचार शुरू किया। खासकर, 1924 में कोहट में भीषण व अमानवीय हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए तो सभी प्रगतिशील व क्रान्तिकारी ताकतों को इस विषय पर सोचने को मजबूर होना पड़ा।

    भगत सिंह ने मई, 1928 में ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ शीर्षक एक लेख लिखा जो ‘किरती’ में छपा। इसके बाद उन्होंने जून, 1928 में ‘साम्प्रदायिक दंगे और उसका इलाज’ शीर्षक लेख लिखा। अन्त में गदर पार्टी के भाई रणधीर सिंह (जो भगत सिंह के साथ लाहौर जेल में सजा काट रहे थे) के सवालों के जबाब में भगत सिंह ने 5-6 अक्तूबर, 1930 को ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ शीर्षक काफी महत्वपूर्ण लेख लिखा। इन लेखों में उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न किया। उन्होंने कहा कि ‘ईश्वर पर विश्वास रहस्यवाद का परिणाम है और रहस्यवाद मानसिक अवसाद की स्वाभाविक उपज है।’ उन्होेंने धार्मिक गुरूओं से प्रश्न किया कि ‘सर्वशक्तिमान होकर भी आपका भगवान अन्याय, अत्याचार, भूख, गरीबी, शोषण, असमानता, दासता, महामारी, हिंसा और युद्ध का अंत क्यों नहीं करता?’ उन्होंने माक्र्स की विख्यात उक्ति को कई बार दुहराया – ‘धर्म जनता के लिए एक अफीम है।’ उन्होंने धार्मिक गुरूओं व राजनीतिज्ञों पर आरोप लगाया कि वे अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक दंगे करवाते हैं। उन्होंने अखबारों पर भी आरोप लगाया कि वे ‘उत्तेजनापूर्ण लेख’ छापकर साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं। उन्होंने इसके इलाज के बतौर ‘धर्म को राजनीति से अलग रखने’ पर जोर दिया और कहा कि ‘यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं, धर्मों में हम चाहें अलग-अलग ही रहें।’ उनका दृढ मत था कि ‘धर्म जब राजनीति के साथ घुल-मिल जाता है, तो वह एक घातक विष बन जाता है जो राष्ट्र के जीवित अंगों को धीरे-धीरे नष्ट करता रहता है, भाई को भाई से लड़ता है, जनता के हौसले पस्त करता है, उसकी दृष्टि को धुंधला बनाता है, असली दुश्मन की पहचान कर पाना मुश्किल कर देता है, जनता की जुझारू मनःस्थिति को कमजोर करता है और इस तरह राष्ट्र को साम्राज्यवादी साजिशों की आक्रमणकारी यातनाओं का लाचार शिकार बना देता है।’ आज जब हमारे देश में राजसत्ता की देख-रेख में बाबरी मस्जिद ढाही जाती है और गुजरात जैसे वीभत्स जनसंहार रचाये जाते हैं, तब भगत सिंह की इस उक्ति की प्रासंगिकता सुस्पष्ट हो जाती है।

    जातीय उत्पीड़न के बारे में

    जातीय उत्पीड़न के सम्बन्ध में भगत सिंह ने अपना विचार मुख्य तौर पर ‘अछूत-समस्या’ शीर्षक अपने लेख में व्यक्त किया है। यह लेख जून, 1928 में ‘किरती’’ में प्रकाशित हुआ था। उस वक्त अनुसूचित जातियों को ‘अछूत’ कहा जाता था और उन्हें कुओं से पानी नहीं निकालने दिया जाता था। मन्दिरों में भी उनका प्रवेश वर्जित था और उनके साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था। उच्च जातियों, खासकर सनातनी पंडितों द्वारा किए गए इस प्रकार के अमानवीय व विभेदी व्यवहार का उन्होंने कड़ा विरोध किया। उन्होंने बम्बई काॅन्सिल के एक सदस्य नूर मुहम्मद के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए प्रश्न किया- ‘जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इन्कार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते-तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकार की मांग करो।’ छुआछूत के व्यवहार पर भी आपत्ति जाहिर करते हुए कहा- ‘कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है, हमारी रसोई में निःसंग फिरता है। लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाये तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है।’ जब हिन्दू व मुस्लिम राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूत्र्ति के लिए ‘अछूतों’ को धर्म के आधार पर बांटने लगे, और फिर उन्हें मुस्लिम या ईसाई बनाकर अपना धार्मिक आधार बढ़ाने लगे, तो उन्हें काफी नाराजगी हुई। उन्होंने अछूत समुदाय के लोगों का सीधा आह्वान किया- ‘संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो, दूसरे के मुंह की ओर मत ताको।’ लेकिन साथ ही साथ, उन्होंने नौकरशाही से सावधान करते हुए कहा- ‘नौकरशाही के झांसे में मत पड़ना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चहती है। यही पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है।’ इसी सिलसिले में उन्होंने उनकी अपनी ताकत का भी अहसास दिलाया। उन्होंने कहा- ‘तुम असली सर्वहारा हो। तुम ही देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोये हुए शेरों उठो, और बगावत खड़ी कर दो।’ भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है-खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रान्तिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हंै।

