दयामनी बारला को बहुमत, जल जंगल जमीन पर हुकूमत !

दयामनी बारला के साथ दो दिन खूंटी लोकसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार में साथ रहे. इस दौरान कारपोरेट-सरकारी गठजोड आज जिस शातिर तरीके से उन सबकी आवाज़ चुप कराने में लगा है जो अपने आस-पास लोकतंत्र और लोगों के हक को लेकर बोलते हैं, इसकी ताज़ा मिसाल हैं दयामनी बारला. दयामनी जी ने अपने अनुभवों को हमसे साझा किया. हम यह बातचीत आपसे साझा कर रहे हैं:

जन आंदोलनों के लम्बे अनुभवों के बाद अब आपको राजनीति करने की जरुरत क्यों पड़ी ?

आज हम देख रहे कि सरकारों के एजेण्डे में जनता से सरोकार रखने वाले सवाल खत्म हो रहे है. आज सरकारे जल-जंगल-जमीन, मानवाधिकार के सवाल, समुदायक अधिकार के सवालों को जनता के सवाल नहीं मानती है. सरकार के एजेण्डे में साफ है कि कैसे कोरपोरेट घरानों को लाभ पहुचाये. यही कारण है कि आज सरकार पुरे देश में जहाँ भी प्राकृतिक संसाधन है उन्हें कोरपोरेट घरानों को सोपने में लगी हुई है. इस लूट का जो भी विरोध कर रहा है उन पर तमाम तरह से हमले किये जा रहे है जैसे- व्यक्तिगत फर्जी कैस थोपना.

केंद्र सरकार, राज्य सरकार या फिर कोरपोरेट घरानों के इर्दगिर्द घुमने वाली ताकते हो. इन ताकतों का गठजोड़ विश्व घरानों की ताकतों के साथ है. इससे निपटने के लिये जरुरी है कि देश में जितने भी हक-अधिकारों, मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण में लगे संगठनों और व्यक्तियों को एक मंच पर आना होगा तभी देश में एक सशक्त आदोलन खड़ा होगा और हम इन हालातों से निपट पायेगें.

आप किन मुद्दों को अपने चुनाव अभियान में उठा रही है ?
आज कोरपोरेट घराने सम, दाम, दंड, भेद के स्तर पर निपट रहे है. आज कोरपोरेट घरानों ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक-एक व्यक्ति को पकड़ कर उन्हें व्यक्तियों में बाँट कर ग्रामीण क्षेत्रों में घुस रहे है. अब कम्पनी सीधे जमीन नहीं खरीद रही है बल्कि उनके दलाल टुकड़ों में जमीन खरीद रहे है. आज हम देख रहे है कि सामूहिक विरोध कि ताकत कमजोर हो रही है, कोरपोरेट घराने आज सरकारों के साथ समझोते कर रहे है कि सरकार जन कल्याणकारी की भूमिका अब कम्पनियों को दे दे, जहाँ कम्पनियों को जमीने चाहिये वहा पर एनजीओ उनकी मदद कर रहे है और नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर गावों में आर्म फ़ोर्स भेजी जा रही जो नक्सलवाद के नाम पर आम लोगों का उत्पीड़िन कर रही है इससे ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पलायन कर रहे है.

अभी देश में कोरपोरेट घरानों के विरोध में तो आंदोलन खड़े हो रहे है परंतु राज्य दमन के विरोध में सशक्त आंदोलन नहीं उठ रहा है.

स्थानीय स्तर पर आपकी प्राथमिकताएँ क्या हैं ?

झारखण्ड भले ही आदिवासी बहुल क्षेत्र हो परंतु आज यहाँ पर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिय जो आंदोलन जारी है उनमें सभी लोगों को शामिल होना होगा तभी हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचा पायेगें.

आदिवासी आंदोलन अकेले आज उस मुकाम तक पहुचने कि स्थिति में नहीं है. आज हम विभिन्नता में एकता की बात कर रहे है. हमने देखा है की राज्य में अब तक आठ आदिवासी मुख्यमंत्री बने परंतु उन्होंने कोरपोरेट की दलाली के अलावा कोई कदम नहीं उठाया.

आज सबसे ज्यादा इस बात की जरूरत है कि जो भी आदिवासी संगठन या आदिवासी मंच है उन्हें आपनी सोच के दायरे को बढ़ाना होगा तभी हम झारखण्ड के सपनों को साकार कर सकते है.

 आज देश का राजनीतिक ढांचा जन मुद्दों पर आधारित नहीं रहा है. आज व्यक्तिगत फायदे के लिये राजनीति की जा रही है. पुरी चुनाव की प्रक्रिया भष्टाचार के खेल में चल रही है. ऐसी स्थिति में जनांदोलनों को एक विकल्प तलाशने की जरूरत है जो भारत की जनता के हक-अधिकारों का संरक्षण करें ताकि उनका जल-जंगल-जमीन पर हक कायम रह सके तभी भारत का असली विकास होगा.

आज देश में हजारों कम्पनियां निवेश के नाम पर आ गई है. इन कम्पनियों ने भारत के सविधान को ही कब्जे में ले लिया है. अब यह आवश्यक हो गया है कि एक ताकत बनाकर इनको टकर दी जाये.

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