इस चुनाव में आप किस पार्टी पर जाकर ठप्पा लगायें या न लगायें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 1952 से अब तक पूँजी की लूट के गन्दे, ख़ूनी खेल के आगे रंगीन रेशमी परदा खड़ा करके जनतंत्र का जो नाटक खेला जा रहा है वह भी अब बेहद गन्दा और अश्लील हो चुका है। अब सवाल इस नाटक के पूरे रंगमंच को ही उखाड़ फेंकने का है। मज़दूर वर्ग के पास वह क्रान्तिकारी शक्ति है जो इस काम को अंजाम दे सकती है। बेशक यह राह कुछ लम्बी होगी, लेकिन पूँजीवादी नकली जनतंत्र की जगह मज़दूरों और मेहनतकशों को अपना क्रान्तिकारी विकल्प पेश करना होगा। उन्हें पूँजीवादी जनतंत्र का विकल्प खड़ा करने के एक लम्बे इंक़लाबी सफ़र पर चलना होगा। यह सफ़र लम्बा तो ज़रूर होगा लेकिन एक हज़ार मील लम्बे सफ़र की शुरुआत भी एक क़दम से ही तो होती है।
The post पूँजीवादी चुनाव की फूहड़ नौटंकी फिर शुरू क्या करें मज़दूर और मेहनतकश ? appeared first on मज़दूर बिगुल.
Leave a Reply