    आतंकवाद के बारे में

    भगत सिंह एवं उनके साथियों पर कई राजनैतिक कोनों से आतंकवादी होेने का आरोप लगाया जाता रहा है। यहां तक कि महात्मा गांधी भी ब्रिटिश सरकार की तरह उन्हें एक आतंकवादी मानते थे। इसीलिए उन्होंने 5 मार्च, 1931 को सम्पन्न हुए ‘गांधी-इरविन समझौता’ में भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी की सजा रद्द करने पर जोर नहीं दिया। उल्टे, उन्होंने वायसराय इरविन को सलाह दी कि उन्हें कांग्रेस के करांची अधिवेशन से पहले फांसी की सजा दे दी जाये। और अंग्रेजों ने करांची अधिवेशन के शुरू होने के एक दिन पहले उन्हें फांसी पर लटका दिया। अगले दिन, यानी 24 मार्च, 1931 को करांची रवाना होने से पहले ‘अहिंसा के पुजारी’ महात्मा गांधी ने प्रेस में बयान दिया- ‘मेरी व्यक्तिगत राय में भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी से हमारी शक्ति बढ़ गई है।’ इसी बयान में उन्होंने नौजवानों को अगाह किया कि ‘वे उनके पथ का अवलम्बन न करें।’ लेकिन देश की जनता, खासकर नौजवानों ने पूरे देश में फांसी की सजा का तीखा प्रतिवाद किया। करांची में भी नौजवानों ने गांधी को काला झंडे दिखाये और उनके खिलाफ आक्रोशपूर्ण नारे लगाये।

    भगत सिंह ने असेम्बली हाॅल में फंेके गए पर्चे एवं सेंशन व हाईकोर्ट में असेम्बली बम कांड में दिये गए बयानों और ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेखों में अपने उपर लगाये गए इस आरोप (आतंकवादी होने) का माकूल जबाब दिया है। भगवतीचरण बोहरा ने गांधी के लेख ‘बम की पूजा’ (जिसमें असेम्बली बम कांड की तीखी आलोचना की गई थी) के जबाब में ‘बम का दर्शन’ शीर्षक एक सारगर्मित लेख लिखा, जिसमें गांधी के तमाम तर्कों का बखिया उधेड़ा गया। इस लेख को अन्तिम रूप भगत सिंह ने प्रदान किया।
    भगत सिंह ने अपने बयानों व लेखों में साफ शब्दों में स्वीकार किया कि शुरूआती दौर में वे एक रोमानी क्रान्तिकारी थे और उन पर रूसी नेता बाकुनिन का प्रभाव था। लेकिन बाद में वे एक सच्चे क्रान्तिकारी बन गए। उन्होंने फरवरी, 1931 में लिखे गए ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेख में कहा- ‘आतंकवाद हमारे समाज में क्रान्तिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है, या एक पछतावा। इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है। शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ था। इसने राजनीति में आमूल बदलाव लाया। नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को चमकाया, आत्मत्याग की भावना को ज्वलंत रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों के सामने अपने आन्दोलन की सच्चाई एवं शक्ति को जाहिर करने का अवसर मिला। लेकिन वह स्वयं में पर्याप्त नहीं है। सभी देशों में इसका (आतंकवाद) इतिहास असफलता का इतिहास है-फ्रांस, रूस, जर्मनी स्पेन में हर जगह इसकी यही कहानी है।’ इस उक्ति से जाहिर है कि भगत सिंह आतंकवादी नहीं बल्कि क्रान्तिकारी थे, जिनका कुछ निश्चित विचार, निश्चित आदर्श और क्रान्ति का एक लम्बा कार्यक्रम था।
    ज्ञातव्य है कि आज भी भगत सिंह के सच्चे अनुयायियों, यानी नक्सलवादियों को, भारत सरकार व अमेरिकी साम्राज्यवादी ‘आतंकवादी’ करार देकर तरह-तरह की यातना का शिकार बना रहे हैं। उन्हें फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारा जा रहा है और उनके नेतृत्व में चल रहे आन्दोलनों को कुचलने के लिए स्पेशल कमाण्डो फोर्स के साथ-साथ एयर फोर्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका ‘अपराध’ यही है कि वे भगत सिंह की तरह ‘अन्याय पर टिकी व्यवस्था का आमूल परिर्वतन’ करना चाहते हैं।

    हिंसा के प्रयोग के बारे में

    भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में हिंसा के इस्तेमाल पर महात्मा गांधी एवं भगत सिंह व उनके साथियों के बीच काफी गंभीर चर्चा हुई है। महात्मा गांधी का मानना था कि क्रान्तिकारियों के हिंसात्मक आन्दोलन से एक तो सरकार का सैनिक खर्च बढ़ गया है, जिसका बोझ आम नागरिकों पर पड़ रहा है, और दूसरे, उनके नेतृत्व में चल रहे अहिंसात्मक आन्दोलन को काफी क्षत्ति पहुंची है। उन्होंने सुखदेव के पत्र का जबाब देते हुए लिखा कि ‘यदि देश का वातावरण पूर्णतया शान्त रहता तो हम अपने लक्ष्य को अब से पहले ही प्राप्त कर चुके होते। जबकि भगत सिंह की समझ थी कि ‘अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है, लेकिन यह अतीत की चीज है। जिस स्थिति में हम आज हैं, सिर्फ अहिंसा के रास्ते से कभी भी आजादी प्राप्त नहीं कर सकते। दुनिया सिर से पांव तक हथियारों से लैस है, लेकिन हम जो गुलाम हैं हमंे ऐसे झूठे सिद्धांतों के जरिए अपने रास्ते से नहीं भटकना चाहिए।’ उन्होंने टर्की और रूस की सशस्त्र क्रान्ति का उदाहरण देकर बताया कि जिन देशों में हिंसात्मक तरीके से संघर्ष किया गया, उनकी सामाजिक प्रगति हुई और उन्हें राजनीतिक स्वतंत्रता की भी प्राप्ति हुई। हालांकि वे यह भी मानते थे कि ‘क्रान्ति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा का कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है।’ (देखें- सेशन कोर्ट में 6 जून, 1929 का बयान)

