समाजवाद के निर्माण का अर्थ केवल विशालकाय फ़ैक्टरियों और आटे की मिलों का निर्माण करना नहीं है। ये चीज़ें ज़रूरी हैं, किन्तु समाजवाद का निर्माण इतने से नहीं नहीं हो सकता। आवश्यक है कि लोगों के मस्तिष्कों और हृदयों का भी विकास किया जाये। और, प्रत्येक व्यक्ति की इस वैयक्तिक उन्नति के आधार पर, अन्ततोगत्वा एक, नये प्रकार की बलशाली समाजवादी सामूहिक इच्छा की सृष्टि की जाये जिसके अन्दर “मैं” और “हम” अभिन्न रूप से मिलकर एकाकार हो जाएँ। इस तरह की सामूहिक इच्छा का विकास गहरी वैचारिक एकता तथा उतने ही गहरे परस्परिक सौहार्द-भाव एवं आपसी समझदारी के आधार पर ही किया जा सकता है।
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