    वे अच्छी तरह समझते थे कि क्रान्ति का तरीका शासकों के रूख से तय होता है। उन्होंने घोषणा की कि ‘जहां तक शान्तिपूर्ण या अन्य तरीकों से क्रान्तिकारी आदर्शों की स्थापना का सवाल है, इसका चुनाव तत्कालीन शासकों की मर्जी पर निर्भर है। क्रान्तिकारी अपने मानवीय प्यार के गुणों के कारण मानवता के पुजारी हैं। …क्रान्तिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी चरम आवश्यकता से पैदा होती है और ऐसा आखिरी दांव के तौर पर होता है।’’

    सचमुच जब शासक वर्ग क्रान्तिकारियों के तमाम शांति प्रस्तावों पर संगीन रख देता है तो उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचता है, सिवाय प्रतिक्रान्तिकारी हिंसा का जबाब क्रान्तिकारी हिंसा से देने का। आज जब यही जबाब नक्सलवादियों द्वारा शासक वर्गों की हत्यारी जमात को दिया जा रहा है, तो शासक वर्गों के साथ-साथ कुछ बुद्धिजीवीगण एवं नागरिक व मानवाधिकार संगठन भी ‘हिंसा’ या ‘अत्यधिक हिंसा’ का सवाल खड़ा कर रहे हैं।

    हाल के वर्षों में हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवियों और प्रगतिशील व जनतान्त्रिक जमातों ने भी हिंसा के प्रश्न पर भगत सिंह की समझ को लेकर एक नई बहस छेड़ी है। उनका कहना है कि जेल जाने के बाद भगत सिंह ने जब काफी अध्ययन व मनन किया तो वे एक ‘रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी’ से एक ‘वैज्ञानिक क्रान्तिकारी’ बन गए और उन्होंने क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसात्मक तरीका अपनाये जाने का विरोध किया। इस तथ्य को साबित करने के लिए वे आमतौर पर भगत सिंह की दो उक्तियों को पेश करते हैं। पहली उक्ति जनवरी, 1930 में लाहौर हाईकोर्ट में दिए गए उनके बयान से ली गई है जो इस प्रकार है- ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ से हमारा वह उद्देश्य नहीं था जो आम तौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है।’ दूसरी उक्ति ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ शीर्षक लेख से ली गई है जो 5-6 अक्तूबर, 1930 को लिखा गया था। यह उक्ति इस प्रकार है- ‘इस समय मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे, अब अपने कन्धों पर जिम्मेदारी उठाने का समय आया था। कुछ समय तक तो, अवश्यम्भावी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पार्टी का अस्तित्व ही असम्भव-सा दिखा। उत्साही कामरेडों- नहीं नेताओं-ने भी हमारा उपहास करना शुरू कर दिया। कुछ समय तक तो मुझे यह डर लगा कि एक दिन मैं भी कहीं अपने कार्यक्रम की व्यर्थता के बारे में आश्वस्त न हो जाऊँ। वह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूंज रही थी- विरोधियों द्वारा रखे गए तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिए अध्ययन करो। अपने मत के समर्थन में तर्क देने के लिए सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। हिंसात्मक तरीकों को अपनाने का रोमांस, जो कि हमारे पुराने साथियों मंे अत्यधिक व्याप्त था, की जगह गम्भीर विचारों ने ले ली। अब रहस्यवाद और अन्धविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं रहा। यथार्थवाद हमारा आधार बना। हिंसा तभी न्ययोचित है जब किसी विकट आवश्यकता में उसका सहारा लिया जाये। अहिंसा सभी जन आन्दोलनों का अनिवार्य सिद्धान्त होना चाहिए’।

    जहां तक पहली उक्ति का सम्बन्ध है वह भगत सिंह ने जज को ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का सही अर्थ बतालने और साथ ही साथ क्रान्ति में विचारधारा के महत्व को समझाने के लिए कहा था, न कि क्रान्ति में हिंसात्मक संघर्ष की भूमिका को नकारने के लिए। दूसरी बात यह है कि इसी बयान में भगत सिंह ने साफ शब्दों में कहा था कि ‘सेशन जज की अदालत में हमने जो लिखित बयान दिया था, वह हमारे उद्देश्य की व्याख्या करता है और उस रूप में हमारी नीयत की भी व्याख्या करता है।’ हम देख्ंों कि सेशन कोर्ट में दिए गए बयान में उन्होंने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि हमारा लक्ष्य है ‘क्रान्ति’, यानी ‘अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन’। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा था कि ‘अगर वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जन शक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आई तो क्रान्ति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है। सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना होगी।’ क्या इस बयान में भगत सिंह एक ऐसे ‘भयंकर युद्ध’ की कल्पना कर रहे थे जो पूरी तरह अहिंसक होगी और जिसमें सिर्फ विचारों की तलवार चलेगी?

    जहां तक दूसरी उक्ति का प्रश्न है, उसका तो संदर्भ ही पूरी तरह भिन्न है। यह उक्ति एक ऐसे लेख से ली गई है जिसमें ंभगत सिंह ने ईश्वर, धर्म, सम्प्रदाय, रहस्यवाद व अंधविश्वास के बारे में अपने वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत किया है। इस लेख में क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसा के प्रयोग पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं खड़ा किया गया है। इसमें भगत सिंह ने 1925 के पूर्व की कारवाईयों की समीक्षा एवं उस समय की अपनी राजनैतिक स्थिति को पेश किया है। 1925 में काकोरी एक्शन के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। इसके बाद पार्टी की जिम्मेदारी भगत सिंह एवं उनके साथियों के कंधों पर आ गई थी और उनके सामने कई गंभीर सवाल व समस्याएं मुंहबाये खड़ी थीं। इन सवालों व समस्याओं का हल ढूंढने के लिए उन्होंने देश व विश्व के क्रान्तिकारी आन्दोलनों का गंभीर अध्ययन व विश्लेषण किया और भारत के क्रान्तिकारी आन्देालन को ‘रहस्यवाद व धार्मिक अंधविश्वास’ एवं ‘हिंसात्मक तरीके अपनाने के रोमांस’ (जिनसे एच.आर.पी. के प्रायः सभी पुराने नेता ग्रसित थे) से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने क्रान्तिकारी संघर्ष में जनता की व्यापक भागीदारी पर जोर दिया और कहा कि जनता मुख्यतः अहिंसात्मक तरीके से लड़ेगी, लेकिन विशेष हालत में उसकी हिंसात्मक कार्रवाई भी जायज होगी। यही दूसरी उक्ति की अन्तिम दो पंक्तियों का असली मतलब है। इस पूरी उक्ति के सही अर्थ को समझने के लिए राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ शीर्षक किताब की जगमोहन सिंह व चमन लाल द्वारा लिखित भूमिका को पढ़ना चाहिए। इस भूमिका में अन्तिम दो पंक्तियों को एक संयुक्त वाक्य के रूप में इस प्रकार रखा गया है- ‘किसी विशेष हालत में हिंसा जायज हो सकती है, लेकिन जन आन्दोलनों का मुख्य हथियार अहिंसा होगी।’

    इस तरह स्पष्ट है कि भगत सिंह के उक्त दोनों वक्तव्य यह साबित नहीं करते कि उन्होंने क्रान्तिकारी संग्राम में हिंसात्मक तरीके अपनाने का विरोध किया था। अगर वे ऐसा करते तो ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ के बाद लिखे गए ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक दस्तावेज (2 फरवरी, 1931) में नौजवानों से ‘सैनिक विभाग’ गठित करने का आह्वान नहीं करते। साथ ही साथ, वे क्रान्तिकारी पार्टी के एक कार्यभार के रूप में ‘ऐक्शन कमिटी’ बनाने (जिसका प्रमुख काम हथियार संग्रह करना, विद्रोह का प्रशिक्षण देना और शत्रु पर गुप्त हमला करना होगा) की बात नहीं करते। (देखें- भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, पेज नं.- 404, राजकमल प्रकाशन का पेपरबैक संस्करण)

    इसके अलावा फांसी पर लटकाये जाने के 3 दिन पूर्व 20 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव द्वारा पंजाब के गवर्नर को भेजे गए पत्र में वे नहीं लिखते कि ‘हमने निश्चित रूप से युद्ध में भाग लिया, अतः हम युद्ध बंदी हैं। … निकट भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह निर्णायक होगा।… यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने उपर गर्व करते हैं।’(देखें वही किताब- पेज नं. 379-80)

    कानून एवं न्यायपालिका के बारे में

    ‘‘हमारा विश्वास है कि अमन और कानून मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य अमन और कानून के लिए।….कानून की पवित्रता तभी तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल यानी भावनाओं को प्रकट करता है। जब यह शोषणकारी समूह के हाथों का एक पुर्जा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्व खो बैठता है। न्याय प्रदान करने के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का खात्मा होना चाहिए। ज्यों ही कानून सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना बंद कर देता है त्यों ही जुल्म और अन्याय को बढ़ाने का हथियार बन जाता है। ऐसे कानूनों को जारी रखना सामूहिक हितों पर विशेष हितों की दम्भपूर्ण जबरदस्ती के सिवाय कुछ नहीं है।’’

    शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने यह बात कमिश्नर, विशेष ट्रिब्यूनल (लाहौर षड़यन्त्र केस) को 5 मई 1930 को लिखी थी। उस दिन सरकार के अध्यादेश द्वारा स्थापित विशेष ट्रिब्यूनल की कार्रवाई पूंछ हाउस में शुरू हुई थी। सरकार ने पंजाब हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में इस ट्रिब्यूनल का गठन इसलिए किया था, ताकि भगत सिंह और उनके साथियों पर चल रहे मुकदमे की तेजी से सुनवाई की जा सके। जबकि भगत सिंह व उनके साथी चाहते थे कि मुकदमे की कार्रवाई धीमी गति से चले, ताकि उन्हें आम जनता तक अपने विचारों को ले जाने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय मिल सके। हालांकि वे अच्छी तरह जानते थे कि विशेष ट्रिब्यूनल ‘न्याय नहीं दे सकता’ और यह ‘कानून का एक खूबसूरत फरेब’ के सिवाय कुछ नहीं है। वे मुकदमे के परिणाम से भी अच्छी तरह वाकिफ थे।

    उस दिन भगत सिंह और उनके साथी क्रान्तिकारी गीत गाते हुए और नारे लगाते हुए अदालत में हाजिर हुए थे। भगत सिंह ने मांग की थी कि उन्हें ट्रिब्यूनल के ‘गैर कानूनी’ होने सम्बंधी दलील पेश करने हेतु 15 दिनों का समय दिया जाये। लेकिन उन्हें यह समय नहीं दिया गया और मुकदमे  की कार्रवाई शुरू कर दी गई। भगत सिंह व उनके साथियों ने कोई वकील रखने से साफ इन्कार कर दिया। इसके बाद उन्हें 12 मई 1930 को हथकड़ी लगाकर ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश किया गया। जब उन्होंने हथकड़ी लगाने का विरोध किया तो ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने गाली देते हुए इन क्रान्तिकारियों को पीटने का आदेश दिया। पुलिस ने प्रेस संवाददाताओं एवं आम लोगों के समक्ष उन्हें, खासकर भगत सिंह को लाठियों व जूतों से पीटा। सरेआम अदालत में इस प्रकार की पिटाई की दुनिया भर में काफी चर्चा हुई। पूरे भारत में इसके विरोध में आवाजें उठीं। नतीजतन इस विशेष ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष को ‘लम्बी छुट्टी’ पर जाना पड़ा और सरकार को इसे पुनर्गठित करना पड़ा।

    इसी पुनर्गठित ट्रिब्यूनल में जब भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने एक आवेदन देकर बचाव पेश करने की मांग की तो इससे भगत सिंह को काफी दुःख हुआ। उन्होंने इस बाबत 4 अक्तूबर 1930 को अपने पिता के नाम एक कड़ा पत्र लिखा। इस पत्र में भगत सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके सम्बंध में इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है-निचले दर्जे की कमजोरी। …मैं जानता हूं कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत की आजादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखायी, यह बात मैं समझ नहीं पाता ?’

    दरअसल भगत सिंह एवं उनके साथी ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित न्यायालयों की साम्राज्यवादपक्षीय व जन विरोधी भूमिका से अच्छी तरह वाकिफ थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार के कानून औपनिवेशिक शासन के हितों के अनुकूल चलते हैं और उनके न्यायालय साम्राज्यवादी शोषण के ही एक औजार हैं। इसीलिए उन्होंने कहा था कि ‘हर भारतीय की यह जिम्मेदारी बनती है कि इन कानूनों को चुनौती दे और इनका उल्लंघन करे।’ इसीलिए मुकदमे की सुनवाई के दौरान उन्होंने गोर्की के पावेल की तरह अपनी सफाई में कुछ भी कहने से इन्कार किया था। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार न तो न्याय पर आधारित है और न ही कानूनी आधार पर। इसलिए इस सरकार द्वारा संचालित किसी भी न्यायिक प्रक्रिया को वे कहीं से भी न्यायोचित नहीं मानते थे।  

    लेकिन भगत ंिसंह एवं उनके साथी अदालतों का बहिष्कार नहीं करते थे। वे ब्रिटिश अदालतों का भी एक राजनैतिक मंच के रूप में उपयोग करते थे। इस सम्बंध में भगत सिंह के सुनिश्चित विचार थे, जिसे उन्होंने अपने एक साथी को जेल से लिखे एक पत्र में व्यक्त किया था। उनका यह पत्र जून 1931 में लाहौर से प्रकाशित ‘पीपुल्स’ नामक एक अंग्रेजी साप्ताहिक में छपा था। इसमें उन्होंने लिखा था कि ‘राजनैतिक बन्दियों को अपनी पैरवी स्वयं करनी चाहिए’, ‘राजनैतिक महत्व के केस में व्यक्तिगत पहलू को राजनैतिक पहलू से अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए’ और ‘गिरफ्तारी के बाद उसके काम का राजनैतिक महत्व समाप्त नहीं होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी लिखा कि राजद्रोह के मुकदमों में ‘हमें अपने द्वारा प्रचारित विचारों और आदर्शों को स्वीकार कर लेना चाहिए और स्वतंत्र भाषण का अधिकार मांगना चाहिए।’ उन्होंने क्रान्तिकारियों को सावधान किया कि अगर हम ऐसे मुकदमों में अपना बचाव यह कहकर करेंगे कि ‘हमने कुछ कहा ही नहीं’, तो यह बात ‘हमारे अपने ही आन्दोलन के हितों के विरूद्ध’ होगी। इसी पत्र में उन्होंने वकीलों से भी अपील की- ‘वकीलों को उन नौजवानों की जिन्दगियां, यहां तक कि मौतों को भी खराब करने में इतने आत्महीन विशेषज्ञ नहीं होना चाहिए, जो दुःखी जनता की मुक्ति के पवित्र काम में अपने आप न्योछावर करने के लिए आते हैं।’ उन्होंने राजनैतिक मुकदमे में ज्यादा फीस लेने पर भी आश्चर्य व्यक्त किया- ‘भला एक वकील किसी राजनैतिक मुकदमें में यकीन न आने वाली फीस क्यों मांगे!’

    इन्हीं उपर्युक्त विचारों के साथ भगत सिंह व उनके साथियों ने जब भी मौका मिला, अदालतों का भरपूर राजनैतिक उपयोग किया। इस सम्बन्ध में असेम्बली बम काण्ड पर दिल्ली सेशन कोर्ट एवं लाहौर हाईकोर्ट में दिये गए उनके बयान काफी महत्वपूर्ण हैं। भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने  6 जून, 1929 को दिल्ली सेशन जज के समक्ष एक ऐतिहासिक बयान दिया। इस बयान में न केवल ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ एवं ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ के असली जन विरोधी व मजदूर विरोधी चरित्र पर प्रकाश डाला गया, बल्कि ‘काल्पनिक हिंसा’ ‘आमूल परिवर्तन’ एवं ‘क्रान्ति’ के बारे में क्रान्तिकारियों के विचार भी रखे गए। साथ ही साथ, ‘बहरी’ अंग्रेजी हुकूमत को ‘सुनाने’ और ‘सामयिक चेतावनी’ देने के लिए असेम्बली में बम फेंकने के औचित्य की भी व्याख्या की गई।

    दिल्ली सेशन जज ने जब इस केस में आजीवन कारावास की सजा सुना दी तो इसके खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट में अपील की गई। इस सजा के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करते हुए भगत सिंह ने हाईकोर्ट में काफी महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने प्रसिद्ध कानून विशेषज्ञ सालोमान के हवाले से कहा कि ‘किसी व्यक्ति को उसके अपराधी आचरण के लिए उस समय तक सजा नहीं मिलनी चाहिए, जब तक उसका उद्येश्य कानून विरोधी सिद्ध न हो जाये।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाये तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति साधारण हत्यारे नजर आयेंगे, सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी कत्ल का अभियोग लगेगा।’ इस बयान में उन्होंने असेम्बली में बम फेंकने के अपने पवित्र व जनपक्षीय उद्देश्य एवं ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के असली मतलब को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने दलील दी कि चूंकि उन्होंने असेम्बली के खाली स्थान पर बम फेंकने के ‘मुश्किल काम’ को अंजाम दिया है, इसलिए उन्हें ‘बदले की भावना से’ सजा देने की बजाय ‘इनाम’ दिया जाये।

    जैसा कि हम जानते हैं, ब्रिटिश न्यायालय ने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, राजगुरू व अन्य क्रान्तिकारियों के साथ न्याय नहीं किया (और वह कर भी नहीं सकता था) और उनमें से कईयों को मौत की बर्बर सजा सुना दी। जेल की काल-कोठरियों में बंद इन क्रान्तिकारियों ने अपने राजनैतिक अधिकारों के लिए काफी तीखे संघर्ष किए और न्यायालय के समक्ष कई मांगे भी पेश कीं। ब्रिटिश न्यायालय उनकी तमाम न्यायप्रिय मांगों को ढुकराता रहा। अन्ततः 23 मार्च 1931 को (अदालत द्वारा नियत तिथि में एक दिन पूर्व) भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

    ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह के पार्थिव शरीर को तो नष्ट कर दिया लेकिन उनके क्रान्तिकारी विचार आज भी काफी प्रासंगिक हैं। आज हमारे ‘आजाद भारत’ की न्यायपालिका भी आमतौर पर शासक वर्गों के हितों का ही संरक्षण करती हैं। हमारे देश में आज भी ब्रिटिश जमाने के जेल मैन्यूअल, भारतीय दंड विधान, अपराधिक दण्ड विधान व अन्य कानून कुछ मामूली सुधारों के साथ लागू हंै। आज भी भारतीय न्यायालयों व जेलों में क्रान्तिकारियों के साथ प्रायः उसी प्रकार का गैर कानूनी व अमानवीय व्यवहार किया जाता है, जैसा कि ब्रिटिश काल में होता था। भगत सिंह के रास्ते पर चलने वाले भारत के क्रान्तिकारियों के साथ-साथ आम जनता को भी तय करना है कि इस शासक वर्ग पक्षीय न्यायपालिका के साथ क्या व्यवहार किया जाये।

    क्रान्ति के बारे में 

    अपने बयानों और लेखों में भगत सिंह ने क्रान्ति की अवधारणा एवं क्रान्तिकारी संग्राम में विभिन्न वर्गों व समूहों की भूमिका के बारे में काफी विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने कहा कि अगर कोई सरकार जनता को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का आवश्यक दायित्व बन जाता है कि वह न केवल ऐसी सरकार को समाप्त कर दे, बल्कि वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने हेतु उठ खड़ी हो। उन्होंने क्रान्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा- ‘क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी हुई है, बदलनी चाहिए।… क्रान्ति से हमारा अभिप्राय अन्ततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसमें सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो, तथा एक विश्व संघ मानव जाति को पूंजीवाद के बंधन से और साम्राज्यवादी युद्धों में उत्पन्न होने वाली बरबादी और मुसीबतों से बचा सके।’ यह बयान उन्होंने सेशन अदालत में तब दिया था जब जज ने उनसे क्रान्ति का मतलब पूछा था। इस बयान से स्पष्ट होता था कि क्रान्ति के बारे में उनका दृष्टिकोण कितना व्यापक था।

    क्रान्ति में जनता के विभिन्न वर्गों व समूहों की भूमिका के बारे में भी उनका दृष्टिकोण काफी साफ था। वे ऐसी क्रान्ति करना चाहते थे ‘जो जनता के लिए हो और जिसे जनता ही पूरी करे’, और जिसका मतलब ‘जनता के लिए, जनता के द्वारा राजनीतिक सत्ता पर कब्जा’ करना हो। इस तरह भगत सिंह का यह दृष्टिकोण माओ की इस उक्ति से मेल खाती है कि जनता और केवल जनता ही क्रान्ति की प्रेरक शक्ति होती है। भगत सिंह क्रान्ति में किसानों-मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका को बखूबी समझते थे। वे कहते थे कि ‘गांवों के किसान और कारखानों के मजदूर ही असली क्रान्तिकारी सैनिक हैं।‘ खासतौर पर वे श्रमिकों की भूमिका पर जोर देते थे। उन्होंने कहा कि ‘साम्राज्यवादियों को गद्दी से उतारने का भारत के पास एकमात्र हथियार श्रमिक क्रान्ति है।’ इसी सन्दर्भ में वे क्रान्ति के बाद ‘सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता’ की स्थापना करना चाहते थे। वे नौजवानों को भूमिका को भी अच्छी तरह समझते थे। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र में यह कहा गया कि ‘देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुःख सहने की तत्परता, उनकी वेखौफ बहादुरी और लहराती कुर्बानी दर्शाती है कि भारत का भविष्य उनके हाथ सुरक्षित है।’ इन वर्गों व समूहों के अलावा भगत सिंह ने ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेख में बुद्धिजीवियों, दस्तकारों व महिलाओं को भी संगठित करने पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने ‘कांग्रेस के मंच का लाभ उठाने’, ‘ट्रेड यूनियनों में काम करने एवं उन पर कब्जा जमाने’ और सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों (यहां तक कि सहकारिता समितियों) में गुप्त रूप से काम करने का दिशा-निर्देश दिया।

    जहां तक क्रान्ति की मंजिल का प्रश्न है, इस पर भगत सिंह के खेमे एवं उसके बाहर के क्रान्तिकारियों के बीच काफी मतभेद थे। कुछ लोग ‘राष्ट्रीय क्रान्ति’ की वकालत करते थे तो कुछ लोग ‘समाजवादी क्रान्ति’ की। भगत सिंह इस बहस में आमतौर पर ‘समाजवादी क्रान्ति’ का पक्ष लेते थे, लेकिन उन्होंने इस क्रान्ति की व्याख्या इस रूप में की थी- ‘कोई भी राष्ट्र गुलाम हो तो वह वर्गहीन समाज की स्थापना नहीं कर सकता, शोषण का खात्मा नहीं कर सकता और मनुष्यों के बीच समानता कायम नहीं कर सकता। अतः ऐसे किसी राष्ट्र की पहली जरूरत साम्राज्यवादी गुलामी के बंधनों को तोड़ने की होती है। दूसरे शब्दों में, किसी गुलाम देश में क्रान्ति साम्राज्यवाद विरोधी और उपनिवेशवाद विरोधी होती है।’ इस उक्ति से स्पष्ट है कि वे सामन्तवाद को लक्षित  नहीं करते थे, हालांकि ‘सामन्तवाद की समाप्ति’ को भी क्रान्ति के एक ‘बुनियादी काम’ के रूप में पेश करते थे।

    हमारे देश में आज भी क्रान्ति की मंजिल के बारे में यह बहस जारी है। कुछ क्रान्तिकारी समूह ‘नव जनवादी क्रान्ति’ को अपनी मंजिल मानते हैं तो कुछ ‘समाजवादी क्रान्ति’ को। ‘नव जनवादी क्रान्ति’ को मानने वाले ‘सामन्तवाद-साम्राज्यवाद-दलाल नौकरशाह पूंजीवाद’ को लक्षित करते हैं तो ‘समाजवादी क्रान्ति’ को मानने वाले मूलतः भारतीय पूंजीवाद को।

    भगत सिंह ने क्रान्ति को सफल होने के लिए लेनिन की तरह तीन जरूरी शत्र्तें बताई- 1. राजनैतिक-आर्थिक परिस्थिति, 2. जनता के मन में विद्रोह की भावना और 3. एक क्रान्तिकारी पार्टी, जो पूरी तरह प्रशिक्षित हो और परीक्षा के समय जनता को नेतृत्व प्रदान कर सके। उनका मानना था कि भारत में पहली शत्र्त तो मौजूद है, लेकिन दूसरी और तीसरी शर्त अन्तिम रूप में अपनी पूर्ति की प्रतीक्षा कर रहा है। वे तरह-तरह के जन संगठनों का निर्माण कर एवं पहले से स्थापित संगठनों में ‘फ्रेक्शनल’ काम कर जनता के विभिन्न हिस्सों में विद्रोह की भावना जगाना चाहते थे और ‘पेशेवर क्रान्तिकारियों’ से लैश सही मायने में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करना चाहते थे। वे अध्ययन व वैचारिक संघर्ष पर काफी जोर देते थे और एक ऐसी पार्टी का निर्माण करना चाहते थे जिसका वैचारिक व राजनैतिक पक्ष सबसे उन्नत हो और जिसमें तमाम दकियानुसी व प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं को परास्त करने की क्षमता हो। इस सन्दर्भ में उनकी यह उक्ति काफी महत्वपूर्ण है- ‘इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’ वे जोर देकर कहा करते थे कि ‘एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्वास करता है। आज की परिस्थिति में जब क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक व सैद्धान्तिक पक्ष उतना मजबूत नहीं है व उसमें एकरूपता का भी अभाव है, और साथ ही साथ, जब नेतृत्व व कार्यकत्र्ता अध्ययन-मनन व वैचारिक संघर्ष पर जोर देने के बजाय ज्यादा से ज्यादा व्यवहारिक व रूटीनी कामों में ही व्यस्त रहते हैं, भगत सिंह की यह उक्ति काफी महत्व रखती है।

    भगत सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके उपर्युक्त विचार न केवल हमारे बीच कायम हैं बल्कि आज की परिस्थिति में काफी हद तक प्रासंगिक भी हंै। भगत सिंह व उनके साथियों ने क्रान्ति का जो बिगुल फूंका था, उसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनाई पड़ रही है। भगत सिंह की शहादत के बाद क्रान्तिकारी संग्राम खत्म नहीं हुआ, वह आज भी टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजरता हुआ जारी है। भगत सिंह ने ठीक ही कहा था- ‘न तो हमने इस लड़ाई की शुरूआत की है और न ही यह हमसे खतम होगी।’ यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक ‘आदमी द्वारा आदमी का’ एवं ‘साम्राज्यवादी राष्ट्र द्वारा कमजोर राष्ट्रों का ‘ शोषण व दोहन जारी रहेगा। आज जरूरत इस बात की है कि भगत सिंह के क्रान्तिकारी विचारों को आत्मसात् किया जाये और उन्हें जनता के बीच कारगर तरीके से ले जाकर भौतिक ताकत में तब्दील किया जाये। यही भगत सिंह व उनके साथियों के प्रति सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।

  • क्‍या बनारस से काशीनाथ सिंह की उम्‍मीदवारी वास्‍तविकता बन सकती है?

    काशीनाथ सिंह 
    मैं पूरी गंभीरता से एक सवाल या कहें खुला प्रस्‍ताव आप सब के सामने रख रहा हूं:

    ”क्‍या लेखक काशीनाथ सिंह को बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ कांग्रेसी/निर्दलीय उम्‍मीदवार बनाया जा सकता है?”

    ज़रा इन बिंदुओं पर सोचिए… …

    1. एक ओर जबकि पैराशूट से कुछ चमत्‍कारिक बाहरी उम्‍मीदवार बनारस में गिराए जा रहे हों, काशी की सांस्‍कृतिक-साहित्यिक पहचान का नाम काशीनाथ सिंह, मोदी विरोधी प्रतीक के तौर पर क्‍या बुरा है?

    2. काशीनाथ जी ने बीबीसी के चढ़ाए गए इंटरव्‍यू पर जबकि अपनी सफ़ाई दे दी है, क्‍यों नहीं उन्‍हें ख़ुद आगे आकर यह ऐतिहासिक जि़म्‍मेदारी अपने कंधों पर लेनी चाहिए जो जितनी प्रतीकात्‍मक है उतनी ही वास्‍तविक भी? कम से कम दिग्विजय सिंह के कांग्रेसी प्रहसन से तो लाख गुना बेहतर?

    3. क्‍या हिंदी का व्‍यापक साहित्यिक-सांस्‍कृतिक समाज बनारस की सेकुलर बौद्धिकता और ज्ञान की विरासत को बचाने हेतु खुद आगे आकर यह पहलकदमी करने की स्थिति में है?

    4. क्‍यों नहीं प्रलेस, जलेस, जसम और तमाम लेखकीय मोर्चे एकजुट होकर काशीनाथ को निर्दलीय उम्‍मीदवार के तौर पर बनारस से परचा भरवा सकते हैं और संस्‍थानों में काम करने वाले सारे हिंदीजीवी अपनी एक माह की तनख्‍वाह काशीजी के प्रचार में लगा सकते हैं?

    5. हिंदी लिखने-पढ़ने वाले व्‍यापक प्रगतिशील समाज के सामने क्‍या मोदी को रोकने से बड़ी ऐतिहासिक जिम्‍मेदारी कोई है फि़लहाल? अगर नहीं, तो यह प्रस्‍ताव क्‍या बुरा होगा?

    बनारस में चुनाव 12 मई को है। समय पर्याप्‍त है। क्‍या इस प्रस्‍ताव पर विचार कर के, इसे आगे बढ़ा के, प्रसार कर के, एक सहमति बनाई जा सकती है? कांग्रेस नहीं, निर्दलीय सही। 

    बस आखिरी बात यह समझ लेने की है कि काशीनाथ सिंह का बनारस से खड़ा होना पूरे पूर्वांचल के मतदान पैटर्न पर असर डाल सकता है क्‍योंकि राजनाथ सिंह ने बलिया से लेकर बनारस तक भाजपा के ठाकुर प्रत्‍याशियों की फसल खड़ी की हुई है। काशी का आना पूर्वांचल में भाजपा का जाना हो सकता है।

    एक बार ज़रूर सोचिएगा।

    सादर,
    अभिषेक श्रीवास्‍तव